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नम्रता चंद्रवंशी

Drama Tragedy


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नम्रता चंद्रवंशी

Drama Tragedy


बेरोक मुहब्बत।

बेरोक मुहब्बत।

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आज वर्षों बाद मैं अपना जीमेल अकाउंट खंगाल रही थी। एक एक कर के विज्ञापन वाली सैकड़ों मेल्स डिलीट करके मैं थक गई थी। सोची, औल डिलीट का बटन दबा दूं! तभी कुछ ऐसा दिखा, जिसका मुझे कोई अंदाज़ा नहीं था। पहली बार देखा तो मुझे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ! आंखों को मीचा और दुबारा देखा !इस बार विश्वास हो गया। ये उसी का मेल था जो लगभग एक साल पहले आया हुआ था! मैंने एक पल की भी देरी न लगाते हुए, जल्दी से मेल ओपन किया और पढ़ने लगी। मेल बस एक लाइन का था -" how are you?I wanted to talk to You." इस एक लाइन ने ही मुझे दुनिया की सारी खुशियां से सराबोर कर दिया। मुझे अपने रेगुलर मेल्स न चेक करने की आदत पर बहुत गुस्सा रहा था! मैं कोस रही थी अपने आप को , मैंने मेल्स पहले क्यूं नहीं देखा? क्या बात करनी होगी उसे ?? मैंने शायद अपना एक ऑपर्च्युनिटी खो दिया, आदि!! ढेर सारे सवाल और विचार मेरे मन में नदी की धार की तरह बहने लगें। मैंने मेल को कई बार पढ़ा, हर बार ऐसा लग रहा था मानो मैं उसके और करीब आते जा रही हूं। दस सालों में पहली बार उसने मुझे याद किया था! और मै? मुझे बहुत अफसोस आ रहा था।

खैर ,मैं बहुत खुश थी, मेरी खुशी का कोई ठिकाना ही नहीं था, कम से कम उसने मुझे याद तो किया ,इतना ही बहुत था मेरे लिए। मैंने मेल डिलीट नहीं किया और अर्चिव्ड में डाल दिया ताकि मेरे पति विपिन की नजर न पड़ जाए!

मेरे होंठों पर अनवरत मुस्कान दौड़ रही थी। मन ही मन सोच रही थी कमीने को आखिर मेरी याद आ ही गई!

प्रतीक से ब्रेकअप हुए लगभग दस साल बीत चुके थे। इन दस सालों में मैं कभी भी मेंटली उससे अलग नहीं हो पाई थी। और आज भी नहीं! वह मेरे साथ भले ही नहीं था लेकिन मैं, मैं हर दिन हर पल उसी के साथ थी। एक दिन, एक पल भी भूल नहीं पाई थी उसे। मेरी जिंदगी बेरंग हो गई थी उसके बिना। कहीं भी जाऊं कुछ भी करूं, मेरा मन ही नहीं लगता था! शायद मैं "मिसिंग ए टाइल्स सिंड्रोम" का शिकार हो गई थी।

मुझे मालूम था कि प्रतीक के लिए मैं सिर्फ और सिर्फ एक एक्स हूं ,फिर भी पता नहीं क्यूं प्रतीक की तरह मैं अपने दिल में किसी और के लिए स्पेस क्यूं नहीं बना पाई??

प्रतीक ब्रेकअप के बाद दिव्या के साथ बेहद खुश था। दिव्या को भी प्रतीक का साथ खूब जंचता था। लेकिन मैं?? मैं सिर्फ खुश रहने की कोशिश करती रही, आज भी कर रही हूं। खास कर प्रतीक के सामने, मैं खुश दिखने का भरपूर प्रयास करती थी, शायद इसीलिए वह मेरे अंदर छिपे दर्द को पहचान न सका! मेरी जिंदगी बरसात फिल्म के प्रियंका चोपड़ा जैसी हो गई थी।

लेकिन इतने दिनों बाद ईमेल देखा तो सारे दुख दर्द भुलाकर मैं खुशी के मारे फूले नहीं समा रही थी। मैं गुम गई यादों कि हसीन, ख़ूबसूरत और मीठी गलियों में...

प्रतीक मेरे बचपन का एक मात्र दोस्त था। मैं और प्रतीक धनबाद में एक ही कॉलोनी में रहते थे। मेरे घर से उसके घर की दूरी लगभग सौ मीटर थी। स्कूल के बाद शाम को छत पर खड़े होकर एक दूसरे को निहारना और इशारों में बातें करना , हमारे हर शाम के रूटीन में शामिल था।

प्रतीक और मैं एक ही स्कूल में पढ़ते थे। वह मुझसे एक क्लास सीनियर था। क्लास में हरबार टॉप करता था मेरा प्रतीक! मुझे पढ़ना लिखना ज्यादा पसंद नहीं था, और कभी लिखने पढ़ने की ज्यादा कोशिश भी नहीं की , जरूरत ही नहीं महसूस हुई थी! मेरे जीवन में प्रतीक के अलावा और कुछ नहीं था, जो मैं हासिल करना चाहूं। प्रतीक तो आलरेडी मेरे पास ही था, फिर और क्या चाहिए मुझे? टॉपर लड़कियां भी जलती थी मुझसे !फिर मुझे पढ़ने की क्या जरूरत?

हमारा समय बहुत अच्छा बीत रहा था।लेकिन मुझसे गलती हो गई ,मैंने प्रतीक को गारंटीड ले लिया और अपने रिश्ते के प्रति लापरवाह हो गई।मुझे लग रहा था, प्रतीक मेरे अलावा किसी और का कम से कम इस जिंदगी में तो नहीं हो सकता है! वो किसी से भी बात करे, किसी के साथ घूम - फिरे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता था। मुझे उसके किसी बात पर आपत्ति नहीं होती थी। कभी होती भी थी तो मैंने जताना छोड़ दिया था।

बारहवीं पास करने के बाद उसका एडमिशन शहर के ही दूसरे कॉलेज में हो गया। मैं एक क्लास जूनियर थी इसलिए मुझे एक साल किसी तरह उसके बिना ही काटनी थी! मैंने अपने आप को धैर्य दिया और एक साल अलग रहने के लिए साहस बंधा।

दिव्या उसकी क्लासमेट थी, सुंदर ,सुशील और पढ़ाई में प्रखर भी। बारहवी के बाद दोनों ने एक ही कॉलेज में एडमिशन लिया। मैं हमेशा दोस्ती और प्यार को अलग अलग समझती थी। मुझे लगता था कि दिव्या ,प्रतीक की सिर्फ दोस्त है ,और मैं ,मैं तो राधा हूं उसकी! मैंने उसे दिव्या से कभी भी, किसी टाइम पर बात करने की खुली छूट दे दिया था। धीरे धीरे प्रतीक मेरा फोन कट करके दिव्या से बात करने लगा। जैसे जैसे समय बीतता गया मेरे लिए प्रतीक के पास टाइम कम होते चला गया। एक समय ऐसा आ गया, मैं घंटों - घंटों वेटिंग पर रहने लगी। मैंने वजह जानने की बहुत कोशिश की लेकिन हरदम नाकाम रही। प्रतीक और दिव्या प्यार में थे इसका पता मुझे चलने लगा था लेकिन प्रतीक और दिव्या ने इस बात को कभी स्वीकार नहीं किया, ऊपर से मेरे दिमागी अवस्था पर भी सवाल उठाने लगे। मेरे मन से शांति गायब हो गई, दिल हरदम कोई न कोई उलझन में फंसा रहता।

प्यार मोहब्बत ग़लत है, हमें पेरेंट्स शादी के लिए अलाव नहीं करेंगे, पढ़ाई जरूरी है आदि आदि बातों का हवाला देकर धीरे - धीरे उसने मुझसे पूरी तरह से किनारा कर लिया!

मैं टूट गई थी अन्दर से। मन नहीं मानता तो कॉल लगा देती, लेकिन प्रतीक का कोई रेस्पॉन्स नहीं आता। समय बीतने के साथ साथ मैंने भी उसके अध्यात्म कि ओर झुकाव की बातों पर यकीन कर लिया। करीब आठ नौ सालों तक मैंने सिर्फ उसी का इंतेज़ार किया। मुझे अभी भी यकीन था कि प्रतीक मेरे लिए अध्यात्म और संन्यास कि भावनाओं को त्याग कर मेरे पास जरूर लौटेगा!

इन आठ नौ सालों में मैंने पढ़ाई में मन लगाया ताकि खुद को प्रतीक से डायवर्ट कर सकूं। पढ़ाई के बाद मैंने कॉम्पटीशन एग्जाम्स की तैयारी की। हाई स्कूल के टीचर्स के लिए एग्जाम दिया और हाई स्कूल में टीचर बन गई।

मुझे लगा अब तो प्रतीक मेरे पास आ जाएगा लेकिन मैं गलत थी, उसने तो मुझे कंग्रॅजुलेशनस तक नहीं कहा। मेरा फ्रेंड रिक्वेस्ट उसे फेसबुक अकाउंट में अभी भी कन्फर्मेशन की राह देख रहा है। सच तो ये है कि मैं क्या कर रही हूं क्या नहीं ,उससे उसे कोई फर्क नहीं पड़ता था। एक मैं , जो पलकों पर उसकी आस लिए बैठी थी!

आस हो भी भला क्यूं नहीं उसने मुझे कभी नहीं कहा था कि वो मुझसे प्यार नहीं करता, बल्कि अध्यात्म कि ओर झुकाव के कारण वह प्यार मोहब्बत, सांसारिक मोह - माया और दुनिया - दारी से विमुख हो गया था!

समय बीतने के साथ मेरे मां बापूजी मेरी शादी के लिए चिंतित रहने लगे ।उनकी चिंता का भी मुझ पर कोई असर नहीं होता था। मैं बिल्कुल पत्थर और स्वार्थी हो गई थी ।

मेरी हालत देख मेरे मां - बापू ने मेरी शादी विपिन से तय कर दी। आखिरकार मैंने भी मां - बापूजी की बात मां ली और विपिन से शादी कर ली। मैनें अपना मैरिज फेसबुक स्टेटस पर भी अपडेट किया, लेकिन आज तक उसने, एक विश तक टाइप करने की भी जहमत नहीं उठाया।

मेल पढ़ने के बाद, उसे मुझसे क्या बात करनी थी जानने के लिए मैं व्याकुल हो गई। मैंने उसके पुराने नंबर पर डायल किया लेकिन वो नंबर किसी और को मिल चुका था। मुझसे अलग होने के लिए उसने नया सिम खरीद लिया था, जिसका नंबर उसने आज तक मुझे नहीं दिया, कुछ दोस्तों के नम्बर थे लेकिन अब वे लोग भी अपने नम्बर बदल चुके हैं। क्या करूं कुछ समझ नहीं आ रहा था।

मैंने सोचा उसके फेसबुक अकाउंट से शायद कुछ पता चले। मैंने अपना फेसबुक अकाउंट फिर से एक्टिव किया और सर्चर में प्रतीक टाइप करके, सर्च का बटन दबा दिया। सर्च रिजल्ट्स को स्क्रॉल करते करते मेरी आंखें एक प्रोफाइल पर आकर रुक गई। नाम देखा तो प्रतीक दिव्या सिंह। मैंने तुरंत ही फोटो पे क्लिक किया ,अब वह बिल्कुल मेरी नज़रों के सामने था। उसकी तस्वीर दिव्या के साथ हाथ में हाथ डाले काफी शानदार लग रही थी, कहीं स्टूडियो में फोटो शूट करवाया होगा! मैंने उसका प्रोफाइल देखा तो शादी की सुंदर सुन्दर सैकड़ों तस्वीरें सज रही थी प्रोफाइल में। एक साल पहले ही उसने "मैरिड विथ दिव्या " का स्टेटस भी अपडेट किया था।

मैं समझ गई की उसने मुझे अपनी शादी का इन्विटेशन देने के लिए मेल किया होगा! मैं मेल को आर्चीव्ड से निकाल कर डिलीट ही करने वाली थी कि बिपिन ने पीछे से आकर मेरी आंखें बंद कर दी और लैपटॉप को शटडॉउन करके अलमारी में रख दिया, मुझे अपने कंधों का सहारा देकर बेड पर बिठाया कुछ सेकंड के बाद मैंने आंखें खोली तो देखा मेरे सामने जगमगाता हुआ हीरों का हार ,और विपिन का प्यार भरा मुस्कुराता चेहरा था। विपिन ने मुझे गले से लगा लिया और धीरे से कहा -" आई लव यू स्वाति।"

मैंने एक पल की भी देर न लगाते हुए तुरंत उत्तर दिया -"आई लव यू टू विपिन।"

         


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