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कुमार संदीप

Abstract

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कुमार संदीप

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पौधा

पौधा

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पीहू विद्यालय से लौटकर प्रतिदिन बगीचे में झूला झूलने जाती थी। आज जब पीहू विद्यालय से वापस आई तो बैग घर में रखकर बगीचे में चली गई। विद्यालय में उसे किसी ने कहा था कि तुम जिस पेड़ पर झूला लगाकर झूलती थी न! उस पेड़ को तुम्हारे पापा ने पेड़ के ठेकेदार के हाथों बेच दिया है। जैसे ही पीहू बगीचे में पहुंचती है सन्न रह जाती है।जिस पेड़ पर वह झूला झूलती थी उस पेड़ को उसके पापा ने बेच दिया था।

उस पेड़ के पत्तों को हाथ में लेकर पीहू खूब रोने लगी और पेड़ के साथ बिताए गए हर लम्हों को याद करने लगी।घर आकर पीहू ने पापा से प्रश्न करना शुरू कर दिया।पीहू ने अपने पापा से पूछा "पापा आपने पेड़ क्यूं बेच दिया?क्यूं आपने बेवक्त उसका प्राण हर लिया?पापा चंद पैसों से आप क्या कर लेंगे? मैं जिसके साथ खेलती थी डाली पर झूला झूलती थी उस पेड़ को आपने बेच दिया ! क्यूं आखिर क्यूं ?

बेटी के मुख से इन प्रश्नों को सुनकर पीहू के पिता प्रवीण की आँखें नम हो गई।

और उसे अपने किए पर अफसोस होने लगा। पेड़ के बिना हमारा कोई अस्तित्व ही नहीं है।जन्म से लेकर अंत समय तक पेड़-पौधे हमारा साथ निभाते हैं हमें पेड़ पौधों की देखभाल अवश्य करनी चाहिए।इन बातों को सोचते हुए उसने आगे से ऐसी गलती न करने का प्रण लिया।बेटी को विश्वास दिलाया कि अब ऐसी गलती नहीं होगी।चलों आज हम मिलकर एक नया पौधे रोपते हैं।जिस पर तुम बड़ी होकर झूला झूलना और फल भी खाना।

इस लघुकथा का उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण हेतु लोगों को जागरूक करना है।पौधे न केवल हमारे बच्चों को बहुत कुछ देते हैं अपितु बड़ों को भी बहुत कुछ देते हैं। इसलिए हमारी जिम्मेदारी है कि हम पेड़ पौधों की सुरक्षा करें।


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