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आहूति

आहूति

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बंगले के गेट से लेकर चौखट के अन्दर तक सब जगह फूलों की सजावट हो रही है। हो भी क्यों ना! आज सुशीला देवी बहुत खुश जो हैं। आखिर पाँच साल बाद उनकी सबसे छोटी बहू को बेटा जो हुआ है। हवन का आयोजन कराया गया है,साथ ही सभी मेहमानों को रात्रिभोज के लिये भी आमंत्रित किया गया है।

सब ओर भागदौड़ दिख रही है। सुशीला देवी के बड़े बेटे व बहू ने हवन का सारा कार्य भार संभाला हुआ है तथा मझले बेटे व बहू ने रात्रिभोज के कार्यक्रम का। दोनों बेटे व बहुएँ पूरी तन्मयता से अपने कार्यों में जुटे हुए हैं।

सुशीला देवी के संपूर्ण परिवार में उनके रुतबे और अपने बेटों को दिए संस्कारों की प्रशंसा की जाती है। उनके बेटे व बहुएँ उनकी आज्ञा को सर्वोपरि मानते हैं।

हवन की सम्पूर्ण सामग्री अग्निकुंड के आस पास सजी हुई है। पंडित गण तेैयारी में लगे हुए हैं। सब ओर सजी फूलों की लड़ियाँ वातावरण को आकर्षक व सुगंधित बना रही है। मेहमानों का आगमन भी शुरु हो गया है।

घड़ी में दस बजते ही,सुशीला देवी अपनी रौबदार वेशभूषा में, अपने नवजात पोते को हाथों में लिये आगमन करती हैं।  उनके मझले पुत्र, पुत्रवधू और उनके दो बेटे तथा छोटे पुत्र व उसकी पत्नी भी साथ में हैं। सबकी नज़र उनके परिवार की तरफ मुड़ जाती है। बड़ा बेटा व उसकी पत्नी हवन कुंड के पास खड़े उन सबका इंतज़ार कर रहे हैं। बड़े बेटे के दोनों बेटे भी अपनी दादी के पास दौड़ते हुए जाते हैं और परिवार में शामिल हो जाते हैं। सब अग्निकुंड के आस पास बैठ जाते हैं। सुशीला देवी अपने पौत्र को उसकी माता की गोद में देती हैं। पंडित जी मंत्रोच्चारण के साथ हवन शुरु करते हैं।

सबका ध्यान पंडित जी के क्रिया कलापों की तरफ है जबकि छोटी बहू की दृष्टि किसी को ढूँढ रही है। यकायक उसकी नजर एक जगह जाकर अटक जाती है। बंगले के मुख्य द्वार की चौखट के दरवाज़े की आड़ से कोई झांक रहा है। सहमा सा मासूम चेहरा, कभी अपनी माँ को देखता तो कभी अपनी दादी को। सुंदर सी फ्रॉक पहने और बालों मे फूल सजाये, नन्ही सी नौ वर्ष की यह परी, सुशीला जी की पौत्री "नेहा" है, जिसे हवन और रात्रि भोज के कार्यक्रम में ना सम्मिलित होने के सख्त आदेश मिले हैं। किन्तु बाल मन स्वयं को कैसे रोक सकता है!अत: दरवाज़े की आड़ से ही झांक कर सबको देख रहा है। उसकी तरसती आँखे अपने माता पिता की गोद में बैठने को और परिवार में सम्मिलित होने को अधीर है।

नेहा, सुशीला देवी की छोटी बहू की बेटी है, जिसे उनकी बहू ने झूठ बोलकर जन्म दिया है और इसके लिये वह आज तक सुशीला देवी के तिरस्कृत शब्दों की शिकार है। नेहा ने भी कभी अपनी दादी का प्रेम नहीं पाया। उन्होंने सदैव ही नेहा की ओर घृणा की दृष्टि से देखा है।

सुशीला देवी मानती है कि उनके परिवार में सिर्फ पुत्र ही जन्म लेगें। पुत्रियों का उनके घर में कोई स्थान नहीं है।

तभी पंडित जी हवनकुंड की अग्नि में आहूति देने को कहते है। सुशीला देवी सहित सभी बेटे व बहुएँ अग्नि को आहूति देते है। आहूति देते ही अग्नि से उठते धुंए में उन छह अजन्मी कन्याओं की तस्वीर उभरने लगती है जिनकी उन तीन बहुओं के गर्भ में ही सुशीला देवी ने वंशवाद के नाम पर आहूति दे दी थी। उधर अबोध नेहा के मन में अनसुलझे प्रश्नों के बादल घुमड़ घुमड़ कर आँखों से बहे जा रहे थे। वह इस असमंजस में थी कि आखिर उस से क्या गलती हुई है। इधर उसकी माँ की आँखों से भी आंसू नहीं रुक रहे थे। ये धुंए की जलन नहीं थी अपितु अपनी लाडली को दूर से रोते देख कर मन में उठने वाली टीस थी।


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