Seema sharma Pathak

Inspirational


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नालायक बेटा और बाऊ जी की वसीयत

नालायक बेटा और बाऊ जी की वसीयत

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"राजू, वकील साहब कितने बजे तक आ जायेगें? हमें शाम को निकलना भी है। अगर बाऊ जी की वसीयत का नाटक नहीं होता तो हम कल ही निकल जाते। बाऊ जी को क्या जरूरत थी वसीयत बनाने की? सबकुछ हम तीनों भाइयों का था ही, बराबर बाँट लेते हम। दिल्ली में इतनी छुट्टी नहीं मिलती ना ही बच्चों के स्कूल में और ना ही ऑफिस में ।"राजू के बडे़ भाई बोले।

राजू एक भोला भाला और सच्चे दिल का इन्सान था। वैसे तो वो हमेशा हंसता मुस्कराता रहता था लेकिन अभी कुछ दिनों से उदास और खामोश हो गया था और होता भी कैसे नहीं अभी 13 दिन पहले ही उसके बाऊ जी उसे हमेशा के लिए छोड़ कर जो चले गए थे। बाऊ जी सिर्फ उसके पिताजी नहीं थे उसकी पूरी दुनिया थे उसकी जान बसती थी उनमें। एक वही थे जिन्हें कदर थी उसकी वरना दोनों बडे़ भाई तो उसे नालायक ही कहते थे। हाई स्कूल में था राजू जब माँ छोड़ कर गई थी। उस समय भी उनके दोनों बेटे शहर में अपनी -2 नौकरी पर थे। केवल राजू ही था उनके पास, मरने से पहले मां ने राजू का हाथ पकड़ कर कहा था, " बेटा मुझे वचन दे तु अपने बाऊ जी को कभी अकेला नहीं छोड़ेगा। हमेशा उनका ख्याल रखेगा। " राजू ने कांपते हाथों से माँ को वचन दे दिया था। उसने कभी ये बात न अपने बाऊ जी को बताई और नाहीं अपने भाइयों को।

राजू के गांव में सिर्फ इंटर तक ही स्कूल था। बड़े भाई इंजीनियर थे तो उन्होंने इंटर के बाद राजू को शहर बुलाया और इंजीनियरिंग करने की सलाह दी। छोटे भाई जो खुद एक डॉक्टर थे, ने भी राजू को पूछा कि उसे जो भी पढ़ना है वह उनको बता सकता है किसी भी अच्छे कॉलेज में उसका एडमिशन करवा दिया जायेगा। राजू पढ़ना चाहता था लेकिन अपनी भाभियों के व्यवहार की वजह से उनके पास जाने की हिम्मत न पड़ती। बड़े भाई की शादी तो मां के सामने ही हो गई थी। पहले तब भी बड़ी भाभी कभी -2 गांव आ जाया करती थी लेकिन अब तो उन्हें गांव आने में शर्म आती हैं। छोटे भाई ने भी मां के जाने के 1 साल बाद ही अपने साथ काम करने वाली डॉ. से शादी कर ली थी। उनको तो हमारे साथ उठना बैठना वैसे भी पंसद नहीं था। ऐसे में बाऊ जी को वहां रखना सही नहीं होगा और उनको गांव छोड़ के भी नहीं जा सकता अकेले। हरि काका ने तो कहा था कि चले जाओ राजू बेटा मैं रख लुंगा बाऊ जी का ध्यान ,लेकिन राजू का मन नहीं माना और उसने आगे ना पड़ने का निर्णय लिया।

बाऊ जी ने बहुत समझाया था लेकिन राजू अपने निर्णय पर अटल रहा। दोनों भाइयों के साथ -2 गांव के और भी लोग बाऊ जी से कहते कि उनका छोटा बेटा तो नालायक निकला। बाऊजी कुछ नहीं कहते बस मुस्कारा जाते थे। राजू ने गांव में ही रहकर खेती करना शुरू किया और इतनी मेहनत की कि हर साल सबसे ज्यादा फसल राजू के खेत में ही होती। फसल बेचने के बाद जो पैसा मिलता बाऊ जी उससे और जमीन खरीद लेते। धीरे-2 राजू की मेहनत रंग लाई और आस पास के गांव में सबसे ज्यादा जमीन राजू और उसके बाऊ जी पर थी। बाऊ जी हमेशा कहते कि ये जमीन तेरे नाम करा देता हूँ लेकिन वह हमेशा बाऊ जी के नाम ही करा देता।

बाऊ जी ने पास के ही गांव की एक लड़की से राजू की शादी करवा दी थी। शादी से पहले राजू ने कहा था कि एक बार वह सुनीता से बात करना चाहता है। उस समय सबने उसका मजाक बनाया था लेकिन बाऊ जी ने हंस कर हां कह दिया था। राजू जब सुनीता से मिला तो उसने माँ के वचन के बारे में बता दिया था और यह भी कह दिया था कि भविष्य में कभी भी वह उसे भाभियों की तरह शहर जाने को न कहेगी।वह अपने बाऊ जी को छोड़कर कहीं नहीं जायेगा। राजू का अपने पिता के प्रति इतना प्रेम देखकर सुनीता तो वैसे भी उसकी दीवानी हो गई थी। वह अक्सर कहती भी थी कि वह बहुत खुशनसीब है जो उसे राजू जैसा देवता पति मिला है। राजू की भाभी इतनी घमंडी थी कि वह सुनीता को थर्ड क्लास लड़की कहकर ही बुलाती थी। सुनीता ये सोचकर जबाब न देती कि साल में कभी -2 तो आते हैं ये लोग अब क्या बहस करे इनसे। बाऊ जी की तो आंखों के तारे थे सुनीता और राजू।

"भइया वकील साहब आ गए हैं" राजू के छोटे भाई ने कहा।सारा परिवार आंगन में इकट्टा था गांव के कुछ बुजुर्गों को भी बुलाया गया था। वकील साहब ने राजू और उसकी पत्नी को भी बुलाया। बडी़ बहुयें और बेटे बहुत खुश थे सोच रहे थे अपने -2 हिस्से की प्रॉपर्टी के पेपर्स लेकर शाम को निकल जायेगें। वकील साहब ने सबको बैठने के लिए कहा और वसीयत पढ़ना शुरू किया -

"प्रिय गांव वालों और मेरे लायक बेटों तुम सबको हमेशा यही लगता रहा कि मेरा राजू नालायक बेटा है लेकिन मैं तुम्हें बता दूं उस जैसे लायक बेटे सदियों में जन्म लेते हैं। वह है तो मेरा बेटा लेकिन हमेशा मेरी मां बनकर मेरा ख्याल रखा। अपनी माँ को दिये वचन के लिए उसने अपना पूरा जीवन कुर्बान कर दिया। मुझे तो कभी पता ही नहीं चलता अगर मैं उसकी और सुनीता की बातें नहीं सुनता। मेरे पास जो भी कुछ है सब मेरे राजू की मेहनत का नतीजा है इसलिए मेरा सबकुछ सिर्फ और सिर्फ मेरे नालायक बेटे राजू का है मेरी किसी भी चीज पर मेरे उन लायक बेटों का कोई अधिकार नहीं है जिन्होने कभी पलट कर ये नहीं देखा कि मैं कैसा हूँ मुझे क्या चाहिए। मैं जब जब बीमार हुआ मेरे राजू ने मेरी देखभाल की मेरे दोनों बेटों ने तो मुझसे मिलना भी जरूरी नहीं समझा। मेरी पत्नी के सारे गहने सिर्फ और सिर्फ मेरी बहु सुनीता के हैं उन गहनों पर मेरी शहरी बहुओं का कोई अधिकार नहीं है जिनको हम गांव वालों के साथ खड़े होने में शर्मिंदगी महसूस होती है। "

बाऊ जी की वसीयत पढी़ जा चुकी थी और वो सभी लोग जो राजू को नालायक बेटा कहते थे मुंह लटकाये खड़े थे। दोनों भाई भी गुस्से में अपने -2 परिवार के साथ जा चुके थे कभी न आने के लिए। उस आंगन में खड़ा राजू उस गांव का सबसे अमीर व्यक्ति था लेकिन फिर भी वह अपने आप को सबसे ज्यादा गरीब महसूस कर रहा था क्योंकि उसकी असली दौलत उसके बाऊ जी उसे हमेशा के लिए छोड़ कर जा चुके थे।


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