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संजय असवाल

Tragedy

4.8  

संजय असवाल

Tragedy

नूतन:एक आखिरी अलविदा.!

नूतन:एक आखिरी अलविदा.!

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बिस्तर पर पड़े पड़े उसे कई महीने बीत गए और ये बीमारी उसका पीछा छोड़ने को तैयार नहीं थी लगता है साथ लेकर ही जायेगी...!यही सोच सोचकर नूतन बहुत परेशान हो जाती। 

उसे हरदम यही सताता कि कहीं सच में ये बीमारी उसे साथ लेने ही तो नही आई है। अभी उम्र भी क्या है उसकी यही ३८/३९ वर्ष और इस उम्र में इतना बड़ा दुःख उसे मिला इस बीमारी के रूप में।

वर्ष २०१८ में जब पहली बार उसे पता चला कि उसे कैंसर है तो उसके पांव के नीचे से जमीन खिसक गई।वो रात भर रोती रही, खुद को कोसती रही कि आखिर किस जन्म के पापों की सजा उसे मिल रही है। उस रात नूतन और प्रदीप दोनो सो नही पाए। पूरी रात आंखों में ही कट गई। दोनो एक दूसरे को समझाते रहे रोते रहे। और सुबह उन्होंने दिल से स्वीकार किया कि अब साथ मिलकर इस परिस्थिति का सामना करेंगे बेशक दिल से अब भी दुखी थे।

आज उस बात को हुए पूरे दो साल हो गए हैं। शरीर में हो रहे बदलाव और शारीरिक दर्द की वेदना को पिछले कुछ समय से महसूस करने लगी है। बच्चों के लिए प्रदीप के लिए हरदम दुःख होता है कि अगर मैं कल न रही तो ये कैसे संभालेंगे खुद को।

बच्चे भी तो अभी छोटे हैं, हर बात के लिए मुझ पर ही निर्भर है कौन देखेगा उन्हें मेरे जाने के बाद...!

इसी उधेड़बुन में उसका समय गुजर रहा था । साथ में हर महीने की कीमोथेरेपी और उसका दर्द भी..!

प्रदीप इस अवस्था में नूतन का पूरा ध्यान रख रहा था।हर छोटी बड़ी चीज, उसकी पसंद न पसंद ,खाने पीने की पूरी जिम्मेदारी उसने खुद ही संभाली हुई थी।

बेशक इस वजह से उसका असर बिज़नस पर भी पड़ रहा था। वो पूरी तरह से उस तरफ ध्यान नहीं दे पा रहा था। हर महीने नूतन को डाक्टर के पास ले जाना, उसका कीमोथेरेपी करवाना आसान काम नहीं था।

नूतन जब भी प्रदीप को उदास गुमसुम देखती तो मन से बहुत दुःखी हो जाती आखिर उसी के वजह से सारा घर अस्त व्यस्त हो गया है। वो खुद भी तो कुछ नहीं कर पा रही थी बस बिस्तर पर लेटी रहतीं पर करे भी तो क्या आखिर उसका शरीर उसका साथ भी तो नहीं दे रहा था। वो जब भी अकेले होती तो सोचती रहतीं कि इस परेशानी से अच्छा वो मर जाती तो सभी को छुटकारा मिल जाता। दूसरी ओर छोटे बच्चों का प्रदीप का ध्यान उसे अंदर से डरा देता कि उनका आगे क्या होगा।

प्रदीप उसका इलाज अच्छे से हॉस्पिटल में अच्छे से डॉक्टर से करवा रहा था। वो नूतन के लिए पूरी भागदौड़ कर रहा था। बीमारी के इलाज के लिए पैसा पानी की तरह बहा रहा था। अपनी तरफ से उसने कोई कसर नहीं छोड़ी। प्रदीप के इस तरह पूरी समर्पित भाव से नूतन के अंदर भी जीने की चाह बढ़ जाती।

पिछले कुछ माह से नूतन की तबीयत बिगड़ने लगी है। जनवरी के कीमोथेरेपी के बाद उसने खाना पीना भी छोड़ दिया है। कैंसर धीरे धीरे उसके शरीर को अंदर ही अंदर खाए जा रहा है। पूरे शरीर में कैंसर तेजी से फैल रहा है। इसी वजह से उसके मुंह का स्वाद चला गया है और खाना पचने में दिक्कत होने लगी है।

इस परिस्थिति में अब नूतन भी हिम्मत हारने लगी है। उसके जीने की इच्छा भी खत्म होने लगी है। हालांकि प्रदीप उसे खूब मोटिवेट करता है। जीवन के प्रति जीने की बच्चों के लिए उसकी जिम्मेदारियां, उसके खुद के लिए उसे अंदर से लड़ने की प्रेरणा देता है वो खुद भी इस बीमारी से लड़ना चाहती है पर शरीर जवाब देने लगा है।

नूतन को पिछले दो तीन महीने से लगने लगा है कि अब शायद उसके पास समय कम है। बच्चों को भी अपने पास नही आने देती, उन्हें हरदम रोकती है। जब भी छोटू उसके पास मम्मा मम्मा कहते हुए आता है वो उसे दुत्कार देती है। शायद इसलिए कि बच्चों का उसके प्रति लगाव कम हो जाए और उसके जाने के बाद उन्हें ज्यादा असर न हो। ये उसकी सोच है जब आंसू भी उसके छलक जाते हैं जब वो ऐसा बच्चों के साथ करती है पर ऐसा नहीं होता है बच्चों का मां के प्रति मोह तो कभी खत्म हो ही नहीं सकता। नूतन खुद ये महसूस करती है पर क्या करे जब शरीर और किस्मत दोनों उसे दगा दे रहे हैं। वो दिनपर दिन अंदर से टूटती जा रही है। उसे खुद पर बहुत गुस्सा है खुद को कोसती है आखिर क्यों उसके साथ ही ऐसा हुआ..? क्यों ईश्वर ने उसे जन्म दिया जब उसे जिंदगी जीने से रोक रहा है आखिर क्यों..? वो घंटो आसमान को ताकती अपनी किस्मत पर रोती। उड़ते परिंदे उसे अच्छे लगते। खुला नीला आसमान दूर दूर तक फैली खामोशी उसे अच्छी लगने लगी थी। वो अक्सर अपनी बालकनी में चिड़ियों के लिए दाना डालती, उनके लिए पानी रखती तो मन को बहुत सुकून मिलता। आखिर अब यही तो उसके बस में है। 

आज नूतन की तबियत बिगड़ी तो प्रदीप उसे तुरंत हॉस्पिटल की लेकर चल पड़ा। रास्ते में नूतन लगातार प्रदीप को देखती उससे कुछ कहना चाहती मगर उसकी सांसे उखड़ रही थी। वो बस इशारे से प्रदीप को पुछ रही थी और प्रदीप उसे उसकी बात का जवाब दे रहा था। प्रदीप के आंखें भरी हुई देख नूतन उसके हाथ को अपने हाथों से थपकी दे कर उसे सब ठीक हो जाएगा कह कर तसल्ली देने का प्रयास करती तो प्रदीप उसकी तरफ देख कर बस मुस्करा देता।

कल रात जब नूतन की तबियत बिगड़ी तो प्रदीप ने उसे बाहों में भर लिया। नूतन को उसके बाहों में ऐसी शांति, ऐसी ठंडक महसूस हो रही थी मानों अगर मरना ही है तो प्रदीप की बाहों में ही मर जाऊं।

एंबुलेंस में प्रदीप की तरफ़ देखते हुए उसे उसके दर्द का अहसास अंदर तक झकझोर रहा था।आखिर कितना दर्द उसने झेला और कितना दर्द अपने अपनों को दे रही है। प्रदीप ने उसके इलाज के लिए दिन रात एक कर दिए। मंदिर गुरुद्वारों में जा जा कर उसके लिए मन्नते मांगी, ऊपवास लिए,दान दिया और नतीजा कुछ भी नही निकला। नूतन अंदर से टूट रही थीं। आखिर प्रदीप ने उसके लिए सब कुछ दांव पर लगा दिया और लाखों रुपए कीमोथेरेपी पर खर्च कर दिए पर मिला क्या शून्य..............!!

नूतन अब ऐसी परिस्थितियों में जीना नहीं चाहती थीं। कम से कम उसके ना होने पर प्रदीप बच्चों,और बिजनेस पर तो ध्यान देगा और पैसे भी यूं बर्बाद होने से बच जायेंगे। बेशक प्रदीप और बच्चों को उसकी कमी जरूर महसूस होगी पर इस दर्द से वो सब समय के साथ साथ उबर ही आयेंगे जो वो रोज झेल रहे हैं उसके साथ...!!

आज नूतन आईसीयू में एडमिट हो गई है सांसे अब थमने को तैयार है। रास्ते में आते समय उसने प्रदीप से लीची खाने की जिद की तो उसने फौरन उसकी इच्छा के लिए गाड़ी फल मार्केट की ओर मोड़ दी ।

वहां से लीची खरीदकर जब नूतन ने लीची खाई तो उसे लगा मानों उसकी आत्मा तृप्त हो गई हो। फिर उसने एक और इच्छा प्रदीप के सामने रखी कि उसे बर्फवाला मीठा चुस्की खानी है तो प्रदीप के आंखों से आंसू निकल आए। उसने हंसते हुए नूतन की तरफ देख कर कहा बच्चों वाली हरकत....... तो नूतन ने दर्द में मुस्कराते हुए कहा आखिरी इच्छा है पूरी कर लो क्या पता फिर मौका मिले न मिले।

प्रदीप रुहांसा सा नूतन की पसंद के मीठे मीठे रंगवाला बर्फ की चुस्की लेकर आया तो नूतन ने उसे बहुत देर तक तब तक खाया जब तक हॉस्पिटल नही आ गया।

हॉस्पिटल पहुंचने पर उसने खुद चलकर वार्ड में जाने की जिद की जबकि उसका शरीर साथ नही दे रहा था प्रदीप ने सहारा देकर उसे वार्ड तक लाया। डॉक्टर से मिलने पर बहुत सारे टेस्ट से उसे फिर से गुजरना पड़ा पर इस दफे वो शांतचित थी। उसे न दर्द का अहसास हो रहा था न दुनिया से विदा होने का डर सता रहा था। वो मानों अब तैयार थी इस दुनियां से विदा लेने को। जो होगा देखा जाएगा कह कर खामोश शांतचित हो गईं।

शाम को वार्ड में नूतन की हालत गंभीर हो गई मगर वो फिर भी प्रदीप से लगातार बात कर रही थी और ठीक हो जाने पर पहाड़ घूमने के लिए कह रही थी।

प्रदीप सर झुकाए सब चुपचाप सुन रहा था। डॉक्टर लगातार उसकी गिरती हालत की मॉनिटरिंग कर रहे थे। रात को उसे ब्लड की जरूरत पड़ी तो प्रदीप ने भागदौड़ कर उसके लिए पांच यूनिट ब्लड का इंतजाम कर लिया। आज की रात बहुत भारी गुजर रही थी। एक एक पल महत्वपूर्ण हो गए थे। रात में उसे आईसीयू में शिफ्ट किया गया। नूतन रात भर आईसीयू में मशीनों के शोर में खुद को अकेला महसूस कर रही थी। उधर प्रदीप रात भर आईसीयू के बाहर चहल कदमी करते हुए रात भर जागा जागा फिर रहा था। सुबह कब हुई पता ही नहीं चला। आईसीयू में नूतन भी पूरी रात परेशान रही और सुबह होते ही प्रदीप के आने पर वार्ड में शिफ्ट करने की जिद करने लगी। मशीनों की आवाजे उसे रात भर परेशान करती रही। प्रदीप ने डॉक्टर चेंबर में जा कर डॉक्टर से नूतन को वार्ड में शिफ्ट करने की गुजारिश की तो डॉक्टर ने शाम तक शिफ्ट करने की बात मान ली।

इसी बीच आईसीयू अटेंडेंट का फोन बजा कि नूतन की सांसे भारी हो गई है तो सभी आईसीयू की ओर भागे।

आईसीयू में नूतन की सांसे उखड़ने लगी थी। उसका पल्स भी लगातार गिरने लगा था। आँखें बंद होने लगी वो बदहवास सी हो गई। नूतन अब जिंदगी और मौत के बीच झूल रही थी। कब सांसे उखड़ जाए अब कहना मुश्किल था। डॉक्टर लगातार उसे वेंटीलेटर पर सपोर्ट सिस्टम दिए जा रहे थे। प्रदीप भी लगातार नूतन से बातें कर रहा था मगर नूतन शायद उसकी आवाज को नही सुन पा रही थी। डॉक्टर ने अगले कुछ घंटे क्रिटिकल बताए। अगर ये समय निकल जाएं तो शायद कुछ बात बने। प्रदीप ने नूतन के मम्मी पापा फोन कर सारी वस्तुस्थिति से अवगत करा दिया और वो लोग भी बिना समय गंवाए फौरन नूतन से मिलने उस शहर की ओर निकल पड़े।

समय धीरे धीरे कठिन होता जा रहा था नूतन की सांसे अब चंद मिनटों की शायद रह गई थी।

घर पर बच्चे भी परेशान हो रहे थे बार बार प्रदीप को फोन कर मम्मी की हालत के बारे में पूछते मगर प्रदीप सब ठीक है ठीक हो जायेगा कह कर बच्चों को ढांढस बंधा रहा था।

मगर होनी को जो मंजूर था वो होना ही था। वेंटीलेटर पर नूतन आखिरी सांसे गिन रही थी । उसकी नब्ज़ गायब होने लगी उसने बड़ी मुश्किल से हाथ से इशारा किया तो डॉक्टर ने फौरन प्रदीप को उसके पास जाने दिया।

प्रदीप के आंखों में छिपे आंसुओं को नूतन टकटकी लगाए देखती रही और उसकी आखिरी सांसे भी उखड़ गई।

नूतन की आंखें अब भी प्रदीप को देखती रही जैसे मानों कह रही हो " चलो अब आखिरी अलविदा का समय हो गया है"। मेरे चलने का समय हो गया है। इस दर्द से छुटकारा मिल गया। मेरे आंसुओ से तुम्हें दूर जाने का मौका मिल गया।

नूतन आज इस दुनियां में नहीं है। उसका हंसता मुस्कराता चेहरा बस यादों में रह रह कर आंखों के सामने घूमता रहता है।

नूतन एक नए सफर के लिए चल पड़ी है। उसे एक नया जहां नया जीवन की शुरुआत करनी है।

उसका सफर इस जहां के लिए हमारे साथ बस इतना ही था। वो बहुत सी यादों को अपने दर्द को पीछे छोड़ आगे बढ़ गई।

जिंदगी भी बहुत अजीब होती है, खुशियां छोटी गम बड़े होते हैं, आना जाना बेशक लगा रहता है पर वो लम्हें जो जीए थे साथ मगर, एक दिन सब छोड़ कर आगे बढ़ना होता है।

अब रह गई तो बस लंबी खामोशी,हर दिल में दर्द, आंखों में आंसू और एक शून्यता....!

जिंदगी एक फलसफा है 

मौत एक कविता है 

एक आखिरी अलविदा कहना ही पड़ता है।

"नूतन".......!!! तुम बहुत याद आओगी।

हम सब तुम्हें बहुत मिस करते हैं,

ढेर सारा प्यार तुम्हें एक लंबी अनंत यात्रा के लिए।

ईश्वर तुम्हें अपने श्रीचरणों में स्थान दे...!



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