मोतीबाई-एक तवायफ़ माँ की कहानी.
मोतीबाई-एक तवायफ़ माँ की कहानी.
"माँ" मेरे हिसाब से ये एक ही ऐसा शब्द है, जिस पर दुनिया टिकी हुई है, मानव इतिहास के जन्म के समय से ही स्त्री माँ बनती आई है और मातृत्व को जीती आई है, ये अलग बात है कि स्त्री गर्भावस्था से लेकर प्रसव पीड़ा तक इतना कुछ झेलती है इसके बावजूद भी बच्चे को हमेशा पिता की सन्तान रूप में इंगित किया जाता है, माँ की सन्तान के रूप में नहीं....
फिर भी वो कुछ नहीं बोलती, बस चुप्पी साधकर सालों साल वंश की बेल बढ़ाने की परम्परा को कायम रखती है और जमाना उसे दायित्व, फर्ज और कर्तव्य का नाम दे देता है, कितनी अजीब बात है ना कि इतनी सदियाँ बीत जाने के बाद भी आज तक लोगों की मानसिकता नहीं बदली।
हाँ तो माँ रूपी हाथ दुनिया का वो हाथ है जो जिसके सिर पर रहता है तो उसकी दुनिया सँवर जाती है, ऐसा ही एक हाथ था मेरे ऊपर , वो मेरी माँ थी लेकिन दुनिया के नज़रों में वो एक तवायफ थी, जिसे समाज ना जाने कैसे कैसे नामों से पुकारता है, वैश्या, कोठेवाली, धंधेवाली और भी बहुत से नाम है जो शायद बोलने और लिखने में मुझे अच्छे नहीं लगते इसलिए नहीं लिखे.....
वो जमींदारी और रजवाड़ों का जमाना था, मेरे नाना जी आदिवासी परिवार से ताल्लुक रखते थे, राजासाहब ने ऐसे परिवारों को एक अलग से छोटा सा गाँव दे रखा था, वें समय समय पर उस गाँव का दौरा करने जाते अगर उन परिवारों में से कोई खूबसूरत और जवान लड़की उन्हें पसंद आ जाती तो वो उनके राजभवन की शोभा बनती और जिसे नाचने गाने का शौक होता तो राजा उन्हें तालीम दिलवाकर अपने शाम की मनोरंजक महफिलों के लिए चुन लेते थे।
और यही डर मेरे नाना नानी के मन में बैठ गया गया था क्योंकि बेटे की चाह में उन्होंने पाँच बेटो को जन्म दे दिया था, लेकिन तब भी छठी बेटी ही हुई, उनकी बेटियाँ सुन्दर थीं क्योंकि नानी भी सुन्दर थीं, उन्हें राजा का डर था कि कहीं राजा उनकी बेटियों को राजभवन ना ले जाए, इसी अफरातफरी में उन्होंने एक एक करके सभी बेटियों का बाल-विवाह करना शुरू कर दिया।
जो भी जैसा लड़का मिला चाहें उम्र में दुगना ही क्यों ना हो, चाहे कुछ भी काम ना करता हो बस उन्हें तो अपनी बेटियों को जल्द से जल्द पराए घर भेजना था और इस जल्दबाजी में कुछ को तो भले घर नसीब हो गए लेकिन कुछ को तो ऐसा जीवन मिला जो शायद किसी ने उसकी कल्पना भी ना की हो.....
तो ऐसी ही नानी की सबसे छोटी बेटी यानि की मेरी माँ जिसका नाम उन्होंने महुआ रखा था, तो महुआ जब नौ दस साल की रही होगी तो उसका ब्याह एक उन्नीस-बीस साल के लड़के साथ कर दिया गया क्योंकि महुआ के पिता के पास इतने पैसे ही नहीं थे कि वो अपनी बेटी के लिए ढंग का घर ढूंढ सकें, उस लड़के के परिवार में केवल उसकी माँ और वो ही थे, वो लड़का महुआ के संग ब्याह करके , अपनी माँ और महुआ के संग कलकत्ता चला गया, बाद में महुआ को पता चला कि वो औरत उसके पति की सगी माँ नहीं है, उसने उसके पति को सड़क से उठाकर पाला था, उस औरत ने महुआ को अच्छे फनकारों के यहाँ संगीत और नृत्य की तालीम दिलवाई, महुआ ने सोचा चलो उसे माँ बाप के घर में कुछ सीखने को नहीं मिला, कम से कम यहाँ वो कुछ तो सीख पा रही है......
उसे नहीं मालूम था कि आगे चलकर विधाता उसके संग कितना बड़ा मज़ाक करने वाला है, उसकी जिन्दगी में तूफान लाने वाला है....
महुआ के चौदह पन्द्रह तक का होने तक उसके पति उपेन्द्र को उसकी सास मधुबनी ने उसके करीब भी नहीं आने दिया, वो महुआ का बहुत ध्यान रखती थी उसे अपनी बेटी की तरह चाहती थी लेकिन ये बात महुआ कभी नहीं सोच पाई कि मधुबनी जो उसका ख्याल रखती है उसके पीछे उसका कोई स्वार्थ छिपा है,
मधुबनी नहीं चाहती थी की महुआ की खूबसूरती में कोई भी कमी आएं, वो उसके खाने का ख़ास ख्याल रखती थी, जिसे महुआ का बदन हृस्ट-पुष्ट और सुन्दर दिखाई देता था, उसकी साज सज्जा का भी वो बहुत ध्यान रखती थी, रोज नए गहने और कपड़ो से उसे सजाती रहती थी।
अब महुआ पन्द्रह की होने आई थी उसके संगीत और नृत्य की तालीम भी पूरी हो चुकी थी, तो एक दिन मधुबनी ने महुआ से कहा....
अब वक्त आ गया है कि तुझे तेरी मुनासिब जगह पहुँचा दिया जाएं.....
मुनासिब जगह ! आपका मतलब क्या है माँ? महुआ ने पूछा।
इतने सालों से तेरे ऊपर इतना बेहिसाब पैसा कर रही हूँ, तुझे संगीत की तालीम दिलवाई, तेरे हर शौक पूरे किए, वो इसलिए कि अब तेरी बारी है मेरा हिसाब चुकाने की, मधुबनी बोली।
मैं समझी नहीं माँ कि तुम क्या कहना चाहती हो? महुआ ने पूछा।
यही कि अब तू मुझे कमाकर देगी, मधुबनी बोली।
मुझे क्या कोई नौकरी करनी होगी? महुआ ने पूछा।
नौकरी नहीं! अब तुझे नाचना गाना होगा, वो भी कोठे पर, मधुबनी बोली।
कोठे पर! क्यों? मगर! ऐसा मैंने क्या गुनाह किया है? महुआ ने पूछा।
तूने गुनाह तो उसी दिन कर दिया था जब तूने गरीब माँ बाप के घर जन्म लिया था वो भी उनकी बेटी बनकर, मधुबनी बोली।
तो क्या उस गुनाह की सजा तुम मुझे दोगी? महुआ ने पूछा।
अरे, एहसान मान की तुझ जैसे गरीब घर की लड़की को उपेन्द्र ब्याह कर लाया नहीं तो बैठी होती राजा के राजभवन में उसकी रखैल बनकर, मधुबनी बोली।
तो तुम भी तो मुझसे वही करवाना चाहती हो, इसे एहसान मत कहो, मजबूरी का फायदा उठाना कहो, महुआ जोर से चीखी।
चीख मत! अपनी आवाज पर काबू रख नहीं तो ठुमरी , दादरा गाकर लोगों का जी कैसे बहलाएगी? मधुबनी बोली।
मैं तो समझती थी कि तुम मेरी माँ हो लेकिन तुमने तो मुझे कहीं का ना रखा, महुआ बोली।
तवायफें किसी की माँ, बहन और बीबियाँ नहीं होतीं, वो तो केवल गैर मर्दों का जी बहलाने का सामान होतीं हैं, मैं भी पहले एक तवायफ हुआ करती थी, लेकिन जब तक उम्र थी तो लोग इन्हीं कदमों पर गिरकर मेरी गजलों और नाच के कायल हो जाते थे लेकिन उम्र ढली तो फिर कोई नहीं पूछता और तेरी तरह मेरा तो कोई पति भी नहीं था, ना कोई घरवाले, तेरा पति एक रात लावारिस सड़क के किनारे पड़ा था तो उठा लाई और उसे अपना बेटा बना लिया......मधुबनी बोली।
तुम तवायफ थी तो मुझे क्यों तवायफ बनाने पर तुली हो? हम इज्जत की जिन्दगी भी तो बसर कर सकते हैं, कोई काम कर लेते हैं, मैं बहुत मेहनत करूँगी, महुआ बोली।
नहीं! तेरा सौदा तय हो चुका है, अजीजनबाई के यहाँ, तू अब से वहीं रहेगी और मैं भी, मधुबनी बोली।
लेकिन मैं ये धन्धा करने को तैयार नहीं, महुआ बोली।
देख जिद मत कर मेरे पास और भी बहुत रास्ते हैं तुझे मनवाने के, मधुबनी बोली।
मैं जिद नहीं कर रही , मैं तुम्हारी बेटी जैसी हूँ, जब कोई मेरा जिस्म छूएगा तो तुम्हें ये अच्छा लगेगा, महुआ ने पूछा।
ये धन्धा नहीं है तुझे वहाँ सिर्फ़ गाना और नाचना होगा, मैं तुझसे वादा करती हूँ कि कोई भी तेरे जिस्म को हाथ नहीं लगाएगा, मधुबनी बोली।
मैं इस घर से कहीं भाग जाऊँगी, लेकिन ये काम नहीं करूँगी, महुआ बोली।
भागकर भी कहाँ जाएगी? उस माँ बाप के यहाँ , जहाँ वहाँ का राजा भी लड़कियों का सौदा करता है, कहीं भी चली जा लेकिन अपनी आबरू नहीं बचा पाएगी, मधुबनी बोली।
तो तुमने ठान ही लिया है कि मुझे तवायफ बनाकर रहोगी, महुआ बोली।
तुम्हें ये काम करना ही पड़ेगा, अब और मेरे बस में नहीं है तेरा और तेरे पति का खर्चा उठाना, मधुबनी बोली।
तो तुम ये सब मुझसे पैसे के लिए करवाना चाहती हो, महुआ बोली।
पैसा ही सब कुछ होता है इस दुनिया में, दौलत के आगे ही दुनिया झुकती है, मधुबनी बोली।
तुम बहुत गिरी हुई औरत हो जो पैसों के लिए ये सब करवाना चाहती है, महुआ बोली।
एक दिन मैं भी इसी तरह किसी के आगे गिड़गिड़ाई थी और मेरी भी उसने एक भी नहीं सुनी थी, मधुबनी बोली।
तो तुम भी मेरे साथ यही करोगी, महुआ बोली।
हाँ और कल तैयार रहना अजीजनबाई के कोठे पर जाने के लिए और इतना कहकर मधुबनी , महुआ को कमरे में कैद़ कर के चली गई....
कमरें में बंद महुआ दिन भर रोती रहीं, शाम होने को आई लेकिन मधुबनी ने दरवाजा नहीं खोला, रात भी हो गई और रात को मधुबनी ने महुआ को ना खाना दिया और ना ही कमरें का दरवाजा खोला, दूसरे दिन भी महुआ ऐसे ही भूखी प्यासी कमरें में पड़ी रही लेकिन निर्दयी मधुबनी ने कमरें के दरवाज़े नहीं खोले......
और फिर रात होने को आई थी, ना महुआ ने दरवाज़ा खोलने को कहा और ना मधुबनी ने दरवाज़े खोलें, ये देखकर उपेन्द्र को महुआ की कुछ चिन्ता हो आई क्योंकि करीब करीब दो दिन होने को आए थे , महुआ को कमरें में बन्द हुए, ऐसा ना हो भूख प्यास से उसकी तबीयत खराब हो गई हो, ये सोचकर उपेन्द्र ने मधुबनी से कमरें के दरवाज़े खोलने को कहा.....
माँ! बहुत हो चुका , अब खोल भी दो दरवाज़ा।
तुझे बड़ा तरस आ रहा है उस पर, मधुबनी बोली।
तरस क्यों ना आएगा? आखिर वो मेरी बीवी जो है, उपेन्द्र बोला।
बड़ा आया बीवी वाला, मधुबनी बोली।
कुछ तो इन्सानियत दिखाओ, माँ! उपेन्द्र बोला।
ले चाबी! और दरवाजा खोलकर देख जिन्दा है कि मर गई, मधुबनी बोली।
उपेन्द्र ने चाबी ली और कमरें का दरवाजा खोला तो महुआ जमीन पर पड़ी थी, उपेन्द्र ने उसे हिलाकर जगाने की कोशिश की लेकिन महुआ ना जागी, तब उपेन्द्र भागकर पानी ले कर आया उसके मुँह पर छिड़का लेकिन महुआ तब भी होश में ना आई, उपेन्द्र जोर से चीखा.....
माँ! देखो ! इसे कुछ हो गया है जल्दी से इसे अस्पताल ले जाना होगा।
मेरे पास पैसे नहीं हैं, मरती है तो मरने दो, मधुबनी बोली।
इतनी कठोर मत बनो माँ! तुम भी तो एक औरत हो उसका दर्द समझने की कोशिश करों, उपेन्द्र बोला।
तो तू ये वादा कर कि इसके ठीक हो जाने पर ये अजीजनबाई के यहाँ रहेगी तभी इसका इलाज करवाऊँगी, मधुबनी बोली।
ठीक है माँ! मुझे तुम्हारा हर वादा और हर शर्त मंजूर है, तुम जैसा कहोगी वैसा ही होगा, पहले इसका इलाज करवाने का बन्दोबस्त करो, उपेन्द्र बोला।
ठीक है ये ले रूपए और एक ताँगा मँगा , जल्दी से इसे अस्पताल लेकर चल, मधुबनी बोली।
फिर महुआ को अस्पताल ले जाया गया कुछ देर के इलाज के बाद उसने आँखें खोलीं, डाक्टर ने आकर बताया कि इन्हें एक दो दिन अस्पताल में ही रखिए, बहुत कमजोर हो चुकीं हैं, मधुबनी भी चाहती थी कि महुआ जल्द से जल्द ठीक हो जाए और अजीजनबाई के यहाँ काम पर जाने लगे, इसलिए वो उपेन्द्र से बोली.....
तू इसके पास अस्पताल में रूक कर इसकी देखभाल कर मैं घर जाती हूँ और हाँ मेरी शर्त तू भी याद रखना और उसे भी बता देना, इतना कहकर मधुबनी घर आ गई।
उपेन्द्र दो रातें और तीन दिन तक महुआ के संग अस्पताल में रहा , उसकी बराबर सेवा करता रहा, उसके खाने पीने का ख्याल रखता रहा, जिससे उपेन्द्र के मन में महुआ के लिए हमदर्दी पनप गई, प्यार तो वो महुआ से पहले भी करता था लेकिन मधुबनी उसे महुआ के पास कभी जाने ही नहीं देती थी।
उपेन्द्र के सेवा भाव ने महुआ के दिल में भी जगह बना ली और वो उससे पूछ ही बैठी कि तुम कभी मुझसे मिलने मेरे पास क्यों नहीं आए? तब उपेन्द्र बोला....
माँ नहीं चाहती थी कि मैं तुमसे मिलूँ, वो नहीं चाहती थी कि हम दोनों के दिल में कभी भी एक दूसरे के लिए प्यार पनपे, क्योंकि वो तुम्हें इस घर में लाई ही इसी मकसद थी कि तुम्हें तवायफ़ बनाकर वो पैसे कमा सकें,
उपेन्द्र की बात सुनकर महुआ स्तब्ध सी हो गई और कुछ देर बाद बोली....
तो तुमने और तुम्हारी माँ ने दोनों ने मिलकर मुझे और मेरे परिवार वालों को धोखा दिया....
मैं क्या करता महुआ? मजबूर था, मुझ पर मेरी माँ का एहसान था कि मुझ जैसे अनाथ को उसने सड़क से उठाकर पाल पोसकर बड़ा किया था तो उसके इस घिनौने काम में मैं भी शामिल हो गया, उपेन्द्र बोला।
तो अगर मैं कोठे पर नाचूँगी- गाऊँगी तो तुम्हें बुरा नहीं लगेगा, महुआ ने पूछा।
माँ! तो इसी शर्त पर तुम्हें अस्पताल लाई थी कि तुम ठीक होने पर अजीजन बाई के यहाँ काम पर जाओगी, उपेन्द्र बोला।
तो तुमने और तुम्हारी माँ ने फैसला कर ही लिया है मुझे इस नरक में धकेलने का, महुआ बोली।
मेरी मजबूरी है, मैं क्या करूँ? उपेन्द्र बोला।
तो इसका मतलब है कि तुम मुझसे प्यार नहीं करते, महुआ ने पूछा।
महुआ! सच बताऊँ तो पहले तुमसे प्यार नहीं करता था, क्योंकि तुम्हारी अहमियत नहीं थी मुझको लेकिन अब मैं तुम्हें चाहने लगा हूँ, मुझे भी तुम्हारे साथ की जरूरत है, तुमसे पहले भी मैंने कई बार मिलने की कोशिश की लेकिन माँ के डर से तुम्हारे करीब ना आया, उपेन्द्र बोला।
तो अब तुमने क्या सोचा है? महुआ ने उपेन्द्र से पूछा।
करना तो हमें वही पड़ेगा जो माँ ने कहा था, इसी शर्त पर तो मैं तुम्हारी जान बचा पाया लेकिन यकीन मानो, तुम अजीजनबाई के कोठे पर सिर्फ़ नाच और गाना ही करोगी, इसके सिवा कुछ नहीं , मैं ये तुमसे वादा करता हूँ, उपेन्द्र बोला।
तुम पर कैसे यकीन कर लूँ मैं? महुआ ने पूछा।
मेरे प्यार पर यकीन करो, मैं तुम्हारा शौहर हूँ, मैं कभी नहीं चाहूँगा कि दूसरा और कोई भी तुम्हें हाथ लगाएँ, उपेन्द्र बोला।
लेकिन तुम अब ये वादा करो कि तुम हमेशा मेरे साथ रहोगे, वहाँ अजीजनबाई के यहाँ भी, महुआ बोली।
तुम और मैं हमारे घर में ही रहेंगे, तुम केवल वहाँ नाचने और गाने जाओगी, तुम्हें ले जाने और वहाँ से लाने की जिम्मेदारी मेरी होगी, मैं माँ से ये बात कहूँगा कि हम अपने घर पर ही रहेंगे, उपेन्द्र बोला।
सच! कहते हो! महुआ बोली।
हाँ! बिल्कुल सच! ये कहकर उपेन्द्र ने महुआ को पहली बार अपने सीने से लगाया।
अब महुआ ठीक होकर घर आ गई थी लेकिन अभी भी वो कमजोरी महसूस कर रही थी, इसलिए उपेन्द्र अब घर से बाहर ना जाता , घर में रहकर उसका ख्याल रखता था, वो मधुबनी को अब महुआ के पास फटकने भी नहीं देता था, ये देखकर मधुबनी खीझ उठती लेकिन अब वो कुछ नहीं कर सकती थी क्योंकि महुआ और उपेन्द्र ने उसकी शर्त जो मान ली थी.....
अब उपेन्द्र कहता कि वो उसकी पत्नी है इसलिए उसके दुख दर्द का ख्याल रखना उसका ही फर्ज है, तुम्हारा हमसे सिर्फ़ रुपए का नाता है जब महुआ कमाने लगेगी तो अपना हिसाब पूरा कर लेना और उसके कमरे मे तुम अब भूलकर भी कदम नहीं रखोगी।
ये देखकर महुआ को तसल्ली हो गई थी कि चलो अब कोई तो है उसका मन पढ़ने वाला, उसके आँसू पोंछने वाला , उसका दर्द समझने वाला।
कुछ दिन ऐसे ही बीते अब महुआ पूर्ण रूप से स्वस्थ हो चुकी थी और एक रोज शाम के वक्त मधुबनी उसे तैयार करके अजीजनबाई के यहाँ ले गई, साथ में उपेन्द्र भी गया, अजीजनबाई के कोठे पहुँचकर मधुबनी ने महुआ के रूख से परदा हटाते हुए अजीजनबाई से कहा.....
लो ले आई मैं तेरे कोठे के लिए एक और खूबसूरत चेहरा....
अजीजनबाई ने जैसे ही महुआ को देखा तो उसका रूप-लावण्य देखकर बोली......
मधुबनी बाई! यूँ तो तुम पहले भी हमारे कोठे पर नायाब खूबसूरत चेहरे लाती रही हो लेकिन ये सुन्दर मोती समुद्र की किस तलहटी से ढूंढ़कर लाई हो?अल्लाह कसम क्या हुस्न पाया है? बला है बला!
अजीजन! ये मेरी बहु है, इस उपेन्द्र की बीवी, मधुबनी बोली।
क्या कहती हो? इस बार बहु को ही दाँव पर लगा दिया, कुछ भी नहीं सोचा, अजीजन बोली।
हम तवायफें इतना सोचने लगीं तो दुनिया के कोठे ना बंद हो जाएंगे अजीजन! , मधुबनी बोली।
सही कहती हो मधुबनी! अजीजन बोली।
लेकिन एक शर्त मेरी भी है कि ये सिर्फ़ नाचेगी और गाएंगी, यहाँ रहेगी नहीं, मधुबनी बोली।
ठीक है मधुबनी! इस नायाब मोती के लिए तो हमें हर शर्त मंजूर है, वैसे इसका नाम क्या है? अजीजन ने पूछा।
इसका नाम महुआ है, मधुबनी बोली।
तुम ही सबकुछ बोलोगी, जरा हमें भी तो इस हूर की आवाज़ सुनने का मौका दो, नहीं तो कैसे पता चलेगा हमें कि ये गाती भी है, अजीजन बोली।
जी, मेरा नाम महुआ है, महुआ बोली।
आवाज़ तो बहुत ही सुरीली है तेरी , माशाल्लाह! और आज से तेरा नाम महुआ नहीं मोतीबाई होगा, तुम्हें कोई एतराज़ तो नहीं, अजीजनबाई बोली।
एतराज कैसा अजीजन?मधुबनी बोली।
अरे, मधुबनी! मैंने तुझसे नहीं महुआ से पूछा है, अजीजनबाई बोली।
जी, मुझे कोई एतराज़ नहीं, महुआ बोली।
ठीक है तो आज ये तय हुआ कि तुम्हारा नाम मोतीबाई है और मुझे आज से तुम खालाज़ान बुलाओगी, अजीजनबाई बोली।
ठीक है खालाज़ान! महुआ बोली।
और उस दिन आखिर महुआ के पहले कदम कोठे पर पड़ ही गए।
कुछ ही दिनों में मोतीबाई उस कोठे की सबसे मशहूर तवायफ़ बन गई, अपनी गायकी और नाच से वो सबकी दिलअजीज बन गई, उसकी आवाज़ का जादू अच्छे अच्छो का मन मोह ले लेता, जो एक बार अजीजनबाई के कोठे पर मोतीबाई की ठुमरी सुन लेता वो बार बार सुनने के लिए आता, अजीजनबाई के दिनबदिन ग्राहक बढ़ते ही जा रहे थें, अजीजनबाई की आमदनी भी बहुत बढ़ गई थी, जिससे वो मोतीबाई की हर इच्छा मान लेती, मोतीबाई जो भी कहती तो अजीजनबाई कभी भी उसकी बात नहीं काटती।
इस तरह मोतीबाई इस काम से खुश तो नहीं थी लेकिन उसके पास अब दौलत और शौहरत की कोई कमीं नहीं थी, जिससे उसकी सास मधुबनी का मुँह भी बन्द रहता, मोतीबाई ने अब खुद का एक अच्छा सा घर खरीद लिया था, उपेन्द्र भी मोतीबाई का बहुत ख्याल रखता।
इस तरह मोतीबाई पहली बार माँ बनी, उसके इस बच्चे के लिए मधुबनी कतई राजी नहीं थी, वो बोली बच्चा आ जाने तेरे काम में खलल पड़ेगा, उसने ये बात अजीजनबाई से कही....
अजीजनबाई ने जब मधुबनी की बात सुनी तो बोली.....
मधुबनी! ये तो आल्लाह ताला का दिया हुआ खूबसूरत तोहफा, इसे तू क्यों ठुकरा रही है? कुछ ही महीने तो मोतीबाई का काम रूकेगा, ज्यादा से ज्यादा एक साल, इसके बाद जब मोती गाया करेगी तो बच्चे को मैं सम्भाल लिया करूँगी, खुद की औलाद का सुख ना तुझे मिला और ना मुझे मिला तो इसका मतलब ये तो नहीं कि और भी ये सुख ना ले पाएं, इस बच्चे के इस दुनिया में आने के बाद , तेरा जो हर्जाना होगा वो मैं भरूँगी लेकिन बच्चे को इस दुनिया में आने से मत रोक।
अजीजनबाई की बात सुनकर मधुबनी बोली.....
मुझे कोई एतराज़ नहीं, अगर तुम मुझे पैसो दोगी....
और इस तरह कुछ महीनों बाद महुआ की पहली सन्तान इस दुनिया में आई जो कि एक बेटी थी, परियों सी सुन्दर, फूल सी नाजुक, अपनी माँ की हमशक्ल, महुआ और उपेन्द्र उसे देखकर फूले नहीं समाए, प्यार से उसका नाम उन्होंने रिमझिम रखा।
रिमझिम के कुछ महीनों का होते ही महुआ फिर से नाचने गाने जाने लगी, उसका शरीर देखकर अब भी नहीं लगता था कि वो एक बच्चे की माँ है, मोतीबाई के लौटने से एक बार फिर अजीजन का कोठा आबाद हो गया , कोठे की रौनक बढ़ गई, अजीजनबाई की झोली रूपयों से हर रात भर जाती , लोंग मोतीबाई की ठुमरी सुनकर इतना खुश होते थे।
अब मोतीबाई ने गज़लें गाना भी शुरू कर दिया था, अजीजनबाई उसे मशहूर शायरों की गज़लें लाकर देती और कहती इनका भी रियाज़ करो, लोंग आजकल ये भी सुनना पसंद करते हैं और मोतीबाई ऐसा ही करती।
लेकिन रात किसी गाँव के जमींदार अपनी बग्घी में कोठे से होकर गुजरें, उन्होंने जैसे ही मोतीबाई की गज़ल सुनी तो कोचवान से बग्घी रोकने को कहा और कोठे के भीतर गए, वें मोतीबाई की गज़ल बेसुध होकर सुन रहें थें, जब गज़ल खतम हुई तो सब के जाने के बाद वें बोल पड़े.....
क्या गला पाया है आपने ?कसम से कहते हैं कि ये नजाकत, ये गाने की अदा हम ने आज तक किसी में नहीं देखीं, अपनी जिन्द़गी में हमने बहुत गाने वाली सुनी हैं, लेकिन मोहतरमा आप जैसी गायकी आज पहली बार सुनी.....
जमींदार की बात सुनकर अजीजन पूछ बैठीं.....
कौन हैं जी आप? पहले तो यहाँ कभी नहीं देखा।
हम तो मौसिकी के कद्रदानों में से एक हुआ करते हैं, जमींदार प्रभातसिंह हैं हम, वो जमींदार बोले।
अच्छा हुजूर! आइए तशरीफ़ रखिए, आप जैसे कद्रदानों की तो हमें भी बहुत कद्र रहतीं हैं, अजीजनबाई बोली।
इन मोहतरमा की आवाज़ का जादू हमें यहाँ खींच लाया, माशाल्लाह जितना अच्छा गला पाया है सूरत भी खुदा ने वैसी ही बख्शी है, जमींदार साहब बोलें।
जी, जमींदार साहब आपकी निगाहों पर जरा काबू रखें, अजीजनबाई बोली।
जी, मैं तो फनकारा की तारीफ़ कर रहा हूँ, जमींदार साहब बोलें।
जी, बस, यहाँ आएं हैं तो हद में भी रहना सीख लीजिए, अजीजनबाई बोली।
मोहतरमा! मैं अपनी हद में ही हूँ, किसी के फन की तारीफ करना गुस्ताखी तो नहीं, जमींदार प्रभातसिंह बोलें।
जी, बिल्कुल नहीं, फन की तारीफ़ गुस्ताखी नहीं लेकिन यहाँ पर फनकारा की तारीफ करना गुस्ताखी मानी जाती है, अजीजन बोली।
ओह..समझा! तो अगर मैने अपनी हद पार की हो तो गुस्ताखी माफ, अब इस गुस्ताख़ से ऐसी गुस्ताखी कभी ना होगी, जमींदार प्रभातसिंह बोले।
मुझे आपसे ऐसी ही उम्मीद है, अजीजनबाई बोली।
मैं वायदा करता हूँ, आपकी ये उम्मीद कभी ना टूटेगी लेकिन इस मौसिकी के आशिक को इन मोहतरमा की गायकी बहुत ही पसंद आई तो क्या कभी कभी हम इनकी गायकी सुनने आ सकते हैं? जमींदार प्रभातसिंह ने पूछा।
जी, जरूर, जहेनसीब! कभी कभी क्या रोजाना तशरीफ़ रखिए? लेकिन हद में रहकर, अजीजनबाई बोली।
जी, हम सब समझ गए, अभी चलते हैं, हवेली पर हमारी बेगम इन्तज़ार करतीं होंगी, जमींदार प्रभातसिंह बोलें।
माफ़ कीजिए, एक बात पूछना चाह रही थीं अगर एतराज़ ना हो तो, अजीजन बोली।
जी, पूछिए, भला हमें क्यों एतराज़ होने लगा? जमींदार प्रभातसिंह बोले।
वो ये कि उर्दू पर आपकी पकड़ बहुत अच्छी है, अजीजन बोली।
जी, वो इसलिए कि हम शायर हैं और जो गज़ल अभी ये मोहतरमा गा रहीं थीं वो हमारी ही लिखी हुई हैं, जमींदार प्रभातसिंह बोलें।
लेकिन वो तो किसी बेनाम शायर ने लिखी है, इतने में मोतीबाई बोल पड़ी।
जी, हम जमींदार होकर अपनी गजलों की छपी किताब में अगर ये नाम डालें कि शायर जमींदार प्रभातसिंह तो कितना भद्दा लगेगा, प्रभातसिंह बोलें।
ये सुनकर सब हँस पड़े और अजीजन बोली....
आप बहुत ही दिलचस्प इन्सान हैं।
जी !तो हम चलते हैं फिर कभी मुलाकात होगी और इतना कहकर जमींदार प्रभातसिंह सिंह चलें गए।
अब जमींदार प्रभातसिंह का कोठे पर आने का सिलसिला जारी हो गया, वो केवल मोतीबाई की गजलें सुनने ही आते थे, बदलें में अपनी लिखीं कुछ शायरियाँ और गजलें मोतीबाई को दे देते, पन्द्रह गाँवों के जमींदार थे वें, भगवान की दया से उनके दो बच्चे थे एक बेटा और एक बेटी, दोनों बच्चे अपनी नानी के पास ही रहते थे क्योंकि जमींदार साहब के परिवार में उनके बड़े भाई उनसे अलग रहते थे और माँ बाप का सालों पहले ही देहान्त हो गया था,
सबसे मुश्किल बात ये थी उनके लिए कि उनकी पत्नी का कमर के नीचे का भाग लकवाग्रस्त था , जिसकी वें स्वयं देखभाल करते थे, चन्द्रिका से उन्होंने प्रेमविवाह किया था, दो बच्चों के जन्म के बाद जिंदगी अच्छी खासी चल रही थी एकाएक ना जाने किसकी नजर लग गई और सालों से चन्द्रिका बिस्तर में ही पड़ी है, बच्चों की देखभाल प्रभातसिंह कर नहीं पा रहें थे इसलिए उन्हें ननिहाल भेज दिया, चन्द्रिका ने कई बार उनसे दूसरा ब्याह करने को कहा तो प्रभातसिंह ने ये कहकर मना कर दिया कि अगर मैं तुम्हारी जगह होता तो क्या तुम ऐसा करती.....?
प्रभातसिंह का जवाब सुनकर फिर चन्द्रिका कुछ ना कहती, इसलिए प्रभातसिंह अपना मन बहलाने के लिए शायरियां लिखने लगें , उनकी लिखी शायरियाँ मशहूर होतीं गई और उन्हें मुशायरों में भी बुलाया जाने लगा, वो अपनी जिन्द़गी से उदास जरूर थे लेकिन दुखी नहीं थे।
जब कोई उनसे चन्द्रिका के बारें में कुछ कहता तो वे कहते कि मैं तो केवल उसका ख्याल ही रख रहा हूँ लेकिन जो सालों से करवट लेने के लिए भी लाचार है उसका क्या? उसके दिल से पूछो कि एक ही बिस्तर पर एक ही कमरें में , एक ही छत को निहारना कितना मुश्किल होता है?मैं तो सारे काम खुद कर सकता हूँ लेकिन उससे पूछो कि वो खुद से पानी भी नहीं पी सकती, उसको इस तरह अधर में छोड़ना नाइन्साफ़ी होगी, मैं खुद से कैसे नजरेंं मिलाऊँगा अगर मैने उसे धोखा दिया तो।
वें कोठे आते तो मोतीबाई से कुछ देर जरूर बात करते, इससे अजीजन को तो कोई एतराज़ ना था लेकिन मधुबनी को था उसने एक दिन उपेन्द्र के कान भर दिए कि तेरी बीवी का उस जमींदार से इतना मेल जोल अच्छा नहीं, बहुत पैसे वाला है वो अगर उसने अजीजनबाई से उसे खरीद लिया तो क्या करेगा तू?
मधुबनी की बात सुनकर उपेन्द्र का माथा ठनक गया और वों एक दिन जमींदार का पता ठिकाना पूछते पूछते उसकी हवेली पहुँच गया.....
प्रभातसिंह बोले.....
आओ मियाँ! कहों कैसे आना हुआ? कोई पैगाम लाए हो क्या?
जी नहीं ! मैं तो हिसाब-किताब चुकता करने आया था, उपेन्द्र बोला।
क्यों मियाँ? ऐसा भी क्या हो गया? प्रभातसिंह ने पूछा।
मुझे अपनी बीवी से आपकी नजदीकियाँ बरदाश्त नहीं हो रहीं, इस मुआमले में आप कोई सफाई पेश करेंगे, उपेन्द्र गुस्से से बोला।
बरखुर्दार! आप तो खाँमखाँ में नाराज होते हैं, प्रभातसिंह बोले।
जी, मुझे मेरे सवाल का जवाब दीजिए, उपेन्द्र बोला।
सच कहूँ या झूठ, प्रभातसिंह बोले।
सच ही कहिए, उपेन्द्र बोला।
मोतीबाई मेरी छोटी बहन की तरह है, मेरी नज़रें और लोगों की तरह उस पर नहीं उठतीं, मैं सिर्फ अपना मन हल्का करने के लिए कोठे पर उसका गाना सुनने जाता हूँ, मेरा मोतीबाई के साथ केवल इन्सानियत का नाता हैं, तुम्हें ये मन्जूर नहीं तो ठीक है, प्रभातसिंह बोले।
क्यों ?आपके पास तो बहुत दौलत है, आप तो दौलत से हर सुख खरीद सकते हैं फिर आपको कोठों पर जाने की क्या जरूरत? उपेन्द्र ने पूछा।
चलो तुम्हें कुछ दिखाता हूँ और ये कहकर प्रभातसिंह , उपेन्द्र को अपनी पत्नी चन्द्रिका के कमरे की खिड़की के पास ले जाकर बोले.....
उसे देखकर रहें हो , मेरी पत्नी चन्द्रिका है, सालों हो गए कमर के नीचे लकवा ग्रस्त है, उसकी घुटन, उसकी तड़प, उसकी लाचारी , उसकी उलझन को केवल मैं ही समझ सकता हूँ और कोई नहीं, उसकी आत्मा कैसे तड़प हो रही होगी मुक्त होने के लिए उसके अलावा मैं ही इस बात को समझ सकता हूँ, चाहता तो कर लेता दूसरा ब्याह , नहीं किया, कारण जानते हो क्या है ? कि मैं उससे अब भी प्रेम करता हूँ, उसे बीच मँझधार में कैसे छोड़ दूँ? क्योंकि मेरा प्रेम उथला नहीं गहरा है, तुम प्रेम की गहराई को समझते होते ना तो मोतीबाई कभी भी कोठे पर ना दिखाई देती, इसलिए आज के बाद भाई बहन के रिश्ते पर उँगली मत उठाना।
जी, मुझे मुआफ कर दीजिए, आपको समझने में मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई, उपेन्द्र बोला।
कोई बात नहीं बरखुरदार! गल्तियाँ हो जातीं हैं, प्रभातसिंह बोलें।
और उस दिन उपेन्द्र , प्रभातसिंह की हवेली से अपने मन का मैल धोकर वापस आ गया।
इसके बाद फिर कभी भी उपेन्द्र ने मोतीबाई पर शक़ नहीं किया, उसे प्रभातसिंह की बात अच्छी तरह समझ में आ गई थी कि प्रेम उथला नहीं गहरा होना चाहिए, अब मधुबनी कुछ भी कहती रहती और उपेन्द्र उसकी एक ना सुनता, इसी तरह जिन्द़गी के दो साल और गुज़र गए, वक्त ने करवट ली और एक बार फिर मोतीबाई की गोद हरी हुई, इस तरह उसने एक बार फिर से एक और बेटी को जन्म दिया, उसका नाम मोतीबाई ने मिट्ठू रखा।
दो दो बेटियों को देखकर मधुबनी की नीयत खराब होने लगी, वो इन लड़कियों को भी कोठे पर बिठाने के सपने देखने लगी, अब उसके मन में मोतीबाई के लिए स्वार्थी प्रेम उमड़ने लगा था, वो बच्चियों का खूब ख्याल रखने लगी और मोतीबाई का भी, मोतीबाई सोचती थी कि शायद उम्र का तकाज़ा है, अब मधुबनी में सुधार आ रहा है, शायद इस उम्र में वो अपने आप को सुधारना चाह रही हो, लेकिन यहाँ मामला तो कुछ और ही था, मधुबनी का इरादा क्या है ये मोतीबाई नहीं समझ पाई?
समय रेत की तरह मुट्ठी से निकलता जा रहा था, रिमझिम और मिट्ठू धीरे धीरें बड़ी हो रहीं थी और स्कूल जाने लगी थी, रिमझिम सात साल की हो रही थी और मिट्ठू पाँच साल की,
इधर प्रभातसिंह जी की पत्नी चन्द्रिका भी एक दिन जिन्द़गी से मुँह मोड़कर चली गई, आखिर और कितने साल तक वो मौत से लड़ती, प्रभातसिंह जी के बच्चे भी अब बड़े हो चले थे और अब चन्द्रिका के जाने से उनकी जिम्मेदारियाँ भी कम हो गई थी,
अकेली हवेली में उनको घुटन होने लगी थी इसलिए उन्होंने अब अपने बच्चों को ननिहाल से बुला लिया था, बच्चों को कहीं कुछ बुरा ना लगें इस वजह से उन्होंने अब अजीजनबाई के कोठे पर जाना भी बंद कर दिया था,
लेकिन उन्होंने शायरी लिखना नहीं छोड़ा था , जब भी कोई नई गज़ल लिखते तो नौकर के हाथ अजीजनबाई के कोठे पर भिजवा देते, बदले में मोतीबाई शुक्रिया अदा का ख़त भिजवा देती।
इधर बच्चियों का स्कूल जाना देखकर मधुबनी के कलेजे पर साँप लोटते, मधुबनी को दोनों लड़कियों का पढना बिल्कुल भी पसंद नहीं था, लेकिन उपेन्द्र के आगें उसकी एक ना चलती, इसी तरह एक दिन रिमझिम स्कूल से आई तो चुपचाप जाकर अपने कमरें में रोने लगी और किसी से कुछ भी नहीं कहा......
जब मोती उसे बुलाने आई तो उसे रोता हुआ देखकर पूछ बैठी कि क्या हुआ?
दूर रहो मुझसे, मुझे हाथ मत लगाओ.....रिमझिम बोली।
रिमझिम की बात सुनकर मोतीबाई को झटका सा लगा और पूछ बैठी लेकिन क्यों?
मेरी स्कूल के बच्चे कहते हैं कि तुम्हारी माँ गंदी है, हम तुमसे दोस्ती नहीं करेंगे, हम लोगों की माँ ने मना किया है, रिमझिम बोली।
रिमझिम की बात सुनकर मोतीबाई वहीं बैठ गई और सोचने लगीं आखिर उसका काम उसकी बेटियों की जिंदगी के आड़े आ ही गया, बड़ी हिम्मत करके वो रिमझिम से बोली...
चुप हो जाओ, मैं तुम्हारा नाम किसी और स्कूल में लिखवा दूँगी, जहाँ तुमसे सभी बात करेंगे, अब तो खुश, बस कल ही मैं किसी और स्कूल वालों से बात करती हूँ, ऐसा कहकर उस समय तो मोतीबाई ने रिमझिम को समझा तो दिया लेकिन वो भी जानती थी कि स्कूल बदलना ही इस समस्या का हल नहीं है,
इस मामले पर उसने उपेन्द्र से बात की लेकिन उपेन्द्र को भी इस समस्या का कोई हल समझ नहीं आया, ये बात मधुबनी तक पहुँची तो वो बोली.....
बहुत हो चुकी लड़कियों की पढ़ाई, अब इन्हें स्कूल भेजना बंद करो, घर पर ही इनकी पढ़ाई का कुछ इन्तजाम कर दो और वैसे भी पढ़ लिख कर क्या करेंगीं? ये भी तो बड़े होकर अपनी माँ की तरह एक कोठे वाली ही बनने वालीं हैं, इन्हें नाच गाने की तालीम दिलवाओ, वही आगें काम आएगा....
मधुबनी की जहरीली बातें सुनकर अब मोतीबाई चुप ना रह सकी और बोली......
खबरदार! तूने मेरी जिन्द़गी तो बर्बाद कर दी लेकिन मै अब अपनी बेटियों की जिन्द़गी तुझे बर्बाद करने नहीं दूँगी, मेरे इस काम की गन्दी परछाईं भी मेरी बेटियों पर नहीं पड़ेगी, अगर जरूरत पड़ी तो मैं किसी को मार भी सकती हूँ और मर भी सकती हूँ लेकिन अपनी बेटियों का सौदा हर्गिज़ नहीं करूँगीं।
जिन्द़गी की जद्दोजहद ने आज मोतीबाई को ना जाने किस दोराहे पर खड़ा कर दिया था, अगर स्कूल भी बदला जाता है तो उसकी बदनामी वहाँ भी तो पहुँच जाएंगी, कुछ भी हो जाएं उसकी बेटियाँ कोठे पर नहीं बैठेगीं, ये उसने ठान लिया था और एक रात उसने अपने दिल पर पत्थर रखकर दूध के गिलास में धतूरे के बीज पीसकर पिला दिए, आधी रात गए दोनों बच्चियाँ इस जहर को सह नहीं पाईं और उन्हें उल्टियाँ शुरू हो गई, एक दो उल्टी के बाद भी जब उल्टियाँ नहीं रूकी तो उपेन्द्र घबरा गया , अब तो उनके पास मोटर थी इसलिए मोटर में दोनों बच्चियों को डाला और डाक्टर के पास चल पड़ा। ।
डाक्टर ने इलाज शुरू किया, तब डाक्टर ने कहा कि बच्चियों को कुछ जहरीली चीज़ दी गई है, शुकर कीजिए कि जहर खाने के कुछ देर बाद उल्टियाँ शुरू हो गईं, इसलिए मेरा काम आसान हो गया, अगर उल्टियाँ ना होतीं तो आप इन्हें मेरे पास भी ना लाते और इन्हें बचाना नामुमकिन था,
बस सुबह तक इन्हें होश आ जाएगा, अब वे खतरे से बाहर हैं, अगर आप घर जाना चाहें तो जा सकते हैं, डाक्टर की बात सुनकर उपेन्द्र का पारा चढ़ गया उसे लगा कि ये काम हो ना हो उसकी माँ मधुबनी का है इसलिए वो बच्चियों को अस्पताल में छोड़कर घर आ गया मधुबनी की खबर लेने और घर पहुँचकर चींख पड़ा....
बाहर निकल नागिन! मेरे बच्चों को मारने की कोशिश की तूने, महुआ ने उन्हें कोठे पर बैठने को मना कर दिया तो तू उनकी जान की दुश्मन हो गई, आज मैं तुझे जिन्दा नहीं छोड़ूगा, चाहें मुझे जेल ही क्यों ना जाना पड़े?
उपेन्द्र का चीखना चिल्लाना सुनकर मधुबनी बोली.....
क्या कहता रे तू? मैं भला बच्चियों को क्यों मारने लगीं, मेरी भला उनसे क्या दुश्मनी हो सकती है।
तू उन्हें कोठे पर बिठाना चाहती थी, तेरी ये मंशा पूरी ना हुई तो तू उनकी जान लेने पर आमादा हो गई, उपेन्द्र गुस्से से बोला.....
मैं ऐसा क्यों करने लगी? क्या वो मेरी पोतियाँ नहीं है, मैंने भी तो उन्हें पाला पोसा है , मधुबनी बोली।
तूने अपने स्वार्थ के लिए उन्हें पाला पोसा था, उपेन्द्र बोला।
क्या बकता है रे? मधुबनी चीखी।
बकता नहीं हूँ, सच कहता हूँ, तूने ही उनके खाने में जहर मिलाया होगा, उपेन्द्र बोला।
तू मुझ पर गलत इल्जाम लगा रहा है, मधुबनी बोली।
तो तेरे सिवा ऐसा और कौन कर सकता है, उपेन्द्र ने पूछा।
पीछे से आवाज़ आई....
ये मैने किया हैं?वो महुआ थी।
महुआ तुम! ...तुम भला ऐसा कैसे कर सकती हो? तुम तो उनकी माँ हो , तुमने उन्हें जन्म दिया है, उपेन्द्र ने पूछा।
इसलिए कि मैं नहीं चाहती कि उनका सौदा हो, इसलिए कि मैं नहीं चाहती कि मेरी वजह से कोई उन पर उँगली उठाए और इसलिए मैं नहीं चाहती कि कोई उन्हें तवायफ़ की बेटियाँ कहें।
तो तुम उन्हें मार दोगी, उनकी जान ले लोगी, कैसी माँ हो तुम, इस समस्या का कोई और हल भी तो हो सकता है, उपेन्द्र बोला।
मुझे और कोई हल समझ नहीं आया तो मैंने उन दोनों के दूध में धतूरे के बीज पीसकर मिले दिए, महुआ बोली।
मैं अब और अपनी बेटियों को तुम्हारे पास नहीं रहने दूँगा, मैं कल ही जमींदार साहब के पास जाकर उनसे इस समस्या को हल करने के लिए कहता हूँ और इतना कहकर उपेन्द्र फिर से मोटर में बैठकर अस्पताल चला गया बच्चियों के पास ।
बच्चियाँ जब घर आ गईं तो उन्हें घर छोड़कर वो उसी वक्त जमींदार साहब के पास पहुँचा......
अरे! उपेन्द्र बाबू! आप , कहिए कैसे आना हुआ? प्रभातसिंह ने पूछा।
बहुत जरूरी काम आ पड़ा और आपके सिवा इस समस्या का रास्ता सूझाने वाला मुझे और कोई नज़र ना आया इसलिए आ गया आपके पास , उपेन्द्र बोला।
अच्छा किया जो आप आएं लेकिन समस्या क्या है? जरा मैं भी तो सूनूँ, प्रभातसिंह बोले।
महुआ बहुत परेशान है और परेशानी के चलते उस के हाथों से बहुत बड़ा पाप होने से बच गया, उपेन्द्र बोला।
आगे भी कहिए, प्रभातसिंह बोलें।
और उपेन्द्र ने प्रभातसिंह को सारी कहानी कह सुनाई, उपेन्द्र की बात सुनकर प्रभातसिंह बोलें...
बस, इतनी सी बात, मैने सोचा पता नहीं कौन सा पहाड़ टूट पड़ा?प्रभातसिंह बोले।
ये आपको इतनी सी बात लगती है, अगर बच्चियों को कुछ हो जाता तो?उपेन्द्र बोला।
हुआ तो नहीं ना, तो बेफिकर रहो बरखुरदार! जिन्द़गी है, कुछ ना कुछ तो होता ही रहता है, चिन्तित रहकर समस्याओं को बड़ा बनाने की कोशिश मत करों , उन्हें सुलझाने की कोशिश करो, प्रभातसिंह बोलें।
तो आपको इस समस्या का कोई हल सूझा, उपेन्द्र ने पूछा।
एक ही हल है मियाँ! और वो है जुदाई, प्रभातसिंह बोले।
मतलब क्या है आपका? उपेन्द्र बोला।
ऐसा करों बच्चियों को किसी महफूज़ जगह रखवा दो, प्रभातसिंह बोलें।
और वो जगह कौन सी होगी? उपेन्द्र ने पूछा।
मेरी एक चचेरी बहन हैं जो लखनऊ में संगीत विद्यालय चलातीं हैं, बेवा हों गईं थी और दोनों बच्चे विलायत में जाकर बस गए तो उन्होंने अपना समय काटने के लिए संगीत कला केन्द्र खोल लिया, वहाँ स्कूल और हास्टल दोनों साथ में ही हैं, अनाथ लड़कियों के लिए उन्होंने ये स्कूल खोला था लेकिन अब अच्छे अच्छे घरों से भी लोंग अपनी बेटियों को यहाँ संगीत के लिए भरती करवाते हैं, तुम और मैं बच्चियों को लखनऊ में भरती करवा आते हैं, सब समस्याएँ खतम, जमींदार प्रभातसिंह बोले।
बहुत बहुत शुक्रिया, जमींदार साहब ! बहुत एहसान हैं आपके हम पर , एक और चढ़ गया, उपेन्द्र बोला।
कैसी बातें करते हो बरखुरदार! मोतीबाई मेरी बहन है और इस नाते ये तो मेरा फर्ज बनता है, कल ही तैयारी कर लो, कल ही चलते हैं, प्रभातसिंह बोलें।
और इस तरह एक बार फिर उपेन्द्र अपनी समस्या का समाधान लेकर प्रभातसिंह की हवेली से लौटा।
उपेन्द्र बिना देर किए हुए दोनों बेटियों को संगीत कला केन्द्र में प्रभातसिंह के साथ भरती करवाने ले गया, प्रभातसिंह की चचेरी बहन ही संगीत कला केन्द्र को चलातीं थीं इसलिए एडमिशन मे कोई दिक्कत ना हुई, बच्चियों के संगीत केन्द्र चले जाने से अब उपेन्द्र और महुआ की परेशानी कुछ कम हो गई थी, फिर से उनका जीवन सुचारु रूप से चलने लगा,
इसी बीच जब उपेन्द्र के पास बेटियों की जिम्मेदारी खतम हो गई तो उसने सोचा कोई काम शुरू किया जाए, वो पढ़ा लिखा तो था नहीं, इसलिए उसने एक डेरी खोलने का सोचा, शहर से बाहर उसने कुछ जमीन और कुछ गाय भैंसें खरीदी, अपना हाथ बँटाने के लिए उसने कुछ लोगों को भी अपने साथ काम पर रख लिया, उसका ये काम चल पड़ा, उसके अन्दर भी एक आत्मविश्वास आ गया कि अब वो महुआ को अपने पैसों से उपहार भेंट किया करेंगा।
उसने अपनी डेरी के मुनाफे से कुछ पैसे इकट्ठे किए और महुआ को सोने के जड़ाऊ कंगन उपहार में दिए, उन कंगनों को पहनकर महुआ खुशी से फूली ना समाई, आखिर वो उसके पति की कमाई के कंगन थे, महुआ के मन से एक और बोझ जैसे उतर गया था, उसने सोचा देर से ही सही कम से कम उसके जीवन में कुछ तो खुशियाँ लौटीं।
अब जब भी महुआ का मन अपनी बेटियों से मिलने का करता तो वो खुद ही लखनऊ जाकर उनसे मिल आती, लेकिन बेटियों को उसने अपने पास बुलाना बिल्कुल छोड़ दिया था।
बच्चियों का भी वहाँ मन लग गया था, वो वहाँ ठीक से पढ़ रही थीं और साथ साथ संगीत भी सीख रहीं थीं, इसी बीच महुआ की जिन्दगी में फिर से एक नन्हे मेहमान का आगमन हुआ , महुआ बहुत डर रही थी कि इस बार लड़की ना हो तो ही अच्छा, क्योंकि दो बेटियों को वो बड़ी मुश्किल से सही जगह पहुँचा पाई थी, लेकिन इस बार महुआ की मुराद पूरी हो गई, उसे बेटा जो हुआ था उसने प्यार से उसका नाम पलाश रखा।
पलाश अभी साल भर का ही हुआ था कि मधुबनी एक लम्बी बीमारी के बाद भगवान को प्यारी हो गई, मधुबनी के जाने से पलाश की पूरी जिम्मेदारी अब उपेन्द्र पर आ गई थी इसलिए वो अब अपने डेरी वाले काम पर ध्यान नहीं दे पा रहा था लेकिन संकोचवश वो महुआ से कुछ नहीं कह पा रहा था लेकिन कुछ दिनों बाद इस बात को लेकर उपेन्द्र और महुआ के बीच बहस हो गई, मजबूरी में अब महुआ को पलाश को अपने साथ कोठे ले ही जाना पड़ता, वहाँ पलाश को अजीजनबाई सम्भाल लेती या वहाँ की लड़कियाँ।
फिर एक दिन ना जाने महुआ को क्या सूझी?उसने कोठे ना जाने का मन बना लिया लेकिन फिर बाद में उसने सोचा कि खर्चा कैसे चलेगा, दोनों बेटियाँ लखनऊ में पढ़ रहीं हैं, ये तीसरा भी तो है, अभी उपेन्द्र का काम भी उतना नहीं जमा है, एक बार उपेंन्द्र का काम जम जाए फिर वो कोठे को हमेशा हमेशा के लिए तिलांजली दे देंगी।
इसी तरह पलाश तीन साल का होने को आया और उधर उपेन्द्र की डेरी के आस पास और भी डेरियाँ खुल गई तो उसका काम कुछ मद्धम सा हो गया, अब डेरी से उसको उतना मुनाफा नहीं हो रहा था जैसे पहले हो रहा था, इसी परेशानी के चलते उपेन्द्र ने शराब पीना शुरू कर दिया।
अब आए दिन महुआ और उपेन्द्र में बहस होने लगी जिसे देखकर छोटा पलाश परेशान हो उठता लेकिन इस समस्या का दोनों में से किसी ने कोई समाधान ना ढ़ूढ़ा और तभी एक दिन थकहार कर फिर से उपेन्द्र, जमींदार प्रभातसिंह के पास जा पहुँचा और जाकर बोला.....
मैं तो अपनी जिन्द़गी से तंग आ चुका हूँ, जमींदार साहब!
क्यों! मियाँ ! अब कौन सी मुसीबत ने आपके दरवाज़े खटखटा दिए जो आप ऐसी बुजदिलों वाली बात करतें हैं, प्रभातसिंह बोलें।
जिन्द़गी में कभी सुख नहीं मिला मुझे और शायद ना कभी मिलेगा, उपेन्द्र बोला।
मियाँ आपकी पहेलियाँ सुलझाने का समय नहीं है हमारे पास जो कहना है साफ साफ कहिए, प्रभातसिंह बोले।
मेरी सारी जिन्द़गी यूँ ही बरबाद हो गई, सौतैली माँ, तवायफ़ बीवी, बच्चियाँ भी दूर हैं, लानत हैं ऐसी जिन्द़गी पर, जिन्द़गी अब बोझ लगने लगी है, उपेन्द्र बोला।
मियाँ !लानत का मतलब समझते हो, शरम की बात, अरे! तुम जैसे आदमी को तो फक्र होना चाहिए कि उसकी मोतीबाई जैसी बीवी है, जिसने अपने सिर पर पूरी गृहस्थी और बच्चों का बोझ उठा रखा है और तुम जैसे नकारा आदमी का भी , कोई और होती ना तो ना जाने तुम्हें छोड़कर कब का चली गई होती, फिर भी तुम ऐसी बातें करते हो, बोझ जिन्द़गी तब हो जाती है जब आपका कोई दिल अजीज आपकी आँखों के सामने लाचार और मजबूर होकर बिस्तर पर लेटकर जीवन से मुक्त होने की कामना करें और आप सिवाय आँसू बहाने कुछ ना कर पाएं, तब जिन्द़गी बोझ होती है और तुम्हारे पास किस चींज की कमीं है, चले आए हमारे पास खुद को कोसने, हमारे घर में ऐसे लोगों के लिए कोई जगह नहीं है, हम जिन्दादिल इन्सान हैं और हमें वैसे ही लोंग अच्छे लगते हैं, प्रभातसिंह बोले।
जमींदार प्रभातसिंह की बात सुनकर उपेन्द्र की बोलती बंद हो गई लेकिन फिर भी वो हिम्मत करके बोला, आजकल डेरी का काम नहीं चल रहा है।
तो इसमें कौन सी बड़ी आफत आ गई, छोड़ दो काम , बेंच दो डेरी, जो पैसे आएं उनसे कोई और धन्धा शुरू करों, हमने पहले भी कहा था कि समस्याओं को बढाने से अच्छा है या तो उन्हें खतम करो या तो उनका समाधान ढूँढ़ो, प्रभात सिंह बोलें।
शायद आप सही कहते हैं , उपेन्द्र बोला।
तुम पढ़े लिखे होते तो हम तुम्हें अपना मुनीम बना लेते, अभी कुछ समय किसी भी काम के बारें में मत सोचो, डेरी बेचकर कुछ दिन आराम करो, फिर तब हम सोचते हैं कि तुम्हारे लिए कौन सा व्यापार ठीक रहेगा, प्रभातसिंह बोले।
हाँ, मैं यही करता हूँ, कुछ दिन सुकून से रहता हूँ, बाद में देखूँगा कि क्या करना है? उपेन्द्र बोला।
अब हमें लगता है कि तुम्हें हमारी बात ठीक तरह से समझ में आ चुकी है, प्रभातसिंह बोले।
जी, तो मैं चलता हूँ, इस तरह एक बार फिर प्रभातसिंह ने उपेन्द्र की समस्याओं का समाधान कर दिया।
उपेन्द्र ने डेरी बेंच दी और पैसें महुआ को जाकर दे दिए हिफाज़त से रखने के लिए, महुआ ने पूछा भी कि ये पैसें कहाँ से आए ? तो वो बोला.....
मुनाफा नहीं हो रहा था इसलिए डेरी बेंच दी, कुछ दिन आराम से सोचकर बाद में नया काम शुरू करूँगा,
महुआ भी कुछ नहीं बोली बस इतना कहा कि आराम से सोच लेना।
अब उपेन्द्र के स्वभाव में बदलाव आने लगा था, धीरे धीरे उसकी शराब भी कम हो गई थी, वो फिर से महुआ और पलाश का ख्याल रखने लगा था, महुआ की जिन्द़गी में एक बार फिर से खुशियों ने कदम रखें, उसकी जिंदगी में अब फिर से कुछ कुछ ठीक होनें लगा था।
लेकिन अब पलाश को महुआ की आदत हो गई थी, इसलिए उपेन्द्र अब उसे ज्यादा देर सम्भाल नहीं पाता था, इसलिए महुआ पलाश को फिर से अपने संग कोठे पर ले जाने लगी, इसी तरह पलाश चार साल का हो कर पाँचवीं में लग गया था, अब वो भी अपनी माँ की तरह नाचने की कोशिश करता, अपनी माँ की नकल करता, उसका ये खिलवाड़ अजीजनबाई को खूब भाता और वो उसे देखकर खूब खुश होती, लेकिन ये चींज महुआ को पसंद नहीं आ रही थी कि उसका बेटा उसके जैसी हरकतें करें।
उसने अब पलाश को भी अपने से दूर करने का मन बना लिया था और इसी सिलसिले में उसने एक दिन प्रभातसिंह को अपने घर बुलवाया ......
जी, कहिए मोहतरमा ! हमें कैसें याद किया, प्रभातसिंह जी ने पूछा।
जी !जमींदार साहब !पलाश के बारे में कुछ बात करनी हैं, महुआ बोली।
जी! कहें! प्रभातसिंह बोले।
मैं ने सुना है कि बडे़ बड़े घरों के बच्चे बोर्डिंग स्कूल जाते हैं, महुआ बोली।
हाँ! तो ! जाते तो हैं, प्रभातसिंह बोले।
मैं चाहती हूँ कि पलाश भी बोर्डिंग स्कूल में पढ़े, अब उसकी स्कूल जाने लायक उमर हो गई है, मैं नहीं चाहती कि वो अपनी माँ को ऐसे नाचते और गाते हुए देखें, महुआ बोली।
तो क्या आपने इस विषय पर अपने शौहर से बात कर ली है? प्रभातसिंह ने पूछा।
इसलिए तो आपको बुलवाया है, मेरी हिम्मत नहीं हो रही उनसे बात करने की, महुआ बोली।
इसका मतलब है कि इस मसले पर मुझे उनसे बात करनी होगी, प्रभातसिंह बोले।
जी, हाँ! बहुत बड़ा एहसान होगा मुझ पर जो आपने उन्हें मना लिया, महुआ बोली।
पक्का तो नहीं कह सकता लेकिन कोशिश जरूर करूँगा, प्रभातसिंह बोलें।
बहुत शुक्रिया, महुआ बोली।
शुक्रिया कैसा? अगर किसी बच्चे की जिन्दगी मेरी वजह से सँवर जाती है तो मैं अपने आपको खुशकिस्मत समझूँगा, प्रभातसिंह बोलें।
और प्रभातसिंह ने दूसरे दिन उपेन्द्र को अपनी हवेली बुलवाकर उससे पलाश की बोर्डिंग स्कूल जाने की बात की और ये सुनकर उपेन्द्र भड़क उठा फिर बोला...
एक एक करके सारे बच्चों को महुआ मुझसे दूर कर देगी आखिर वो चाहती क्या है? मैं उसके टुकड़ों पर पल रहा हूँ तो हर जगह अपनी मरजी चलाएगी,
मियाँ!आप गलत समझ रहें हैं, प्रभातसिंह बोले।
मैं बिल्कुल सही समझ रहा हूँ और पलाश को मैं कहीं भी भेजने को राजी नहीं हूँ और इतना कहकर उपेन्द्र उसी वक्त प्रभातसिंह के घर से वापस आ गया.....
पहले तो उपेन्द्र ने बाहर खूब शराब की और घर आकर महुआ से ये कहा....
तुम कमाती हो तो जब चाहो मनमानी करोगी, तुमने जमींदार साहब से पलाश को बोर्डिंग स्कूल भेजने को कहा, तुम चाहती क्या हो ? कि एक एक करके मेरे सारे बच्चे मुझ से दूर चलें जाएं, तुम्हारी इतनी हिम्मत, लगता है तुम अपनी औकात भूल गई हो और उस रात उपेन्द्र ने शराब के नशे में महुआ पर हाथ भी उठा दिया, महुआ उस समय तो कुछ ना बोली क्योंकि वो जानती थी कि अभी उपेन्द्र नशे में है उसकी बात वो नहीं समझेगा और वो चुपचाप मार खाती रही।
सुबह हुई और पलाश महुआ के पास आकर माँ...माँ...चिल्लाने लगा लेकिन महुआ ने कोई जवाब ना दिया और बहुत देर तक जब महुआ ना उठी तो उपेन्द्र ने उसके पास जाकर देखा तो पास में गोलियों की एक शीशी पड़ी थी और उस शीशी की आधी गोलियाँ खतम थी, शायद वो नींद की गोलियाँ थी और रात महुआ ने गुस्से में वो गोलियाँ खा लीं थीं, उपेन्द्र को हालात समझते देर ना लगी और वो फौरन महुआ को डाक्टर के पास ले भागा।
बड़ी मुश्किलों से डाक्टर ने महुआ को बचा पाया, होश में आते ही महुआ ने उपेन्द्र से कहा कि मुझे क्यों बचाया?
मैं तुम्हारे बिन क्या करता महुआ? तुमने कुछ भी नहीं सोचा, बच्चों का मुँह तो निहारा होता, इन्हें किसके भरोसे छोड़कर जाने वाली थी तुम? उपेन्द्र ने महुआ से पूछा।
मैं अब थक चुकी हूँ जिन्द़गी से संघर्ष करते करते , जिन्द़गी के हर मोड़ पर मैंने केवल संघर्ष ही तो किया है, नहीं जीना चाहती मैं, मेरी गलती क्या थी जो कल रात तुमने मुझ पर हाथ उठाया? मैं तो सिर्फ़ ये चाहती थी ना कि मेरा बच्चा अपनी माँ को कोठे पर नाचते हुए ना देखें इसलिए मैंने उसे बोर्डिंग स्कूल भेजने का सोचा लेकिन तुमने तो तिल का ताड़ बना दिया, महुआ बोली।
मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई, महुआ! मुझे माफ़ कर दो , पलाश को अपने से दूर जाने के ख्याल ने मुझे डरा दिया था, मैं कुछ करता नहीं हूँ तो ये बात भी मुझे खाए जाती है और इन सबका तनाव मैंने तुम्हारे ऊपर निकाला, अब आगे से ऐसा कुछ नहीं होगा, तुम जो चाहती हो अब से मैं वही करूँगा लेकिन मुझसे कभी भी दूर जाने की बात मत करना, उपेन्द्र बोला।
उपेन्द्र की आँखों में आँसू देखकर महुआ भी रो पड़ी और दोनों ने एक दूसरे के आँसू पोंछकर माँफ़ी माँगीं, फिर क्या था महुआ के ठीक होते ही पलाश को बोर्डिंग स्कूल भेज दिया गया और इस बार भी इस काम में उपेन्द्र की मदद प्रभातसिंह ने की।
महुआ की जिन्द़गी एक बार फिर ठीक से चल पड़ी, दोनों पति पत्नी अब एक दूसरे का ख्याल रखते और दोनों नया व्यापार डालने के विषय में भी सोच रहे थे लेकिन क्या करें ये समझ में नहीं आ रहा था, तभी एक दिन उपेन्द्र ने कहा.....
महुआ! क्यों ना कुछ खेत खरीदें और सब्जियाँ उगाने का काम शुरू करें?
तुम्हारा सुझाव तो अच्छा है लेकिन इसमें मेहनत बहुत है और तुम्हारी अब वो उम्र तो रही नहीं, महुआ बोली।
तुम क्या मुझे बूढ़ा समझती हो? उपेन्द्र बोला।
तुम मुझसे उम्र में बड़े भी तो हो, महुआ बोली।
वो तो ठीक है लेकिन कुछ मजदूर भी लगवा लेंगे, उपेन्द्र बोला।
ठीक है, मैं सोचकर बताती हूँ, महुआ बोली।
सोचना क्यों हैं? कुछ पैसे तो डेरी के बेचने पर मिले थे और बाकीं तुम दे दो, उपेन्द्र बोला।
मतलब ये कि अच्छी जमीन तो मिल जाए फिर फौरन खरीद लेंगे, तुम जमीन तो ढूंढ़ो, महुआ बोली।
ठीक है तो मैं आज से ही इस काम पर लग जाता हूँ, उपेन्द्र बोला।
और कुछ ही दिनों में जमीन भी मिल गई, पक्के कागजात भी बन गए और दूसरे दिन ये सौदा होने ही वाला था कि उस रात महुआ कोठे पर गई, उस दिन उपेन्द्र भी गया था उसे छोड़ने तब महुआ बोली....
तुम थोड़ी देर रूक जाओ, आज पता नहीं मन क्यों खराब सा हो रहा है, मैं बस थोड़ी देर ही गाऊँगी और फिर हम दोनों साथ में घर चलेंगे।
उपेन्द्र बोला, ठीक है।
और उस रात वो हुआ जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी, मोतीबाई अपनी कोई ठुमरी गा रही थी और बीच बीच कुछ कुछ नाच भी लेती थी, उसकी अदाएं देखकर एक जमींदार ने मोतीबाई का हाथ पकड़ लिया और उसके संग बतमीजी करनी चाही ये देखकर अजीजनबाई बोल उठीं......
हुजूर! ये क्या कर रहे हैं? इन सब की हमारे कोठे पर मनाही है....
तो कौन सा हम मुफ्त में माँग रहे हैं, इसकी हम कीमत चुकाएंगे, जमींदार बोला।
मियाँ! ये बदसुलूकी हैं, ये आप ठीक नहीं कर रहे हैं, अजीजनबाई बोली।
दौलत के दम पर सब मुमकिन है, बोल मोतीबाई एक रात की क्या कीमत है? जमींदार ने पूछा।
तब तक शोर सुनकर उपेन्द्र भी बाहर आ गया था और जमींदार की बात सुनकर उसका गिरेबान पकड़ते हुए बोला.....
तेरी इतनी हिम्मत, तू समझता क्या है खुद को?
मैं बीस गाँव का जमींदार हूँ और तेरी इतनी हिम्मत कि तू मेरे गिरेबान पर हाथ डाले ले अब इसकी सजा और इतना कहते कहते उस जमींदार ने अपनी पिस्तौल निकालकर उपेन्द्र के पेट में दो तीन गोलियाँ दाग दीं, गोलियों की आवाज़ सुनते ही पहले तो अजीजनबाई के गुण्डो ने जमींदार को धर दबोचा और पुलिस बुलाई और इधर उपेन्द्र को फौरन ही अस्पताल पहुँचाया गया, कुछ देर आँपरेशन चला लेकिन डाक्टर ने बाहर आकर बताया कि वे उपेन्द्र को वो नहीं बचा सकें, ये सुनकर महुआ चीख पड़ी......
उधर उस जमींदार को उपेन्द्र के खून के जुर्म में उम्रकैद की सजा सुनाई गई, इधर महुआ ने उपेन्द्र के जाने के बाद चुप्पी साध ली, उसकी ये हालत अब अजीजनबाई से देखी नहीं जा रही थी , उसने महुआ को बहुत समझाया लेकिन महुआ अब अपनी सुधबुध बिसरा बैठी थी.....
ये देखकर एक बार फिर अजीजनबाई को प्रभातसिंह की याद हो आई और उन्हें बुलाकर बोली कि......
आप ही कुछ कीजिए, ये हंसेंगी नहीं बोलेगी नहीं तो घुट घुट कर मर जाएगी....
तब प्रभातसिंह महुआ के पास जाकर बोले....
क्या चाहती हो तुम ? कि तुम मरकर इस दुनिया से छुटकारा पा जाओगी लेकिन कभी सोचा है कि तुम्हारे बाद तुम्हारे बच्चों का क्या होगा? तुम्हारे बेटे से लोग भीख मँगवाएं और तुम्हारी बेटियों को भी तुम्हारी तरह कोठा ही नसीब हो , जहाँ वो अपने जिस्म की नुमाइश करें....
ये सुनकर महुआ को कुछ होश आया और उसने जोर का थप्पड़ प्रभातसिंह के गाल पर धर दिया....
तब प्रभातसिंह ने अजीजनबाई को पुकारते हुए कहा.....
लीजिए अजीजनबाई! आपकी मोतीबाई ठींक हो गईं हैं सम्भालिए इन्हें, अल्लाह कसम गाल लाल कर दिया हमारा.....
महुआ ये सुनकर कुछ झेंप सी गई और बोली....
माफ कीजिएगा! जमींदार साहब! गलती हो गई....
अरे, हमें तो खुदा ने बनाया ही इसी वास्ते है कि लोगों की उलझनें सुलझाते रहें और मार खाते रहें....प्रभात सिंह बोले।
तब तक अजीजनबाई भी वहाँ पहुँच गई और बोली....
हुजूर ऐसा ना कहें आप जैसे शख्स दुनिया में विरले ही होते हैं, जब भी हमने आपको मदद के लिए पुकारा आप आ पहुँचे, आपकी वजह से आज मोतीबाई भी ठीक हो गई.....
मुझे अब मोतीबाई ना कहो, अजीजनबाई !अब से मैं ये काम नहीं करूँगी, मैं फिर से महुआ बनना चाहती हूँ, क्योंकि अब मुझे इस काम से घिन आने लगी है इस काम की वजह से एक एक करके मुझे अपने बच्चों को अलग रखना पड़ा और इसी काम की वजह से मेरा पति भी मुझे छोड़कर चला गया , इसलिए अब मुझे ये काम नहीं करना, महुआ बोली।
महुआ की बात सुनकर अजीजनबाई बोली....
फिर तुम क्या करोगी?
यहाँ का घर बेंचकर किसी गाँव के छोटे से घर में जाकर रहूँगी, वहाँ रहूँगी जहाँ मुझे कोई पहचानता ना हो, महुआ बोली।
जब तुमने ये छोड़ने का फैसला कर ही लिया है तो मैं भी तुम्हें नहीं रोकूँगी, लेकिन मैं चाहती हूँ कि तुम मेरी बुआ के गाँव जाकर रहो, बुआ तो कब की मर चुकी थी लेकिन उनकी याद में उसी गाँव में मैंने एक घर खरीदा था, जहाँ कोई नहीं रहता,
सालों से वो घर ऐसे ही पड़ा है, उस घर के ही आस पास मेरे खेत हैं, वहाँ एक कुआँ भी कुछ इमली और जामुन के पेड़ भी हैं वहाँ, अगर सही सलामत होंगे तो, ये मैंने अपने रहने के लिए बड़े शौक से खरीदा था, उस गाँव में मेरी बुआ रहा करती थी वो मुझे बहुत प्यार करती थी, मेरी माँ के मरने के बाद मैं कुछ समय तक उनके पास रही, फिर मेरे पिता दूसरी ब्याह रचा लाएं और सौतेली माँ ने मुझे चंद पैसों के लिए कोठे पर बेंच दिया, मैं घर की अहमियत खूब समझती हूँ इसलिए तो मैं किसी भी लड़की से जिस्म का धंधा नहीं करवाती,
लेकिन अगर मैं वहाँ रहने लगती तो मेरे यहाँ जो अनाथ और मजबूर लड़कियाँ रहतीं हैं उनका क्या होता ? यही सोचकर मैं वहाँ नहीं गई लेकिन अब तुम वहाँ जाकर रहो, आज से मैं वो घर और जमीन तुम्हारे नाम करती हूँ, कल ही उसके पेपर बनवाकर तुम्हें सौंप दूँगी, तुम वहाँ आराम से जाकर रहो, अजीजनबाई बोली।
नहीं अजीजनबाई इतना एहसान मत करो मुझ पर, मैं कोई ना कोई इन्तजाम कर लूँगी, महुआ बोली।
तुम भी तो मुझे इतने सालों से कमाकर दे रही है, ये उसका उपहार मान लो, अजीजन बोली।
मैं किस मुँह से तुम्हारा शुक्रिया अदा करूँ? अजीजनबाई! महुआ बोली।
बस, कभी कभी मुझसे मिलते आती रहना, बस मैं चाहती हूँ कि तुम एक इज्जत की जिन्दगी बसर करो, जो मैं नहीं कर पाई और इतना कहते कहते अजीजन सुबक पड़ी।
भाई! त्याग करना हो तो कोई आप औरतों से सीखें, जिन्द़गी भर केवल देती ही रहती हो और बदले में कभी कुछ नहीं माँगती, चाहे वो एक पारिवारिक औरत हो या कि कोठेवाली , फिर भी औरतों को ही हमेशा कुसूरवार ठहराया जाता है, प्रभातसिंह बोले।
वो हम औरतों का नसीब है जमींदार साहब! अजीजनबाई बोली।
बदनसीब तो वो हैं जो औरतों की कद़र नहीं करते, प्रभातसिंह बोले।
जमींदार प्रभातसिंह की बात सुनकर अजीजन बोली....
काश, आपकी तरह दुनिया का हर मर्द हम औरतों की इज्जत करता होता तो दुनिया में औरतों की ये दशा ना होती, जमींदार साहब!
इस पुरूषसत्तात्मक दुनिया में ये सदियों से चला आ रहा है लेकिन औरतों का हौसला आज भी कायम है, जो एक जीव को धरती पर ला सकती है वो कुछ भी कर सकती है, बस करना नहीं चाहती क्योंकि उसकी ममता और उसके भीतर जो दया का भाव है वो उसे गलत काम करने से रोकता है, अगर औरत जैसी दया और ममता मर्दों में एक प्रतिशत भी आ जाए तो उस दिन ये दुनिया बदल जाएगी, जमींदार प्रभातसिंह बोलें।
शायद सही कहते हैं आप, अजीजन बोली।
चलिए फिर अब मैं चलता हूँ, बच्चे इन्तज़ार करते होगें, प्रभातसिंह बोले।
जी, अच्छा!मोतीबाई बोली।
ठीक है तो मोहतरमा!जब आप अपने नये ठिकाने पर पहुँच जाएं तो हमें ख़त लिखकर बता दीजिएगा, सगी बहन ना सही आप मेरे लिए लेकिन मैने तो आपको सगी से भी ज्यादा माना है, कभी कभी अपने इस भाई को याद फरमाइएगा, प्रभातसिंह बोले।
और इतना सुनते ही महुआ ने उनके चरण स्पर्श करते हुए कहा....
आपने तो मेरा साथ सगें भाई से भी बढ़कर दिया है, मेरे मुश्किल हालात में आप हमेशा मेरे साथ खड़े रहें, आप हमेशा मेरे संरक्षक बनकर आएं, आपके चरण तो स्पर्श कर ही सकती हूँ, भाईसाहब!
तो ये वादा करो कि हर रक्षाबंधन पर मुझे राखी भेजोगी, प्रभातसिंह बोले।
जी! हमेशा ! मरते दम तक, महुआ बोली।
आप दोनों का ये भाई बहन का प्यार हमेशा कायम रहें मैं दुआ करती हूँ, अजीजनबाई बोली।
और इस तरह उस दिन प्रभातसिंह अजीजनबाई के कोठे से चले आए, जल्द ही अजीजनबाई ने घर और जमीन के नये कागजात बनवा दिए और महुआ ने सामान सहित अपना मकान बेंच दिया जिससे उसको उस मकान और सामान के अच्छे दाम मिले , उन पैसों को उसने प्रभातसिंह की मदद से बैंक में जमा करवा दिया, उसने अपने सारे पुराने जेवर भी बेंच दिए सिवाय उन जड़ाऊ कंगनों के जो उसे उपेन्द्र ने दिए थे, वो कंगन उसने अपनी बहु के लिए रख लिए और पुराने जेवरों के जो दाम मिले उसने उन्हें अपनी दोनों बेटियों में आधे आधे बाँटकर उनसे उन दोनों का बैंक में खाता खुलवा दिया लेकिन उसने अपनी मोटर नहीं बेंची।
ये सारे काम निपटाकर वो अपनी मोटर में बैठकर निकल पड़ी सोनपुर गाँव की ओर , उसे उस गाँव में छोड़ने अजीजनबाई भी गई, फिर एक दो दिन ठहर कर अजीजनबाई वापस आ गई।
अब मोतीबाई उस अन्जाने से गाँव में और अन्जाने लोगों के बीच पहुँचकर कुछ असहज सा महसूस कर रही थी, लेकिन अब उसने धीरें धीरें अपने आस पड़ोस वाले से व्यवहार बना लिया और गाँव में उसने लोगों से अपनी जिन्द़गी के बारे में कुछ नहीं छुपाया, उसकी बात सुनकर गाँव के कुछ लोंगों ने तो उससे दूरियाँ बना लीं लेकिन अभी कुछ परिवार उससे हमदर्दी रखते थे।
गाँव में कुछ पढ़े लिखें लड़के थे जिनके पास नौकरियाँ नहीं थी, तब महुआ ने सोचा क्यों ना खेतों के कुछ भाग को स्कूल में परिवर्तित कर दिया जाए, जिससे बच्चे पढ़ भी सकेंगे और ये लड़के जिनके पास नौकरियाँ नहीं है वे भी फालतू नहीं बैठेंगे और उसने अपना विचार गाँव के लोगों को बताया, कुछ लोगों को तो महुआ का सुझाव पसंद आया लेकिन कुछ ने उसका विरोध किया।
कुछ लोगों के विरोध के कारण महुआ अपने खेतों की जमीन पर स्कूल ना खुलवा सकीं, इसलिए मजदूर लगवा कर उस जमीन पर खेतीबाड़ी शुरू कर दी क्योंकि यही तो उसके पति उपेन्द्र का सपना था, इतना गेहूँ चना हो जाता कि उसे बेचना पड़ता और उन पैसों से उसने गाँव में एक प्याऊ बनवा दी, फिर एक धर्मशाला भी बनवायी धीरे धीरे उसने उस गाँव में एक विवाह घर भी बनवा दिया जहाँ उसने पानी के लिए दो कुँए भी खुदवा दिए, महुआ के इस काम को देखकर अब लोगों का मन महुआ की ओर से कुछ साफ हुआ।
अब महुआ से मिलने उसकी बेटियाँ और बेटे घर आने लगें थे, जब भी सबकी छुट्टियाँ होतीं तो सारा परिवार हँसी खुशी एक साथ समय बिताता, अब महुआ को अपनी ये सुकून भरी जिंदगी भाने लगी थी, कभी कभी वो सोचती कि कैसे कैसे हालातों को पार करके वो जिन्दगी के इस मुकाम तक पहुँची है, इस जिन्द़गी के सपने उसने कितनी बार देखें लेकिन हर बार टूटे, अब जाकर उसका ये सपना सच हो रहा है।
इधर उसके बच्चे भी अब बड़े और समझदार होते जा रहे थे वें भी अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी समझने लगें थे, वो जब भी घर आते तो अपनी माँ का पूरा ख्याल रखते, बच्चों के बड़े होने से महुआ को बहुत आराम हो गया था, क्योंकि उसके बच्चे उसे बहुत अच्छी तरह समझने लगें थे।
इधर प्रभातसिंह के दोनों बच्चों की भी पढ़ाई खतम हो चुकी थी, बेटी एक स्कूल में अध्यापिका हो गई थी, प्रभातसिंह ने एक अच्छा सा वकील लड़का देखकर उसकी शादी कर दी, इधर उसका बेटा भी विलायत से डाक्टरी पढ़कर आ गया था, उसने भी एक सभ्य परिवार की पढ़ी लिखी लड़की देखकर प्रभातसिंह की रजामंदी से विवाह कर लिया,
लेकिन महुआ, प्रभातसिंह की दोनों बच्चों की शादी में ना गई उसने प्रभातसिंह से ये कहा कि वो शादी में आई और अगर किसी ने उसे पहचानकर उसके अतीत को कुरेदा तो उसे ये अच्छा नहीं लगेगा फिर आपके यहाँ भी चार रिश्तेदार जुड़ेंगे, कुछ ऊँच नीच हो गई तो मैं अपने आपको जिन्दगी भर माफ नहीं कर पाऊँगी, लेकिन उसने अपने बच्चों को शादी में जरूर भेजा।
बेटी ब्याहकर अपने ससुराल चली गई थी और डाक्टर बेटे की पोस्टिंग बैंगलोर के किसी अस्पताल में हो गई थी इसलिए प्रभातसिंह का बेटा अपनी पत्नी के संग बैंगलोर चला गया, अब इतनी बड़ी हवेली में अकेले प्रभातसिंह का जी घबराता था, इसलिए उसने सोचा कि मैं उस शहर चला जाता हूँ जहाँ पलाश बोर्डिंग स्कूल के बाद अपनी आगे की पढ़ाई काँलेज में कर रहा है और इसने इस बात के लिए महुआ से पूछा....
महुआ ने ख़त लिखकर कहा कि इससे अच्छा और क्या हो सकता है जो आप मेरे पलाश के संरक्षक बनकर उस शहर में रहकर उसके ऊपर निगरानी रख सकते हैं और प्रभातसिंह ने महुआ की बात मान ली, वें जल्दी से पलाश के शहर में आकर रहने लगें।
सबका जीवन ऐसे ही बीत रहा था, महुआ के तीनों बच्चे भी उसके पास नहीं थे तभी गाँव में हैजा फैला, एक एक दिन में परिवार के लगभग दो तीन सदस्य जाने लगें, महुआ जी जान से गाँव के लोगों की सेवा में जुट गई, उसने अपने ही घर के पास अपने ही पैसों से सभी गाँव वालों के लिए खाने की व्यवस्था करवाई,
जहाँ खाना बनाने के लिए उसने दो तीन महाराज और दो तीन महिलाओं को लगवा दिया, गाँव के बीमार घरों में वो दोनों समय का खाना बँटवाती, उसने शहर से हैजे की दवाइयां भी मँगवाई और हर दो दिन में शहर के डाक्टर को अपनी मोटर भिजवाकर गाँव के बीमार लोगों के इलाज के लिए बुलवा लेती,
उसकी इस हिम्मत से प्रभावित होकर गाँव के और लोग भी उसका साथ देने लगें, उसके अच्छे कामों को लोगों ने अपना लिया और उसके बुरे अतीत को लोगों ने भुलाकर उसे इज्जत बख्शी , जैसा कि वो चाहती थी ।
अब गाँव में लोंग उसे सम्मान की नजरों से देखते, अब उन सबकी नजरों में वो एक महान ममतामयी और दयालु महिला थी, अब महुआ को सबलोग पसंद करने लगें थे।
इधर एक दिन महुआ के पास ख़बर आई कि अजीजनबाई सीढ़ियाँ चढ़ रही थीं, बुढ़ापे का शरीर सम्भाल ना पाई और सीढ़ियों से गिर पड़ी, अस्पताल ले जाते वक्त उसने रास्ते में ही दम तोड़ दिया, ये सुनकर महुआ को कुछ सदमा सा लगा, उसे लगा कि जैसे माँ का हाथ उसके सिर से उठ गया हो, उसने सोचा अभी पिछले महीने ही तो मिलने गई थी उससे, कितनी ममता से उसने सिर पर हाथ फेरा था और कुछ गहने देते हुए बोली थी कि....
रख लें इन्हें क्या पता तेरे बच्चों की शादी में ना पाऊँ? तो अपनी नानी की तरफ से ये सब बच्चों को दे देना, मुझे लगेगा कि मैं अभागी नहीं हूँ, मेरी भी बेटी है और नाती-नातिनें भी हैं।
उसकी ये बातें सुनकर महुआ का दिल भर आया था और आते समय अपने आँसू नहीं रोक पाई, उसे क्या पता था कि वो अजीजन से आखिरी बार मिल रही है, लेकिन क्या करें समय के आगे सब मजबूर हो जाते हैं, इस तरह अजीजनबाई भी एक दिन महुआ को छोड़ कर चली गई।
समय यूँ ही बीतता रहा , महुआ की दोनों बेटियों की पढ़ाई पूरी हो चुकी थी और उन दोनों को अपनी मेहनत के बलबूते पर नौकरियाँ भी मिल गईं, मिट्ठू को उसी संगीत कला केन्द्र में नौकरी मिल गई, जिसमें वो पढ़ती थी और रिमझिम ने अपनी माँ का सपना पूरा किया उसने गाँव आकर अपनी माँ की जमीन पर ही एक स्कूल खोल लिया, साथ में शाम को वो गाँव की लड़कियों को संगीत सिखाने लगी।
अपने बच्चों को हँसता खेलता और कामयाब देख वो खुशी से फूली ना समाती, सब बच्चे अपनी अपनी जगह स्थिर हो गए थे, तभी एक दिन रिमझिम ने आकर महुआ से कहा कि वो किसी से प्यार करती है और उससे ही शादी करना चाहती है।
महुआ ने रिमझिम से पूछा कि वो कौन है?
रिमझिम बोली....
उसके साथ ही काँलेज में पढ़ता था, बस अपनी नौकरी लगने का इन्तज़ार कर रहा था, वो अब स्टेशन मास्टर हो गया है इसलिए अब मुझसे शादी करना चाहता है लेकिन माँ वो अनाथ है।
इतना अच्छा लड़का मिल रहा था महुआ को, भला उसे इस शादी से क्या एतराज़ हो सकता था, लेकिन एक ही अड़चन थी कि अगर रिमझिम शादी करके चली गई तो स्कूल कौन चलाएगा?
लेकिन इस समस्या का समाधान भी जल्द ही हो गया, ये जिम्मेदारी गाँव के पढ़े लिखें कुछ लड़कों ने ले ली क्योंकि अब उन सबको महुआ पर भरोसा हो गया था।
इस तरह गाँव वालों ने महुआ का सहयोग किया, सबने मिलकर रिमझिम की शादी खूब धूमधाम से की, प्रभातसिंह भी मामा का कर्तव्य निभाने आए, उन्होंने ब्याह का सारा काम देखा, उनके आने पर महुआ को बहुत सहारा हो गया था,
अब रिमझिम भी अपने घर चली गई थी, महुआ एक बार फिर से अकेली हो गई, लेकिन उसने मन को फिर काम में लगा लिया और गाँव वालों की सेवा मे लग गई, इस तरह एक दिन प्रभातसिंह का ख़त आया कि उनकी नज़र में एक बहुत अच्छा लड़का है , काँलेज में प्रोफेसर है अगर हम मिट्ठू का ब्याह उस लड़के से कर दें तो,
मैं उस लड़के की फोटो भी भेज रहा हूँ, परिवार से मैं मिल चुका हूँ, पढ़ा लिखा परिवार है और मैंने तुम्हारे अतीत के बारे में भी उनसे सब बता दिया है, उन्हें बस पढ़ी लिखी लड़की चाहिए और उन्हें किसी बात से कोई मतलब नहीं है, प्रभातसिंह का खत पढ़कर महुआ ने हाँ बोल दी और कुछ ही दिनों में रिश्ता भी पक्का हो गया.....
लेकिन अब तक पलाश को महुआ के अतीत के बारे में कुछ भी पता नहीं था और महुआ ने प्रभातसिंह और दोनों बेटियों से भी ये बात बताने को मना कर रखा था।
महुआ ने अपनी ये जिम्मेदारी भी बखूबी निभा दी , मिट्ठू का ब्याह भी निपट गया और फिर महुआ ने सोचा कि कुछ दिन हरिद्वार में बिताकर आऊँ और महुआ हरिद्वार आ गई, कुछ दिन उसने हरिद्वार में अकेले एकदम शान्ति से बिताएँ फिर गाँव वापस आ गई.....
उसकी दो जिम्मेदारियाँ निपट चुकीं थीं, अब केवल पलाश बचा था, काँलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद पलाश दो साल के लिए कोई कोर्स करने विलायत चला गया।
अब दो साल महुआ को बेटे का मुँह देखे बिना काटने थे लेकिन तब भी उसने तसल्ली रख ली, बेटियाँ हर एक दो महीने में माँ से मिलने आतीं रहतीं, फिर पता चला कि रिमझिम उम्मीद से है इसलिए उसकी देखभाल के लिए महुआ ने उसे अपने पास बुला लिया चूंकि रिमझिम का पति अनाथ था इसलिए उसकी देखभाल के लिए वहाँ कोई महिला नहीं थी।
कुछ महीनों के इन्तज़ार के बाद रिमझिम ने एक नन्ही मुन्नी प्यारी सी बच्ची को जन्म दिया, उस बच्ची को देखकर महुआ की खुशी का कोई ठिकाना ना रहा, वो नानी बन चुकी थी ये उसे अब तक विश्वास नहीं हो रहा था, उसने उस बच्ची को बड़े प्यार से अपने हाथों में उठाया, उस नन्ही परी को हाथों में लेते ही खुशी के मारे उसकी आँखों से आँसुओं की धार बह चली,
महुआ बोली....
ये मेरी जिन्द़गी की सबसे बड़ी खुशी है इसलिए इसका नाम खुशी होना चाहिए, मैं अपनी बेटियों के जन्म के वक्त इतनी खुश नहीं थी क्योंकि मुझे डर था कि ना जाने मेरी बेटियों के नसीब में कैसी जिन्द़गी लिखी है,
लेकिन इसे देखकर एक आजादी का अनुभव हो रहा है, बस आज भर के लिए मुझे पंख मिल जाएं तो मैं हवा में उड़ जाऊँ।
रिमझिम की बेटी को महुआ ने तब तक सम्भाला जब तक कि वो पाँच छः महीने की ना हो गई, इसके बाद रिमझिम बच्ची को अपने साथ लेकर ससुराल चली गई, रिमझिम के जाने के बाद मिट्ठू की भी खुशखबरी आ गई और इसके कुछ महीनों बाद उसने बेटे को जन्म दिया लेकिन वो महुआ के पास ना आई क्योंकि उसका ख्याल रखने वाले उसके ससुराल में काफी लोग थे।
अब महुआ बिल्कुल निश्चिन्त हो चुकी थी, दोनों बेटियों की गोद भी भर चुकी थी अब इन्तज़ार रह गया था तो केवल बहु का, उसे विलायत से पलाश के लौटने का इन्तजार था कि वो वापस आ जाए तो कोई अच्छी सी लड़की देखकर इस जिम्मेदारी को भी पूरा कर दे।
लेकिन इन्सान जैसा सोचता है वैसा हो कहाँ पाता है? अगर जिन्द़गी हमारे अनुसार चलने लगें तो इन्सान को कभी कोई तकलीफ़ ही ना हो......
पलाश को विलायत गए हुए दो साल पूरे होने वाले थे और बस महुआ को उसके आने का इन्तजार था और एक दो महीने बाद वो विलायत से लौट भी आया,
उसे प्रभातसिंह एयरपोर्ट लेने पहुँचें और एक दो दिन वो शहर में रूकने के बाद महुआ के पास गाँव भी आ गया, लेकिन विलायत से लौटने के बाद पलाश को गाँव में रहना रास नहीं आ रहा और दो चार दिन रहने के बाद पलाश ने बोल ही दिया कि वो अब गाँव में और नहीं रह सकता वो शहर में ही रहेगा लेकिन कभी कभी महुआ से मिलने आ जाया करेगा।
महुआ को पलाश की बातों का कुछ बुरा तो लगा लेकिन उसे ये लगा कि ये तो हमेशा शहर में ही रहा है इसलिए इसे शहर में रहने की आदत है और फिर मेरे साथ ये कब तक रहेगा? कहीं नौकरी मिल जाएगी तो मुझे छोड़कर तो इसे जाना ही पड़ेगा और महुआ ने पलाश को शहर जाने की इजाजत दे दी......
पलाश शहर आ गया तो महुआ के कहने पर एक बार फिर प्रभातसिंह उसके संरक्षक बन गए, शहर आने के कुछ ही दिनों बाद पलाश को एक बहुत बड़े कारखाने में एक अच्छे औहदे पर रख लिया गया, वहाँ के मालिक को पलाश अपनी बेटी के लिए जँच गया।
कारखाने के मालिक सेठ हीरानंद की बेटी सुवर्णा ने भी एक बार पलाश को कारखाने के किसी समारोह में देखा तो वो उसे एक ही नज़र में भा गया, उसने पलाश से दोस्ती कर ली, दोनों की दोस्ती प्यार में बदलते देर ना लगी और बात शादी तक आ पहुँची।
सेठ हीरानंद ने सगाई का दिन भी तय कर लिया, इसमें पलाश भी राजी था और इसने इस मसले पर महुआ से भी कुछ कहने सुनने की जरूरत भी महसूस नहीं की, ये बात जब प्रभातसिंह तक पहुँची तो वो फौरन महुआ के पास गाँव आए और महुआ से बोले....
हम ये क्या सुन रहे हैं? लड़का अपनी मनमर्जियाँ कर रहा है और आप बरदाश्त कर रही हैं, उससे जाकर सवाल क्यों नहीं करतीं?
अब मै क्या बोलूँ और क्या कहूँ? उसकी जिन्द़गी है जी लेने दीजिए, मैं दख़ल नहीं देना चाहती, महुआ बोली।
लेकिन ये गलत हो रहा है, हमें मंजूर नहीं, प्रभातसिंह बोले।
शादी ही तो कर रहा है अपनी मरजी से तो क्या हो गया? महुआ बोली।
परसों सगाई है, आपको कोई जानकारी है, प्रभातसिंह बोले।
नहीं, मुझे तो कुछ भी पता नहीं, महुआ बोली।
ना उसका बहनों से कोई सरोकार और ना माँ से, कैसी मति भ्रष्ट हुई है उसकी, प्रभातसिंह बोले।
रहने दीजिए ना! जो करता है तो करें, बुलाएगा तो चली जाऊँगी, महुआ बोली।
महुआ से इसी तरह की कुछ बातें करके प्रभातसिंह वापस शहर आ गए और दूसरे दिन पलाश सगाई के लिए महुआ को लेने गाँव पहुँच गया, पलाश को देखकर महुआ बोली.....
आज तो नहीं चल सकती, तू अभी जा! मैं कल पक्का आऊँगी,
सच माँ! तुम आओगी ना! पलाश बोला।
हाँ, आऊँगी !और महुआ का ऐसा जवाब सुनकर पलाश निश्चिन्त होकर शहर वापस आ गया।
सगाई वाली शाम महुआ उस जगह पहुँची जहाँ सगाई थी, खाना पीना चल रहा था लोगों की चहलकदमी जारी थी, बस सगाई के लिए कुछ और लोगों का इन्तजार था, प्रभातसिंह भी पहले से पहुँच गए थे उनका मन तो नहीं था लेकिन महुआ के जोर देने पर वें आ गए थे।
महुआ जैसे ही पहुँची , महुआ को देखकर पलाश खुश होकर बोला....
तुम आ गई माँ! मुझे पता था कि तुम जरूर आओगी, चलो माँ! मैं सबसे तुम्हारा परिचय करवाता हूँ और एक एक करके पलाश ने महुआ का सबसे परिचय करवाया, लेकिन उस भीड़ में से एक सख्श ऐसा भी था जिसने महुआ को पहचान लिया और सबके सामने ये एलान करते हुए कहा कि.....
हीरानंद जी ये औरत आपके होने वाले दमाद की माँ है, ये औरत....हीरानंद जी आपको दुनिया में कोई और लड़का नहीं मिला था जो आप अपनी बेटी की शादी एक तवायफ़ के बेटे से करने जा रहे हैं.....
क्या बकते हो ? करोड़ीमल! मेरा होने वाला दमाद एक तवायफ़ का बेटा कैसे हो सकता है? हीरानंद बोले।
मैं बकता नहीं हूँ, सच कहता हूँ , मेरी बात पर यकीन ना हो तो इस औरत से खुद ही पूछ लो कि ये मशहूर तवायफ़ मोतीबाई है कि नहीं.....करोड़ीमल बोला....
ये सुनकर महुआ एक पल को शून्य हो गई, जिसका उसे सालों से डर था आखिर वही हुआ , उसका अतीत आज फिर उसके सामने मुँह फाड़े खड़ा था उसे निगलने के लिए, अब वो क्या जवाब दे सबके सवालों का ?उसे कुछ नहीं सूझ रहा था कि वो क्या कहें और क्या सफाई पेश करें।
तभी सुवर्णा ने पलाश से कहा....
पलाश! तुमने मुझसे इतनी बड़ी बात छुपाकर रखी कि तुम एक तवायफ़ के बेटे हो।
ये बात तो मुझे भी पता नहीं थी, पलाश बोला....
तो जाकर अपनी माँ से क्यों नहीं पूछते?लेकिन वो तुम्हें क्यों बताने लगी भला कि वो तवायफ़ थी, मौका जो मिल रहा था शरीफ़ों के बीच में घुसने का, सुवर्णा बोली।
तुम चुप रहो सुवर्णा! किसी पर बेवजह लांछन लगाने से पहले उसकी हकीकत तो जान लो, हीरानंद जी सुवर्णा को डाँटते हुए बोले।
सबकी बातें सुनकर पलाश चुप ना रह सका और महुआ से पूछ ही बैठा....
क्यों माँ! क्या ये सच है? तुम बोलती क्यों नहीं? कह दो कि ये झूठ है...
और महुआ फिर पलाश के किसी के सवालों के जवाब ना दे सकी और उसी वक्त चुपचाप बाहर आ गई और मोटर में बैठकर ड्राइवर से गाँव चलने को कहा.....
तभी सेठ करोड़ीमल फिर से बोला....
मै ना कहता था कि वो तवायफ़ है, अगर शरीफ़ होती थी तो ऐसे मुँह छुपाकर ना चली जाती, बाजारू औरत कहीं की, यहाँ हम शरीफ़ों के बीच में जगह बनाने आई थी....
उसकी बात सुनकर पलाश वहीं जमीन पर घुटनों के बल बैठकर रोने लगा, ये तमाशा देखकर अब प्रभातसिंह भी चुप ना बैठ सकें और वहाँ मौजूद लोगों और करोड़ीमल से बोले.....
अच्छा तो सेठ करोड़ीमल !आपको कैसे मालूम कि वो तवायफ़ थी? इसका मतलब है कि आप भी कभी उनकी महफिलों की शान बढ़ाने उनके कोठे पर जाते होगें, तवायफों के कोठों पर आप जैसे रईस ही तो जाया करतें हैं और जब शराफत की बात आती है तो आप शरीफ़ और वे औरतें एक पल में बाजारू हो जातीं हैं.....
जनाब! आपके मुँह से शराफ़त की बातें अच्छी नहीं लगतीं, आप सब को कुछ पता है है कि किन हालातों में वें इस धन्धे में उतरतीं हैं, अरे, साहब! किसी औरत को शौक नहीं होता अपने जिस्म की नुमाइश करने का, पेट की भूख और गरीबी के कारण उतरती है वें इस गन्दगी में और आप जिस औरत की बात कर रहे हैं ना वो किसी देवी से कम नहीं है....
मैने देखा है उसकी परिस्थितियों को, मैंने देखा है कि उसने किन हालातों से उबर कर इस जिन्दगी को पाया है....
और बेटा! पलाश ! जो सवाल तुम उनसे पूछ रहे थे, वो सवाल पूछने के तुम काबिल ही नहीं हो, तुम्हें मैं बताता हूँ कि उसने आज तक तुझसे अपना अतीत क्यों साँझा नहीं किया? उसका संघर्ष देखकर तुम्हारी आँखें भी नम हो जाएगी।
और प्रभातसिंह ने एक ही पल में सब के सामने महुआ की सच्चाई बयाँ करते हुए उसके अतीत के बारें में सबकुछ बता दिया....
ये सुनकर वहाँ मौजूद लोगों का दिल पसीज़ गया और सुवर्णा , पलाश के पास आकर बोली.....
मुझे माफ़ कर दो पलाश! मैने माँ को अशब्द कहें....
उस रात पलाश अपने आप पर इतना शर्मिंदा था कि वो अपनी माँ के पीछे पीछे ना सका और रातभर रोता रहा...
और उस रात महुआ घर पहुँची, उपेन्द्र की तस्वीर अपने सीने से लगाकर रात भर रोती रही और तस्वीर से बोली.....
सुनते हो जी! आज मुझे मेरे किए का ईनाम मिल गया , सारी दुनिया के सामने आज मेरे बेटे ने मुझसे सवाल किया, उसने मुझसे पूछा कि मैं तवायफ़ थी या नहीं।
सुबह जब दूधवाला दूध देने आया तो महुआ ने दरवाज़ा नहीं खोला....
तब उसने गाँववालों को बताया, गाँववालों ने दरवाजा तोड़कर देखा था तो महुआ का निर्जीव शरीर बिस्तर पर पड़ा था और बगल में पड़ी थी उसके पति उपेन्द्र की फोटो।
तब तक पलाश भी अपनी माँ को मनाने आ पहुँचा था लेकिन उसे पता नहीं था कि माँ उससे ऐसी रूठेगी कि उसे छोड़कर ही चली जाएगी।
प्रभातसिंह भी ये खबर सुनकर आ पहुँचे , रिमझिम और मिट्ठू भी अपने अपने पतियों के साथ माँ के अन्तिम संस्कार के वक्त आ पहुँचीं, पूरा गाँव इकट्ठा हो गया महुआ के अन्तिम संस्कार में।
माँ की मौत के कुछ महीनें बाद ही मेरे मुँहबोले मामा प्रभातसिंह भी हृदयाघात से चल बसें, उनके जाते ही मुझे लगा कि अब मैं बिल्कुल से अनाथ हो गया हूँ।
मेरी माँ के जाने के बाद मुझे उनकी असली कीमत पता चली कि किस तरह से उन्होंने कितने दुख झेलकर हमे खुद से दूर रखकर, कितना कुछ सहकर जीवन को संघर्षों के साथ जिया था।
मैंने उसके बाद शहर और शहर की नौकरी छोड़ दी, सुवर्णा ने मुझसे शादी की और वो भी मेरे साथ गाँव में रहने लगी , गाँव में माँ के स्कूल के सामने मैंने उनकी बड़ी सी मूर्ति बनवाई और स्कूल का नाम भी मोतीबाई विद्यालय रख दिया, मैं ही अब माँ का स्कूल और उनके खेतों को सम्भालने लगा था।
हर रोज मैं माँ की मूर्ति के सामने पुष्प अर्पण करके उनसे माफी माँगता रहा और एक रोज उनके रूप में मेरी बेटी का आगमन हुआ और प्यार से मैंने अपनी बेटी का नाम महुआ रखकर उनकी यादों को जिन्दा रखा तो ये थी एक तवायफ़ माँ के संघर्षों की कहानी।
