Dinesh Uniyal

Abstract


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Dinesh Uniyal

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मजबूर

मजबूर

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एक मुस्लिम परिवार में गफ्फार अपनी पत्नी व दो बेटियों के साथ रहता था गफ्फार एक अच्छे केमिकल कंपनी में काम करता था उसी कंपनी से उसे रहने के लिए मकान मिला हुआ था। मकान छोटा था पर अच्छा था वहां सब चीजों की सुविधा थी। बेटियां बड़ी हो रही थी।

    गांव में उसका भाई अपने परिवार के साथ रहता था उसके तीन बेटे थे उसकी गरीबी स्थिति के कारण गफ्फार ने मझले बेटे आमीन को अपने साथ मुंबई शहर ले आया। मुझे अपने साथ अपने ही घर में रखा आमीन को अपने सेठानी के बंगले में काम दिलवाया। वह वहां खूब मेहनत से काम करता उनके बगीचों की देखभाल करता था।

    कुछ समय बाद गफ्फार ने अपनी बड़ी बेटी का निकाह आमीन से कर दिया। अब आमीन की जिम्मेदारी बढ़ गई थी। वह सेठानी के घर में पार्ट टाइम काम करता तथा उनके जरिए कंपनी के कंस्ट्रक्शन कार्य में मजदूरी का कार्य करता। वह बहुत मेहनती था यहां उसे खूब मेहनत करनी पड़ती आए दिन उसके परिवार में कुछ ना कुछ समस्या रहती थी। इसी के चलते गफ्फार का इंतकाल हो गया। अब घर की सारी जिम्मेदारी आमीन पर आ गई आमीन पढ़ा लिखा नहीं था इसलिए लोग उसे बेवकूफ भी बना देते थे जहां अंगूठा ज्यादा रुपयों के चालानों पर लेते और उसे कम रुपए देते। ऐसा उसके साथ कई बार होता पर बेचारे आमीन को पता ही नहीं चलता। कुछ समय बाद उसकी साली का भी निकाह गांव में हो गया गांव से आने के बाद उसकी चाची ने अपने भांजे को भी बुला लिया अपने साथ रहने की लिए अब इतने से घर में एक तो खुद दूसरा अपनी बड़ी बेटी का परिवार और तीसरा या भांजा। एक ही कमरे में इतने सारे लोग पता नहीं किस तरह एडजस्टमेंट कर रहे थे। 

    आमीन को भी शादी के कई सालों बाद लड़का हुआ था। वह बड़ा खुश था। शुकराना की नमाज अदा कर ऑफिस चला गया। अचानक पता लगा जिस कंस्ट्रक्शन लाइन में वह काम करता था। वह लाइन बंद हो गई थी। यह अचानक पहाड़ा उस पर टूट पड़ा। अच्छा खासा काम चल रहा था। वह भी हाथ से गया। कुछ महीनों आमीन ने ऐसे ही फांके किए। उनके घर के पास में ही एक संस्था थी। वहां उसे प्यून का कार्य मिल गया। पगार कम था। पर घर के बिल्कुल बगल में था। आने जाने की दिक्कत ना थी। गरीबी का आलम था। अपने परिवार को पालने की जिम्मेदारी थी। अपने तन की बिल्कुल भी परवाह किए बगैर वह अपने काम में लगा रहता था। अब सुबह 4:00 बजे उठकर व बगीचे में पानी मारने जाता। वहां से घर आकर नहा धोकर संस्था में पहुंच जाता था। वहां से शाम को बगीचे में फिर पानी मारने जाता। सप्ताह के अंतिम दिनों में वह पुरानी सेठानी के बगीचे में दवाई छिड़काव के लिए जाता। व्यसन कुछ ना था । हां कभी-कभी दोस्तों के साथ बैठकर शराब पी लिया करता। कुछ सालों बाद उसी बेटी हो गई परिवार बढ़ गया अब एक बेटा और एक बेटी वह बड़ा खुश हुआ था। उसके निवास स्थान में भी अब पुराने मकान की जगह इमारत बन गई थी। उसे इमारत में चौथे मंजिल पर मकान मिला था। छोटा कमरा था । एक छोटे से कमरे में अपना परिवार चाची, चाची का भांजा वह भी शादी कर अपना परिवार यहीं ले आया था। आमीन का छोटा भाई सभी लोग यहीं साथ रहते थे। इतनी सी जगह पर कैसे क्या रहते पता नहीं। घर में सामान कोई ना भराता था। बस सिर्फ साथ रहना था। घर का पूरा खर्चा आमीन और उसकी पत्नी उठाती उसकी पत्नी को यहां वहां लोग बच्चों के मालिश के लिए बुलाते। वह मालिश का कार्य जानती थी। गरीबी की हालात थे। लड़का मां-बाप की मेहनत का समझता था। वह अपने पिता से कहता बाबा दो साल और झेल लो। मेरे 12वी हो जाने के बाद मैं भी काम पकड़ लूंगा। मैं भी कमाने लगूंगा और जब मैं अच्छा कमाने लग जाऊंगा तो मैं तुम्हें काम करने नहीं दूंगा।

     बेचारा आमीन पहले ही जिम्मेदारियों के बोझ से मरा जा रहा था। उमर भी हो चली थी। कानों से आवाज बिल्कुल कम सुनाई देता। उसमें एक खूबी थी। वह कार्य करते वक्त पुराने गाने बड़ी खुशी से गुनगुनाकर सब को खुश करता था। ऑफिस में वह हर समय अपनी मस्ती में गुनगुनाता रहता। इसी तरह समय बीतता गया । उसके लड़के ने 12वीं की परीक्षा दे दिया था। अब वह अपने पिता से कह रहा था। अब आप बिल्कुल भी फिक्र मत करो मैं जल्द ही नौकरी में लग जाऊंगा। मैं आपका सहारा बनूंगा हमारे गरीबी के दिन जल्द खत्म कर दूंगा।

     बेटा बढ़ा ही होनहार और समझदार था। अमीना बच्चे की बातों से बड़ा खुश होता। उसे एक आंतरिक सहारा मिलता पर होनी को कुछ और ही मंजूर था। एक दिन वह अपने पिताजी से इजाजत लेकर अपने दोस्तों के साथ पास के दूसरे स्टेशन में मार्केट जाने के लिए निकला। वे लोग ट्रेन से जा रहे थे।सारे बच्चे अपने लड़कपन से अभी अभी बाहर आए थे। सभी में मौज मस्ती की धूम थी। कभी से कभी बाहर निकले लड़कों में अल्हड़पन रहता है। वह कुछ नया कर गुजरने की सोचते हैं। मार्केट जाते समय या ट्रेन में दरवाजे पर की लत का मजाक मस्ती कर रहा था कि अचानक एक जोरदार फटका लड़के के सिर पर लगा और वह ट्रेन से वहीं गिर गया। वह खंबे से टकरा गया था। सारे बच्चे डर गए ‌। अगले स्टेशन में सारे उतर कर अपनी सोसाइटी में खबर कर उसके साथ अस्पताल पहुंच गए।

     आमीन को अब तक पता नहीं था कि आज उसके ऊपर कौन सा पहाड़ टूटने वाला है वह ऑफिस में रोज की भांति गाते हुए अपने कामों को निपटा रहा था।अचानक दोपहर में उसे फोन आता है, फोन पर सोसाइटी से ही किसी ने उसे तुरंत अस्पताल पहुंचने को कहा और फोन कट गया। वह डरता हुआ अस्पताल की तरफ चल पड़ा। मन बड़ा घबरा रहा था ।क्या हो गया होगा?..... ऐसे कई अजीबोगरीब सवाल उसके मन में पैदा हो रहे थे। जैसे तैसे वह अस्पताल में पहुंचा। देखता क्या है , सारे सोसाइटी के लोग वहां अस्पताल में पहले से ही मौजूद थे। वहां पहुंचकर उसके ऊपर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। वहां पहुंचकर उसे पता चला कि उसके लड़के का ट्रेन एक्सीडेंट में सर फटने से उसका इंतकाल हो गया है। वहीं पर उसके सारे सपने टूट गए आंखों के आगे अंधेरा छा गया और वह धड़ाम से जमीन पर गिर पड़ा। होश आने पर आवाक सा यहां वहां देखने लगा। उसे अपने लड़के की वे सारी बातें याद आने लगी जो वह कहा करता था।

     एक जवान बेटा को कंधा देना, इससे बड़ा दुख शायद ही उसकी जिंदगी में आया हो। वह भी एक लायक बेटा, जिसने अभी कल ही तो उसे भविष्य के सपने दिखाए थे। खुद ही उन सपनों को तोड़ता हुआ निकल पड़ा। आमीन तो पूरी तरह टूट गया । उसने अपने बेटे से बहुत उम्मीद लगा रखी थी। सारी उम्मीदें टूट गई। यही उसके जिने का सहारा थी। समय बीतता गया। पर वह इस सदमे से उभर नहीं पाया। कुछ महीनों बाद उसने पुणे ऑफिस ज्वाइन कर लिया। अब उसे तो अपनी बेटी की खातिर काम तो करना ही था। वह जब भी अकेला बैठा होता अपने-अपने बड़बड़ आता रहता। अपने बेटे के गम में आंसू बहाता। लोगों ने उसे बहुत समझाया जो हो गया सो हो गया अब अपनी बेटी लड़की को ही बेटा मानकर इसे पढ़ाओ लिखा हुआ और इस काबिल बनाओ कि वह अपने पैरों में खड़ी रह सके। वह हां में सिर हिला देता कुछ समय बाद चाची भी गुजर गई घर किसी के नाम नहीं हो रखा था। तो सभी अपना हक जताने लगे। आमीन का छोटा भाई भी अपनी बेटी के साथ वही रहने आ गया।

     आमीन के छोटे भाई को यह था कि आमीन अपनी बेटी का निकाह उसके बेटे से करा दे। इसलिए उसका लड़का भी इनका खूब ध्यान रखता । आमीन ने कभी इस रिश्ते के लिए हामी नहीं भरा था। तो कुछ सालों साथ रहने के बाद वे अपने आप ही साइड हो गए। आमीन उनसे यही कहता भाई सब लड़की के ऊपर है। पहले वह पढ़ लिख जाए फिर उसकी शादी की बात हो वाच आएगी तो शादी कर देंगे और ना चाहेगी तो यह शादी नहीं होगी।

     अब लड़की जवान हो गई थी। वह भी समझदार थी। वह भी वही सब कहती जो उसका भाई था। वह अपने मां-बाप का सहारा बनना चाहती थी। वह मन लगाकर पढ़ाई कर रही थी। उसने भी इस बार 12वीं की परीक्षा दी अब रिजल्ट आने का इंतजार कर रही थी।





     


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