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Aaradhya Ark

Romance Others


5.0  

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मैं अशुद्ध नहीं

मैं अशुद्ध नहीं

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"यह दुर्गा की प्रतिमा सबसे ऊपर स्थापित करो और आज की पूजा इस घर की नई बहू अपर्णा के हाथों सम्पन्न होगी!" त्रिभुवन जी की रोबिली आवाज़ सुनते ही पंडाल में खड़े कई लोगों की नज़र अपर्णा पर पड़ गई तो अपर्णा थोड़ा सा असहज़ हो गई थी।


आज माँ दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की जा रही थी और आज से पूरे नौ दिन तक रोज़ देवी का भोग प्रसाद स्वरुप ठाकुरों के विशाल दालान पर ही वितरित किया जानेवाला था।वैसे त्रिभुवन ठाकुर के घर कोई त्यौहार बिना हंगामे के सम्पन्न हो जाए यह कहाँ संभव था?...और आज तो दुर्गापूजा का अवसर था जिसमें पहली बार घर की छोटी बहु अपर्णा भी सम्मिलित हुई थी तो ज़ाहिर है अधिकांश लोग बहु को देखने भी चले आए थे कि सुना है ठाकुर जी की बहू अशुद्ध हो चुकी है तो क्या उसके हाथों माँ दुर्गा की पूजा होगी? आखिर संस्कारों की अलग से दुहाई जो देता था ठाकुरों का खानदान।


गाँव के सम्पन्न घरानों में गिनती होती थी ठाकुर के इस खानदान की। दौलत, शोहरत के साथ अब यह परिवार शिक्षा के क्षेत्र में भी अपने झंडे गाड़ चुका था। घर की छोटी बहु अपर्णा पढ़े लिखे घर से आई थी। पर लोगों ने दबी ढकी खबर ये भी सुनी थी कि वह अशुद्ध है।


अपर्णा ठाकुर परिवार की पहली बहु थी जो इतना पढ़ीलिखी थी और शहर में नौकरी भी करती थी। वैसे त्रिभुवन जी का छोटा बेटा राघव शुरू से ही पढ़ाई में अच्छा था और स्वभाव से थोड़ा बागी किस्म का। तभी दसवीं की पढ़ाई के बाद गाँव में अपनी ज़मींदारी संभालने की बजाए शहर जाकर पढ़ाई करने की ज़िद पर तब तक अड़ा रहा जब तक सबने उसे आगे की पढ़ाई के लिए अनुमति ना दे दी थी।


किशनगंज से लगा हुआ था हरिहरगंज। वहीं के हाइस्कूल से पढ़कर आई थी अपर्णा जो अपनी तीक्ष्ण बुद्धि और तीखे नाक नक्श की वजह से सबकी नज़र में आकर्षण का केंद्र बन जाती थी। सबसे ज़्यादा आकर्षित करती थी अपर्णा की आँखें। ऐसी काली घनेरी पुतलियों से सज़ी सुन्दर आँखें मृग छौने (हिरण का चंचल बच्चा) की याद दिला देते थे।ऐसे मनोहारी व्यक्तित्व के जादू से राघव भी अछूता नहीं रह पाया था। सिर्फ एक वाक्य और अपनी गहरी नज़र से वह जादूगरनी राघव पर ऐसा जादू कर गई थी कि राघव का मन उससे बार बार मिलने और बात करने को मचलता रहता था।


राघव और अपर्णा के मिलने का सिलसिला अब लगभग हर रोज़ होने लगा था!


उस दिन इतना ही तो पूछा था अपर्णा ने कि,"आपने कोलेज़ के पुस्तकालय से शरतचंद जी की जो किताब ली है उसे लौटने से पहले मुझे बता दीजियेगा ताकि मैं आपके बाद उसे अपने नाम से इशू करा सकूँ वरना उसे कोई और ले जायेगा!"


इतनी मधुर आवाज़ जैसे कि कहीं जलतरंग बज उठा हो। सुनकर राघव का मन किया कि अभी उसे किताब तो क्या... अपना दिल ही निकालकर दे दे।


राघव बोला,"आप इसे पढ़ लीजिये मैं तो इस किताब कोई टाइमपास के लिए लाइब्रेरी से उठा लाया था!"


इस पर अपनी बड़ी बड़ी आँखें नचाते हुए अपर्णा बोली,"आप यहाँ पढ़ाई करने आए हैं। आपको अपना पूरा समय अपनी पढ़ाई को समर्पित करनी चाहिए। वरना आपको इम्तिहान के समय पछताना पड़ सकता है!"सुनकर राघव को समझ आ गया कि अपर्णा की ज़िन्दगी में पढ़ाई का कितना महत्व है।किताबों के आदान प्रदान से शुरू हुई उनकी दोस्ती चल निकली थी। धीरे धीरे उनमें प्रेम के बीज़ भी प्रसफुटित होने लगे थे।कभी कभी राघव अपर्णा को चिढ़ाते हुए कहता,


"वो तो अच्छा हुआ कि तुम मुझे कॉलेज के अंतिम वर्ष में मिली वरना तुम्हारे आकर्षण में तो मैं फेल ही हो जाता!"सुनकर अपर्णा कुछ नहीं बोलती सिर्फ अपनी बड़ी बड़ी आँखें शर्म से झुका लेती और राघव उसके लाज से आरक्त (शर्म से लाल होना) कपोलों को निहारता रह जाता।


उन्हीं दिनों कोलेज़ के ट्रस्टी का बेटा रंजीत अपने छोटे भाई केतन जो कोलेज़ यूनियन के प्रेसिडेंट के पदके लिए उम्मीदवार के तौर पर खड़ा हुआ था, उसकी मदद करने जब तब आने लगा था। उसकी नज़र भी अपर्णा पर पड़ी थी तो अपनी मनचली हरकतों के वश में आकर अपर्णा को छेड़ते हुए एक जुमला कसा,"ओये होये, अब तो कॉलेज में बहार ही बहार है,ये मासुम कली कौन है जिसके चेहरे पर इतना निखार है!"


सुनकर अपर्णा का चेहरा गुस्से से तमतमा गया। उसने कहा,"आप मुझे ऐसे नहीं बोल सकते!"


"तो तम्हीं बता दो जानेमन तुमसे कैसे बात करते हैँ?"


यह सुनकर अपर्णा को गुस्सा आने ही वाला था कि तभी राघव आकर बीच बचाव करके उसे वहाँ से दूर ले गया और समझाते हुए बोला कि,


"रंजीत से दूर ही रहना अक्सर बताते हैँ कि ये थोड़ा सनकी है!"उसके बाद अपर्णा समझ गई कि उसे रंजीत से दूर रहने की पूरी कोशिश करनी होगी।इधर दुर्गापूजा का समय आ रहा था। माँ भवानी की पूजा ठाकुरों की वर्षों पुरानी चली आ रही परम्परा थी। राघव को इस त्यौहार में घर जाना अति आवश्यक था। अपनी माँ और दोनों भाभियों को तो वह अपर्णा के बारे में बता चुका था पर इसबार वह अपने और अपर्णा के रिश्ते की बात अपने पिता से करनेवाला था। राघव के फाइनल ईयर के सारे इम्तिहान हो चुके थे, सिर्फ रासायन शास्त्र की प्रायोगिक परीक्षा होनी बाकी थी। इधर अपर्णा के तीन पेपर बच रहे थे। अपर्णा राघव को जाने नहीं देना चाह रही थी पर ज़रूरी था तो रोकती भी कैसे?


उधर राघव अपने घर गया इधर रंजीत अपने कुछ गुंडे दोस्तों के संग अपर्णा के कोलेज़ से हॉस्टल जाने के रास्ते में उसे उठा लाया था। उस दिन कोलेज़ लइब्रेरी में देर तक नोट्स बनाती रही थी अपर्णा और समय का ध्यान ही नहीं रहा था। साढ़े पाँच बजे वह कॉलेज से निकली वहाँ से उसका पी. जी. ज़्यादा दूर नहीं था और मौसम भी अच्छा था सो पैदल ही निकल पड़ी थी।


राघव की यादों में खोई अपर्णा ने अचानक देखा एक काली वैन. उसके पास आकर रुकी और चार हाथों ने उसका हाथ पकड़कर उसे गाड़ी के अंदर खींच लिया। एक ने कसकर उसका मुँह दबाया हुआ था। यह रास्ता शाम होते ही थोड़ा सुनसान हो जाता था अपर्णा ने चीखने की कोशिश की तो किसी ने उसके सर पर तेज़ चोट की और वह दर्द से बिलबिला उठी। उसने स्पष्ट देखा गाड़ी रंजीत चला रहा था। उसका फोन किसीने रास्ते में ही फेंक दिया था। एक सुनसान जगह पर गाड़ी रोककर वह चारों निरीह अपर्णा पर जैसे टूट पड़े। रंजीत बार बार उस दिन कॉलेज में हुई घटना का ज़िक्र कर रहा था जिस वजह से उसमें बदले की भावना आई थी। अपर्णा ने खुद को बचाने में अपनी पूरी शक्ति लगा दी थी। उसने तबतक विरोध किया जब तक वह बेहोश नहीं हो गई। आखिर चार हट्टे कट्टे मुस्टंडो से कब तक लड़ती।पर बेहोश होते होते भी उसने उनमें से तीन के चेहरे देख लिए थे। ये वही तीन लड़के थे जो रंजीत के आगे पीछे घूमा करते थे।


जब अपर्णा को होश आया तो उसने खुद को कोलेज़ और हॉस्टल के बीच के रास्ते में गिरा हुआ पाया। पहले तो उसे कुछ समझ नहीं आया कि वह कहाँ है। थोड़ी देर बाद चैतन्य हुई तो उसे पता चला उसका सर्वस्व लुट चुका है। हालाँकि अभी रात ज़्यादा नहीं हुई थी पर अपर्णा की ज़िन्दगी में तो जैसे रात की कालिमा आकर ठहर सी गई थी।वापस हॉस्टल आकर भी वह पूरे घटनाक्रम को याद कर रही थी। तो उसे कुछ नहीं याद आ रहा था। सिवाय इसके कि जब वह उन चारों से बचने के लिए हाथ पाँव मार रही थी तब रंजीत ने ज़बरदस्ती उसे पानी पिलाया था। शायद उसमें बेहोशी की दवा मिली हो। इसे संजोग कहें या कुसंजोग पर उस पिछले दो दिनों से अपर्णा की रुममेट कांता भी अपने घर गई हुई थी। इसलिए कमरे में एकांत पाते ही अपर्णा दर्द और अपमान के अतिरेक से जैसे पागल हो गई। कभी मन करता पुलिस में जाकर शिकायत कर दे फिर बदनामी का सोचकर रुक जाती, कभी जी करता आत्महत्या कर ले फिर अगले ही पल अपने घरवालों और राघव का ख्याल आ जाता था।उसने अपने आपको एकदम कमरे में बंद कर लिया था। उस घटना के बाद कॉलेज भी नहीं गई।इधर पूजा समाप्त होने के बाद राघव जब घर से निकला तब वह अपर्णा से मिलने के लिए बहुत खुश था क्योंकि वह अपने घरवालों को अपने और अपर्णा के रिश्ते के लिए मना चुका था।


वापस आया तो पता चला अपर्णा तीन चार दिनों से कोलेज़ आई ही नहीं थी। उसका फोन भी बंद आ रहा था।राघव अपर्णा की इस हरकत की वजह जाननाचाहता था इसलिए वह अपर्णा के हॉस्टल गया और विजिटिंग रूम में उसे मिलने को बुलाया। अपर्णा पहले तो उसे देखकर चौंक गई पर कुछ बोली नहीं। राघव बार बार उससे उसकी चुप्पी और उदासी की वजह पूछता रहा पर अपर्णा सिर्फ बड़ी बड़ी आँखों से उसे देखती मानो कुछ कहना चाहती हो पर कुछ कहती नहीं।अपर्णा की चुप्पी से हारकर राघव ने कहा,


"मैं हमदोनों के लिए एक खुशखबरी लाया हूँ।पता है घरवाले मेरे और तुम्हारे रिश्ते के लिए मान गए हैँ। बस अब तो शहनाई बजनेवाली है और तुम दुल्हन बननेवाली हो!"


इतना सुनते ही अपर्णा रोने लगी। उसका रोना राघव को समझ नहीं आ रहा था। हिचकियों मेंरोते रोते ही उसने रंजीत और उसके गुंडे दोस्तों की सारी कारस्तानी बता दी। सुनकर राघव का खून खौल उठा। उसका मन किया अभी जाकर उस रंजीत की मार मारकर आंते तक बाहर निकाल दे पर उसने धैर्य से काम लेते पहले पुलिस में रिपोर्ट लिखाई।


उसके बाद से चारों बलात्कारियों को सज़ा दिलवाने तक हमेशा साये की तरह अपर्णा के साथ लगा रहा। शुरु में तो काफ़ी ताने सुनने मिले पर बाद में दोस्तों और कॉलेज के छात्रों ने भी काफ़ी साथ दिया। रंजीत ऐसी हरकत पहले भी कर चुका था पर किसी लड़की की हिम्मत नहीं पड़ी थी विरोध करने की। राघव ने अपर्णा को हिम्मत दिलाई और हरदम बताता रहा कि इसमें अपर्णा का कोई दोष नहीं। गलती रंजीत की है और उसे सज़ा दिलवाना ही होगा।


धीरे धीरे अपर्णा भी सामान्य होने लगी थी। इस बीच राघव तीन चार बार अपर्णा के साथ उसके गाँव भी हो आया था। अपर्णा के पिता का बचपन में देहांत हो चुका था। घर में व्योवृद्ध दादाजी आचार्य उमाशंकर जी थे जिनकी गाँव में बहुत प्रतिष्ठा थी। माँ गायत्री देवी एक बेहद सीधी सादी ईश्वर पर अटूट विश्वास रखनेवाली स्त्री थीं,


उनका विश्वास था कि अब भी पृथ्वी पर देवपुरुष होते हैँ, नहीं तो उनकी पुत्री को राघव जैसा सहचर कैसे मिलता जो सबकुछ जानकर भी सच्चाई का गरल (विष) पीकर भी उसे अपनाने को तैयार था। इसके अलावा अपर्णा का नटखट छोटा भाई अंगद था जो नवीँ में पढ़ता था। अपर्णा के दादाजी जब पहली बार राघव से मिले और पहली ही मुलाक़ात में राघव ने उनके पैर छूकर आशीर्वाद लिए तो उन्होंने तुरंत कह दिया,


"बेटा!आज तुझे देखकर अपने दिवंगत बेटे दयाशंकर की याद आ गई। ऐसा ही दिव्य रूप और ऐसे ही विनम्र संस्कार!"


एक पल को अपर्णा भी दद्दा की याद में खो गई। अपनी बारह साल तक की उम्र तक जितनी भी यादें पिता के साथ की थीं सब उसके जेहन में कौँध गई थी। अपने पिता को वह दद्दा कहा करती थी और दद्दा उसे प्यार से गुड़िया बुलाते थे।गाँव के लोगों ने जब दादाजी से यह सुना कि त्रिभुवन ठाकुर के बेटे राघव ठाकुर से उनके गाँव की बेटी का ब्याह तय हुआ है तो सब राघव को पाहुना कहकर बुलाने लगे थे।परस्पर अगाध प्रेम में डूबकर भी राघव और अपर्णा का मर्यादित प्रेम उनकी सबसे बड़ी ताकत थी जिसके बल पर वह समाज के तानों को भी बर्दाश्त कर पा रहे थे। और एक दूसरे का साथ दे पा रहे थे। यह महज़ आकर्षण नहीं बल्कि अनहद प्रेम था तभी दोनों बिना विचलित हुए अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर थे।

बलात्कारियों के शिनाख्त और सज़ा दिलवाने के बाद जो सबसे मुश्किल काम था...


वह था मौजुदा परिस्थिति को जानते हुए घरवालों को अपर्णा के साथ शादी के लिए दुबारा राज़ी करना।राघव जानता था अभी इस हालात में कोई ससम्मान अपर्णा को नहीं अपनाएगा। अतः दोनों ने अपना करियर बनाने में कुछ साल और लगा दिये उसके लिए। पहले दोनों अपने पैरों पर खड़े हुए। अपर्णा ने बी. एड. किया और उसको एक सरकारी स्कूल में नौकरी मिल गई और राघव को मेडिकल फार्मा का डिप्लोमा कोर्स करने के बाद मेडिकल रिप्रेजेन्टेटिव का पद मिल गया।


फिर उचित समय देखकर राघव ने पूरा सच बताते हुए एक बार फिर अपने पिता त्रिभुवन ठाकुर से अपनी और अपर्णा की शादी की इज़ाज़त माँगी। काफ़ी विरोध हुआ पर राघव का निश्चय अडिग था कि शादी करेगा तो सिर्फ अपर्णा से।जब शादी की मंज़ूरी दुबारा मिल गई तो राघव को ख़ुशी के साथ अपने परिवार वालों की उत्कृष्ट सोच पर गर्व हुआ जिन्होंने अपने मन में ज़रा सा भी मैल ना रखते हुए अपर्णा को पूरे सम्मान के साथ अपनाया।सच है... अगर हम किसीको प्रेम करते हैँ तो उसका सम्मान करना आवश्यक है।त्रिभुवन ठाकुर सिर्फ अपने छोटे बेटे से प्रेम ही नहीं करते थे अपितु उसकी इच्छाओं का सम्मान भी करते थे। तभी आज पहली बार इस घर की छोटी बहु अपर्णा भी पूरे सम्मान के साथ माँ भवानी की पूजा में सम्मिलित हुई थी।


पूजा की शुरुआत में जब पंडितजी माँ दुर्गा में प्राण प्रतिष्ठा स्थापित करने के मंत्र का जाप कर रहे थे, तब घर की छोटी बहु के हाथों से ही प्रतिमा को अनावरण करने की रस्म की गई। इस सम्मान से आहलादित होकर अपनी आँख मुंदकर अपर्णा जैसे राघव का धन्यवाद कर रही थी, वह सोच रही थी कि राघव ने उसमें उस हादसे के बाद दुबारा अपनाकर उसमें प्राण भर दिए और आज वह एक प्रतिष्ठित जीवन जी रही है। अपने अंदर की शक्तिपुंज को वह इतनी अच्छी तरह नहीं समझ पाती अगर उसने स्त्री के अस्तित्व की पूर्णता को ना समझा होता।

दुर्गा देवी का ध्यान कर उन्हें मन ही मन धन्यवाद करके अपर्णा ने अपनी आँखें खोली ही थी कि उसके ओज से दिप्त चेहरे और प्रभावशाली आँखों को देखकर बड़ी जेठानी की बेटी शरण्या बोल पड़ी,


"माँ देखो, छोटी चाची की आँखें बिल्कुल माँ दुर्गा की तरह लग रही हैँ!"


वहाँ पंडाल में उपस्थित सभी लोगों की नज़रें अनायास ही अपर्णा की ओर उठ गई और कुछ के मुँह से निकला,


"वाह... छोटी बहु तो साक्षात दूर्गा का का रूप हैँ!"


सुनकर एक सलज़्ज़ मुस्कान आ गई अपर्णा के चेहरे पर तभी उसकी नज़र राघव से टकराई,वह बड़े ही प्रेम से अपनी नवोढ़ा पत्नी को निहार रहा था जिसे देखकर अपर्णा ने अपनी आँखें झुका दी और उसने एक बार फिर माँ भवानी का दिल से धन्यवाद दिया।


"हे माँ भवानी! हर स्त्री में अपनी शक्ति भर देता कि उसके साथ कोई बलप्रयोग करके उसके सतीत्व का हरण ना कर सके"आँखें बंद करते हुए अपर्णा यही प्रार्थना कर रही थी।



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