पहला प्यार ...
पहला प्यार ...
दीवानगी की कोई हद नहीं होती क्यूँकि ये ख़ूबसूरत होती है इतनी कि चाहे आप उस शख्स से कभी भी ना मिल पाओ फिर भी लबों पे उसके नाम से मुस्कुराहट आ जाये।
पहला प्यार ... अन्त तक धड़कता है
कैसा सफ़र है ये जिन्दगी का, हर हिस्सा कहीं ना कहीं किसी छोर से जुड़ा होता है। कोई राह मे चलते-चलते सफर पूरा कर ख़त्म हो जाता है।लेकिन कुछ हिस्से शायद ताउम्र साथ चलते है जब तक उन लम्हों को उनके हिस्से की सासें नहीं मिलती तब तलक वो कभी ख़ामोशी से कभी मन को झिंझोड़कर हुऐ साथ साथ चलते है। इन्हें ही “ कैनैटिंग डोटस् “कहते है शायद।जिन्दगी का जो एक छोर छूट गया जिन्दगी भी आगे बढ़ चली लेकिन तब भी वो लम्हा हर क़दम दबे पावँ साथ चलते है तो क्या कहे उनको।कि उनका कोई क़र्ज़ ,कोई साँस बाक़ी है जो अभी भी जीवित है।
क्यूँ है - मुझे उसका इंतज़ार। आज भी दिल के उस कोने में गाहे-बगाहे दस्तक देती है यादें उसकी। वो नहीं है, फिर भी है और था।क्या ये प्यार सब बस, मेरा ही, इक तरफ़ा था। शायद .. शायद इक तरफ़ा ही था। तभी तो आज तक इतने सालों के बीत जाने बाद भी नहीं भूली तुमको लगता है जैसे कल ही की बात हो।
फिर से यादों की पोटली की गिरहें धीरे धीरे खुल गई। कब ,कैसे , पता नहीं। पोटली से सारे लम्हें बिखर गयेफिर से मेरे ज़हन के आकाश में।वो लम्हे आज भी जीवित है, साँस लेते है अभी भी। हुआ ये अहसास मुझ को।
वो मिला तो कभी भी नहीं था वो मुझे फिर क्या है ये, क्यूँ है ये कसक उसके लिये, क्यूँ है ? नहीं मिला आजतक मुझे इसका जवाब।
कितनों को ठुकरा दिया बस चाह मे, उसकी जो शायद इक तरफ़ा थी, मेरे पास !
कितनों के दिल तोड़े है उसके ख़ातिर। ख़ाली कहाँ था दिल का कमरा कि कोई और आता। नाक ही इतनी ऊँची कि उसके बाद दिल को कोई भी छू नहीं पाया। राह मे मिली हूँ कितनों को तलाश में उसकी कि शायद कोई तो राह मिले पहुँच पाऊँ उस तक। हाँ उस तलक -जिसे पता नहीं कि मैं कहाँ हूँ अब ? कौन हूँ ? याद भी नहीं होगी उसे तो।
नहीं नहीं .. आये थे कुछ लम्हें दिल में उसके भी, जब मिलने को कहा था उसने, मिलते मिलते भी नहीं मिला वो, फिर मिला, कि ऐसे खो गया।जाने किन राहो में ... और मैं उसके ना मिलने में ही अटक कर रह गई, आज भी !!!
हाँ आज भी यादों की महक जब उठती है ते तन-मन सरोबार कर देती है। नम हो गई है आँख आज भी ख्याल से उसके।
ठीक से याद भी नहीं कैसा दिखता होगा वो, नाम भी याद करने पर याद आता है।
“सुधीर “
हाँ सुधीर, यही नाम है उसका। धड़कता है कहीं मुझ में आज भी। अब अगर कहीं दिख जाये तो पहचानूँगी कैसे ?? नहीं पता।
लेकिन फिर भी, उसकी याद ... उसका अहसास .. मेरे अहसास, मेरे वो प्यार में भीगे-भीगे जज़्बात। आज भी उसके ख्याल से नम मेरी आँखें।दिल में उठता दर्द के साथ मीठा मीठा गुबार। यानी कि मुझे आज भी उससे उतनी ही शिद्दत से मोहब्बत है जितनी 25 साल पहले थी।हाँ जिन्दगी के 25 साल बीत गये है जुदा हुए। कॉलेज में साथ पढ़ते थे, एक ही क्लास में। जाने कैसे, कहाँ उसने मुझे ढूँढा और मेरी फ्रैंड के साथ मिलकर मुझे प्रपोज़ किया। मैने कभी नहीं देखा था उसको क्लास में भी नहीं। ज़बरदस्ती दिल में आकर बैठ गया। ना कभी मिलने की ज़िद , ना कभी बात करने की ज़िद। कब नोट्स लिये जाने लगे पता ही ना चला।
“बातें भी कम हुई लेकिन
“अहसास कब जगने लगे
बिन मिले बिन बात किये
मोहब्बत हम करने लगे “
जाने कब मैं भी बिन कहे मन ही मन चाहने लगी। और वो भी मुझे, कहा उसने मेरी सहेली को सब । कि वो मुझे चाहता है मिलना है मुझको।
वो बारिश .. वो उसकी बातें आज भी मुझे कह रही है
“ तुम मुझे मिलने आओगी ना “
“नहीं मैं नहीं आऊँगी “ चाहे कुछ भी हो।
मैं तुम्हें चाहने लगा हूँ ... मुझसे मिलने
“तुम्हें आना ही होगा “ उसे यक़ीं था कि उसकी कशिश मुझे खींच कर उसके पास ले जायेगी।
आज भी वही खड़ी हूँ होस्टल के गेट के इस पार और वो होस्टल के बाहर सड़क पर उस पार ... वहीं बाहर से वो चिल्ला कर मुझे मिलने आने को कह रहा था। और हम दोनो के बीच थी एक ऊँची दीवार।
मैं आज भी दीवार के इस पार खड़ी हूँ और मेरे कानों में बस यही आवाज़ आ रही है .. तुम जरूर आओगी मुझे यक़ीं है।लेकिन तुम कहाँ हो ?? तुम्हें तो शायद मैं याद भी हूँ या नहीं ... पता नहीं। लेकिन मैं तुम्हें आजतक नहीं भुला पाई।खो गई थी कुछ लम्हों के लिये अपनी दुनिया में .. फिर भी तुम जाने कहाँ से आ गये।
उस दिन तुम्हें यक़ीं था कि मैं तुमसे मिलने आऊँगी।
उसी तरहा मुझे आज भी यक़ीं है कि “ तुम आओगे, जाने कब ,कहाँ , कैसे पहचानूँगी तुम को .. कुछ भी नहीं पता, पर तुम आओगे इक बार जरूर .. मेरे उस सवाल का जवाब देने - जो आज तक अधूरा है।

