STORYMIRROR

Priyanka Gupta

Drama Tragedy Inspirational

4  

Priyanka Gupta

Drama Tragedy Inspirational

मेरा क्या दोष है !!!

मेरा क्या दोष है !!!

8 mins
231

एक वह दिन था और एक यह दिन है। नमिता की ज़िन्दगी एकदम बदल गयी थी। 6 महीने पहले जहाँ सभी लोग उसकी किस्मत से रश्क़ कर रहे थे वहीं आज कुछ लोग उसके दुर्भाग्य पर आँसू बहा रहे है। कल तक वह सर्व गुण संपन्न, संस्कारी, सबकी दुलारी थी आज वही कुसंस्कारी, चरित्रहीन और सबकी नफ़रत की अधिकारी हो गयी है। 

नमिता शहर के जाने -माने मेहता परिवार की इकलौती पुत्रवधू है। अभी ६ माह पहले ही सुधा और पंकज मेहता नमिता को अपने पुत्र ऋषभ की दुल्हन बनाकर मेहता निवास में लाये थे। नमिता एक साधारण से परिवार की असाधारण व्यक्तित्व की धनी पुत्री थी, नमिता के घर में उसके अलावा उसकी दो छोटी बहिनें और थी। सुधा जी ने नमिता को अपने एक मित्र के यहाँ किसी फंक्शन में देखा था। मधुर भाषिणी, रूपवती और सौम्य नमिता सुधाजी को देखते ही अपने पुत्र ऋषभ के लिए भा गयी थी। 

फंक्शन में ऋषभ जैसे नमिता के ईर्द -गिर्द मंडरा रहा था, उससे सुधा जी अपने बेटे के मन की बात भी समझ गयी थी। जो माँ अपनी संतान को 9 महीने अपने गर्भ में रखती है, उसके लिए अपने संतान के मन की बात पढ़ लेना कोई बड़ी बात नहीं है। नमिता के मम्मी -पापा भी सुधा जी को बड़े भले और सभ्य लोग लगे थे। 

फंक्शन से अपने घर लौटते ही सुधाजी ने अपने फैसले की घोषणा कर दी थी कि, "मैंने मेहता परिवार की पुत्रवधू पसंद कर ली है।"

सुधा जी की बात सुनकर ऋषभ ने कहा कि, "मम्मी मुझे अभी शादी नहीं करनी है।"

"बेटा, पहले यह तो जान ले कि हमारी होने वाली बहू कौन है ?" सुधाजी ने मुस्कुराते हुए कहा। 

"मुझे नहीं करनी शादी।" ऋषभ ने कहा। 

"ठीक है। वैसे मैंने फंक्शन में जो लड़की प्याजी रंग की साड़ी पहनकर घूम रही थी और जिसके आसपास तू किसी न किसी बहाने से जा रहा था, उसे तेरे लिए पसंद किया था।" सुधाजी ने शांति से कहा। 

"अब मम्मी आप चाहती हो तो कर लूँगा शादी।" ऋषभ ने अपनी ख़ुशी छिपाते हुए कहा। 

पंकज मेहता ने भी अपनी जीवनसंगिनी के निर्णय पर मुहर लगा दी थी। "जैसा तुम चाहो। जब जाना हो तुम बता देना।" पंकज जी ने कहा। 

अपने मित्र से सुधा जी ने नमिता के लिए ऋषभ का रिश्ता भिजवा दिया था। शहर के मेहता परिवार से रिश्ता आने की खबर सुनते ही नमिता के मम्मी -पापा की ख़ुशी का कोई पारावार नहीं था। उन्होंने तो सपने में भी इतने अच्छे रिश्ते की कल्पना नहीं करी थी। रिश्ते की बातचीत के लिए सुधा जी ने उन्हें अपने घर निमंत्रित कर लिया था। 

नमिता के मम्मी -पापा उनके घर जाकर आये थे। सुधा जी ने उनका बहुत अच्छे से स्वागत -सत्कार किया और विनम्रता से कहा कि,"भाईसाहब, अगर आपको घर -वर पसंद हो तो हम आपके घर नमिता बिटिया की इच्छा जानने के लिए आना चाहेंगे। आखिर ज़िन्दगी तो नमिता और ऋषभ को ही साथ में बितानी है। "

घर आकर नमिता के मम्मी -पापा ने सुधाजी, ऋषभ और मेहता निवास की तारीफों के पुल बाँध दिए थे। "बेटा, तू बहुत किस्मतवाली है। इतने अच्छे लोग हैं। सुधाजी तो साक्षात देवी ही हैं। विनम्रता और सौम्यता की मूर्ती।" नमिता की मम्मी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोला था। 

नमिता ब्याहकर मेहता निवास में ऋषभ की पत्नी बनकर आ गयी थी। सुधाजी उसकी सास नहीं, ममतामयी माँ थीं। ऋषभ जैसा प्यार करने वाला वह अपने आपको दुनिया की सबसे खुशनसीब लड़की समझती थी। 

समय पंख लगाकर उड़ जाता है, अच्छा समय तो और भी तेज़ी से उड़ता है। देखते ही देखते नमिता के विवाह को 6 महीने हो गए थे। एक दिन नमिता को चक्कर आये, डॉक्टर को दिखाया गया। डॉक्टर द्वारा जब यह बताया गया कि ,"नमिता गर्भवती है। "

यह सुनकर मेहता परिवार तो ख़ुशी से पागल ही हो गया था। नमिता पर सुधाजी का प्यार बरस रहा था। नमिता का आँचल खुशियों से भर गया था। 

गर्भावस्था के दौरान नमिता के कुछ रूटीन टेस्ट हुए। आज उन टेस्ट की रिपोर्ट आ गयी थी। आज डॉक्टर ने जो बताया, उसने नमिता की ज़िन्दगी में भूचाल ला दिया था। 

नमिता के एलिसा टेस्ट की रिपोर्ट पॉजिटिव आयी थी। नमिता HIV पॉजिटिव थी। मेहता परिवार को जैसे ही इस बात की ख़बर लगी, उन्हें तो साँप सूँघ गया था। ममतामयी सुधाजी ललिता पवार बन गयी थी। उन्होंने अपने आज तक के जीवन में जितनी भी गालियाँ सीखी थी, सब नमिता को दे डाली थी। 

नमिता एक कोने में धम से बैठ गयी थी। उसे अभी तक भी समझ नहीं आ रहा उसे यह बीमारी कैसे लग गयी। संस्कारी, सुशील, पतिव्रता नमिता एक पल में संस्कारहीन, कुलटा ,पतिता बन गयी थी। 

पंकज जी का गुस्सा सुधा जी पर था ,"इसीलिए अपने स्तर के परिवार में शादी करनी चाहिए। सड़क छाप लोगों से रिश्ता जोड़ने चली थी, अब भुगतो। इन गरीब लोगों का न तो कोई ईमान होता है और न ही इज़्ज़त। पूरा समाज हम पर थू -थू करेगा। अब तो तुम्हारी लाडली बहू के चरित्र के किस्से गली-नुक्कड़ों पर लोग चटखारे ले -लेकर सुनेंगे। "

तब ही ऋषभ की आवाज़ ने सभी का ध्यान खींचा ,"मम्मी -पापा, डॉक्टर ने मुझे भी अपना टेस्ट करवाने के लिए बोला है। नमिता का पति हूँ न इसीलिए। "

"क्या ?बेटा, तुझे भी ख़तरा है ?" सुधाजी ने पूछा। 

"कैसी पागलों जैसी बातें कर रही हो ? टीवी में सुना नहीं है क्या ?" पंकज जी ने बौखलाते हुए कहा। 

"मैं अपने सैंपल तो दे आया हूँ। जल्द ही रिपोर्ट आ जायेगी।" ऋषभ ने कहा। 

जिस घर में कल तक खुशियाँ नृत्य कर रही थी, वहाँ मातम का ताण्डव नाच रहा था। जिस नमिता को कल तक सब लोगों ने सिर आँखों पर बिठा रखा था, आज कोई उसकी शक्ल तक नहीं देखना चाहता था। 

पंकज और सुधा अब नमिता को भूलकर ऋषभ की चिंता में लग गए थे। सुधा अपने सभी देवी -देवताओं को मना रही थी ताकि उनके बेटे की रिपोर्ट नेगेटिव आये। अब उन्हें केवल अपने बेटे की फ़िक्र थी। 


ऋषभ की रिपोर्ट भी पॉजिटिव आयी। पंकज और सुधा के सब्र का बाँध टूट गया। उनके घर की खुशियों को नमिता ने डस लिया था, ऐसा उनका मानना था। अब वे नमिता को घर में एक पल के लिए भी बर्दाश्त नहीं कर सकते थे। उन्होंने नमिता को घर से बाहर निकाल दिया। 

नमिता बहुत रोई, गिड़गिड़ाई। उसने कहा कि, "मेरा कोई दोष नहीं है। मैंने ऋषभजी के अलावा किसी पुरुष के बारे में सपने में भी नहीं सोचा। "

नमिता ने अपने होने वाले बच्चे की दुहाई दी, "मेरा नहीं तो आपके खानदान के होने वाले चिराग के बारे में सोचिये। "

"पता नहीं किसका पाप पेट में लेकर घूम रही है। इस बच्चे को हमारे माथे मढ़ने की कोशिश कर रही है। हमारा न तो तुझसे और न ही इस बच्चे से कोई वास्ता है। "सुधा ने झिड़कते हुए कहा। 

"बहादुर ,इसको सड़क पर फेंक दे। आज के बाद यह घर के आसपास दिखाई भी दी तो तेरी नौकरी भी चली जायेगी। "पंकज ने अपने चौकीदार को कहा। 

अपनी बदक़िस्मती पर आँसू बहाती नमिता वहां से चली गयी। ससुराल के बाद औरत को पनाह मायके में ही मिल सकती है। यह सोचकर नमिता अपने मायके पहुँची। उसकी दुर्दशा देखकर नमिता की मम्मी का कलेजा मुँह को आ गया था। नमिता की आपबीती सुनने के बाद मम्मी-पापा उसके दुःख से दुखी थे। 

"बेटा, तेरे बाद तेरी दो बहिनें और कुँवारी है। तेरी बदनामी की कहानी लोगों तक पहुँचेगी तो इनसे कौन शादी करेगा। तू यहाँ नहीं रह सकती। हम बहुत मजबूर हैं।" मम्मी -पापा ने अपनी बेटी के आगे हाथ जोड़ लिए थे। 

ससुराल और मायके दोनों ने ही नमिता को दुत्कार दिया था। नमिता को उस गलती का दोषी माना जो उसने कभी की ही नहीं थी। हमारा समाज हमेशा औरत को ही कटघरे में खड़ा करता आया है, अहल्या से लेकर वैदेही तक हमेशा पुरुष की गलतियों की सजा भी स्त्री ने ही भुगती है। नमिता कौन सी अलग थी, अपने पेट में एक नन्ही सी जान को लिए नमिता सरकार के पुनर्वास केंद्र में जाकर रहने लगी। नमिता का संक्रमण एड्स में परिवर्तित हो गया था। ९ महीने बाद नमिता ने एक बच्चे को जन्म दिया, लेकिन बच्चा भी संक्रमित था। कुछ ही देर में बच्चे की मृत्यु हो गयी थी।

नमिता की हालत भी दिन बा दिन बिगड़ती जा रही थी। 

उधर ऋषभ नमिता के जाने के कुछ महीनों बाद अपनी अलमारी में कुछ ज़रूरी कागज़ात ढूँढ रहा था। तब ही उसकी नज़र एक फोटो पर पड़ी। फोटो देखकर ऋषभ के चेहरे पर मुस्कान आ गयी। यह उसकी दोस्तों के साथ शादी से कुछ समय पहले की फोटो थी। तब ही ऋषभ के दिमाग में एक बिजली सी कौंधी। 

"यह मैंने क्या कर डाला। अपनी गलती की सजा मासूम नमिता को दे दी।" फोटो हाथ में लिए ऋषभ बिस्तर पर बैठ गया था। 

ऋषभ अपनी बैचलर पार्टी के लिए दोस्तों के साथ पटाया गया था। पार्टी में उसने कुछ ज्यादा ही ड्रिंक कर ली थी। उसके बाद वह अपने रूम में आकर सो गया था। अगली सुबह जब वह उठा तो उसने अपने बगल में एक लड़की को सोये हुए पाया था। तब उसके दोस्तों ने समझाया था कि ,"कोई बात नहीं यार। तेरी बैचलर पार्टी थी। जो हुआ भूल जा। "

ऋषभ अपने साथ वह गन्दी बीमारी लाया था और उसने वह बीमारी नमिता को दी थी। अपनी गलती का एहसास होते ही ऋषभ ,सुधा और पंकज के साथ नमिता के मायके पहुँचा। लेकिन वहाँ भी नमिता नहीं थी। उसके बाद से से ही सभी लोग नमिता को ढूंढ रहे थे। इश्तिहार आदि बदनामी के डर से नहीं दिए थे। 

ऋषभ के तब एक दोस्त ने उसे नमिता के पुनर्वास केंद्र में होने के बारे में बताया। वह दोस्त अपने किसी रिश्तेदार से मिलने वहाँ गया था। 

आज जब सब घरवाले नमिता से मिलने पहुंचे तब वह आखिरी सांसें गिन रही थी। मानो अपने परिवार को देखने के लिए ही वह ज़िंदा थी। गोरी चमड़ी काली पड़ चुकी थी। उसके लम्बे बाल इतना झड़ रहे थे कि उसने अपने बाल आ गए आ कटवा लिए थे। नमिता हड्डियों का ढाँचा मात्र रह गयी थी। 


अपने पूरे परिवार को सामने देखकर , आँखों से आँसू लुढ़ककर गालों पर आ गए थे।" मेरी कोई गलती नहीं थी।" खाँसते हुए नमिता ने बड़ी मुश्किल से बोला। 

ऋषभ ने उसे सहारा देकर बिठाया। नमिता की हालत देखकर सुधाजी की भी रुलाई फूट पड़ी थी। नमिता की माँ का तो रोते -रोते बुरा हाल था। ऋषभ ने नमिता के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा ,"तुम्हारा कोई दोष नहीं था। तुम्हारी इस हालत का जिम्मेदार मैं हूँ, सिर्फ मैं। अगर हो मुझे माफ़ कर देना। "

नमिता शायद यही सुनने के लिए अब तक ज़िंदा थी। ऋषभ की बात सुनते ही नमिता ने ऋषभ की बाँहों में ही दम तोड़ दिया। 

ऋषभ की नासमझी ने एक हँसते -खेलते मेहता परिवार को तबाह कर दिया था। 


Rate this content
Log in

Similar hindi story from Drama