मुट्ठी में है तकदीर हमारी

मुट्ठी में है तकदीर हमारी

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शिवांश और उसका दोस्त साहिल रोज की तरह अपने विद्यालय की बस का इंतज़ार करते हुए बातों में व्यस्त खड़े थे। दोनों कक्षा सात में पढ़ते थे।

अचानक शिवांश की नज़र लगभग उनकी ही उम्र के कुछ बच्चों पर पड़ी जो फटे-पुराने कपड़े पहने एक गन्दा सा थैला साथ लिए जा रहे थे। उनमें से एक बच्चा बार-बार मुड़कर उदास नज़रों से शिवांश और साहिल को देख रहा था। शिवांश ने उसे आवाज़ दी "सुनो, यहां आओ" पर वो बच्चा अनसुना करके तेजी से दौड़ता हुआ निकल गया।

तब तक विद्यालय की बस भी आ चुकी थी।

बस में बैठकर साहिल ने कहा "अजीब था ना वो। कैसे देख रहा था हमें।"

शिवांश बोला "हाँ, मुझे लगा वो कुछ कहना चाह रहा था शायद।"

"अच्छा शाम को जब खेलने चलेंगे तब पकड़कर पूछ लेंगे। मैंने उसे कई बार पार्क के आस-पास देखा है।" साहिल ने कहा।

शिवांश बेचैनी से शाम की प्रतीक्षा करने लगा। उसका ध्यान रह-रहकर उस बच्चे के उदास चेहरे की तरफ जा रहा था।

शाम होते ही शिवांश और साहिल पार्क की तरफ दौड़ चले। उनके नन्हे से दिमाग में अनेक जिज्ञासाएं भरी पड़ी थी। दोनों पार्क के आस-पास उस बच्चे को ढूंढने में लग गए जो उन्हें सुबह मिला था। थोड़ी देर में वो बच्चा उन्हें आता हुआ दिखाई दिया हाथों में वही गंदा थैला लिए हुए।

शिवांश और साहिल जाकर उसके सामने खड़े हो गए। वो घबराकर जाने लगा तो शिवांश बोला "रुको दोस्त, हमारी बात सुनो।"

'दोस्त' शब्द सुनकर वो बच्चा रुक गया और उनके पास आया।

उसके आने पर उन्होंने पूछा "तुम सुबह हमें बार-बार मुड़कर क्यों देख रहे थे ? और तुम उदास भी थे। क्यों ?"

"तुम्हारे हाथों में विद्यालय जाने वाला थैला, और मेरे हाथों में ये कचरा बीनने वाला थैला देखकर मुझे अपनी किस्मत पर गुस्सा आ रहा था की मैं गरीब क्यों हूँ। इसलिए मैं उदास हो गया था और तुम्हें देख रहा था। काश मैं भी तुम्हारी तरह विद्यालय जा पाता।" ये बोलते हुए वो बच्चा लगभग रो पड़ा।

शिवांश और साहिल ने उसके कंधे पर हाथ रखा और उसके आँसू पोंछे।

तभी वो बच्चा अचानक से दूर हट गया और बोला "तुम अच्छे घरों के बच्चे हो, मुझे स्पर्श मत करो।"

ये सुनकर शिवांश और साहिल बोले "तुम अब से हमारे दोस्त हो, तो हम तुम्हें स्पर्श क्यों ना करें" और दोनों ने उसे गले लगा लिया।

ये देखकर वो बच्चा बहुत भावुक हो गया और शायद अपने जीवन में पहली बार हँसा।

शिवांश ने उस बच्चे से कहा "हम तुम्हारी मदद करने की पूरी कोशिश करेंगे। सोचते है कुछ।"

"वो तो हम जरूर सोचेंगे पर पहले अपना नाम तो बताओ दोस्त।" साहिल बोला।

"सब मुझे 'ए छोटे' कहकर बुलाते है तो यही मेरा नाम है।" उस बच्चे ने कहा।

शिवांश ने कहा "लेकिन हम तुम्हें 'ए छोटे' नहीं कहेंगे। आज से हमारे दोस्त का नाम होगा 'सागर'। शिवांश, साहिल और सागर। अच्छा है ना ?"

"हाँ-हाँ बहुत अच्छा" साहिल और सागर एक साथ बोले और हँस दिए।

"हम तुमसे कल मिलते है इसी जगह शाम में। जरूर आना दोस्त।" ये कहकर शिवांश और साहिल अपने घरों की तरफ चल दिये।

अगले दिन विद्यालय में पूरे वक्त शिवांश और साहिल ये सोचते रहे कि सागर की पढ़ने की इच्छा कैसे पूरी करें।

तभी शिवांश बोला "क्यों ना जब हम पार्क में खेलने जाते है तब हम उसे पढ़ाये।"

"अरे वाह आईडिया तो अच्छा है लेकिन उसे तो शुरू से पढ़ना-लिखना सिखाना होगा ना। हम सीधे अपनी कक्षा की किताबें थोड़े पढ़ा सकते है।" साहिल बोला।

शिवांश ने कहा "हाँ पता है मुझे। इसकी भी तरकीब है मेरे पास। मेरी छोटी बहन ने अभी-अभी पढ़ना शुरू किया है। हम उसकी किताब ले जाकर सागर को पढ़ाएंगे।"

"लेकिन फिर घर पर पढ़ने के लिए भी तो सागर को किताबें चाहिए होंगी। पार्क में थोड़ी देर पढ़ने से क्या होगा ?" साहिल ने चिंता जाहिर की।

"हाँ यार ये तो मैंने सोचा ही नहीं।" शिवांश बोला।

"अच्छा ऐसा करें कि कुछ पैसे मिलाकर सागर के लिए किताबें और बैग खरीद लें ?" साहिल ने सुझाया।

शिवांश ने कहा "ये सही है। मैं घर जाते ही अपना गुल्लक देखता हूँ कितने पैसे है उसमें। तू भी देखना। फिर मिलते है पार्क में।"

सब बातें तय करके दोनों विद्यालय के बाद अपने-अपने घर चल दिये।

दोनों के गुल्लक से कुल मिलाकर इतने पैसे निकल गए कि उससे शुरुआती कक्षा की कुछ किताबें और एक बैग लिया जा सके।

आज शिवांश और साहिल पार्क के लिए थोड़ा जल्दी ही निकल गए। पार्क के पास ही एक दुकान थी, जहां किताबों के साथ-साथ विद्यालय के उपयोग की चीजें भी मिलती थी।

शिवांश और साहिल ने 'हिंदी वर्णमाला' 'अंग्रेजी ज्ञान' और 'गणित' की किताबों के साथ स्लेट, उस पर लिखने वाली पेंसिल का एक डिब्बा, और एक छोटा सा बैग खरीदा। फिर पार्क की तरफ चल पड़े। जैसे ही सागर आया दोनों ने उसके हाथ में वो बैग दे दिया।

जब सागर ने उसे खोलकर देखा तो हैरान रह गया। वो बैग, वो किताबें सब कितनी सुंदर थी।

"क्या ये मेरे लिए है ?" सागर ने पूछा।

शिवांश और साहिल बोले "बिल्कुल दोस्त, तुम्हारे ही लिए है। आज से हम दोनों तुम्हें रोज शाम यहीं पढ़ाएंगे। अब तो खुश हो ना ?"

"बहुत-बहुत खुश हूँ। लेकिन मैं ये नहीं ले सकता। मेरे पास इसके पैसे नहीं है।" सागर ने सर झुकाए हुए रुआंसी आवाज़ में कहा।

शिवांश ने थोड़ा गुस्सा दिखाते हुए कहा "बुद्धूराम तुमसे पैसे किसने मांगे ? तुम दोस्त हो ना। शिक्षक बोलते है दोस्तों की मदद करनी चाहिए।"

"हाँ और जब कभी हमें मदद की जरूरत होगी तो तुम कर देना।" साहिल ने कहा।

उनकी बातें सुनकर सागर की खुशी का ठिकाना नहीं था।

अब शिवांश और साहिल रोज शाम खेलने की जगह सागर को पढ़ाने लगे। पार्क में आते-जाते लोग उन्हें देखते। कुछ तारीफ करते, कुछ हिकारत भरी नजरों से दो अच्छे घरों के बच्चों के बीच बैठे उस गरीब बच्चे को देखते।

शिवांश और साहिल के मोहल्ले और विद्यालय के और भी बच्चे उस पार्क में आया करते थे। उनमें से कुछ शैतान बच्चों ने हर जगह ये कहना शुरू कर दिया कि शिवांश और साहिल गंदे बच्चों के साथ रहते है। सबको उनसे दूर रहना चाहिए।

ये बात उन दोनों के माता-पिता के कानों तक भी पहुँची। माजरा क्या है ये देखने के लिए शाम को उनके माता-पिता पार्क पहुँचे। वहाँ पहुँचकर उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं था। उनके नन्हे बच्चे शिक्षक बने बड़ी जतन से अपने ही जैसे एक बच्चे को पढ़ाने में व्यस्त थे।

जब वो सब उन तीनों के पास पहुँचे तो शिवांश और साहिल घबरा गए कि शायद उन्हें डांट पड़ेगी।

इससे पहले की वो कुछ कहते उनके माता-पिता बोले "तुम दोनों को डरने की कोई जरूरत नहीं है। हमें सारी बात बताओ बच्चों।"

शिवांश और साहिल ने सागर के मिलने से अब तक कि सारी बातें उन्हें बता दी।

तब उनके माता-पिता बोले "बच्चों, तुम बहुत अच्छा काम कर रहे हो। लेकिन इस शहर में एक नहीं अनेकों सागर है। जिनकी मदद कर पाना तुम्हारे वश की बात नहीं है। ये काम तो सरकार का है।"

फिर उन्होंने सागर से पूछा कि सरकार ने 'सरकारी विद्यालय' की सुविधा तो दी है, फिर वो वहां क्यों नहीं जाता ?

तब सागर ने बताया कि हम जैसे बच्चों के माता-पिता अक्सर आप जैसे नहीं होते। वो कहते है "पढ़-लिखकर क्या होगा ? काम करना, पैसे कमाना और घर के खर्च में मदद करना ज्यादा जरूरी है।"

उसकी बातें सुनकर शिवांश के माता-पिता बोले "एक अच्छे नागरिक का फर्ज निभाते हुए हमें ऐसे लोगों को जागरूक करना चाहिए ताकि वो शिक्षा का महत्व समझे और अपने बच्चों से उसके सपने ना छीने।"

"आप ठीक बोल रहे है। हम सब मिलकर कल ही जिलाधिकारी महोदय की जन-अदालत चलते है और इस विषय में अर्जी देते है कि वो ऐसे मोहल्लों में शिविर लगवाकर बच्चों को विद्यालय भेजने की बात उनके माता-पिता को समझाए, साथ ही सरकारी विद्यालयों की शिक्षा-व्यवस्था दुरुस्त है या नहीं इसकी भी जांच करवाएं।" साहिल के माता-पिता ने कहा।

उनकी बातें वहां से गुज़र रहे और लोग भी सुन रहे थे। उनमें से कुछ लोग भी उनके साथ इस मुहिम में शामिल होने के लिए राजी हो गए।

शिवांश, साहिल और सागर अपने माता-पिता के इस कदम से बहुत खुश थे।

सागर ने खुशी का इजहार करते हुए कहा "अब मैं भी तुम दोनों की तरह विद्यालय जाऊंगा"।

अगले दिन जिलाधिकारी की जन-अदालत में बड़ी संख्या में लोग इन बच्चों के लिए अर्जी लेकर जिलाधिकारी के पास पहुँचे।

जिलाधिकारी ने उनकी बातें और सुझाव सुने और तत्काल इस पर काम शुरू करने का आश्वासन दिया।

अगले ही दिन कुछ शिक्षा-मित्रों के साथ बस्तियों में शिविर का आयोजन किया गया। जब बस्ती के सभी लोग वहां पहुँच गए तब एक छोटे से नाटक के जरिये उन्हें समझाया गया कि उनके बच्चों के लिए शिक्षा कितनी जरूरी है। साथ ही जिलाधिकारी का ये आदेश भी सुना दिया कि जो अपने बच्चों को विद्यालय जाने से रोकेगा उसे दंड दिया जाएगा।

अब कुछ लोग स्वेच्छा से तो कुछ दंड के भय से अपने बच्चों को विद्यालय भेजने लगे। धीरे-धीरे विद्यालय जाने वाले बच्चों की संख्या बढ़ने लगी।

ये खबर राज्य के शिक्षा मंत्री तक पहुँची। तब उन्होंने जिलाधिकारी के पास अर्जी देने वाले उन सभी अभिभावकों की और जिलाधिकारी के पहल की तारीफ करते हुए राज्य के प्रत्येक गांव, प्रत्येक शहर में सरकार की तरफ से ऐसी मुहिम चलाने की घोषणा कर दी। साथ ही सरकारी विद्यालयों का शिक्षा-तंत्र मजबूत करने के लिए भी आवश्यक कदम उठाये।

अब गांव-गांव, शहर-शहर सागर जैसे लाखों बच्चों के सपने फिर से जी उठे जो कि शिवांश और साहिल के उठाये एक छोटे से कदम का परिणाम था।

वो दोनों अब भी पार्क में सागर से मिलकर पढ़ाई में उसकी मदद करते थे और संतुष्टि का अनुभव करते थे।

शिक्षक दिवस आने वाला था। इस दिन सरकार की तरफ से शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय काम करने वाले लोगों को पुरस्कार दिया जाता था।

इस बार के पुरस्कार पाने वालों की सूची बहुत ही खास थी। उनमें सबसे ऊपर दो नन्हे शिक्षकों का नाम था जिन्होंने अपने नन्हे हाथों से पूरे राज्य में शिक्षा का दीप जला दिया था 'शिवांश और साहिल'।

कभी उनके प्रयासों को देखकर हँसने वाले और उनकी संगति को हिकारत भरी नज़रों से देखने वाले तमाम लोगों की नज़रों में अब वो दोनों हीरो बन चुके थे।

उनके माता-पिता और विद्यालय सभी को आज उन पर गर्व था।


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