नमन आपको
नमन आपको
मैं आज अपने शिक्षकों की विशेषताएँ बतलाने जा रही हूँ। अगर आप सत्तर के दशक के है तो आप मेरी बातों से सहमत होंगे बाकी जेब मे मोबाइल फ़ोन लेकर घूमने वाली पीढ़ी के लिए तो ये बाते कपोल कल्पित ही होंगी। नही मैं ना तो मोबाइल की ना ही इस पीढ़ी की बुराई कर रही हूँ। मेरा कहना सिर्फ इतना है कि मोबाइल के रूप में आज की पीढ़ी की जेब मे विराजमान दस बारह उपकरण हमारी पीढ़ी के सपनो में भी नही थे। जैसे रेडियो , टी. वी., टेपरिकार्डर, कैमेरा, वीसीआर। हाँ रेडियो था पर इतना सर्वसुलभ नही । टेपरिकार्डर नही तब ग्रामोफ़ोन थे। टीवी और वीसीआर तो बहुत बाद कि बात है। अब आप कहेंगे तो इन सब बातों का शिक्षको से क्या मतलब।
हैं ना मतलब मुझे अपने स्कूल की याद है। रंगारंग सांस्कृतिक वार्षिकोत्सव के समय हमारे शिक्षक/शिक्षिकाएं सिखाते समय भी तबला , हारमोनियम आदि वाद्ययंत्र ले कर बैठते थे। बजाते भी थे, गाना भी गाते थे और नाचना भी सिखाते थे । मैं भी शिक्षिका हूँ। आज वार्षिकोत्सव के समय हमें सिर्फ मोबाइल को सिर्फ रिपीट (पुनः) पर सेट करना होता है। टेपरिकार्डर का भी झंझट नही की बार बार रिवाइंड करना पड़े। और उस पर भी हम थक जाते है। तब मैं सच्चे दिल से नमन करती हूँ अपने शिक्षकों को जो हमे उस समय गाना गाकर वाद्ययंत्र बजा कर बार बार हमारी, पूरे स्कूल की रिहर्सल करवाते थे। जाहिर सी बात है मुख्य कार्यक्रम के दिन भी शिक्षक ही गाते थे। हमारा कार्यक्रम शाम छः बजे से रात के ग्यारह बजे तक चलता था। आज मैं अपने शिक्षकों की हालत का अंदाज़ा लगाती हूँ तो सिर श्रद्धा से अपने आप झुक जाता है।
सिर्फ एक ही नही ऐसे अनेक संस्मरण है। ऐसे अनूठे शिक्षक कि आज हम उनके पैरों की धूल भी नही है। हमारी संतोष मिस हमे भूगोल (जियोग्राफी) पढ़ाती थी, हाँ आज की भाषा मे एस. एस. टी.। वो हमें अच्छे से समझाने के लिए श्यामपट (ब्लैक बोर्ड) पर नक्शे (मैप) बनाती थी। हाँ भारत और राज्यो के नक्शे ही नही जरूरत पड़ने पर मतलब वो टुंड्रा टैगा प्रदेश सिखाते वक्त या फिर अक्षांश रेखाएं सिखाते समय, पूरे विश्व का नक्शा। एक बात बताऊँ उनके कक्षा के बाहर निकलते ही हम किताब लेकर नक्शा जांचते (चेक) थे, कि कोई तो गलती मिल जाये। पर नही हमे कभी कोई गलती नही मिली।
हमारे खेमचंद सर जो कक्षा में आते ही बोलते थे, "चलो पुस्तक निकालो पृष्ठ संख्या फलां फलां, और बगैर किसी पुस्तक के पढ़ना और पढ़ाना शुरू कर देते थे । वो हमारे संस्कृत और गणित के शिक्षक थे। वो सिर्फ हमारी कक्षा को ही नही अन्य कक्षाओं में भी पढ़ाते थे। पर कभी आ कर हमसे नही पूछा, हाँ लंबी छुट्टियों के बाद भी नही कि , मैं कक्षा में क्या पढ़ा रहा था। उन्हें सब याद रहता था। यहाँ तक कि जब शुरू शुरू में हम पढ़ते वक्त आश्चर्य से उन्हें देखते रहते और पन्ना पलटना भूल जाते वो एक निश्चित शब्द मतलब उस पन्ने के आखिरी शब्द के बाद बोलते पन्ना पलटिये।
हमारे अनिल सर, जिनका मानना था बच्चो की उत्सुकता को शांत करने से बेहतर है उन्हें मौका देना की वो खुद अपनी उत्सुकता को शांत कर सके। वो हमारे विज्ञान के शिक्षक थे। मुझे लगता बताने की जरूरत नही कि प्रयोगशाला में क्या क्या हुआ होगा। हमारे मोजे, कपड़े अधिकांश पर छोटे छोटे छेद थे। वो सिर्फ एक बार बताते थे कि ऐसा करने से ऐसा हो जाएगा। कभी नही कहते ऐसा मत करना। वो कहते मना करने से वो काम करने की इच्छा बढ़ जाती है। वो कहते अभी मैं सामने बैठा हूँ जितने चाहे उतने प्रयोग कर लो। बाद में ज़िन्दगी प्रयोग करने का मौका नही देती सिर्फ प्रयोग करती है। किसी ने पूछा सर आप विद्यार्थियों को खतरे में डाल देते हो, क्या यह गलत नही है। वो मुस्कुराए और बोले इस तरह से या तो यह लोग, बड़ो की बातों पर विश्वास करना सीख जाएंगे कि मना किया है तो कोई कारण होगा, इसे नही करना है या फिर करके सीखना।
क्या ज़िन्दगी का सबक खेल खेल में सिखाने वाले शिक्षकों को धन्यवाद कहना सूरज को दिया दिखाने जैसा नही है। फिर भी मेरा रोम रोम अपने शिक्षकों को धन्यवाद देता है।
