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Priyanka Saxena

Drama Inspirational Children

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Priyanka Saxena

Drama Inspirational Children

ना आना लाड़ो तुम मायके!

ना आना लाड़ो तुम मायके!

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"हैलो मम्मी!" सुबह सुबह लैंडलाइन की घंटी टनटनाई माया जी ने रिसीवर क्रेडल से उठाकर कान‌ से लगाया तो बेटी चारु की आवाज़ कान में पड़ी

"हैलो चारु बेटी! अभी सुबह की पहली चाय पर तुम्हारे पापा और मैं तुम्हें ही याद कर रहे थे। कैसे हो तुम, आनंद जी और अनु?" माया जी खुश‌ होकर बोली

"मम्मी, तुम मुझे अपने पास बुला लो थोड़े दिन के लिए।" चारु बोली

माया जी उसकी बात सुनकर चौंकी।

ना, ना! इससे पहले आप माया जी को ऐसी मां समझें जो बेटी की शादी कर उससे छुटकारा पा लें ‌और बुलाना ही नहीं चाहें....आपकी उलझन दूर कर‌ देती हूॅ॑। दरअसल चारु एक हफ्ते पहले ही अपने मायके पूरे पन्द्रह दिन की गर्मी की छुट्टियां बिताकर गई है इस कारण माया जी समझ नहीं पाईं कि चारु ऐसा क्यों कह रही है।

अब आप समझें बात चारु को बुलाने की नहीं है...

चारु क्या हुआ बेटी?" माया जी ने व्यग्रता से पूछा

"मम्मी, मेरी बड़ी ननद सुरभि दीदी आ रही हैं। बहुत काम हो जाता है उनके दो बच्चे हैं सारा दिन मुझे किचन‌‌ में लगा रहना पड़ता है।" चारु बोली

"तुम्हारे घर में तो सभी मिलजुल कर काम करते हैं। समधन जी भी तुम्हारी मदद कराती हैं और सुरभि को भी मैंने तुम्हारे साथ किचन में काम करते देखा है।" माया जी ने समझाया

"मैं झूठ बोल रही हूँ क्या?" चारु तुनक कर बोली

"एक तो सुरभि दीदी तब आने वाली थी जब मैं आपके पास आई थी तब तो आई नहीं। बोल रही हैं कि जीजाजी को उस वक्त कुछ काम आ गया था। अभी गर्मियों की छुट्टियां बाकी हैं तो हफ्ते भर के लिए आ रहीं हैं। मम्मी, मुझे बुला लो कोई बहाना बनाकर मेरी सासु माँ से कह‌‌ दो‌‌ कि आपकी या पापा की तबीयत खराब हो गई है। मम्मी जी मना नहीं करेंगी। मुझसे काम-वाम नहीं होगा किसी का!" चारु बोलती गई

माया जी चारु के विचार जानकर हतप्रभ रह गईं। चारु के सास-ससुर उसको अपनी बेटी के समान रखते हैं ना कोई रोक ना कोई टोक। हर काम में समधन जी हेल्प करती हैं जो चारु को नहीं आता वो सिखा भी देती हैं। पोता अनु दो साल का है उसका भी पूरा ध्यान रखती हैं। ननद सुरभि भी बहुत मिलनसार है चारु के साथ मिलकर जल्दी से काम निपटा देती हैं । बहुत बार आननंद और चारु को घर से बाहर मूवी देखने और रेस्तरां भी भेज देते हैं। कोई बंधन नहीं है कपड़े भी अपने मन से वेस्टर्न पहनती है फिर अगर ऐसी समझदार ननद एक हफ्ते के लिए आ रही है तो क्या परेशानी है?

माया जी को पता चल‌ गया कि चारु को एहसास कराना ही होगा कि वह ठीक नहीं कर रही है। आज नहीं तो फिर कभी नहीं! वे चारु को नहीं समझा पाएंगी‌ अगर आज चुप रहकर उसकी ये डिमांड मान ली।

"चारु, तुम्हारे घर में तुम पर कोई बंधन नहीं है ना पहनने का ना कहीं आने-जाने पर। समधन जी और सुरभि तुम्हारे साथ कामों में लगी रहती है बल्कि कई बार तो तुम्हें और आनंद जी को अकेले बाहर भी भेजती रहती हैं।‌ अगर वो तब नहीं आ पाईं जब तुम यहां आईं थीं तो सुरभि के माॅ॑-पापा का घर है जब चाहे आ सकती है। तुम जरा से काम से डरकर यहां भाग आना चाहती हों।" माया जी रोष से बोलीं

"अरे मम्मी तुम तो ख़फ़ा हों गईं! तुम मेरी मम्मी होकर मेरी परेशानी नहीं समझ रही हों और मेरे ससुराल वालों की वकालत कर रही हों।" चारु बोली

"मैं सच कह रही हूँ, चारु।" माया जी एक क्षण रुककर फिर बोली," इस हिसाब से तो तुम्हारे यहां रहने तक तुम्हारी भाभी सुधा को भी अपने मायके ही चले जाना चाहिए? तुम्हारे आने से उस पर भी काम पड़ता है! वो तो नहीं जाती उल्टा तुम्हारे आने की राह देखती है।‌"

"मम्मी, कैसी बात कर रही हों? आप मुझे बुलाना नहीं चाहती हों, ये कह दो।" चारु गुस्से से बोली

" मेरी बात समझ तो तुम भी रही हो चारु। जो तुम अपनी ननद के आने पर करो और वैसा ही तुम्हारे आने पर तुम्हारी भाभी करने लगे तो बुरा क्यों लग रहा है तुम्हें?

चारु मैंने सिर्फ तुम्हें कहा है तुम्हारी भाभी ऐसा कभी नहीं सोचती पर तुम तो‌ वो करने के लिए कह रही हों। अब तुम जो भी समझो कि मम्मी गुस्सा हो गई है इसलिए कह रही है , तुम्हारी मर्जी! जो चाहे तुम समझ सकती हों परंतु मैं तुम्हारी गलत बात में साथ नहीं दूंगी। " माया जी ने फोन‌ का रिसीवर रख दिया

चारु को भलीभांति माँ का संदेश मिल‌ गया कि आज मम्मी वास्तव में उससे ख़फ़ा हों गईं हैं। माँ के स्वयं से नाराज़ होने के एहसास मात्र से ही वह घबरा गई।

अपनी मम्मी की कही बातों को आत्मसात किया, कुछ देर सोचने के बाद चारु ने फिर फोन मिलाया, माया जी ने ही फोन उठाया।

"हैलो मम्मी! थैंक्यू आज आपने मुझे सही रास्ता दिखा दिया। अच्छा किया जो मेरी अनुचित मांग नहीं मानी। आप मुझे फटाफट मसूर दाल के गुल्ले और पापड़ की सब्जी की रेसिपी बता दो, मैं ये दोनों बनाऊंगी। हमारे यहां ये नहीं बनती हैं तो नई डिश हो जाएगी दीदी के आने पर।" चारु ने कहा

माया जी ने फोन पर ही दोनों की रेसिपी उसको लिखवाई।

"अच्छा मम्मी, अब तो आप मुझसे नाराज़ ‌नहीं हों?" चारु ने पूछा

"बेटी, माॅ॑ कभी बच्चों से दिल‌ से ख़फ़ा नहीं होती पर सही-गलत बताने के लिए नाराज़गी दिखानी पड़ती है।" माया जी ने‌ हंसते हुए कहा

"अगली छुट्टियों में तुम्हारा बेसब्री से इंतज़ार रहेगा।" माया जी ने चारु को लाड़ से कहा

माया जी ने उम्र भर के तजुर्बे से बेटी की सोच को ग़लत दिशा में जाने से रोका शायद माँ के पास बच्चों के लिए वो ऐसी टेलीपैथी है, एहसास है जिससे वह बच्चे को सही पथ पर लाने में कामयाब हो जाती है...

 देखा आपने माॅ॑ ने किस प्रकार बेटी को सही दिशा दिखाई। ऐसी उलझनें ज़िन्दगी में आती रहती हैं जब बच्चे ग़लत सही के फेर में उलझ‌ जाते हैं तब माॅ॑ ही खेवनहार बनकर उनकी नैया पार लगाती है, बड़ी से बड़ी उलझनें सुलझ जाती हैं माँ के साथ से!


आशा है‌ आपको मेरी यह कहानी पसंद आई होगी।‌ रचना पसंद आने पर कृपया लाइक कमेंट और शेयर कीजिएगा। आपकी प्रतिक्रिया का इंतज़ार रहेगा।

धन्यवाद।



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