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Neeraj pal

Abstract


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निष्काम भक्ति।

निष्काम भक्ति।

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एक बार नारद जी कहीं जा रहे थे तो रास्ते में एक गांव में पहुंचे। वहाँ संपन्न परिवार का एक भक्त रहता था। उसने नारद जी की बहुत सेवा की ।नारद जी उसकी सेवा से प्रसन्न होकर कहने लगे तुम कुछ उदास दिखाई दे रहे हो, कहो तुम्हारी क्या इच्छा है? उसने कहा- कि मैंने बहुत भक्त महात्माओं की सेवा की है और वे सभी प्रसन्न होकर यह वायदा तो कर गए कि मेरी इच्छा पूर्ण होगी, लेकिन वह आज तक तो पूर्ण हुई नहीं, इसलिए अब आप मेरी इच्छा क्यों पूछ रहे हैं? नारद जी ने कहा-" नहीं तुम अपनी इच्छा बताओ।" तब उसने कहा कि- मेरे पास बहुत धन दौलत है और भी सब कुछ है परंतु पुत्र नहीं है। नारद जी ने कहा कि- "ब्रह्मा जी मेरे पिता हैं, उनसे कह कर मैं उनसे तुम्हारी इच्छा पूरी कर देने की कोशिश करुँगा।"

 जब नारद जी ब्रह्मा जी के पास गए, तो ब्रह्मा जी ने कहा कि-" कहो पुत्र कैसे आए।" तब नारद जी ने अपना कार्य बताया। ब्रह्माजी बोले कि- उसके प्रारब्ध कर्म ऐसे हैं कि उसे पुत्र प्राप्त नहीं हो सकता, इसलिए इसमें मैं कुछ नहीं कर सकता। नारद तो सभी देवताओं के यहाँ आते जाते रहते थे, इसलिए नारद जी ने कहा कि तब तो मैं विष्णु भगवान से जाकर इस कार्य को करने के लिए प्रार्थना करूंगा। ब्रह्मा जी ने कहा-" कि हाँ, कोशिश करो।"

 तब विष्णु भगवान के पास नारद जी पहुंचे और उन्हें अपनी प्रार्थना निवेदन की ताे कहा कि देखो नारद, यह कार्य तो हो सकता है। किंतु इतने में ही नारद जी बोले कि मैं ब्रह्मा जी के पास से आ रहा हूँ, उन्होंने उस कार्य को करने के लिए कहकर मना कर दिया कि इस मनुष्य के प्रारब्ध में पुत्र है ही नहीं। तब विष्णु भगवान बोले कि फिर तो मैं भी कुछ नहीं कर सकता, अब तो उसका जो प्रारब्ध है वही होगा। नारद जी कुछ दु:खी हुए और वहां से चल दिए।

 बहुत समय बाद नारद जी को फिर उसी रास्ते से जाने का अवसर मिला और वे उस मनुष्य के घर के सामने से निकले। वहाँ उन्होंने देखा कि उसके यहाँ एक की जगह तीन- तीन पुत्र खेल रहे हैं। वे रुके, घर के अंदर गए और पूछा कि यह कैसे हुआ। तब उस मनुष्य ने कहा कि एक महात्मा आए थे, आप की सेवा की तरह मैंने उनकी भी सेवा की। उनकी कृपा हुई और उन्होंने भी यही पूछा कि-" तुम्हारी क्या इच्छा है?" मेरे मना करने पर भी जब वे नहीं माने, तो मैंने अपनी इच्छा उनको बता दी। वह बोले,"एक,दो,तीन" और यहाँ से चले गए। उन्हीं की कृपा है कि आज मेरे 3 पुत्र हैं।

 नारद जी को बहुत बुरा लगा। विष्णु भगवान के पास गए और कहा कि आप तो यह कहते हैं कि मैं आपको बहुत प्रिय हूँ, लेकिन आज आपने तो मेरी मान -प्रतिष्ठा मिट्टी में मिला दी। भगवान विष्णु समझ गए कि क्या बात है। वे बोले, चलो थोड़ा भू-लोक चलें। भू-लोक में घूमते घूमते उन्होंने एक जगह अपनी माया रची। 

उन्होंने नारद से कहा कि-" मुझे बहुत सर्दी लग रही है, कहीं से आग का प्रबंध करो। नारद जी इधर-उधर दौड़े, उन्होंने देखा कि एक झोपड़ी में एक फकीर रह रहा है। वे उसके पास गए और कहा कि-" भाई क्या तुम्हारे पास आग का कोई प्रबंध है, क्योंकि भगवान को सर्दी लग रही है। तब वह फकीर बोला कि- तब देर क्यों कर रहे हो ? जल्दी भगवान को यहीं बुला लाओ। फकीर के पास और कुछ तो था नहीं, एक उसकी अपनी झोपड़ी थी, जिसमें उसने आग लगा दी ताकि भगवान ताप लें। जब भगवान वहाँ आये और तापते- तापते, नारद को बोले कि-" देखो ऐसे भक्तों के लिए क्या नहीं करें, जो कह देता है वह करना ही पड़ता है।" इसी को कहते हैं निष्काम भक्ति।

अतः ईश्वर को अपने भक्तों की हर बात माननी पड़ती है।


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