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Bhavna Jain

Drama Inspirational


4.2  

Bhavna Jain

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एक पुण्य ऐसा भी

एक पुण्य ऐसा भी

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"अरे ! आज सुरेश नहीं आया? " नीता ने पूछा "वैसे अभी तक तो आ ही जाता है। आज लेट हो गया होगा।" सीमा ने जवाब दिया।

सुरेश एक सब्जी वाला है। जो ठेले पर जगह-जगह अपनी सब्जियां बेचता है। नीता को शहर आए अभी कुछ ही दिन हुए थे। नई जगह, नया शहर.. कहां क्या मिलेगा... जानने में समय तो लगता है। दिन के करीब 12:00 बजे थे, वह अपनी बेटी को स्कूल से वापस ला रही थी। "चलो अभी तुम्हें घर छोड़ती हूं, खाना भी बनाना है, फिर थोड़ा आराम करके शाम को सब्जी लेने जाऊंगी। नीता यह सब बड़बड़ा ही रही थी कि सामने एक सब्जी का ठेला दिखा। उसने अपनी एक्टिवा रोकी और सब्जियां छांटने लगी। 

"अरे ! सुनो...सुनो, सुरेश चिल्लाया। तुम अपने पैसे तो लेती जाओ।" सुरेश अपनी सब्जी की ठेल छोड़ कर उस औरत के पीछे भागा। "कैसा सब्जी वाला है। ग्राहक खड़ा है, और उसे कुछ पड़ी ही नहीं है।" नीता मन ही मन सोचने लगी। परंतु उसे सब्जी खरीदनी थी। तो उसने सुरेश का इंतजार किया। "अरे भैया, क्या करते हो... ग्राहक छोड़कर इधर-उधर जाना। कितनी देर इंतजार करना पड़ा।

" मैडम ! वह एक काम वाली औरत है। उसने ₹20 सब्जी ली लेकिन बाकी पैसे लेना भूल गई बस वही देने गया था। घरों में जाकर छोटा-मोटा काम करके मेरी तरह मेहनत करके दो वक्त की रोटी कमाती है। उसके पैसे रखकर मुझे कोई अमीर नहीं बनना।" एक बार को तो नीता को विश्वास ही नहीं हुआ किसी सब्जी वाले से ऐसा सुनना। पर तभी उसे लगा इंसान की पहचान उसके काम से नहीं उसकी इंसानियत और नियत से ही होती है। खैर, सब्जी खरीदने के बाद जब पैसे दिए तो उसे पता चला कि वह बाकी सब्जी वालों से सस्ती सब्जी देता है। उसे थोड़ा अजीब लगा और मन में सवाल भी आया ऐसा क्यों ? परंतु क्योंकि वह जल्दी में थी तो उसने थैला उठाया और घर आ गई। थोड़े ही दिन में उसे पता चला कि सुरेश उस कॉलोनी के लगभग सभी घरों में सब्जी देता है। बड़ा ही सज्जन और एक नेक आदमी है। अब नीता उसी से सब्जी खरीदती। एक दिन उसने पूछ ही लिया, "तुम बाकी सब्जी वालों से कम पैसों में सब्जी क्यों देते हो"। 

"अरे मैडम.. कहां ले जाना है पैसा। ऊपर वाले का हाथ है सर पर। जितनी जरूरत है वह दे देता है। बस काफी है। " नीता सोचने पर मजबूर थी। आज भी इंसानियत जिंदा है, ऐसे लोग आज भी जीवित हैं। 

कुछ समय बाद अचानक कोरोना फैल गया। लाॅक डाउन में हालत खराब थी। चारों तरफ अफरा-तफरी मची थी। जहां, जो भी जरूरत का सामान, जिस भाव में मिल रहा था। लोग खरीद रहे थे और सब्जियों के दाम तो डबल हो गए थे। इस बीच एक दिन सुरेश दिखा। देखते ही नीता दौड़ पड़ी। "बहुत दिनों बाद आए हो, भैया।" सब्जी खरीदने के बाद उसने पैसे पूछे तो पता चला कि वह सब्जी पहले से भी कुछ सस्ते दाम में बेच रहा था। 

"यह क्या सुरेश! एक तो तुम इस माहौल में सब्जी बेच रहे हो और उस पर पहले से भी सस्ती। बाकी लोग तो डबल भाव ले रहे हैं।"

"मैं तो एक अनपढ़ आदमी हूं मैडम ! ज्यादा कुछ तो नहीं जानता। परंतु इतना पता है यह एक बहुत बड़ी समस्या है। जो शायद हम सब के पापों का ही जवाब है जो प्रकृति दे रही है। और इस स्थिति में मैं किसी भी तरह के पाप का भागीदार नहीं बनना चाहता। दो पैसे ज्यादा कमा कर मैं कौन सा धनवान हो जाऊंगा। जितना चाहिए, वह ऊपर वाला दे रहा है। किसी के सामने हाथ नहीं फैलाना पड़ता यह काफी है मेरे लिए। और इस समय अगर मेरे ऐसा करने से किसी को थोड़ा भी लाभ हो जाए तो मैं तो पुण्य कमा लूंगा। पैसा तो आज है कल नहीं साथ में तो यह पुण्य ही जाना है।" उसकी बातें सुनकर नीता बहुत हतप्रद थी। वह सोचने लगी ये होता है असली मोटिवेटर। जो बिना किसी लालच के पूरे भाव से जो उससे बन पड़ रहा है। लोगों की सेवा कर रहा है।

नीता सुरेश के बारे में सोच ही रही थी तभी सीमा की आवाज कानों में पड़ी। सामने एक दूसरा सब्जीवाला दिखाई दिया। 

सीमा, "अरे आज सुरेश नहीं आया।" 

सब्जीवाला, "नहीं मैडम! अब वह नहीं आएगा।" 

नीता, "क्यों, क्या हुआ सब ठीक तो है ना।" 

सब्जी वाला, "नहीं मैडम ! सुरेश को कोरोना हो गया और वह बच नहीं पाया।

सुनकर बहुत दुख हुआ शायद भगवान को भी अच्छे इंसानों की जरूरत रहती है। जीवन का सच्चा उद्देश्य शायद यही होता है। जब तक वह जिंदा था हर मुमकिन कोशिश में सेवा भाव करता रहा। निश्चित ही स्वर्ग का हकदार है। 

'क्या लेकर आए क्या लेकर जाना है... 

खाली हाथ आए खाली हाथ जाना है... 

परंतु उसकी टोकरी अनगिनत पुण्य से भरी हुई थी। और वह खाली हाथ नहीं गया था।


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