Ravi Kumar

Drama Tragedy


3.3  

Ravi Kumar

Drama Tragedy


मोक्ष

मोक्ष

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बड़े भारी मन से उसके कदम ट्रेन की तरफ बढ़ रहे थे। स्टेशन पर भीड़ की चिल्लाहट, बार-बार अनाउंसर की गूंजती आवाज़ चारो तरफ फैली हुई थी पर वो भीड़ में अकेला, एकदम शांत अपनी मंजिल की तरफ बढ़ रहा था। उसके गांव जाने वाली ट्रेन उसके सामने खड़ी थी। सामान के नाम पर उसके कंधे पर एक बड़ा सा बैग टंगा दिख रहा था। अपनी बोगी ढूंढकर वो ट्रेन में प्रवेश कर गया और कुछ ही मिनटो में उसने सीट भी ढुंढ ली। बैग को सीट के नीचे खिसका कर वो अपनी सीट पर विराजमान हो गया।

खुशकिस्मती से उसे खिड़की के पास वाली सीट मिली थी जो कि दोपहर की तपती धूप और गर्मी में भी उसे सांस लेने की अनुमति दे सकती थी। अब तो बस वो ट्रेन के चलने का इंतजार कर रहा था ताकि उसे कुछ हवा मिल सके।


समय बिताने के लिए उसने अपनी जेब से बीड़ी का पाउच निकाला और पेंट की जेब से माचिस। बीड़ी को सुलगाने के बाद वो खिड़की के करीब जा पहुंचा और कश लेने लगा। उसका नाम सतीश था, उम्र करीब 32 साल के करीब होगी। ट्रेन के खिड़की पर बनी लोहे की सलाखो के बीच घिरा उसका चेहरा बाहर की ओर यूं ताक रहा था मानो वो किसी की कैद में हो। मुंह से धुएं के छल्ले निकालते हुए उसकी निगाहे गुमराह हो चली। वक्त भी उस उड़ते धुएं की तरह कही विलीन होता दिखा और सतीश भी उनके साथ अपनी बीती यादो में खो गया। वो यादे जो आज भी उसके जेहन में पत्थर की लकीर की तरह गुदी हुई थी।

आठ साल पूर्व…


” हम आपसे आखिरी बार कहे रहे है, बापू! मकान के कागज़ हमका दई दो, नाहि तो हमसे बुरा कोई न होई...” सतीश ने चीखकर कहा। डूबते सूरज की मंद रोशनी में सतीश के घर के बाहर लोगों की घनी भीड़ एकत्र हुई पड़ी थी। एक बूढ़ा व्यक्ति उसी घर के अंदर बने खुले बरामदे में बिछी चारपाई पर सिर झुकाए बैठा था।


वो बुजुर्ग बाप जमीन को यूं ताके जा रहा था जैसे वहां कोई कीमती सामान गढ़ा हो। अपने जवान बेटे को खुद पर चिल्लाता देख इस बूढ़े बाप की हिम्मत जवाब दे गई। उसकी ऊंची आवाज़ को सुनने के अलावा इस बूढ़े के पास कोई ओर रास्ता नही था पर बूढ़ी मां शांत नही बैठी और फटाक से उसने जवाब मे कहा, ”अरे ऐसे कइसे तोहका जमीन के कागज़ दे दे? के कही रहा तोहसे कर्जा लेने को। हम जमीन को बेचने नाहि देब। हमरे जीते जी तो नाही, सुन लो सतीश।” सतीश का गुस्सा सांतवे आसमान पर था लेकिन इससे पहले वो कुछ कह पाता, उसकी पत्नी रसोई के दरवाजे की चौखट पर घूंघट की आड़ लिए खड़ी हो गई और बोल उठी, ”अरे कमाने लगेंगे तो पैसा तो इसी घर में आएगा, कही बाहर थोड़े ही न जाएगा। इक बार नौकरी लग जाएगी तो जमीन भी छुड़वा लेंगे। अम्मा, तू काहे को इतनी चिक-चिक कर रही है।” तीन साल की रीता जमीन पर रेंगती हुई, पूरी तरह से मिट्टी में सन्न चुकी थी और पांच साल का प्रकाश मुंह खोले कभी अपने पिता सतीश को देखता तो कभी अपने दादा को।


सतीश ने बात न बनती देख, दूसरे कमरे की ओर रुख किया। उसने कागज़ात को खुद ही ढूंढ निकालने की कसम खा ली थी। कमरे की तरफ सतीश को बढ़ता देख, न जाने कैसे बूढ़ी मां के पैरो में जान आ गई, वो झट से उठी और सतीश को रोकना चाहा पर न जाने सतीश को क्या हो गया था? आज वो रुकने वाला नही था। मां के साथ हुई इस रोका-टोकी में मां को हार मिली और अनजाने में वो बूढ़ी मां सतीश के धक्के के कारण जमीन पर मुंह के बल गिरी।


अब तो छोटे बेटे से रहा न गया। महेश नाम था उसका और वो सतीश से पांच साल छोटा था पर फिर भी उसका कद सतीश के बराबर ही था। अब तक तो वो बड़े भाई का लिहाज करके चुप बैठा था पर मां को जमीन पर गिरा देख उससे रहा न गया और खड़ा हो गया दरवाजे के बीच में आकर। सतीश ने उसे भी धक्का देकर हटाने की कोशिश की पर वो हटा नही बल्कि उल्टा वो घायल शेर की तरह अपने भाई पर झपट पड़ा। सारे रिश्ते आज अपनी सीमा तोड़ गए। घर की दोनो देवियां अब चांडाल का रुप ले चुकी थी। बूढ़ी मां जमीन पर बैठे-बैठे छाती पीट रही थी और सतीश की पत्नी चिल्ला-चिल्लाकर बाहर वालो से अपने पति को महेश की हाथापाई से बचाने की गुहार लगा रही थी। अब तो बच्चो ने भी रोकर बड़ो के शोर को ओर बढ़ा दिया। अब ओर क्या बचा था देखने के लिए, उस बुजुर्ग पिता के पास?


बाहर वालो के आगे तमाशा तो बन चुका था, अब तो बस उसे खत्म करना बाकि रह गया था। वो पिता गुस्से से चारपाई पर से उठा और सीधा अपने दोनो बेटो के युद्ध के मैदान में कूद गया। उसने चिल्लाते हुए कहा, ”अरे हरामजादो, अब क्या एक-दूसरे की जान लेकर मानोगे? अब बस यही देखना बाकि रह गया था इन बूढ़ी आंखो से।” पिता ने पूरी ताकत लगा दी दोनो बेटो को अलग करने में। महेश, पिता को बीच में आता देख अलग हो गया लेकिन सतीश पर तो जैसे खून सवार था और जो हाथ उसने महेश पर वार करने के लिए उठाया था, वो हाथ अचानक से बीच में आए उसके पिता पर उठ गया।

....


इस बार ट्रेन झटके से रुकी जिससे सतीश की नींद भी टूट गई। सुस्त आंखो से उसने बाहर का नजारा देखा। शाम हो चुकी थी, अब बस अंधेरा भी चंद मिनटो में छाने वाला था। बाहर स्टेशन पर यात्रियो की भागा-दौड़ी जारी थी। अभी पूरी रात का सफर बाकी था। कुछ मिनटो बाद ट्रेन दोबारा दौड़ पड़ी और फिर डूबते सूरज की लाल रोशनी में हरे-भरे खेत, आम के पेड़ो का घना झुंड, खेतो से लौटता हुआ गायो का झुंड दिखा। उसका गांव आने में अभी पूरी रात बची थी पर न जाने क्यों उसकी खूश्बू सतीश को अभी से आने लगी थी। खिड़की से बाहर नजर गड़ाए सतीश रास्तो को, पेड़ो को पीछे छुटता हुआ देखता रहा। उस वाकये को बीते हुए पूरे आठ साल हो चुके थे। सतीश को अभी भी याद है कि अपने पिता पर हाथ उठाने के बाद उसके पिता ने उसे घर से निकाल दिया था तब सतीश ने गुस्से में अपने पिता से कहा था कि वो कभी अपनी शक्ल भी दिखाने यहां नही आएगा और शहर चला आया था पर कसम आज टूटने जा रही थी। आठ साल तक चली इस कसम पर उसे गर्व होता था पर आज उसे शर्म के सिवाय कुछ महसूस नही हो रहा था। काश, वो किसी तरह अपने मुंह से निकले हुए उन शब्दो वापस ले सकता।


दो दिन पहले सतीश के चाचा ने उसे फोन किया था और तब सतीश को पता चला कि उसके पिता की तबीयत बहुत ज्यादा खराब है। सतीश ने सौ बार सोचा कि वो जाएं या नही पर अंत में उसने गांव लौटने का फैसला कर ही लिया। शायद वो भी अब इस कसम से ऊब चुका था।

अगली सुबह ट्रेन पांच बजे प्रतापगढ़ के स्टेशन पर रुकी। सतीश की मंजिल आ चुकी थी। हल्के अंधेरे की रोशनी में वो स्टेशन से बाहर निकला और उसने बाहर का नजारा देखा। आठ साल पहले जब वो इसी स्टेशन पर खड़ा था तब उसके मन में सिर्फ नफरत भरी थी और कभी न वापस लौटने की इच्छा लिए वो शहर की तरफ अपने परिवार सहित रवाना हुआ था पर आज स्थिति पलट चुकी थी। उसका मन अभी भी भारी था और वो खुद को बेहद कमज़ोर महसूस कर रहा था। ये उसकी जन्मभूमि है, यही उसकी जड़े है पर फिर भी वो उदास था। वो जल्द से जल्द यहां से लौट जाना चाहता था।


सूरज उग चुका था। गांव का असली सौंदर्य अंधेरे की आड़ से बाहर आ चुका था। पक्की सड़को से होते हुए अब जीप ऊबड़-खाबड़ रास्तो पर दौड़ रही थी। जीप में बैठा हुआ सतीश अपने गांव के बदले स्वरुप को बड़ी ध्यान से निहार रहा था। कई बार वो जीप के चालक से भी पूछ बैठता कि यहां आम वाला बाग हुआ करता था, पर अब वो कहां गया? ये बिल्डिंग तो यहां नही थी, ये कब बनी? आज उसके गांव ने ही उसे गलत साबित कर दिया था। उसे हमेशा से लगता था कि वो इस गांव के चप्पे-चप्पे से वाकिफ है पर आज ये गांव उसे अजनबी लग रहा था।

गांव के लगभग सभी लोगो की नजरो का आकर्षण बिंदु बना हुआ सतीश अपने घर पहुंचा। गांव की हर चीज की तरह उसका घर भी बदलाव की चपेट में आ चुका था। घर का पेंट बदल चुका था। मिट्टी से पुती जमीन की जगह फर्श बन चुका था। गायो और बकरियो की संख्या भी बढ़ी हुई थी। महेश ने घर की काया पलट ही कर दी थी।


घर पहुंचते ही सतीश की मुलाकात उसके चाचा से हो गई जो कल से ही उसके इंतजार में थे और उनसे पता चला कि उसके पिता को कैंसर है जो अब पूरे शरीर में फैल चुका है। सतीश कुछ कह नही सका, बस सिर झुकाए चाचा की धीमी आवाज़ को सुनता रहा। नहा-धोने के बाद सतीश अपने चाचा सहित अस्पताल की ओर रवाना हो गया। पूरे सफर वो इसी बारे में सोचता रहा कि वो कैसे अपने पिता का सामना करेगा? आखिर वो उनसे क्या कहेगा। और अंत में वो इसी नतीजे पर पहुंचा कि उसे बस अपनी शक्ल दिखानी है ताकि नाम रहे कि वो यहां आया था।


अस्पताल में कदम रखते ही सतीश के दिल की धड़कने तेजी से बढ़ गई। दवाईयो की गंध से भरपूर इस वातावरण में उसका सिर भी चकराने लगा था। अपने चाचा के कदमो का पीछा करते हुए वो उस मंजिल की तरफ बढ़ रहा था जहां वो कभी पहुंचना ही नही चाहता था। कुछ सीढ़ियां चढ़ने के बाद दुसरे फ्लोर पर बने एमरजेंसी रुम के करीब वो दोनो पहुंचे। महेश रुम के बाहर ही खड़ा मिल गया। दोनो भाईयो की नजरो दूर से ही आपसे में टकराई। सतीश अपने छोटे भाई को देखकर अचरज में पड़ गया। कितना बदल गया था वो! घनी मूंछे व हल्की दाढ़ी लिए वो लंबे-चौड़े कद वाला शख्स तो कोई और ही लग रहा था। सतीश के कदम और भी धीमे हो गए ताकि चाचा उससे पहले महेश के पास पहुंचे।


चाचा ने महेश के करीब आते ही पहुंचा, ”कईसन बा, किशोर? तबीयत कुछ ठीक हुई या नाही?”


महेश ने निराश भरे स्वर में जवाब दिया, ”डॉक्टरो ने जवाब दे दिया है, चाचा।”


इस पल सतीश भी महेश के करीब जा पहुंचा। महेश ने एक नजर सतीश को देखा और फिर चाचा की ओर देखकर बोला, ”जान अटकी हुई है... बस। कभी भी गुजर सकते है।”


ये सुनते ही सतीश को यूं महसूस हुआ मानो उसने किसी तेज़ करंट वाली तार को छु लिया हो। सतीश का मन अचानक सीने में कही धंस के रह गया। वो महेश से कुछ भी न पूछ सका। बात करने के लिए कुछ बचा ही नही था।


सतीश धीमे कदमो से एमरजेंसी रुम मे दाखिल हुआ। सामने उसके पिता आंखे बंद किए बेड पर लेटे थे। वो अपनी आहट से उन्हे जगाना नही चाहता था। एक बार तो सतीश के मन में हुआ कि वो दोबारा लौट जाए पर बाहर खड़े महेश और चाचा को देखकर उसकी हिम्मत नही हुई। हिम्मत तो उसकी अपने पिता की नज़रो का सामना करने की भी नही थी पर उनकी बंद पलको को देखकर उसके कदम आगे बढ़ गए। वो आहिस्ते से कुर्सी पर बैठा और अपने पिता को असहाय् निगाहो से देखता रह गया। वाकई में वो बेहद कमज़ोर हो गए थे। हाथ-पैर यूं सिकुड़ चुके थे कि सिवाय खिंची हुई नसो और हड्डियो के अलावा कुछ नही दिख रहा था उनके जिस्म पर जैसे सारा मांस कही गल गया हो। अगर उनकी छाती में हलचल न हो रही होती तो कोई भी उन्हे मुर्दा मान जाता। सतीश अपने पिता की इस दयनीय स्थिति को देख नही पाया।


अचानक पिता की पलके खुली और सबसे पहले सतीश पर उनकी नजर रुकी। पहले तो पिता ने अपनी सिकुड़ी हुई नजरो से अपने बेटे को पहचानने में ही मिनटो गवां दिए और फिर उनके मुंह से शब्द फूट पड़े, ”सतीश...।”


सतीश भरे गले से बोला, ”हां, हम हई बापू।”


उसके पिता अपनी धुंधली नजरो से सतीश को निहारते रहे और सतीश बार-बार अपनी नज़रे बचाता रहा। क्या कहे और क्या न कहे! उसके दिमाग ने तो जैसे काम करना ही बंद कर दिया था। चाहकर भी सतीश को शब्द नही सूझे। बाप-बेटे की इस खामोशी में वक्त रेत की तरह सतीश के हाथो से फिसलता गया।

....


26 साल पूर्व…

”और जोर से, और तेज़...” बाप के कंधे पर लदा हुआ सात साल का सतीश जोर से चिल्लाता रहा और पिता तेजी से दौड़ते हुए खेतो का चक्कर लगाते रहे। सतीश का चेहरा खुशी से खिला हुआ था और उसके पिता का चेहरा पसीने से तर व थकावट से भरा हुआ था पर फिर भी उनके पैरो की रफ्तार में कमी न हुई। चार-पांच चक्कर लगाते ही वो सीधा पेड़ की छांव के नीचे हांफते हुए बैठ गए।


सतीश गुस्से से कंधे पर से उतरा और बोला, ”इतनी जल्दी काहे रुक गए।”


पिता ने कहा, “अरे बिटवा, तनिक सांस लेने दे। जा, ऊं लोटा लिवा ला, घाम से गला सूख गया है।”


सतीश मन मारकर पानी से भरा लोटा लेने चला गया और इतने में दोपहर का खाना लिए सतीश की मां भी खेत में पहुंच चुकी थी। सतीश ने पिता को लोटा दिया और पिता ने बिना देर किए पानी को गले मे उतार लिया। फिर गमछे से माथे का पसीना भी पोछ डाला।


सतीश इसी इंतजार में था और बोला, “चलो अब दोबारा।”


मां ने उसे टोका और बोली, “पहिले खाना तो खाने दे।”


सतीश न माना। पिता ने मजाक करते हुए कहा, ”मर जाऊंगा तो किसके कंधे पर झूलेगा तू?”


सतीश ने नादानी में कहा, ”आप मरोगे थोड़े ही न।”


पिता ने कहा, “अरे बिटवा, जाना तो सभी को पड़त है। जब मैं मर जाऊंगा तो तू मुझे अपने कंधे पर लादेगा।”


न जाने सतीश को क्या सूझी और वो बोल पड़ा, ”हां, और इतनी तेज़ दौडूंगा।”


इतना कहकर वो अपनी रफ्तार दिखाने लगा। बाप खिलखिलाकर हंस पड़ा और मां उसे डांटती रही पर उस सात साल के सतीश की दौड़ खत्म नही हुई।

....


वर्तमान मे, सतीश आज भी भाग रहा था अपने अतीत से, खुद से। पर फिर भी वो खुद को उसी जगह पाता जहां वो पहले था। पिता की अर्थी को कंधे पर लादे सतीश आज दौड़ने की क्या, पैदल चलने की स्थिति में भी नही था। कहने को तो सतीश का साथ तीन और कंधे दे रहे थे पर फिर भी वो बाप की लाश के बोझ तले दबता जा रहा था। पीछे भीड़ का कारवां चल रहा था। चारो तरफ ”राम नाम सत्य है” का स्वर गूंज रहा था और आते-जाते लोग अपनी नजरे फेर रहे थे। इन सबके बीच सतीश सिर झुकाए यूं चलता गया मानो इस रास्ते की कोई मंजिल ही न हो।


सतीश ने अपने जीवन के भविष्य के बारे में बहुत कुछ सोचा था, कई सपने जोड़े थे पर उसने कभी उन हालातो के बारे में कभी नही सोचा था जिनका सामना वो आज कर रहा था। उसकी आंखो से अब तक एक आंसू भी नही गिरा था। उसकी आंखे सुर्ख लाल और सूखी हुई थी, न जाने कहां उसके आंसू गुम हो चले थे पर उन आंखो के अंदर बसे दो काले बिंदुओ में पिता की जलती चिता की आग की लपटो का प्रतिबिंब स्पष्ट दिख रहा था। कहने को जल तो लकड़ियां रही थी पर सुलग तो उसका मन रहा था। वो अंदर ही अंदर पश्चाताप की अग्नि में उतरता जा रहा था। सतीश तो गांव यही सोचकर आया था कि पिता को देखने के बाद वो वापस लौट जाएगा पर उसे क्या पता था कि उसे अपने पिता की चिता को आग भी देनी पड़ेगी। क्या ये उसके करमो का कोई खेल था जो उसे आठ साल बाद यहां खींच लाया था?


कहने को तो दोनो भाई घर की एक ही छत के नीचे थे पर एक-दूसरे के लिए किसी अजनबी से कम नही लग रहे थे। न तो सतीश उससे कुछ कह सका और न ही महेश हिम्मत जुटा सका। शाम होने तक पूरा घर तन्हाई के जाल में जकड़ चुका था। महेश तेज़ कदमो से सीढ़ियो पर चढ़ते हुए छत की तरफ आ ही रहा था कि उसके कदम छत की चौखट पर आकर थम गए। सामने सतीश को खड़ा पाकर महेश ने वापस लौटना चाहा पर वो ऐसा कर न पाया। दोनो भाई मूर्ति की तरह छत के दो छोर पर खड़े थे। उनके बीच की दूरी शायद कुछ कदमो तक ही सीमित थी पर दिल की दूरियां कई मीलो तक फैली हुई थी और सतीश जानता था कि अब इस दूरी से सिर्फ वो ही घायल हो रहा था।


उसने खामोशी को तोड़ा और बोला, ”कहां काम कर रहे हो तुम?”


महेश हैरान दिखा और जवाब देते हुए बोला, ”पास की फैक्टरी मे।”


सतीश ने पूछा, ”और तुम्हारी पढ़ाई?”


महेश ने कहा, ”वो तो पांच साल पहले ही छोड़ दी।”


सतीश और कुछ न पूछ सका, पता नही क्यूं उसके सवालो पर विराम लग गया। इतने में महेश आगे बढ़ा और सतीश के बगल में आकर खड़ा हो गया। दोनो भाई छत की रैलिंग के पास एक साथ खड़े दिखाई दिए। आठ साल की खामोशी, इस दो मिनट की बातचीत के आगे कमज़ोर पड़ती मालूम हुई।


सतीश ने कहा, “अगर कोई जरुरत हो तो मुझे जरुर बताना।”


महेश ने कुछ कहा नही, जवाब मे उसने अपना सिर सहमति मे हिलाया और फिर उसने प्रकाश और रीता के बारे मे पूछा।


भले ही इन दोनो का रिश्ता जन्म से हो पर फिर भी आज ऐसा लगा मानो एक नए रिश्ते की शुरुआत हो चली थी।


पके हुए घाव को कुरेदने का दर्द उसकी चोट लगने वाले दर्द से ज्यादा होता है और यही दर्द सतीश आज शमशान घाट में खड़े होकर महसूस कर रहा था। वो यहां अपने पिता की अस्थियां एकत्रित करने आया था। तेज़ दोपहर की गर्म हवाओ के झोंको के साथ चिता की राख रह-रहकर उड़ती प्रतीत हुई। दोनो भाई अपने पिता की चिता के करीब आकर बैठ गए जहां सिर्फ राख का ढेर लगा था। यकीन नही होता था कि इस राख और मिट्टी में कोई इंसानी शरीर भी मिला हुआ है। इंसान के अस्तित्व की कड़वी सच्चाई सामने थी। सतीश उस राख के ढेर में अपना हाथ डालने तक की हिम्मत भी जुटा नही पाया पर यही रीति थी, अंतिम क्रिया का आखिरी चरण था जो उसे ही पूरा करना था। सतीश ने कोशिश करके राख के ढेर में अपना हाथ डाला और उसकी हथेली अपने मृत पिता की अस्थियो से भर गई। आत्मा कांप उठी सतीश की! राख में सनी अपने पिता की अस्थियो को अपने हाथो में देख वो घबरा उठा। ये उसी पिता की अस्थियां थी जिसकी वजह से वो इस संसार में आया था। ये उसी पिता की अस्थियां थी जिसने उसका पालन-पोषण किया था पर इसके बदले वो अपने पिता को क्या दे सका? इस सवाल का जवाब सतीश के पास नही था। जीवन की सभी महत्वपूर्ण चीज़े- पैसा, घर, परिवार, सुख सब इस वक्त बौने साबित हो गए और सतीश इन सब चीजो द्वारा ठगा हुआ महसूस करने लगा। सतीश को इस वक्त स्वयं से ज्यादा पापी कोई ओर न लगा और वो पश्चाताप के जाल में जकड़ता चला गया।


अब बस! इस बार वो अपने आंसुओ को न रोक सका। उसके आंसुओ का बांध टूट गया और उसके गालो पर आंसुओ की लकीरे परत दर परत खींचती चली गई। आंसुओ की कुछ बूंदे उसके हथेलियो में पड़ी मृत पिता की अस्थियो पर जा गिरी। ऐसा लगा सतीश के आंसू उनसे माफी की दरकार कर रहे हो। सतीश चीख-चीखकर रोने लगा। मन मे दबा दर्द अब आंसुओ के माध्यम से निकलता रहा। गिर पड़ा वो अपने पिता की अस्थियो पर। उसका चेहरा राख में सनकर सफेद हो गया और आंसुओ की लकीरे उसके चेहरे पर उभर उठी। रोते हुए सतीश बार-बार अपने पिता से माफी मांगता रहा पर अफसोस वहां कोई नही था जो उसे माफ कर सके। महेश ने करीब आकर उसे उठाया और दिलासा देने लगा पर सतीश के आंसू न रुके।


दो दिन बाद वापसी का दिन आ गया। सतीश रेलवे स्टेशन में प्रवेश कर चुका था। भीड़ से भरे इस स्टेशन मे सतीश अपने प्लेटफॉर्म की तरफ बढ़ता हुआ दिख रहा था। उसका चेहरा उदासी से नही बल्कि सादगी से भरा हुआ था। क्या ये गांव से शहर वापस लौटने की खुशी थी? तभी सतीश के साथ चलते हुए उसकी मां भी दिखी और उसका भाई महेश भी साथ था। सतीश अपनी मां को अपने साथ शहर ले जा रहा था ताकि वहां उनका अच्छा इलाज करा सके और फिलहाल महेश उन्हे यहां तक छोड़ने आया था पर अगले महीने उसने भी शहर आने का वादा सतीश से कर दिया था। सतीश को अपनी गलती का एहसास हो चुका था और अब वो उसे दोबारा नही दोहराना चाहता था। अपनो से नफरत करके, उनसे मुंह मोड़कर कोई भी सुखी नही रह सकता खासकर जब गलती खुद की हो, ये बात सतीश को अब समझ आ गई थी। अब वो अपनी जिंदगी का ज्यादा से ज्यादा वक्त मां के साथ बिताना चाहता था। वो अपने इस फैसले से सतुंष्ट था। वो ये जानता था कि शहर पहुंचकर उसे अपनी बीवी के कई सवालो के जवाब देने पड़ेंगे पर वो बेफिक्र था। उसे पूरा विश्वास था कि इस बार उसने एक सही फैसला लिया है। यही आखिरी रास्ता था उसकी की गई गलतियो को सुधारने का। यही एक रास्ता था, उसके मोक्ष का।


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