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मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

Abstract

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मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

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मंत्रीजी कोमा में

मंत्रीजी कोमा में

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मंत्री जी बड़े बेचैन थे। कभी उठते, कभी बैठते तो कभी टी. वी. चालू बंद करते। वैसे गोद लिए चैनल देखकर मंत्री जी तृप्ति की साँस लेते थे, लेकिन इसबार उन्हें शांति मिल ही नहीं रही। लाला हरामदेव की तमाम हरकतें आजमा कर देख लीं पर शांति का दूर-दूर तक कोई अता-पता नहीं।


किसान आंदोलन रोकने के लिए उन्होंने क्या नहीं किया। सड़कें खुदवा दीं, देश के भीतर ही चीन-पाक बॉर्डर वाली कटीली तार लगवा कर, बड़े-बड़े पत्थर रखवाकर हाइवे बंद करा दीं परन्तु ये किसान तो पुलिस - फौज के बल पर भी नहीं रुके। अपने सभी अंधभक्तों को काम पर लगा दिया, किसानों को देशद्रोही साबित करने में, पर काम फिर भी न बना।


मंत्रीजी सोच रहे थे, अब जान कैसे बचे। उधर पंमानी-टंमानी का प्रेशर इधर दिल्ली में किसान। बड़ी विकट समस्या। न खाते बन रहा - न उगलते... किसान आंदोलन तो हलक में ही अटक गया। कोरोना का बहाना भी न चल सका। 


सुना है मंत्रीजी कोमा में चले गये हैं।



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