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निर्धन गुण

निर्धन गुण

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रोहन की कविताएँ सबको मंत्रमुग्ध कर देती थीं। हिन्दी व अंग्रेज़ी दोनों ही साहित्य में उसे अच्छी महारथ हासिल थी। इतनी छोटी उमर में ही उसने न जाने कितनी ही डायरियाँ भर दी थी, अपने ‌लेखन से। लेखन के साथ साथ ही उसे चित्रकला का भी बहुत शौक था। दोनों ही गुणों कि देख उसके स्कूल के सभी शिक्षक उसकी तारीफ़ों के पुल बांधते थे। दसवीं की शिक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात उसने कला विषयों में अपना कैरियर बनाने की योजना तैयार की।

जब उसने अपने इस निर्णय के विषय में अपने पिताजी को बताया तो वह आगबबूला हो गये। उन्होंने रोहन को साफ मना कर दिया कि शौक मन की शांति के लिये पर्याप्त है किन्तु एक संपन्न जीवन व्यतीत करने के लिये इन्हें कैरियर बनाना मूर्खता है। रोहन भी अपनी दलीलें देता रहा कि उसे मन की शांति ज्यादा पसंद है। थोड़ा हो,किन्तु मन का हो ,वह ज्यादा आवश्यक है।

काफी बहस होने के बाद रोहन को पिता के आदेश के समक्ष झुकना पड़ा। उसने विज्ञान विषयों के साथ अपनी आगे की पढ़ाई पूरी की और एक अच्छी कम्पनी मे कार्यरत हो गया। धन दौलत की अब कोई कमी नहीं थी उसके पास किन्तु मन की शांति कहीं खो गई थी। व्यस्त जीवन शैली ने उसकी कलम और पेंटिंग ब्रुश को छीन लिया था। शायद उस दिन उसके पिताजी के आदेश के बाद उन दोनों ने ही आत्महत्या कर ली थी क्योंकि धन एक बार फिर गुणों पर भारी पड़ गया था।


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