Bhavna Jain

Abstract


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मेरा प्यारा गांव

मेरा प्यारा गांव

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ई-मेल के जमाने में खत लिखना सच में बहुत अनोखा अनुभव है। मगर मैं तो मेरी जिंदगी का पहला खत तुम्हें ही लिखूंगी। तुम, जिसके साथ मेरे जीवन की सबसे मीठी यादें हैं। जिसके साथ के एहसास आज भी जीवित हैं। ऐसा कहते हुए प्रिया ने अपनी डायरी उठायी और लिखना शुरू कर दिया। 

मेरे प्यारे गांव ! कैसे हो तुम ? सोच रहे होगे इतने सालों बाद मैंने कैसे याद किया। मगर मैं अधिकतर खामोश लम्हों में तुम्हें याद करती हूं। अलबत्ता तुम्हें पहली बार बता रही हूं। तुम मुझे बहुत याद आते हो। उम्र के इस पड़ाव पर जब दौड़ती भागती जिंदगी थोड़ा थमना शुरू होती है। तो पहली याद तुम्हारी ही आती है। तुम मेरा पहला प्यार हो ! और हो भी क्यों ना,,, तुमने मुझे बहुत कुछ दिया। मेरी जिंदगी का पेड़ लगाने के लिए एक मजबूत जमीन दी। जिसे दोस्तों, परिवार और रिश्तों ने खूब पानी दिया। अब तो इस पेड़ पर फल भी आ गए हैं। एक प्यारी सी बेटी है मेरी,,, कभी मौका मिला तो लाऊंगी उसे तुमसे मिलाने। 


वैसे तुम्हारी छवि मेरी स्मृति पटल पर आज भी वैसी ही जीवन्त है। वह हरे भरे खेत जिनमें दूर तक फैली हरियाली। कच्ची मुंडेर, कच्ची सड़कें, कच्चे घर मगर मजबूत रिश्ते,, पूरी तरह अपने। 

हर साल गर्मी की छुट्टियों का इंतजार करती थी मैं, तुमसे मिलने के लिए। गांव के बाहर से ही दोस्त यार मिल जाते और पूरे साल की बातें शुरू हो जातीं। खेतों की सैर, बेफिक्र पूरे गांव में घूमना, फिर नये रास्ते बनाना। ट्यूबवेल के पानी से खेलना, पेड़ पर चढ़कर पीलुआ (एक प्रकार का फल) तोड़ना। वह दादा का कुएं से पानी खींच कर ऊंटों को पिलाना और बकरियों का शाम को चर कर आते ही पूरे घर में उछल - कूद करना। वह रात को खुले आसमान के नीचे लेट कर तारों को गिनना। दादी का किस्से -कहानियां सुनाना। सुबह-सुबह घर के बाहर मोर का नाचना। वो दिन में नीम के पेड़ के नीचे चारपाई पर लेट कोयल से बातें करना। शाम का डूबता सूरज,,, चारों तरफ अपनी लालिमा बिखेरता। किसको प्यार ना हो जाए ऐसी जिंदगी से वही तो जीवन था। 


याद है तुम्हें वो घर के आंगन में लगा नीम का पेड़, जिस पर दादी हमारे लिए झूला डलवा देती थी। शाम को उस झूले पर बैठकर हम सब दोस्त आसमान को छूने की होड़ करते। ओह ! वो एहसास ही पूरे शरीर को खुशी से भर देता है। और वह बैलगाड़ी, जो दादा ने घर के बाहर रख रखी थी। अरे वही !! जिसमें मैं घंटों बैठी रहती थी, ऐसा लगता था मानो किसी देव - विमान में बैठी हूं। 


मीना की शादी तो याद ही होगी। कितना सुन्दर तरह से सजाया था तुम्हें। हर जगह चांदनी फैली हुई थी। मैंने भी खूब श्रृंगार किया था उस दिन। और पता है तुम्हें उसके बाद कई रिश्ते आ गए थे मेरे लिए। बहरहाल, आज तो इन कंक्रीट के मकानों में रहने वाले लोगों के दिल भी शायद कंक्रीट के ही है। सालों - साल एक दूसरे के आस-पास रहते हैं। पर ठीक से शायद पूरे परिवार का नाम भी नहीं पता होगा। जिंदगी के एहसास ही खत्म हो गए हैं। बस दौड़ते जा रहे हैं... ना जाने कहां पहुंचना है। इस बंजर जिंदगी में जब तब तुम्हें याद करके थोड़ा जी लेती हूं। 


तुम, मेरे पहले प्यार...मैं

तुम्हारी अपनी प्रिया

भावना "दर्शी"





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