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V. Aaradhyaa

Tragedy Classics

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V. Aaradhyaa

Tragedy Classics

मेरा बेटा शादी के बाद बदल गया

मेरा बेटा शादी के बाद बदल गया

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" जो भी तुम कमाते हो, सब खर्च देते हो, कोई बज़ट नहीं बनाते। आखिर भविष्य का भी तो कुछ सोचो !"

यह बात एक मितव्ययी पत्नी के मुँह से अक्सर सुनी जा सकती है और एक आम लापरवाह सा पति यह कहकर टाल देता है कि।।।

" छोड़ो ना।।। कल किसने देखा है !"

कुछ ज़्यादा ही संज़ीदा पति हुआ तो पत्नी से लाड़ और मस्का लगाते हुए बोलेगा।।।

" मैं क्यों फ़िक्र करूँ ? तुम हो ना मेरा घर संवारने और मेरी मदद करने के लिए !"

और पत्नी अपनी प्रशंसा से और भी डेडिकेशन से घर संभालने लगती है।

यह होता है अक्सर जो इस आम से घर में हो रहा है।

पर।।। यहां बात थोड़ी अलग थी क्योंकि पत्नी अपने पति की कमाई की कौड़ी कौड़ी पर अपना हक जमाने को कमर कसे हुए थी।

"पहले की बात और थी। पर अब तुम्हारी शादी हो गई है। ट्राई टू अंडरस्टैंड !"

तन्वी ने उसे एक बार फिर मनाने की कोशिश की।

"देखो तन्वी !मुझसे माँ से झूठ नहीं बोला जायेगा, मुझे यह पसंद नहीं नहीं मैंने जबसे कमाना शुरू किया है हमेशा अपनी सैलरी सबसे पहले लाकर माँ के हाथ ही रखता आया हूँ। हर महीने के पाँच तारिख को मुझे तनख्वाह मिल जाती है, ये बात माँ को अच्छी तरह पता है।

यूँ माँ से झूठ बोलकर एकदम लग रहा है जैसे मैंने क़ोई चोरी की है !"

सुमित के स्वर में घबड़ाहट के साथ एक उदासी साफ झलक रही थी।

"अरे, तो क्या।।।।।? कल दे देना और कह देना कि इस बार सैलरी आने में एक दिन की देर हो गई। और पुरे पैसे देने की क़ोई ज़रूरत नहीं है, अब तुम्हारी शादी हो गई है, तुम्हारी कमाई पर मेरा हक पहले है। तुम उनको आधी कमाई देना बस " तन्वी ने इस बार थोड़ा तैश में आकर कहा।

"पर मैं माँ को कहूँगा क्या, जब वो पूछेंगी कि बाकी पैसे कहाँ हैँ?"

"कह देना कि अभी कोरोना की वजह से जो लॉक डाउन हुआ उसमें काफ़ी सारे लोगों को कम सैलरी मिली है, लगभग सबको ये खामियाज़ा भुगतना पड़ा है।मम्मीजी यकीन कर लेंगी"।

"अरे, माँ तो यकीन कर लेंगी पर मेरे ज़मीर का क्या? कैसे बोल पाउँगा मैं झूठ माँ से ?"

सुमित बोल ही रहा था कि, इसके आगे अनिताजी और नहीं सुन पाई और बगैर पानी लिए ही चुपके से रसोई से वापस लौट आईं।

"अरे, तुम पानी लेने गई थी और खाली बोतल फिर से उठा लाई" कैलाशजी ने पूछा और फिर उन्होंने अपनी पत्नी की डबडबाई आँखें देखी तो उन्हें कुछ समझ नहीं आया। तभी अनिताजी खुद बोल पड़ी।

"देखो ना, नई नवेली बहू हमारे बेटे को हमसे झूठ बोलना सीखा रही है। कह रही है, पूरी तनख्वाह माँ के हाथों में देने की क्या ज़रूरत है ? तुम्हारी पूरी कमाई पर अब मेरा हक है और ये भी कह रही थी कि अगले महीने से पूरी कमाई मेरे हाथ में रख देना।"

बोलते बोलते और अपनी रुलाई नहीं रोक पाईं अनिताजी और सुबक पड़ी।

कैलाशजी थोड़ी देर उनकी पीठ पर हाथ फेरते रहे फिर ना जाने कैसे साहस करके बोल पड़े,

"क़ोई बात नहीं, नई बहू के अरमान ऐसे ही होते हैँ।तुम भी तो कुछ कुछ ऐसी ही थी।

तुम भूल गई, जब तुम ब्याहकर आई थी तब अम्मा के नाम पैसे भेजने पर कितना हंगामा किया करती थी। एक बार तो तुमने अपनी कसम देकर मुझे अम्मा को झूठ बोलने के लिए मज़बूर कर दिया था कि इस माह तनखा नहीं मिली और फिर हम उन पैसों से जब घूमने गए तो मेरे उदास हो जाने पर पुरे शिमला ट्रिप के दौरान मुझे ताना देती रही थी कि मैं तुम्हारे साथ खुश नहीं हूँ, वगैरह वगैरह। जबकि मैं अम्मा को झूठ बोलने की वजह से आत्मग्लानि में था।"

अनिताजी को काटो तो खून नहीं। इतनी पुरानी बात जस के तस याद है कैलाशजी को?

प्रकट में बोलीं,

"अच्छा, पर बाद के दो दिन तो आप बहुत खुश थे।"

"हाँ, वो इसलिए कि मैं तुम्हारी नज़र बचाकर चुपके से कुछ रूपये अम्मा को मनीआर्डर कर आया था।

फिर बाद में मैं अक्सर ऐसा ही करता था। तुम्हें बताए बगैर ही अम्मा और बाबूजी की पैसे से मदद करता रहा। जब कभी बोनस या किसी और फंड से अतिरिक्त पैसे मिलते तुम्हें नहीं बताकर मैं उनकी मदद करता रहा। यहाँ तक कि बड़ी दीदी की बेटी की शादी में जीजाजी ने कुछ उधार माँगा तो मैंने भविष्यनिधि से निकालकर उन्हें दिए थे क्यूँकि हम दोनों का जॉइन्ट अकाउंट था और तुम्हारे अलावा, घर और बच्चों के अलावा कहीं और खर्च करता तो तुम एकदम मना करती थी और इतना शोर मचाती कि घर में शांति बनाए रखने और हमारे आपसी रिश्तों को बेहतर बनाए रखने के लिए मुझे ऐसा करना पड़ा था। और देखो, आज मेरी ज़गह हमारा बेटा है और तुम्हारी ज़गह तन्वी। तो तुम्हें बुरा नहीं लगना चाहिए।" बोलते बोलते कैलाशजी की आवाज़ की मुलायमियत थोड़ी कम हो गई थी, जिसे अनिताजी ने साफ महसूस किया।

"देखिए, अब हमारा बेटा सुमित क्या निर्णय लेता है। मैं उसपर बिल्कुल ज़ाहिर नहीं होनें दूँगी कि मैंने उसकी और तन्वी की क़ोई बात सुनी है "। आहत स्वर में अनिताजी ने कहा।

अंदर ही अंदर आज अनिताजी को एक छले जाने का एहसास बड़ी ही तीव्रता के साथ हो रहा था। आज तक उनके पति कैलाशजी उनसे छुपाकर दूसरों की पैसों से मदद करते रहे, ये दंश तो उन्हें साल ही रहा था। पर उसमें वो कहीं ना कहीं खुद का दोष भी मान रहीं थीं पर अब ये बेटा जो कल उनके साथ चालाकी करने जा रहा था, उस संताप को वो भूल नहीं पा रही थीं।

जिस बेटे को छब्बीस सताइस साल पाल पोसकर बड़ा किया, जो आजतक सबकुछ अपनी माँ को बताता आया था अब शादी के बाद उनसे झूठ बोलेगा ये उनके अंदर की ममतामयी माँ को बर्दाश्त नहीं हो रहा था। उन्हें याद है एक बार उन्होंने उसे दोस्तों के साथ पिकनिक पर जाते समय गलती से पाँच सौ की ज़गह दो पाँच सौ के नोट एक साथ दे दिए थे तो इसी सुमित ने वापस आकर सबसे पहले अपनी माँ को पैसे वापस कर दिए थे। और अब वो बदल कैसे गया।

अनिताजी की ममता आज इतनी आहत हुई थी कि एक दर्द की लहर सी थी हृदय में,एक विश्वास टूटने के जानलेवा एहसास ने उनको हिलाकर रख दिया था।

"नहीं चाहिए मुझे सुमित के पैसे, बस वो बहू की बात मानकर झूठ बोलकर मुझे पराया ना करे"।

अनिताजी जैसे खुद ही खुद से बड़बड़ा रहीं थीं।

और रोए जा रही थी। मेरा बेटा अब पराया हो गया।

अनिताजी ज्यों ज्यों सोचती जातीं उनकी रुलाई तेज़ होतीं जाती। आहत ममता और टूटे विश्वास के आँसू थे कि रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे।

अब आगे से वो बेटे पर कैसे विश्वास कर पाएंगी सोचते सोचते अनिताजी को फिर से बड़े ज़ोर की रुलाई आ गई।कैलाशजी उनको सांत्वना देते हुए पानी लेने रसोई जाने को तत्पर हुए ही थे कि तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई।

अनिताजी किसी तरह हलक में रुलाई रोककर दरवाज़े की तरफ उत्सुक होकर देखने लगीं और कैलाशजी ने आगे बढ़कर दरवाजा खोल दिया।

दोनों के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा, क्यूँकि सामने उनके बेटा और बहू खड़े थे। अंदर आकर पहले सुमित ने अपनी माँ को पानी पिलाया फिर तन्वी उनके बगल में बैठकर उनकी पीठ सहलाने लगी।

थोड़ा पानी पीकर जब अनिताजी कुछ संयत हुईं तो उन्होंने सवाल किया,

"तुमलोग यहाँ कैसे?"

जवाब में सुमित बोला, जब आप हमारी बात सुनकर वापस मुड़ी तो तन्वी को आभास हो गया था कि बाहर क़ोई है? और फिर हम जब अपने कमरे से बाहर आए तो आप दोनों की बात सुनकर एकदम शर्मिंदा हो उठे।"

"मम्मीजी, मैं आपको विश्वास दिलाती हूँ कि अब ऐसा कभी नहीं होगा। सुमित पहले की तरह सारी तनख्वाह आपके हाथ में ही लाकर रखता रहेगा। हमें बड़ों के अनुभव से सीखना चाहिए और मैंने और सुमित ने आपके और पापाजी के जीवन के अनुभव को सुनकर यही निश्चय किया है कि अब क़ोई अपनी तनख्वाह के पैसे के लिए झूठ नहीं बोलेगा।

मुझे माफ कर दीजिये जो मैं सुमित को उल्टा सीधा सीखा रही थी।"।

"सिर्फ तन्वी को ही नहीं माँ, मुझे भी माफ कर दो। मतलब हमें माफ कर दो "। ये सुमित की आवाज़ थी।

"रुको, बच्चों ! तुमदोनों को माफ करने से पहले मुझे तुम्हारे पापा से माफ़ी माँगने दो।"

"बस बस बहुत हो चुका ये माफ़ी माँगने का कार्यक्रम। चलो सबने सबको माफ किया। जाओ बच्चों तुमलोग अब जाकर सो जाओ "। कैलाशजी बोले।

"अब तो लगभग सुबह होने को आई, अब क्या सोयेंगे हम। यहीं बैठते हैँ आपदोनों के संग।" सुमित ने कहा।

फिर सुमित माँ के पास आया। वह अपनी तनख्वाह एक लिफाफे में भर लाया था। उसे माँ के हाथों में देकर वहीँ ज़मीन पर बैठकर अपना सर माँ की गोद में रख दिया।

ममता और प्रेम से ओतप्रोत अनिताजी का मन गदगद हो गया। सुमित के सर पर हाथ फेरते फेरते उन्हें अचानक महसूस हुआ उनकी आँखों के कोर फिर से गीले हो रहें हैँ। जिसे तन्वी ने बड़े ही ज़तन से अपने दुपट्टे में समेट लिया। अनिताजी ने पनियाली आँखों से तन्वी को देखा।।। कल की नई बहू अनिता की छवि नज़र आई जो शादी के बाद दुल्हन बनकर इस नए घर में अपनी एक पहचान, अपना हक चाहती है। और उन्होंने तन्वी को गले से लगा लिया।

"अब नींद तो क्या आएगी। सुबह होनें को आई "

कहते हुए कैलाशजी रसोई की ओर चाय बनाने चले। शायद भीगे हृदय और सज़ल आँखों में अम्मा की याद आ गई थी।

लगा अम्मा उनको प्यार से निहार रही हैँ।उन्हें इस बात का गहरा संतोष था कि ज़ब तक अम्मा जीवित रहीं उन्होंने उन्हें कोई कमी नहीं होने दी थी।

हाँ अलबत्ता अनिताजी को घर में क्लेश होने के डर से कभी नहीं बता पाए थे। पर एक अच्छे पति होने के साथ साथ उन्होंने एक बेटा होने का कर्तव्य बखूबी निभाया था।आज पता नहीं क्यों गाँव की मिट्टी से सने अम्मा के आँचल की खुशबू बड़े ही पास से महसूस कर रहे थे।उन्हें लग रहा था जैसे

अम्मा मुस्कुराते हुए उनको आशीर्वाद दे रहीं हैँ। उन्होंने कल्पना में अम्मा की मुस्कुराती ममतामयी छवि को याद करके अपने हाथ उनको प्रणाम करने की मुद्रा में जोड़ दिए।आज उनका मन अम्मा के ममता की छाँव को महसूस कर रहा था।

इधर बाल अरुण की हल्की उजास पूरब में दिखाई देने लगी थी।सुबह सुबह चिड़ियों का कलरव सुनाई देने लगा था। आज चिड़ियों का हुज़ूम इस घर की खुशियों में शामिल होनें कुछ तड़के उठ गया था शायद।

(समाप्त )

प्रिय पाठकों,

नमस्कार !

कैसी लगी यह रचना?

आपके सुझाव का स्वागत है और इंतजार भी।


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