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Ashu Verma Chaubey

Inspirational Others

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Ashu Verma Chaubey

Inspirational Others

माँजी के जीवन से बढ़कर ज़माने के ताने तो नहीं

माँजी के जीवन से बढ़कर ज़माने के ताने तो नहीं

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उस रात..............

"माँजी के जीवन और बच्चों की खुशियों से भी बढ़कर है क्या ज़माने के ताने आपके लिए। देखिये मैंने आज तक आपसे कुछ नहीं कहा। जैसे आपने तय किया वैसे ही मैं चली। मन हो या ना हो आपकी हर बात में हामी भरी। आपने कहा हमारे यहाँ औरतें नौकरी नहीं करतीं तो मैंने हँसते खेलते गृहस्थी संभाल ली। हमारे बच्चे हुए तो अपनी खुशियाँ भुला उन्हीं में व्यस्त हो गयी। आखिर आपकी अर्धांगिनी हूँ। आपकी नज़रें किसी के आगे झुके ये मैं कभी बर्दाश्त नहीं कर सकती। इसीलिए सुख हो या दुख सदैव आपके कहे अनुसार आपके साथ चली।"

"मगर आज परिस्थिति पर हमारा बस नहीं। माँजी बीमार हैं, बाउजी लाचार हैं। गाँव में उनका इलाज करा पाना संभव नहीं था सो हम ख़ुशी ख़ुशी उन्हें यहाँ ले आए। आज दो बरस हो गए। आपकी कमाई, बाउजी की पेंशन सब की सब बच्चों की फीस, घर खर्च और माँजी के इलाज में जा रही है ये तो मैं जानती थी मगर हमारी बचत भी सब लगभग खर्च हो चुकी है इस बात से आपने मुझे अंजान रखा। अगर आज बाउजी को मैं फ़ोन पर गाँव की ज़मीन बेचने की बात करते हुए ना सुनती तो मुझे कभी पता ही नहीं चलता की नौबत यहाँ तक पहुंचे चुकी है।"

"जब बच्चों की ज़रूरत के सामान के लिए आप पैसे देने से मना किया करते तो मुझे लगा कि परिवार की हालत को देखते हुए एक एक पैसे की बचत करना ज़रूरी है शायद इसीलिए आप मना करते हो। मगर आज सच पता चला की जब कुएँ में पानी था ही नहीं तो निकलता कहाँ से। पिछले महीने जब बच्चों को स्कूल की तरफ से पिकनिक जाना था लेकिन वो पैसे के अभाव के कारण ना जा पाए तो उनकी आँखों में तो पीड़ा थी अपना बचपन ना जी पाने की, अपने दोस्तों के साथ यूँ स्कूल ट्रिप्स पर ना जा पाने की उसे देखते हुए मेरे मन में जो पीड़ा उठी थी वो मैं ही जानती हूँ पर फिर भी आपसे कुछ नहीं कहा। लगा क्यूँ आपके जख्म कुरेदूँ। वैसे ही आप परेशान हो और फिर इन सब खर्चो के पीछे सेविंग्स भी निकल गयी तो क्या फायदा। मगर सेविंग्स है ही नहीं ये तो मुझे आज पता चला।"

मृत्युंजय खिड़की से बाहर बस शून्य में निहारता हुआ मानो अपनी चुप्पी से ही अनुराधा का पक्ष स्वीकारता हुआ खड़ा था। कहता भी क्या।

आखिर जो कुछ भी वो कह रही थी वो ग़लत भी तो नहीं था। यही अगर वो भी उसका कुछ हाथ बटाँ पाती ती शायद परिस्थियाँ आज थोड़ी बेहतर होतीं ये आज वो भी समझ रहा था मगर घर परिवार, रिश्तेदार, समाज इन सबकी बेड़ियों में जकड़ा हुआ मृत्युंजय ख़ुद को असहाय पा रहा था।

हर वक़्त तो उसे बस यही सिखाया गया था की अगर घर की इज़्ज़त घर से बाहर कदम रखेगी तो समाज क्या कहेगा। लोग क्या कहेंगे। सब तो यही ताना मारेंगे ना की बीवी की कमाई पर जीता है। अपने घर के खर्चे पूरा करने में भी असमर्थ है। चार लोगों को एक सुखी जीवन भी नहीं दे सकता वगैरह वगैरह.............

इस मानसिकता से निकलना इतना भी आसान नहीं था जितना की लगता है।

ये कहानी है मृत्युंजय और अनुराधा की जो शुरू होती है

दस बरस पहले...............

मृत्युंजय और अनुराधा की शादी को लगभग दस बरस हो चुके थे। शादी के बाद कुछ समय तो वो गाँव में रहे फिर मृत्युंजय को मुंबई में नौकरी मिल गयी और वहाँ एक छोटा सा आशियाना तलाशने के बाद वो अपने परिवार को भी अपने साथ लेता आया। उसकी एक बेटी राधिका और एक छोटा बेटा चेतन था।

तब माँजी बाउजी ने उनके साथ आने से इनकार कर दिया था क्यूँकि वो लोग गाँव के माहौल मे रचे बसे थे फिर वहाँ उनकी ज़मीन भी थी और इस उम्र में एक नई जगह जाकर नए सिरे से शुरुआत करना कम से कम उन्हें तो मुश्किल लगता था। फिर उनका दूसरा बेटा नज़दीक ही कानपुर में अफसर था सो उन्होंने ये भी तर्क दिया की वो तो आता जाता रहेगा ही सो उन्हें फ़िक्र करने की ज़रूरत नहीं।

मुंबई शहर में अपने उस छोटे से घर मे एक सुखद जिंदगी गुज़ार रहे थे वो लोग। बड़ा शहर और वहाँ की महंगाई और कमाने वाला मृत्युंजय अकेला।

घर का किराया, बच्चों की फीस, फल सब्जी, राशन पानी आदि..... कुल मिलाकर बड़े शहर में रहने के कारण उसके खर्च बहुत ज्यादा थे। तब भी एक बार अनुराधा ने उसके सामने ये मुद्दा उठाया था मगर उसने सीधे सीधे ही ना कह दिया था।

"ये क्या कह रही हो। घर वाले क्या कहेंगे कि मुंबई जाते ही इन लोगों ने अपनी मनमर्ज़ी करना शुरू कर दिया। सब तो मुझ पे ही ताने कसेंगे ना की लेकर गया था बड़ी शान से। दो दिन भी रख नहीं पाया और लगा दिया काम पे। बड़ी जल्दी पड़ी थी बीवी की कमाई खाने की इसको। नहीं नहीं तुम तो बस घर अच्छे से संभालो। ये सब मैं देख लूँगा।"

धीरे धीरे खर्चो को पूरा करने के लिए उसने ओवरटाइम शुरू कर दिया फिर रात को भी कुछ देर वो टैक्सी चलाता। इधर अनुराधा भी एक एक पैसा बचाती, सारे काम ख़ुद ही निपटाती, हर तरह से किफायत करती। और हर महीने वो दोनों मिलजुलकर कुछ ना कुछ बचत भी कर लेते, जिसे वो अपने बच्चों के नाम जमा करवा दिया करते। कभी जो मृत्युंजय अनुराधा से कहता भी की इस महीने अपने लिए कुछ ले लो तो वह कहती की ले लूंगी बाद में, कहाँ भागी जा रही हूँ। अभी बच्चों के लिए जमा करते हैं। उन्हें हमसे ज्यादा ज़रूरत है।


दो बरस पहले..............

सब कुछ ठीक चल रहा था की अचानक एक दिन गाँव से ख़बर आई की मृत्युंजय की माँ बहुत बीमार थीं और सरकारी अस्पताल के डॉक्टर ने उन्हें शहर में बड़े अस्पताल में जाँच करवाने का सुझाव दिया। वो लोग फ़ौरन गाँव के लिए निकले। बड़े भैया भाभी भी पहले से वहाँ मौजूद थे।

बड़े भैया ने फ़ौरन सुझाव दे दिया कि मुंबई से बेहतर कोई शहर नहीं इलाज करवाने के लिए। मृत्युंजय और अनुराधा ने भी हामी भर दी और ख़ुशी ख़ुशी माँजी बाउजी को मुंबई लाने की तैयारी में जुट गए।

बड़े भैया ने भी उन्हें बिदा करते वक़्त हक़ से कहा की में माँ बाउजी के साथ तो नहीं आ सकता मगर रूपये पैसे की कोई भी ज़रूरत पड़े तो बेझिझक कहना।

मगर रुपया पैसा तो क्या इन दो बरसों में ना तो कभी मिलने ही आए ना कभी ठीक से मृत्युंजय से उनका हालचाल लिया।

खैर मृत्युंजय और अनुराधा को इस सबसे कुछ ख़ास फर्क नहीं पड़ता था क्यूँकि दोनों की नज़रों में तो केवल माँजी का जीवन और अपना सुखी परिवार ज़रूरी था।

मगर आज बात इन्हीं दोनों मुद्दों पर आकर खड़ी हो गयी थी। एक तरफ पैसों की तंगी की वजह से बच्चे छोटी छोटी ख्वाहिशों को तरस रहे थे दूसरे माँ के इलाज में मुश्किल आने लगी थी। आखिर दवाइयों का खर्च भी तो कितना था।

बच्चों तक तो फिर भी ठीक था मगर जब पिछली रात माँजी की दवाई ला पाने मे मृत्युंजय ने अपनी असमर्थता ज़ाहिर की तो अनुराधा ने बैंक से बच्चों के बचत खाते की रकम लाने को मृत्युंजय को पासबुक दे दी। मृत्युंजय बिन कुछ कहे पासबुक लेकर वहाँ से चला गया और सुबह सुबह ही बाउजी से कुछ बात करके काम पर चला गया।

अनुराधा को लगा शायद दवाई पानी की ही बात होगी मगर जब उसने बाउजी से गाँव की ज़मीन बेचने के बारे में किसी से फ़ोन पे बात करते सुना तो उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गयी।

तब उसने जाना की क्यूँ मृत्युंजय कुछ दिनों से इतना परेशान था। सारा दिन ख़ुद को ठगा सा महसूस करती रही वो और रात को उसके आते ही उसने अपनी बात मृत्युंजय के सामने रखी।


उस रात............

"देखिये मैंने इन दो बरसों में जी तोड़ मेहनत कर माँजी की सेवा की है। आपने भी पूरी कोशिश की हमारी हर ज़रूरत पूरा करने की। मगर फिर भी हमारे बीच इतनी दूरी है की आप मुझसे अपनी मनोस्थिति ना कह सकें ये जानकर मुझे बेहद अफ़सोस हुआ।

आजतक हमने किसीके सामने हाथ नहीं फैलाए पर आज बाउजी जिस तरह फ़ोन पर नाम आँखों से अनुरोध कर रहे थे उनकी ज़मीन जल्द से जल्द बिकवाने का जिससे की माँ के इलाज में रुकावट ना आए इस बात ने मेरा दिल तोड़ कर रख दिया।"

"भैया भाभी, वहाँ कानपुर में आराम से जी रहे। इतना बड़ा ओहदा, बंगला, नौकर चाकर ऐशो आराम सब है फिर माँजी, बाउजी की सेवा करने का सारा जिम्मा हमारे माथे मढ़ बड़ी चतुराई से किनारे हो लिए। कभी पलटकर आपको फ़ोन तक नहीं किया। क्या वो उनके माँ बाप नहीं।"

"ये क्या कह रही ही अनुराधा, क्या अब तुम भी माँ बाउजी से चंद पैसों की खातिर मुख मोड लेना चाहती हो", मृत्युंजय फ़ौरन बोला।

"मैंने ऐसा बिल्कुल नहीं कहा। मैं तो वैसे भी उन्हें कहीं जाने नहीं देने वाली। मैं तो बस केवल इतना कह रही हूँ की ज़मीन क्यूँ बेचनी। आप ही फ़ोन कर उन्हें उनका फर्ज़ याद दिलाइये। उनके लिए तो इतना खर्चा मामूली बात है।"

"मैं उनके आगे हाथ बिल्कुल नहीं फैलाऊँगा, चाहे जो हो जाए", मृत्युंजय बोला।

"उनसे आप मांगेंगे नहीं, मुझे काम करने देंगे नहीं तो पैसे क्या पेड़ से तोड़कर लाएंगे", अनुराधा गुस्से मे पूछ बैठी।

अब तक बाहर खड़े अनुराधा के ससुरजी जो की सब सुन रहे थे अंदर आए।

"बहू तुम सही कह रही हो। पैसे पेड़ पे तो नहीं उगते जो हम तोड़ लाएंगे। और ये भी एक सच्चाई है की मेरी पेंशन और मृत्युंजय की कमाई मिलाकर भी अभी ठीक से घर नहीं चल पा रहा। मगर ये तो निश्चित है की चाहे मर जाऊँ, बड़े से भीख नहीं मांगूंगा। जिसे करना है अपनी इच्छा से करे। ज़ोर ज़बरदस्ती किसी पर नहीं है हमारा ज़िम्मा उठाने की। इसीलिए तो मैं अब गाँव की ज़मीन साथ ही मकान भी बेच देना चाहता हूँ", वो अनुराधा से बोले।

उन्हें देख सर ढकती हुई अनुराधा बोली, "बाउजी यही तो मैं कबसे कह रही हूँ इनसे की किसी का एहसान नहीं लेना ना लें पर अगर मेरा नौकरी करना शोभा नहीं देता तो क्या आपके रहते हुए ही आपकी ज़मीन जायदाद बेचना शोभा देता है। मेरे नौकरी करने से दुनिया इनपर ताने कसेगी तो क्या आपका घर बिकने के बाद वहीं दुनिया इनकी तारीफ के कसीदे पढ़ेगी।"

"सही कह रही हो तुम बहू। दुनिया को देखते रहेंगे तो दुनिया तो हमारा तमाशा बना हँसती ही रहेगी। मदद करने मे सब पीछे और ताने कसने में सब आगे। हमारी ही भूल होती है जो हम दुनियादारी निभाने को अपनो के सपने ही दबा देते हैं। ये कोई दुनियादारी नहीं हमारी संकुचित मानसिकता है और आज इससे बाहर आते हुए मैं तुम्हें इज़ाज़त देता हूँ नौकरी करने की वो भी अपनी पसंद की", बाउजी ने कहा।

"बेटा मृत्युंजय शायद अब तक तुम भी मेरी तरह दुनिया के सब रंग देख चुके हो और समझ चुके हो। तो अगर स्वाभिमान से जीना चाहते हो तो बहू की आज आज़ाद कर दो अपने फैसले लेने को। आज मैं ही तुम्हें ये पाठ पढ़ाता हूँ की दुनिया तो हमें किसी भी हाल में ताने ही मारेगी। हमें ही अपने कान बंद करके अपनी ख़ुशी तलाशनी होगी वरना तो ये जीवन बड़ा कठिन है", उन्होंने मृत्युंजय से कहा।

अब माँ की दवाई का समय हो चला है कहते हुए वो निकल गए।

उनके जाने के बाद, अनुराधा मृत्युंजय से ये कहकर की आपका जो भी फैसला हो सुबह बता दीजियेगा अपने काम में लग गयी।

वो रात बड़ी लम्बी थी। मगर कहते हैं ना हर रात की सुबह होती है सो वो सुबह मृत्युंजय और अनुराधा के जीवन में एक नया सवेरा लाई। मृत्युंजय सुबह सुबह अनुराधा के लिए अख़बार लाया और उसे देते हुए बोला इसमें कई नौकरियों के इश्तहार हैं। तुम देख लेना फिर आवेदन भर देंगे।

अनुराधा बहुत ख़ुश थी मृत्युंजय का ये फैसले सुनकर। मगर उसने तो कुछ और ही सोच रखा था।

"आप ये लाए इसका धन्यवाद मगर मेरे मन में कुछ और विचार है। नौकरी ढूंढ़ने में तो कई दिन लग जाएंगे। फिर सारा दिन घर से बाहर रहूंगी तो माँजी और बच्चों का ख्याल कैसे रखूंगी", उसने कहा।

"तो क्या तुमने इरादा बदल दिया", मृत्युंजय ने पूछा।

"नहीं ऐसा मैंने कब कहा। देखिये काम कोई भी छोटा या बड़ा नहीं होता इसीलिए मैंने ये सोचा है की मैं वो काम करूंगी जो एक तो मुझे आसानी से मिल जाए। जगह जगह धक्के ना खाने पड़ें। दूसरे घर से ही हो जाए जिससे की मैं माँजी और परिवार का भी ध्यान रख सकूँ", अनुराधा ने कहा।

"मैं कुछ समझा नहीं", मृत्युंजय ने पूछा तब अनुराधा बोली की मैं सुबह यहाँ बगल की सोसाइटी में खाना पकाने का काम कर लूंगी। वैसे भी खाने का काम यहाँ सबको सुबह सुबह चाहिए होता है। फिर घर आकर दोपहर बाद छोटे बच्चों को ट्यूशन करवाऊँगी। वैसे भी राधिका और चेतन के मार्क्स देखकर मुझसे आसपड़ोस के लोग कबसे ट्यूशन क्लास शुरू करने को कह रहे हैं", अनुराधा ने बताया।

"अनुराधा ट्यूशन तक तो ठीक है, मगर किसी के घर खाना पकाना.........."काम कोई भी छोटा या बड़ा नहीं होता। आप भी तो रात को टैक्सी चलाते हैं", अनुराधा ने उसकी बात काटते हुए कहा।

"ठीक है, जैसा तुम ठीक समझो", कहकर मृत्युंजय काम पर निकल गया।

अनुराधा ने काम निपटकर अपनी सहेलियों को अपनी मंशा बताते हुए काम ढूंढ़ने कहा।

खाना बनाने का काम तो उसे फौरन दो घरों में मिल गया और कुछ ही दिनों में ट्यूशन के लिए आसपास के छोटे बच्चे भी उसके घर आने लगे।

"अरे बहू ये बच्चों को तो मैं भी पढ़ा सकता हूँ। सारा दिन खाली ही तो रहता हूँ। तुम अपनी सहेलियों से कह देना की हिंदी और संस्कृत के लिए यदि किसी को ज़रूरत हो तो मैं देख लूँगा", बाउजी ने अनुराधा से कहा।

और कुछ ही दिन में वो भी बच्चों को पढ़ाने लगे।

अब घर फिर से पटरी पर आने लगा।

घर खर्च आराम से निकल जाया करता और बच्चों की ज़रूरत का सामान भी आ जाया करता।

क़रीब छ महीने बाद एक दिन अचानक बड़े भैया भाभी और बच्चों समेत उनसे मिलने पहुँचे।

"अरे आइये भैया, इतनी समय बाद आप लोगों से मिलना हुआ", अनुराधा ने उनका स्वागत करते हुए कहा।

"मृत्युंजय कैसे हो भाई। बहुत याद करता हूँ तुम्हें बस समय ही नहीं मिल पाता तुमसे बात करने का। हाँ मगर बाउजी से तुम्हारा हालचाल लेता रहता हूँ। मगर नाराज़ हूँ तुमसे। कहा था ना ज़रूरत पड़े तो मदद मांग लेना। मगर तुमने तो अनुराधा को ही काम पे लगा दिया। ये शोभा देता है क्या तुमको। गाँव में सब तरह तरह की बातें कर रहें हैं तुम्हारे बारे में", वो मृत्युंजय से बोले।

जवाब में बाउजी बोले, "अरे छोड़ो बरखुरदार, जहाँ जाना नहीं वहाँ का सोचना क्या। गाँव तो ऐसे भी अब हमारे लिए पराया हो चुका। अब तो जीना मरना यही हैं तो वहाँ कौन क्या कहता है इससे हमें क्या लेना देना। तुम्हें तो मतलब अपनी माँ के इलाज से होना चाहिए था और तुम क्या बात निकालकर बैठ गए।"

"अब तुम तो गायब हो गए थे, कभी दो मिनट फ़ोन किया और छुट्टी। ऐसे में घर तो हमें ही मिलकर चलाना था ना सो मैंने ही बहू को इज़ाज़त दे दी नौकरी करने की और देखो नतीजा। तुम्हारी माँ पहले से कितनी बेहतर हैं।"

"हाँ गाँव की बात से याद आया। तुम्हारे हिस्से की ज़मीन के कागज़ात बनवा दिए हैं मैंने। मैंने अपना हिस्सा तो बेच दिया है, तुम्हें जो करना हो तुम देख लेना। साथ ही वो घर तो मैंने बनवाया था सो उसमें किसी का कोई हिस्सा नहीं, सो वो तो मैंने पहले ही बेच दिया।"

"अच्छा बाउजी, मुझे तो इस बारे में कुछ पता ही नहीं", अटकती आवाज़ में उन्होंने जवाब दिया।

साथ ही मृत्युंजय और अनुराधा भी ये बात सुन अचंभित रह गए।

"अरे पता नहीं चला तो पिछले हफ्ते काम के सिलसिले में गाँव जाने के बाद तू अचानक यहाँ कैसे आ गया", बाउजी ने भी व्यंग्य कस दिया।

खैर हिस्से की बात सुनकर वो लोग बड़े ख़ुश नज़र आ रहे थे। मगर अनुराधा और मृत्युंजय जो इस बारे में कुछ भी नहीं जानते थे थोड़े दुखी थे।

रात को दोनों बाउजी के कमरे में जाकर बोले, " बाउजी सब तो ठीक हो रहा था फिर क्या ज़रूरत आन पड़ी सब बेचने की। हमें बताया भी नहीं आपने। अनुराधा तो बोल पड़ी, बाउजी अब ये लोग तो बँटवारे का दोषी हमें ही मानेगे ना। "

"अरे बहू तुम कबसे ज़माने के तानो की फ़िक्र करने लगी। तुम्हें तो मैं बहुत बहादुर और समझदार समझता हूँ", बाउजी ने जवाब दिया।

कुछ दिन ठहर जब वो लोग वापस जाने लगे तो बाउजी ने कागज़ात लाकर उन्हें दिए। ठीक से देख लो और पढ़ लो। फिर कहीं कोई बात समझने के लिए इतनी दूर दोबारा ना आना पड़ जाए तुम लोगों को।

जब उन्होंने कागज़ात देखे तो होश उड़ गए।

"ये क्या बाउजी ये ती सिर्फ छठे भाग की ज़मीन है", वो बोला।

"हाँ तो यही है तुम्हारा हिस्सा। देखो बेटा उस ज़मीन का आधा हिस्सा ही तुम्हारे दादा का था, बाकी का आधा मैंने ख़ुद खरीदा था। तो वो आधा तो मेरा हुआ। अब जो तुम्हारे दादा का हिस्सा था उसके तीन भाग पड़े एक मेरा, एक मृत्युंजय का और एक तुम्हारा। तो ये वही भाग है। रही मेरे और मृत्युंजय के हिस्से की तो वो मैंने ठेके पे दे दिया है जिससे हमें हर वर्ष एक तय रकम मिल जाएंगी और रहा मेरा हिस्सा तो तुमसे बताया ना मेरा हिस्सा और मेरा घर मैंने पहले ही बेच दिया है और पैसे का जो करना था कर लिया।"

"हाँ याद आया, दो दिन और रूककर जाओ। हमारे छोटे से मकान का गृहप्रवेश है। अब इतनी दूर आए हो तो पूजा में सम्मिलित होकर ही जाना। अब जब हमें सारी उम्र यहीं रहना है तो किराए के मकान में कब तक रहेंगे सो मैंने पास ही में अपना फ्लैट ले लिया।"

मुँह बनाकर जैसे तैसे वो लोग दो दिन वहाँ रुके। गृहप्रवेश भी आधे मन से अटेंड किया।

"बाउजी तो वो रकम जो आएगी खेती की उसे किस्से लेना है आप बता दें तो मैं देख लूँगा।" निकलते वक़्त वो बोला।

"उसकी चिंता तुम ना करो। वो रकम सीधे राधिका और चेतन कर अकाउंट में जाएगी। अब हमपर खर्च करते करते बच्चों के लिए कुछ बचता ही नहीं सो उनका खर्च भी तो निकलना पड़ेगा ना", बाउजी ने दो टूक जवाब दिया।

"वाह देवरानी जी क्या फिरकी घुमाई आपने तो। मान गए", अनुराधा की भाभी व्यंग्य कस्ते हुए बोली।

"ऐसा कुछ नहीं भाभी................, "हाँ ये है ही बहुत चालाक", बाउजी अनुराधा की बात काटते हुए बोले।

बँटवारे का ठीकरा तो अनुराधा और मृत्युंजय के सर फूटा मगर बाउजी संतुष्ट थे और उन्हें समझा रहे थे की "उनके तानो को छोड़ो और अपने घर चलने की तैयारी करो।"

"मगर बाउजी क्यूँ", उन्होंने पूछा।

"नहीं करता तो सब कुछ हाथ से चला जाता। एक अफसर नज़र गड़ाये बैठा था मेरी ज़मीन पर," बाउजी बोले।

"फिर भी सब बेच भी दिया था तो अपने पास रखते क्यूँ सब खर्च दिया", दोनों ने एक स्वर में पूछा।

"अब हिस्सा तो करना था। जीते जी कर दिया। जो जितने का अधिकारी था उसे वो दे दिया। फिर परिवार को जिस चीज़ की ज़रूरत हो उसको खरीदने की खर्च नहीं कहते। चलो अब ट्यूशन के बच्चे आते होंगे। जल्दी से चाय पीकर फ्री हो जाया जाए", कहते हुए बाउजी राधिका और चेतन के साथ मस्ती करने लगे।


दोस्तों,

कई परिवारों में ऐसा देखा गया है की बड़ों की सेवा की बारी आती है तो सब हाथ छुड़ाकर भागते हैं और हिस्सा लेने की बारी आती है तो सबसे पहले आकर लाइन लगाते हैं।

कई परिवारों आज भी यही धारणा है कि बहू की कमाई थोड़ी ना खाई जाती है। आखिर बहू कमाएगी तो ज़माना क्या कहेगा। कैसी भी परिस्थिति हो चाहे ज़ेवर क्यूँ ना बिक जाए पर बहू काम करेगी ---- ना बाबा ना।

ऐसे में बाउजी के ये फैसले आपको कैसे लगे बताइयेगा ज़रूर।

इंतजार में



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