Kumar Vikrant

Action Crime Thriller

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Kumar Vikrant

Action Crime Thriller

फकीरी

फकीरी

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हत्या

लम्बी छरहरी अदिति लकी के साथ लगभग चिपक कर चल रही थी, शाम के धुंधलके में उसे आती—जाती भीड़ की परवाह ना थी । लकी उसकी दौलत के नशे में चूर उसे खुश करने का हर प्रयास कर रहा था । तभी अचानक शाम के धुंधलके से एक साया प्रकट हुआ और बिना किसी चेतावनी के उस साये ने सायलेंसर लगी गन से उन्हें भून डाला । दोनों हक्के-बक्के कुछ देर अपने ही खून में रेंगते रहे और कुछ मिनट बाद वहीँ ढेर हो गये।

उसका जाना

"रोहित इस धन-दौलत से मेरे प्यार की तुलना कर बैठे । तुम कभी ये ना समझ सके कि ये दौलत हम दोनों के बीच एक ऐसी दीवार खड़ी कर रही है जिसके पार मैं तुम्हे नहीं देख सकती थी । मैं तो शराब को अपना भाग्य समझ कर अपने आप को उसमें डुबो चुकी थी तभी सौरभ मेरी जिंदगी में आया और मुझे जीने की उम्मीद और मकसद दिया ।" —कहकर अदिति ने रोहित से हमेशा के लिए विदा ली और उस महलनुमा घर से बाहर निकल गयी।

अदिति के शब्द रोहित के कानो में पिघले शीशे की तरह समा गए थे । जीवन से निराश अपनी ग्यारह सौ करोड़ की सम्पत्ति गरीबो, अनाथालयो और कई ट्रस्टों को दान कर ४५ वर्षीय रोहित दिल्ली की भीड़ से दूर हजारो किलोमीटर दूर हिमालय की इस कंदरा में आ बसा था ।

तीन साल बाद

तीन साल से केवल एक अधोवस्त्र में जीवन यापन, और पास के ग्रामीणों द्वारा पंहुचाया गये भोजन का त्याग भी उसे आत्मसाक्षात्कार ना करा सका, परमेश्वर से मिलाप ना करा सका ।

आज सुबह जब वो पास के पहाड़ी झरने से स्नान करके वापिस आया तो कंदरा के मुहाने पर पत्रकार शालिनी को बैठे पाया।

"पूरे साधू बन गए हो अरबपति रोहित ?" —शालिनी ने उसकी तश्वीर खींचते हुए पूछा।

रोहित ने उसकी और ख़ामोशी से देखा और कंदरा के भीतर चला आया ।

"लगता है मोक्ष की प्राप्ति नहीं हुई है ? —शालिनी ने उसके पीछे कंदरा में आते हुए कहा।

"क्या चाहती हो ?" —रोहित ने गंभीर स्वर में पूछा।

"कुछ नहीं, मैं तो तुम्हे कुछ देने आयी हूँ । —शालिनी ने खुद की लिखी एक मोटी सी हार्डबाउंड पुस्तक उसे देते हुए कहा।

रोहित ने उस पुस्तक का नाम पढ़ा— 'मिलियनेयर टू मॉन्क'

"इसे पढ़ो और जानो कि कितने मासूम सपनों को तोड़ा है तुमनेजिन ट्रस्टों को तुमने पैसा दिया उन्होंने पैसा किसी जनकल्याण के कार्यो में ना लगा कर खुद हड़प लिया । अनाथालयो को दिया पैसा अनाथालयो के ट्रस्टी हड़प गए और अनाथ बच्चे पहले से भी बुरे हाल में है । तुम्हारी एक ट्रस्ट जो १२०० मेधावी छात्रों की शिक्षा के लिए थी उससे ट्रस्टी दीनानाथ ने आयात—निर्यात का बड़ा कारोबार खड़ा कर लिया है और वो १२०० मेधावी छात्र मेहनत-मजदूरी कर अपना जीवन यापन कर रहे है ।" —शालिनी ने थोड़े से क्रोधित स्वर में कहा।

"ऐसा नहीं होना चाहिए था..। —रोहित ने पुस्तक के पन्ने पलटते हुए कहा।

"ऐसा ही हुआ है भिक्षु, तुम्हारी पत्नी ने करोड़ो का चूना लगा कर तुम्हे छोड़ क्या दिया तुम तो अपना सब कुछ दान कर महान बन गए । लेकिन तुम्हारी पत्नी उस सौरभ की भी ना हो सकी और उसे लात मारकर कोई तीसरा ढूंढ लिया और अपने अंजाम को प्राप्त हो गयी ।"

"क्या अंजाम हुआ उसका ?" —रोहित ने गहरी सांस लेते हुए पूछा।

"अदिति और उसके नए आशिक लकी की किसी ने भरे बाजार में गोली मार कर हत्या कर दी । पुलिस का शक सौरभ पर गया, उसे गिरफ्तार भी किया उसके खिलाफ ज्यादा सबूत ना थे लेकिन मोटिव के आधार पर सरकारी वकील ने उसे उम्रकैद करा ही दी।

"बुरा हुआ.। —रोहित गहरी सांस लेकर बोला।

"हाँ भिक्षु बुरा हुआ, लेकिन उनके साथ ज्यादा बुरा हुआ जिनके लिए तुम उम्मीद थे । जिसके कारण तुम भिक्षु बने वो तो दुनिया से गयी, अब उनका सोचो जिन्होंने तुम पर कभी आस लगायी थी ।" —शालिनी ने उठते हुए कहा।

शालिनी चली गयी और रोहित उस पुस्तक के साथ उस कंदरा में अकेला रह गया ।

पांच साल बाद

ट्रायडेंट ग्रुप ऑफ़ कॉलेजेस का बाहरी दिल्ली स्थित मुख्यालय आज रंगो से सराबोर है । आज होली के पावन पर्व पर हजारो छात्रों का हुजूम जम कर होली मना रहा है । सब और खुशियों के रंग बिखरे हुए है । एक बड़े हाल में विभिन्न प्रकार के पकवानो और भोजन का आनंद छात्र व मुख्यालय स्थित कर्मचारी और आमंत्रित अतिथि उठा रहे है।

अनाथ छात्रों का मसीहा रोहित उनके बीच विद्यमान है और उसके श्वेत वस्त्र भी सतरंगी रंगो से रंगे हुए है । बहुत ही व्यस्त कार्यक्रम है आज उसका, यहाँ से सीधे ट्रायडेंट अस्पताल जहाँ वो मुफ्त में महंगा इलाज पा रहे जरुरतमंदो को मिष्ठान वितरीत करेगा । उसके बाद अनाथालय, महिला आश्रम, वृद्ध आश्रम में भी मिष्ठान और वस्त्र वितरण करेगा।

शालिनी अपने कैमरामैन के साथ उसके साथ—साथ चल रही है और जानने का प्रयास कर रही है कि किस प्रकार वो भिक्षु से पुनः टायकून बन, अनाथो और मेधावी छात्रों का मसीहा बन गया । ये सब वो अपनी अगली पुस्तक- 'ए मॉन्क हू बिकेम टायकून' की सामग्री एकत्र करने के लिए कर रही थी।

रोहित शांति से उसके हर प्रश्न का जवाब दे रहा था । लेकिन वो उसे कभी नहीं बताएगा कि इस बिज़नेस एम्पायर की शुरुवात उस मध्यम आकार के हीरे को बेचकर से हुई थी जिसे वो अदिति को उसके जन्मदिन पर भेट स्वरूप देना चाहता था । लेकिन अपने ही बैडरूम में उसे सौरभ नाम के लफंगे के साथ देखकर अपनी सुध—बुध खो बैठा था । दो वर्ष बाद उसने वो हीरा बेच कर वो गन खरीदी गयी थी जिससे उसने अदिति और उसके आशिक की हत्या कर सौरभ को उनकी हत्या के जुर्म में जेल भिजवाया था । उसी गन की नोक पर उसने बदमाश ट्रस्टीयो से अपना पैसा भी वसूला था । कुछ ने पैसा वापिस किया और कुछ ने देने से बिलकुल इंकार कर दिया, कालांतर में दोनों तरह के बदमाश ट्रस्टी विभिन्न दुर्घटनाओं में मारे गए और जिंदगी के सारे अवांछित चैप्टर समाप्त कर फ़क़ीर रोहित अपने आप को पूरी तरह समाजसेवा के लिए समर्पित कर चुका था।


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