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नम्रता चंद्रवंशी

Tragedy


4  

नम्रता चंद्रवंशी

Tragedy


निर्वहन

निर्वहन

8 mins 450 8 mins 450

निशांत दफ़्तर से घर आया तो देखा,घर के बाहर सन्नटा पसरा हुआ था। बालकनी की भी लाईट नहीं जल रही थी।दरवाजा बाहर से सटाया हुआ था।

निशांत,दरवाज़े को धीरे से पुश(धक्का) किया और अन्दर आ गया,अन्दर आकर उसने देखा, घर में कोई नहीं था,पूरे घर में अंधेरा पसरा हुआ था।वह अपने मोबाइल का फ़्लैश लाईट ऑन किया और दरवाज़े के पास लगे स्विच बोर्ड पर बालकनी और हॉल के बल्ब का स्विच दबाया।

लाईट ऑन करने के बाद उसने देखा, अन्दर कोई नहीं था,वह हैरान था कि शाम के सात बज रहे थे ,और घर में किसी का कोई अता पाता नहीं था!!

वह मन ही मन सोच रहा था -" ज्योति भी नहीं है,आज तो उसने ऑफिस से छुट्टी ले रखी थी,तबीयत भी ठीक नहीं थी उसकी, फिर ज्योति इस टाइम पर कहां जा सकती है ,कम से कम उसे तो आज घर में होना चाहिए था!"

उसने अपने शुज को उतार कर वही दरवाज़े के पास लगे शू स्टैण्ड पर रखा, और अपने ऑफिस बैकपैक को अपने कंधे से उतरते हुए अपने कमरे में पहुंचा।अपने कमरे मै आकर, उसने लाईट ऑन किया तो देखा कि ज्योति गुमसुम बिस्तर पर लेटी हुई थी।निशांत हैरान हो गया और मन ही मन सोचा -" आज फिर इसे क्या हो गया ?आज एक और नया ड्रामा!"

                   

फिर भी उसने हिम्मत करके ज्योति से धीमे स्वर में पूछा - "क्या हुआ,अभी तक सो रही हो?"

ज्योति ने निशांत की ओर देखा भी नहीं और बेमन से उत्तर दिया -" कुछ नहीं.. हुआ है, और अभी तक का क्या मतलब है,क्या मै दिन भर से सोयी ही हुई हूं ?"

निशांत ने ज्योति का मूड भांप लिया और प्यार से बोला -" कुछ तो हुआ है!नाराज़ हो मुझसे?"

ज्योति ने तिरछी नज़र से निशांत की तरफ़ देखा और बोली - "नहीं ...,भला मैं क्यूं नाराज़ होऊंगी तुमसे?"

निशांत ने अपने कपड़े उतरते हुए कहा -" ऐसा क्यूं कह रही हो? पूरा हक है तुम्हे नाराज़ होने का..।"

ज्योति गुर्राते हुए निशांत को देखी और धीमे स्वर में बोली -" बस नाराज़ ही होने का हक है!बाकी और कुछ हक तो है ही नहीं।"

निशांत ने टीशर्ट पहनते हुए ज्योति की तरफ देखा और बोला -"और क्या हक चाहिए मेरी जान को?"

ज्योति ने अपने बदन से चादर हटाया और पलंग के सहारे बैठकर इत्मीनान से उत्तर दिया - " मां बनने का हक़..."

निशांत कपड़े चेंज करके ज्योति के बगल में बैठ गया और ज्योति का हाथ अपने हाथों मै लेते हुए बोला -" तृषा की शादी हो जाए बस,उसके बाद हमलोग अच्छे से फ़ैमिली प्लैनिंग करेंगे।?

ज्योति अपने हाथों को जोर से खींचते हुए बोली - " कब निशांत?पांच साल हो गए हमारी शादी को, और तृषा अभी भी पार्ट टू में है,उसकी शादी होते - होते और तीन साल बीत जाएंगे,और फिर हमारी भी तो उमर बढ़ती जा रही है।"

निशांत ने ज्योति को अपने और खींच लिया और गले से लगाते हुए बोला -" ओके मेरी जान ,हम बाद में इत्मीनान से बात करते है न इस बारे में।"

ज्योति को पता था, निशांत हर बार यही कहता है, ओर इत्मीनान की वो घड़ी कभी नहीं आती!

निशांत ने ज्योति को सीने से लगा लिया और माथे सिर को चूमते हुए बोला -"तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है,तुम आराम करो,वैसे तृषा और मां कहां गईं हैं?"

ज्योति ने सिर नीचे कर के मुंह बनाते हुए उत्तर दिया -" गईं होंगी कहीं मौज - मस्ती करने,जिस दिन मै घर में रहती हूं,उस दिन उनकी कदम घर में टिकतीं कहां हैं! तुम्हें तो पता है आज मेरा पीरियड का पहला दिन है और मुझे कितना स्टमैक पेन होता है, इसके बावजूद मैंने सुबह का नाश्ता ,दोपहर का खाना , यहां तक कि पूरे घर की साफ सफाई भी की..,अभी शाम को मुझे ज्यादा पेन होने लगा तो लेट गई हूं,और देखो वे दोनो कहां निकल गईं हैं..!"

निशांत ने ज्योति के बातों को काटते हुए कहा - "ठीक है ,तुम आराम करो, मैं देखता हूं।"

निशांत को पाता था कि ज्योति एक बार बोलना शुरू करती है तो फिर रुकती नहीं है।पांच सालों से वह एक ही बात (या कहें ताने)सुन सुन कर थक गया था।

"तृषा की शादी कर दो,बच्चे कर लो ,अपने बारे में सोचो "और न जाने क्या क्या ज्योति के इन बातों से वह तंग आ गया था।

" कैसे कर लूं बच्चे,अपने बस में थोड़े ही है,आखिर कोशिश तो कर ही रहा हूं ना,कई शहरों में नामी- गिरामी डॉक्टर्स से इलाज भी तो करवाया ,अब नहीं हो रहा है तो इस में, मै क्या कर सकता हूं,रही बात आईवीएफ ट्रीटमेंट की, तो तृषा की शादी कर दूं ,इसके आईवीएफ ट्रीटमेंट भी करवा लूंगा ,पता नहीं तृषा की शादी में कितने पैसे लगेंगे?"निशांत मन ही मन बडबडाते हुए किचेन कि ओर चल दिया।

                      

किचेन में जाकर निशांत ने लाईट जलाया तो देखा सुबह के बर्तन सिंक में ही पड़े हुए थे,किचेन डस्टबिन भी कचरे से लबालब था। गैस चूल्हे पर दाल और सब्जी गिरे हुए थे।वह बर्तन स्टैण्ड पर टंगे कपड़े उतारा और चूल्हे की साफ - सफाई में जुट गया।चूल्हा साफ करने के बाद उसने सक्रोच ब्राइट और विम बार उठाया और बर्तनों को चमका कर बर्तन स्टैण्ड में सजा दिया।किचेन कि साफ सफाई के बाद वह पूरे घर में झाडू लगाना शुरू किया,इसी क्रम में वह अपने रूम में पहुंचा तो देखा, ज्योति अभी भी लेटकर मोबाइल चला रही थी।

                    

निशांत टूट चुका था अन्दर ही अंदर , उसका अपने अपने अनुसार, सबलोग इस्तेमाल कर रहे थे, मां चाहती थी कि निशांत अपनी बहन को पढ़ाए - लिखाए और एक अच्छे लड़के से शादी करे,ज्योति चाहती थी कि निशांत अपने परिवार को छोड़ कर ,अकेले उसके साथ रहे और अपना परिवार बनाए,इसके लिए ज्योति हमेशा निशांत से कुछ न कुछ बात को लेकर झगड़ा करते रहती थी।तृषा को भी पैसों कि कोई क़दर नहीं थी,पानी की तरह उड़ाती थी पैसे,सैलरी भी ज्यादा नहीं थी ,आज कल तीस हजार महीने की क्या कीमत है,ज्योति को जो सैलरी मिलता है वो उसी के मेंटेनेंस में चला जाता है,

पापा की कमी महसूस न ही इसके लिए निशांत तृषा के हर डिमांड को पूरी करता था। मां को भी पापा के सहारे की कमी न महसूस हो इसके लिए वह मां के हर एक फैसले में हामी भर देता था।रही सही कसर ज्योति निकाल देती थी।

आज उसके साथ पहली बार ये सब नहीं हो रहा था,पिता को गुज़रे चार साल हो गए थे। और उनके गुजरने के कुछ दिनों के बाद से ही निशांत का यहीं हाल था।

                  

निशांत ने घर की साफ सफाई करने के बाद चाय बनाने के लिए ,दूध को गैस पर च कर सब्जी काटने के लिए चाकू और एक बर्तन में भिंडी निकल कर खाने की टेबल पर रखा।दूध में चाय पत्ती,चीनी,और अदरक डालकर गैस को धीमी आंच में कर के एक एक कुर्सी लगाकर बाहर हॉल में सब्जी काटने लगा,पंखे को हल्का तेज कर दिया ताकि पसीना जल्दी सुख जाए।

                   

निशांत थोड़ी देर बाद, वापस किचेन में गया तो चाय उबाल गया था ,उसने दो कप निकला और दोनों कपों में चाय भरकर एक प्लेट में सजा कर निकाल पड़ा।अपना कप हॉल में टेबल पर रखते हुए दूसरा कप लेकर अपने रूम में पहुंचा।ज्योति अभी भी मोबाइल में हेडफोन लगकर विडियो देख रही थी।

निशांत ने बेड के सिरहाने पर चाय रखा और ज्योति के बालों को सहलाते हुए कहा -"मस्त चाय बनी है,पी लो थोड़ा आराम मिलेगा और अच्छा लगेगा।"

ज्योति ने विडियो म्युट करते हुए जबाव दिया -"ठीक है..."

                     

निशांत चाय पीते हुए सब्जी काट रहा था तभी उसके कानों में स्कूटी की आवाज़ पड़ी।

"लगता है मां और तृषा आ गए"उसने बड़बड़ाते हुए कहा। इसने झट पट अपना हुलिया थोड़ा ठीक किया और आराम से बैठ कर चाय पीने लगा। मां ने आकर हाथ मुह धोया और किचेन में जाकर चाय गरम की और कप में डालकर लेकर आईं और हॉल में लगे सोफे पर बैठकर पीने लगी।मां ने निशांत को थोडा असहज देख कर कहा - "क्या हुआ बेटा?

निशांत ने घबराते हुए दिया -" कुछ नहीं मां,वैसे आपको कहां गए थे?"

मां ने लंबी सांसे भरते हुए उत्तर दिया -" वो...चांदनी चौक वाली वाली परी मौसी...,बुला रही थी कितने दिनों से,लेकिन ,समय ही कहां मिलता था घर द्वार से,आज तृषा के ट्यूशन भी छुट्टी था और ज्योति भी घर पर थी तो सोचा घूम आऊं।"

निशांत ने सिर हिलाते हुए जवाब दिया -" अच्छा किया मां।"

मां ने आस पास ज्योति को नहीं देखकर निशांत से पूछा - " ज्योति कहां है बेटा?"

निशांत ने चाय का कप टेबल पर रखते हुए जवाब दिया - " अभी ही आपके आने से पहले, चाय बनाने के बाद,यही बैठकर सब्जी काट रही थी कि अचानक चक्कर आने लगा तो कमरे में जाकर आराम कर रही है।"

मां ने मुस्कुराते हुए बोला -"ठीक है बेटा,आराम करने दे उसे।"

मां मन ही मन खुश हो जाती हैं ,उन्हें लगता है कुछ खुश खबरी आने वाला है उन्हें क्या पता कि आज तो ज्योति का पीरियड स्टार्ट हुआ है?

                 

तृषा भी ड्रेस चेंज करके हॉल में आ गई, उसने सुना था कि भाभी की तबीयत ठीक नहीं है इसलिए वह निशांत के बगल में आकर बैठ गई और चाकू छीनते हुए बोली -" लाइए भईया सब्जी मै काट देती हूं,और हां आज आप लोग को मेरे हाथ का बना खाना भी खाना पड़ेगा!"

आगे उसने बोलना जारी रखा -" भईया आप जाइए और भाभी का ख्याल रखिए,मै सारा काम कर लूंगी।"

निशांत ने तृषा के गालों में गुगली किया और दुलारते हुए कहा - "ठीक है,मै जा रहा हूं.. प्यारी गुड़िया।"

               

निशांत कुर्सी पर से उठा ही था को मां ने निशांत को याद दिलाते हुए कहा - "बेटा याद है न,कल तृतीय है और कल तुम्हारे पिता जी का श्राद्ध है कल,पंडित जी ने कहा है कि श्राद्ध का निर्वहन ठीक ठीक करने से दिव्यागत आत्मा को असीम शांति मिलती है।"

निशांत उठा और अपने सिर पर हाथ फेर कर बालों को हल्का खींचते हुए हल्के स्वर में बोला -" सिर्फ निर्वहन ही तो कर रहा हूं मां,अपने कर्तव्यों का सबके प्रति,तुम्हारे ,तृषा और ज्योति के प्रति,और हां पापा के प्रति भी।

मेरे प्रति पता नहीं किसी का कोई कर्तव्य है या नहीं ?"


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