मिलन
मिलन
सुषमा के सामने जैसे ही बेटी पूजा ने अपनी शादी की शर्त रखी वह सकपका गई।उसके जख्म हरे हो गये लगा सैकड़ों बिच्छुओं ने उसे एक साथ काट लिया हो। उसके मानस पटल पर वो घटना अक्षरश: उभर आई। मन में क्रोध और घृणा की आँधी भाँय -भाँय करने लगी।
सुषमा उस समय केवल नौवीं क्लास में ही पढ़ रही थी कुछ परिस्थितियों के कारण पिता को अपना पैतृक घर बेचना पड़ गया था अतः एक व्यापारी ने सहायता के रूप में अपना मकान किराए पर दे दिया था एक दिन यह अपनी सहेली के घर गई और उसके साथ एक आश्चर्यजनक घटना हो गई सहेली चाय लेने के लिए अपने कमरे से बाहर गई थी कि उसके भाई ने अचानक आकर उसे अपनी बहन समझकर सुषमा के कमर पर धप्पा मार दिया जब उसने मुंह उठाकर ऊपर देखा तो वह सकपका गया और वह भी आश्चर्यचकित हो गई । इतना आकर्षक व्यक्तित्व उसने पहले कभी नहीं देखा था। घर आकर भी वह उसी के बारे में निरंतर सोचती रही । वह मन ही मन उसे दिल दे बैठी। जब भी वह स्कूल जाती अक्सर वो लड़का उसे मिलने लगा। इसे प्यार कहें या उम्र का आकर्षण उसे उस लड़के को देखना आँखों को बडा सुखद लगता। और धीरे- धीरे बात पत्रों तक आ पहुँची ।
कच्ची उम्र का प्यार भी मूर्ख होता है । बस इतना पता था प्यार में मिलना जरूरी होता है। शायद फिल्मों का प्रभाव था। उन दिनों परिवार फिल्म देखने कम जाया करते थे। हाँ बच्चे एकत्रित होकर किसी टी वी वाले घर में अधिकार समझकर धावा बोल देते और वो परिवार भी अपने घर में बच्चों को पिक्चरहॉल का अनुभव करा देते। हर फिल्म में प्रेम प्रसंग का होना तो अनिवार्य था। फिल्में नाबालिग मन पर अपना पूरा कब्जा जमा लेती है। अब फिल्मों की तरह कहीं बाग-बगीचे तो थे नहीं अत: रात्रि में अपने घर की छत ही मिलन स्पॉट बना डाला। मासूम बच्चों को समाज की मानसिकता का पता ही नहीं था। घर भी केवल छोटे-छोटे दो कमरों का। उसे आए हुए अभी दस मिनट ही हुए थे। बात करने के लिए कोई टॉपिक ही नहीं था बस बच्चों वाली बेवकूफी वाली बातें होती रही ।और जैसे ही वह वापिस जाने लगा पूर्वनिर्धारित षडयंत्र के अनुसार लोगों ने शोर मचा दिया –चोर —चोर—चोर। जानते-पहचानते हुए भी पहले उसकी पिटाई की। सुबह उठकर जो सुनने को मिला वह अकल्पनीय था असामाजिक तत्वों ने अफवाह उड़ा दी कि लड़का और लड़की दोनों निर्वस्त्र आपत्तिजनक स्थिति में थे । मासूम सुषमा इस वाक्य का अर्थ जब समझ पाई जब उसका विवाह हो गया। सोचकर अपनी बेवकूफी पर ग्लानि,मात-पिता की बेईज्जती, समाज की क्रूरता, उस झूठे आरोप का सही अर्थ और कारण समझ में आया। उसे अपने आप से ही नफरत सी हो गई थी। पिता को जब पता चला तो उन्होंने अपना क्रोध पुत्री को पीट कर निकाला उसकी और उसके परिवार की बातें सुनने वाला कोई भी नहीं था। इसी कारण पिता ने वह शहर ही छोड़ना उचित समझा। नए शहर में आकर उन्हें कितनी परेशानियां उठानी पड़ी इसका अंदाजा समाज नहीं लगा सकता। पिता रोजाना अपनी ड्यूटी करने के लिए उस पुराने शहर ही ट्रेन से जाया करते थे। लड़की ने तो नए शहर के स्कूल में ही एडमिशन ले लिया था । लेकिन पढ़ाई का कोई उचित लाभ नहीं मिला क्योंकि उन दिनों 11वीं और 12वीं का एक ही कोर्स हुआ करता था । दूसरे शहर में अलग कोर्स था अतः लड़की को सारी पढ़ाई स्वयं ही करनी पड़ी । एम ए पास करते ही लड़की का विवाह किसी अन्य लड़के के साथ कर दिया गया ।पति केवल उसके रूप- सौंदर्य पर लट्टू था। वह एक गृहस्थी चलाने का साधन थी। सास भी उसे बहू कम और नौकर अधिक मानती थी। उस समय समाज की मानसिकता भी बहुओं के विषय में इससे अधिक बढ़कर नहीं थी। लेकिन जैसा भी पति था वो भी साथ नहीं रहा। अकाल मृत्यु ने उसे भी अपना ग्रास बना लिया। अब तो नौकरी करना ही सुषमा के सामने एक विकल्प था।
अब इसे सौभाग्य कहे या दुर्भाग्य आलोक उसी कंपनी का मालिक था जिसमें सुषमा ने सर्विस के लिए अप्लाई किया था इंटरव्यू के समय ही दोनों एक दूसरे को पहचान गए थे लेकिन लोकाचार के कारण दोनों के मुंह पर ताला लगा हुआ था दोनों का व्यवहार भी बहुत सभ्य और सुसंस्कृत था कि किसी को भी एहसास ही नहीं हुआ कि पहले दोनों एक-दूजे के प्रेम में बदनाम हो चुके हैं।।
अब बेटी के विवाह की बात सामने आई तो बेटी की शर्त सुनकर सुषमा अवाक रह गई । वह माँ की शादी के पश्चात ही अपनी शादी करने के लिए तैयार थी । उसे पता था माँ ने अपना सारा जीवन अपनी सारी युवा अवस्था उसके पालन-पोषण के लिए झोंक दी है । सारा जीवन विधवा रहते हुए तपस्या में ही काट दिया। पति से तो उपहार में केवल पुत्री ही मिली थी जिसका पालन-पोषण भी सुषमा ने ही किया था। घर और ऑफिस तथा एक बच्चे की जिम्मेदारी सँभालने के लिए सुषमा को कितनी भागदौड़ करनी पड़ती बेटी को अहसास था। अत: वह अपनी माँ में ही भगवान के दर्शन करती । एक बार जन्मदिन के अवसर पर आए सुषमा और बॉस की बातें सुनकर वह अवॉक रह गई थी।
सुषमा बहुत ही साफ दिल की औरत थी उसने ऊँच-नीच समझाते समय अपने साथ हुई दुर्घटना को बेटी को बता दिया था । अपनी माँ की सच बोलने की आदत पर बहुत गर्व करती थी। लेकिन किसी भी कीमत पर मां बेटी की शर्त मानने के लिए तैयार नहीं थी ।
अत: बेटी ने होली आने की प्रतीक्षा कीऔर पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार होली खेलने के लिए बॉस को भी आमन्त्रित किया । माँ हारसिंगार के पौधे के नीचे उदास बैठी थी बॉस ने उनके ऊपर रंग डाल दिया। माँ बहुत चीखी-चिल्लाई लेकिन बेटी ने मोर्चा सँभाल लिया। " माँ मैंने तुम्हें देखा है दौड-धूप करते हुए,पल-पल मरते हुए। मेरी इच्छा पर अपनी आवश्कताओं को बलिदान करते हुए। माता-पिता की भूमिका निभाते हुए। हर परीक्षा में अव्वल आने के लिए जद्दो जहद करते हुए। तुम माँ नहीं हो मेरी, भगवान हो। ईश्वर तुम्हारे जैसा ही होता होगा। अब तुम्हारी जिम्मेदारी पूरी हो गई है बेटी होने के नाते मेरी भी कोई जिम्मेदारी है। मैं अपनी माँ को अकेला छोड़कर नहीं जाऊँगी। जिस न किये हुए अपराध की सजा, बदनामी तुमने किशोरावस्था में पाई है जो जिल्लत आपके परिवार ने झेली है उसकी पूर्ति तो होनी चाहिए । ये समाज के ठेकेदार बच्चों की न उम्र देखते हैं न भावनाएँ न उनकी मासूमियत बस अपने मन में बसी वासना के अनुसार दूसरों को बदनाम करते हैं। और चटकारे लेकर बातें सुनते-सुनाते हैं। माँ मेरी नजर में तो यह पाप नहीं है यदि आपकी नजर में पाप है भी तो इसकी सजा तुम भुगत चुकी हो ,तुम ही नहीं तुम्हारा मासूम परिवार भी। तुम्हें भी जीने का हक है। खुश होने अधिकार है । किसने कहा है जीवन केवल दुख तकलीफ उठाने के लिए है या रोने के लिए है।
जिस उम्र में पति-पत्नि के रिश्ते का भी ज्ञान न हो उस समय इतना घटिया आरोप लगाना कितनी गंदी,छोटी और क्रूर मानसिकता है। नहीं माँ , मुझे पापा चाहिए। मेरा भी अरमान है, मुझे भी अधिकार है कि मैं भी पापा शब्द का उच्चारण करूँ। सारी उम्र भटकी हूँ इस प्यारे से शब्द का सम्बोधन करने से ,अब तो मुझे यह सौभाग्य दे दो माँ। मुझे मेरा पिता दे दो।
और सुषमा ने भी बेटी को गले से लगा लिया दोनों रो रही थी लेकिन ये खुशी के आँसू थे। क्योंकि सुषमा ने बेटी पूजा की शर्त मानकर उसे पिता देने का ईशारा दे दिया था। जब यह सूचना पूजा ने फेसबुक पर डाली तो सबके कमंट्स लगभग इस प्रकार थे " यार तुम दोनों ने शादी कर ली । वाह तुम दोनों तो छुपे रुस्तम निकले, कॉलिज में तो कभी लगा नहीं कि तुम्हारे बीच कुछ चल भी रहा है ।लेकिन चलो कॉलिज की छुपी हुई ही सही,कोई प्रेमकहानी तो शादी तक पहुँची। "

