STORYMIRROR

Sudha Sharma

Inspirational

4  

Sudha Sharma

Inspirational

प्रेम सतत् प्रक्रिया

प्रेम सतत् प्रक्रिया

4 mins
25

                           कहानी 
                             प्रेम 

जैसे ही मोबाइल उठाया ।—-फेसबुक और व्हाट्सएप खोलें सबसे पहले श्याम प्रसाद रस्तोगी जी की पत्नी की मृत्यु का समाचार मिला।—- पढ़कर मन वेदना से भर गया।— व्यस्तता के कारण फोन खोलने में लेट थी अन्यथा समाचार पुराना था।—-- मैंने तुरंत उन्हें फोन मिलाया ।—पता चला उनकी तेहरवीं भी हो चुकी थी । मैंने रूवासी आवाज में पूछा– “क्या हो गया था भाभी जी को ?” उत्तर मिला —-”कुछ भी नहीं। हम दोनों साथ बैठकर खाना खा रहे थे उनके हाथ में खाने के लिए ग्रास था लेकिन हाथ मुंह तक नहीं गया।—-- हाथ से टुकड़ा छूट गया और दिल में दर्द हुआ और दो मिनट में ही सब कुछ समाप्त हो गया ।” कहते कहते उनकी आवाज भर्रा गई ।
मैं आवाज से ही पहचान गई कि उनके दर्द आंसू बनकर आंखों के रास्ते छलक आए हैं । —-पूछने पर पता चला -81 वर्षीय थी और वह महोदय स्वयं 84 वर्ष के हैं।—--दो चार बातों के बाद ही फोन रख दिया क्योंकि भावुकता बात करने में बाधा डाल रही थी


मेरा मन व्याकुल हो गया ।—-व्याकुल कंसे अधिक भावुक हो गया और विचारों का रण शुरू हो गया । 80-85 वर्ष की उम्र में भी इतना प्यार; इतना लगाव!—-यह है सच्चा प्यार । —--जीवन भर का प्रसाद —-लेकिन मैं उम्र की बात ही क्यों कर रही हूॅं ? प्यार की तो कोई आयु ही नहीं होती ।—---प्यार तो काल देश परिस्थितियों से पार ।—---प्यार तो पूर्ण है जो निरंतर मौन रहकर भी चलता रहता है।—- दो में से एक के समाप्त हो जाने पर प्यार मरता नहीं और मुखर हो जाता है ।—सीने में दर्द बनकर बस जाता है।—-- शरीर ही तो मर जाता है ।—-प्रेम तो ध्रुव तारा बनकर मन-मस्तिष्क में टॅंक जाता है । प्यार की शर्त सुंदरता भी नहीं।—- सौंदर्य तो समय की गलियों में भटक भी जाता है। फिर —--फिर ?
      पुरानी परंपराओं को देखते हुए मानने में तनिक भी संदेह नहीं था कि दोनों में शादी से पहले एक दूजे को देखा होगा ,बातें की होंगी । हाॅं चलो माना जा सकता है कि लड़की देखने की परंपरा निभाई होगी—-- फिर भी जन्म -जन्म का बंधन! तभी मेरे मन में मस्तिष्क में आधुनिक युवा वर्ग के वाक्य हथोड़ा बनकर प्रहार करने लगे।—-- “हम एक दूसरे को जाने बिना कैसे साथ रहने का निर्णय ले सकते हैं?----सारी उम्र का बंधन एक -दूसरे का व्यवहार जाने बिना दो अनजान व्यक्ति कैसे साथ रहने के लिए तैयार हो सकते हैं? और इसी सोच से विवाह से पहले साथ रहने की परंपरा चल पड़ी –लिव- इन -रिलेशनशिप।—- दोनों बालिग— दोनों का साथ रहने का परिपक्व निर्णय ।—-न माता-पिता का अंकुश न समाज का बंधन।—- किसी भी प्रकार की कोई दीवार नहीं फिर भी संबंध मोम की भांति जरा सी आंच लगने से ही पिंघल रहे हैं।—- रिश्ते रेत की भांति मुट्ठी से फिसल रहे हैं। संभाले नहीं संभल रहे। फिर अधिकांशतः कोर्ट कचहरी के दरवाजे खटखटाने शुरू । न्याय की गुहार। और थाना -कोर्ट – कचहरी में शिकायतों का अंबार। आधा जीवन कोर्ट कचहरी की दहलीज पर नाक रगड़ते रहने का सिलसिला। जीवन में खुशियां कपूर की भांति छूमंतर। जीवन में हताशा निराशा अविश्वास और न समाप्त होने वाली शिकायतें।
     कैसा प्यार ?----कहां था प्यार ?---प्यार तो समर्पण बिन अधूरा है ।—-प्यार तो मरने के बाद भी चलने वाली सतत् प्रक्रिया है।—-- प्यार तो वह पावन बंधन है जो आत्माओं को मिला देता है। जिस पर अमीरी गरीबी अभाव कुछ प्रभाव नहीं डालते ।—-बीच-बीच में थोड़ी बहुत नोक-झोंक हो भी जाए तो रिश्ते टूटते नहीं रिफ्रेश हो जाते हैं और निखर जाते हैं । जैसे आंधी तूफान के बाद बारिश आने पर मौसम बिल्कुल साफ और सुहाना।—-पता नहीं आधुनिक युवा पीढ़ी में तो वे संवेदनाएं, वे प्यार के भाव ,वह समर्पण क्यों नहीं ?--- और इन सम्बन्धों से डरकर शादी न करने का निर्णय। यह आज के समाज का यक्ष प्रश्न बन गया है। —----मन तो कर रहा था कि युवा पीढ़ी से बात की जाए। उन्हें बताया जाए कि इंसान को इंसान की तरह लें देवताओं की भांति नहीं। इंसान बुराई का पुतला। —---जिससे प्यार करो उसे उसी रूप में स्वीकार करें जैसा वो है। उसे अपने जैसा बनाने का प्रयास करें और उसके जैसा बनने का भी प्रयास करें लेकिन प्यार से। प्यार किया है या हुआ है तो उसे निभाना भी सीखें। लेकिन हर व्यक्ति स्वतंत्र।—-माने या न माने सबकी अपनी मर्जी।
 डॉ सुधा शर्मा आर्या मेरठ 


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi story from Inspirational