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संजय असवाल "नूतन"

Abstract Action Fantasy

5.0  

संजय असवाल "नूतन"

Abstract Action Fantasy

पोडियम वाले जूते

पोडियम वाले जूते

5 mins
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शहर की उस सुबह आसमान कुछ ज्यादा ही शांत था। सड़क पर हजारों धावक थे। किसी के कदमों में रफ्तार थी, किसी की आँखों में पदक का सपना और किसी की छाती पर पिछले मुकाबलों की उपलब्धियों के तमगे। और मैं… मैं हमेशा की तरह सबसे पीछे चलने वाले सपने के साथ खड़ा था। मैं लॉन्ग डिस्टेंस रनर था—लेकिन तेज धावक नहीं। मैंने दर्जनों किलोमीटर दौड़े थे। पहाड़ चढ़े थे, गर्मी में पसीना बहाया था, बारिश में भीगा था, ठंड में कांपा था… लेकिन हर रेस का अंत एक जैसा होता था। फिनिश लाइन। फिनिशर मेडल। और फिर भीड़ में गुम हो जाता मेरा नाम। कभी पोडियम नहीं। कभी ट्रॉफी नहीं। कभी किसी ने नहीं कहा— “देखो… ये रहा विजेता!” फिर भी मैं दौड़ता रहा। क्योंकि शायद कुछ लोग जीतने के लिए नहीं, एक दिन जीतने की उम्मीद में दौड़ते हैं। एक शाम मैं एक पुराने स्टेडियम के पीछे अकेला बैठा अपने जूते के फीते बाँध रहा था। तभी मेरी नजर एक बूढ़े धावक पर पड़ी। सफेद दाढ़ी, झुकी हुई पीठ और हाथ में एक पुराना-सा जूतों का जोड़ा। वह धीरे-धीरे मेरी ओर आया। “तुम हर रेस में दौड़ते हो?” मैंने मुस्कुराकर कहा— “जी… लेकिन हर बार पीछे रह जाता हूँ।” वह हँसा। “पीछे?” “जी।” उसने अपने हाथ का जूता मेरी तरफ बढ़ा दिया। जूता देखने में बिल्कुल साधारण था। थोड़ा पुराना। कुछ खरोंचें। तले पर मिट्टी के निशान। लेकिन उसकी आँखें… ऐसा लग रहा था जैसे उसने दुनिया की हजारों दौड़ें देखी हों। मैंने पूछा— “ये किसके हैं?” वह कुछ क्षण चुप रहा। फिर बोला— “उस आदमी के… जिसने कभी कोई रेस नहीं हारी।” मैं हँस पड़ा। “सर, ऐसा धावक होता ही नहीं।” वह मेरी आँखों में देखते हुए बोला— “होता है। लेकिन उसकी जीत घड़ी में नहीं, किस्मत में दर्ज होती है।” मैं कुछ समझ नहीं पाया। उसने जूते मेरे हाथ में रख दिए। “इन्हें पहनकर अगली रेस दौड़ना।” “कितने के हैं?” वह मुस्कुराया। “कीमत? बस एक वादा।” “क्या?” “अगर कभी पोडियम पर पहुँच जाओ… तो पीछे मुड़कर देखना मत। क्योंकि उस दिन तुम्हें समझ आएगा कि तुम कितने समय से आगे थे।” मैंने पलक झपकी। और अगले ही क्षण… वह आदमी वहाँ था ही नहीं। अगली सुबह मेरी रेस थी। मैंने पहली बार वे जूते पहने। जैसे ही फीते बाँधे… मेरे शरीर में एक अजीब-सी गर्म लहर दौड़ गई। धक… धक… धक… दिल की धड़कन तेज हुई। स्टार्टिंग लाइन पर खड़ा था। सैकड़ों धावक आगे थे। पिस्टल चली— धाँय! सब भागे। मैं भी भागा। पहला किलोमीटर… मैं सबसे पीछे नहीं था। तीसरा किलोमीटर… मैं बीच में था। पाँचवाँ किलोमीटर… मैंने दस धावकों को पीछे छोड़ दिया। दसवाँ किलोमीटर… लोग मेरी ओर देखने लगे। पंद्रहवाँ किलोमीटर… मेरे क्लब के साथी चिल्ला रहे थे— “संजय! गजब..! आज तो छा गए भाई, ये क्या कमाल कर दिया ?” मैं खुद नहीं समझ पा रहा था। मेरे पैर जैसे जमीन को छू ही नहीं रहे थे। आखिरी 21 वाँ किलोमीटर आया। मेरे सामने तीन धावक थे। मैंने रफ्तार बढ़ाई। एक… दो… तीन… और फिर— फिनिश लाइन! मैंने घड़ी देखी। विश्वास नहीं हुआ। घोषक की आवाज गूँजी— “तीसरे स्थान पर… संजय असवाल!” पूरा मैदान तालियों से गूँज उठा। मैं पोडियम पर खड़ा था। मेरे हाथ में ट्रॉफी थी। आँखों में आँसू। और पैरों में वही रहस्यमयी जूते। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। अगली रेस में— दूसरा स्थान। उसके बाद— पहला स्थान। फिर पहाड़ी हाफ मैराथन— पोडियम। मैदानी 10K— पोडियम। मुश्किल ट्रेल रन— पोडियम। लोगों ने मेरा नाम बदल दिया। जो आदमी कभी सिर्फ फिनिशर था… अब उसे देखकर लोग कहते— “ये वही संजय है ना?” मेरे साथी हैरान थे। कोई मेरे जूतों को देखता। कोई मेरी ट्रेनिंग पूछता। कोई कहता— “भाई, आखिर राज क्या है?” मैं सिर्फ मुस्कुरा देता। लेकिन एक बात मुझे परेशान कर रही थी। हर पोडियम के बाद… मेरे जूते थोड़े पुराने दिखाई देते। एक दिन मैंने देखा— उनके तले में एक छोटा-सा शब्द उभर आया था। “वापसी।” फिर एक रात मैं उसी पुराने स्टेडियम पहुँचा। वही बूढ़ा आदमी वहाँ खड़ा था। मैं उसके पास दौड़कर गया। “आपने मुझे ये जूते क्यों दिए?” वह मुस्कुराया। “क्योंकि तुम्हें इनकी जरूरत थी।” “लेकिन इनमें ऐसा क्या है?” उसने मेरे जूतों की तरफ देखा। फिर बोला— “कुछ नहीं।” मैं चौंक गया। “कुछ नहीं?” “हाँ।” “तो मैं इतनी तेज कैसे दौड़ा?” वह हँसा। “जूते तुम्हें सिर्फ उतनी ही रफ्तार दे सकते हैं… जितनी तुम्हारे भीतर पहले से मौजूद थी।” मैं स्तब्ध रह गया। उसने आगे कहा— “तुम्हें चमत्कार चाहिए था। इसलिए मैंने तुम्हें जूते दिए। लेकिन चमत्कार जूतों में नहीं था… तुम्हारे विश्वास में था।” मैंने नीचे देखा। जूते गायब थे। मेरे पैरों में मेरे पुराने रनिंग शूज थे। मैंने घबराकर पूछा— “मेरे जूते?” वह बोला— “अब तुम्हें उनकी जरूरत नहीं।” “क्यों?” उसने मेरी पीठ थपथपाई। “क्योंकि अब तुम पोडियम के लिए नहीं दौड़ते… तुम उस आदमी को हराने के लिए दौड़ते हो, जो कभी सोचता था कि वह पोडियम तक पहुँच ही नहीं सकता।” मैंने पीछे देखा। वहाँ कोई नहीं था। सिर्फ स्टेडियम की खाली ट्रैक। और हवा में उड़ती एक आवाज— “दौड़ते रहो… कभी-कभी सबसे धीमा धावक ही सबसे लंबी कहानी लिखता है।” उस दिन के बाद मैंने कभी उन जादुई जूतों को नहीं देखा। लेकिन हर रेस से पहले जब मैं अपने जूते पहनता हूँ… मुझे लगता है— मेरे पैरों के नीचे आज भी वही जादू है। और शायद इसी वजह से… अब भी जब स्टार्टिंग गन चलती है, मैं सबसे तेज धावक बनने के लिए नहीं… अपनी पिछली सीमा को पीछे छोड़ने के लिए दौड़ता हूँ। क्योंकि मुझे अब पता है— पोडियम पर पहुँचने से पहले एक धावक को अपने भीतर के डर को हराना पड़ता है। और असली चमत्कार… जूते नहीं करते। चमत्कार वह धावक करता है, जो हारने के बाद भी अगली सुबह फिर दौड़ने निकल पड़ता है।


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