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Ashu Verma Chaubey

Inspirational

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Ashu Verma Chaubey

Inspirational

आप भी कहाँ दादी को जवाब दिया करतीं थीं

आप भी कहाँ दादी को जवाब दिया करतीं थीं

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"ये क्या बाबा ने अब तक दूध नहीं पिया और ये बादाम भी यहीं रखे हैं। तुम कर क्या रही हो। बच्चे को दूध तक नहीं पिला पाती। ये तो आज छुट्टी है तो मैं देख रही हूँ की क्या चल रहा है। नजाने मेरे पीछे से बाबा का तुम क्या ध्यान रखती होगी", मैत्री ने अपने बच्चे की नेेनी नेत्रा से झुंझलाते हुए कहा।

"मैडम मैं कबसे बाबा को समझा रही हूँ मगर मेरी बात मान ही नहीं रहा। बस ज़िद पकड़े बैठा है की नहीं पीना तो नहीं पीना। जो करना है करलो। ज्यादा फाॅर्स किया तो माँ से शिकायत कर दूंगा", नेत्रा ने धीमा सा जवाब दिया।

"बस बस ठीक है। अब उसकी शिकायतों का पिटारा ना खोलो। लाओ दूध मुझे दो। मैं पिलाती हूँ इसे", मैत्री ने दूध के ग्लास की तरफ इशारा करते हुए कहा।

"जी मैडम", कहते हुए नेत्रा ने मैत्री को दूध का ग्लास पकड़ाया।

"निशांत चलो इधर आओ"।

निशांत उन सबको इग्नोर करता हुआ खेल मे अपने खिलौनों के साथ ही मस्त था।

"निशांत सुनाई दे रहा की नहीं। जल्दी इधर आओ। दिनबदिन बिगड़ते जा रहे हो। बड़ों की इज़्ज़त तक करना भूलते जा रहे हो। एक सेकंड मे ये दूध फिनिश करो नहीं तो..................."।

सुनते ही निशांत ने फ़ौरन पलटकर कहा, "नहीं है मूड आज दूध पीने का मुझे ऑरेंज ड्रिंक पीना है अभी। प्लीज डोंट फाॅर्स मी तू डू ऑल दैट यू विश।"

"व्हॉट, हाउ डैर यू टॉक टू मी लाइक दैट", कहते हुए उसने ज़ोर से उसका बाज़ू पकड़ते हुए उसे खिलौनों से दूर खींचते हुए ज़ोर का झटका दिया।

"अब एक सेकंड मेंं ये दूध फिनिश करो वरना........", कहते हुए उसने दूध का ग्लास आगे बढ़ाया।

जैसे तैसे उसने वो दूध ख़त्म किया और बादाम खाए।

"और सुनो, यू बैटर बिहेव योरसेल्फ। ये कौनसा तरीका है बड़ों से बात करने का। किस्से सीख रहे हो तुम ये सब। मेरे पीछे से सारा दिन यही सब करते हो क्या। और ज़रा अपना होमवर्क दिखाओ तो", मैत्री ने निशांत से पूछा।

"व्हॉट इस दिस निशांत, ये तुम्हारे पिछले हफ्ते की परफॉरमेंस इतनी ख़राब", मैत्री ने नेत्रा की ओर घूरते हुए कहा।

वो पूछ तो निशांत से रही थी मगर इशारा नेत्रा की ओर था।

"मैडम, मैं सारा दिन बोल बोल कर थक जाती हूँ मगर बाबा सुनते ही नहीं। जो मन मे आए वही करते हैं", नेत्रा ने अपनी असमर्थता ज़ाहिर करते हुए कहा।

"बस करो रहने दो ये बहाने। सब जानती हूँ", मैत्री ने करारा जवाब दिया।

पीछे से निशांत ने उसे मुँह बनाते हुए चिढ़ाया। नेत्रा बस होंठ सिल चुप रह गयी। मगर मैत्री की सास यशोधरा जी जो कमरे में आ रहीं थीं उन्होंने देख लिया और मैत्री से कहा, "बहू तुम बेवजह ही बेचारी की डांट रही हो। ये एकदम सही कह रही है। जबसे यहाँ आई हूँ देख रही हूँ की निशांत नेत्रा की कोई बात नहीं सुनता। उलटे उसे बात बात पर तुमसे डांट पड़वाने की धमकी देता है। अभी भी देखो कैसे इसे मुँह चिढ़ा रहा है।"

मैत्री उन्हें इग्नोर कर निशांत की किताबें देखती रही।

"अब जाओ मेरे लिए कोल्ड्रिंक और कुछ वैफर्स ले आओ ज़रा", मैत्री ने नेत्रा से कहा।

"बहू मैंने ठंडाई बनाई है। वो भिजवाऊं क्या। थोड़ा फ्रेश फील करोगी", यशोधरा जी ने बड़े प्यार से पूछा।

"प्लीज् मुझे नहीं पीनी कोई ठंडाई। मुझे जो चाहिए मैं ले लूंगी। अभी आप मुझे डिस्टर्ब ना करें", कहते हुए मैत्री पलटकर निशांत की किताबों में व्यस्त हो गयी।

मैत्री एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी मे फाइनेंस हैड थी। और बहुत पढ़ी लिखी। रोहन से उसका प्रेम विवाह हुआ था और बड़े प्यार से उसने उस परिवार मे अपनी जगह बनाई थी। मगर करियर की भागदौड़ फिर निशांत का जन्म उसपर बड़े शहर के खर्चे और व्यस्त जीवन शैली। साथ ही रोहन का तबादला दूसरे शहर हो गया लेकिन अपनी नौकरी और निशांत की पढ़ाई के चलते उसने वहीं अकेले रहने का फैसला लिया। इन सबमे वो न जाने कब झुंझलाहट और चिड़चिड़ेपन का शिकार हो गयी वो ख़ुद ही नहीं समझ पाई।

ऐसा नहीं है कि रोहन कोई बहुत दूर शिफ्ट हुआ था। वो हर शनिवार रविवार बिना नागा वहाँ आता भी था मगर वो दो दिन कहाँ और कैसे उड़ जाते पता ही नहीं चलता। और फिर वही हफ्ते भर की भागदौड़ शुरू हो जाती।

यूँ तो निशांत डे केयर में जाता था मगर मैत्री के ऑफिस का कोई टाइमिंग नहीं था। कभी कभी तो उसे लौटने मे बहुत देर हो जाया करती थी इसलिये उसने निशांत के लिए नेत्रा को रखा हुआ था। वो थोड़ा बहुत पढ़ी लिखी भी थी सो मैत्री को निशांत के लिए सूटेबल लगती थी।

घर के बाकी कामों के लिए कांता बाई थी और खाली समय में नेत्रा भी उनकी मदद कर दिया करती थी। सो ऊपर ऊपर से देखें तो कोई ख़ास वजह नहीं थी झुंझुलाहट की उस घर में।

मगर कुछ वर्क प्रेशर, कुछ ऑफिशियल पार्टीज़ और कुछ मैत्री की परफेक्शन की आदत। साथ ही अपने बच्चे से ज़रूरत से ज्यादा लाड लड़ाने के चक्कर में वो ये भूल गयी कि उसे और भी चीज़ें सिखानी हैं। उलटे हर वक़्त यही सोचा करती की पापा नहीं है तो कहीं उसे उनकी कमी ना महसूस हो इसलिए ज़रूरत से ज्यादा उसकी डिमांड्स एक्सेप्ट करती।

यहाँ तक तो सब ठीक था लेकिन बात बात पर वो नेत्रा और काँता बाई को डांट दिया करती। निशांत ज़रा सी उनकी शिकायत लगाता तो वो उनका पक्ष सुने बगैर ही उनकी अच्छा ख़ासा सुना देती। ये सब देख निशांत का हौंसला और भी बुलंद होता जा रहा था और वो दिन-ब-दिन अपनी मनमर्ज़ी करता। नेत्रा की हिम्मत नहीं पड़ती ना तो उसकी शिकायत करने की ना ही उससे कुछ कहने की।

इधर रोहन भी ये सब नोटिस कर रहा था। उसने सोचा शायद मैत्री अकेली है इसीलिए सही और ग़लत का फर्क भी नहीं कर पर रही है और चिड़चिड़ी भी होती जा रही है। सो उसने अपनी माँ से गुज़ारिश कर उन्हें वहाँ बुला लिया। उसे लगा यूँ निशांत पर भी थोड़ी लगाम लगेगी और मैत्री को भी कंपनी मिल जाएगी।

मगर उनके आने के बाद इसका विपरीत ही हुआ। मैत्री को ऐसा लगा जैसे उसकी स्वतंत्रता चली गयी। यशोधरा जी की प्यार से कही हुई छोटी से छोटी बात भी उसे चुभ जाती। कई बार तो उसके रवैये से उनकी आँखें भी भर आतीं मगर वो चुपचाप रोहन और निशांत की खातिर शांति बनाए रखती।

वो कभी उसे शांति से निशांत के बारे में समझाने की कोशिश भी करती या ये कहती कि नेत्रा ग़लत नहीं है बल्कि निशांत ही उसकी आदतों का और प्यार का फायदा उठाकर बिगड़ता जा रहा तो वो सुनी अनसुनी कर दो टूक कह दिया करती, "इनकी बातों में आप ना आएं तो ठीक होगा। आप गाँव से आई हैं। आपको नहीं पता शहर के बारे में कुछ भी। ये लोग सामने से कुछ और होती हैं और पीछे से कुछ और। सब मालूम है मुझे अब मुझपे बस नहीं चला तो आपको बहकाना शुरू कर दिया। और क्यूँ ना करूँ मैं अपने बच्चे पे विश्वास। ऐसे तो कलकों वो हर बात पे यही समझेगा कि माँ मुझपर विश्वास ही नहीं करेगी और अपने मन की बातें बताना बंद कर देगा। नुकसान तो मेरा ही होगा ना इनका क्या जाएगा। ये लोग तो आज यहाँ कल कहीं और।"

कई बार समझाने के बाद जब उन्होंने देखा की मैत्री कुछ समझने को तैयार ही नहीं है तो उन्होंने उसे समझाना ही बंद कर दिया। और बहुत बार एक ही बात सुन सुनकर मैत्री ने भी उन्हें इग्नोर करना शुरू कर दिया। अच्छे ख़ासे रिश्ते में खींचावट आते ज्यादा दिन नहीं लगे।

कभी अकेले में तो बेचारी नेत्रा रो दिया करती और कहती, " दादी मेरी वजह से मैडम आपसे भी नाराज़ हो गयीं"।

मगर वो उसे समझाया करती की वो हिम्मत ना हारे। बहुत जल्दी वक़्त मैत्री को उसकी गलती समझाएगा।

यूँही दिन बीतते जा रहे थे और निशांत की बदमाशियाँ बढ़ती जा रहीं थीं। एक रोज़ घर में मैत्री के ऑफिस के दोस्त आए हुए थे जब दूध पीने के नाम पर निशांत ने एक बार फिर तमाशा खड़ा कर दिया।

मैत्री अपने दोस्तों को छोड़ अंदर आई और उस दिन गुस्से में निशांत को एक थप्पड़ लगा दिया। साथ ही नेत्रा को भी बहुत खरी खोटी सुना दी और वापस पार्टी में चली गयीं।

पूछने पर उसने बताया कि कैसे निशांत दिनबदिन बदतमीज होते जा रहा है।

"पता नहीं कहाँ से सीख रहा है ये सब। अब तो मन करता है की नौकरी छोड़ फुल टाइम इसी के पीछे रहना पड़ेगा", वो सबके सामने बोली।

"खैर छोड़ो चलो डिनर करते हैं"।

इतनी में यशोधरा जी कमरे मे से आईं,"बहू ये क्या तरीका है, बच्चे से बात करने का और नेत्रा से पेश आने का", बड़े गुस्से मे वो बोलीं।

"माँजी प्लीज बाद में बात करते हैं।"

"नहीं बाद में नहीं अभी। एक बात बताओ तुम शाम से कितनी बार कोल्ड्रिंक्स पी चुके हो तुम लोग। घर मे और भी तो पौष्टिक पीने की चीज़े हैं। सब छोड़ अगर रोज़ तुम ख़ुद ये ठंडा पीती रहती हो तो बच्चा कैसे दूध पियेगा। वो भी ती यही सब मांगेगा ना। उदाहरण तुम्हें उसे देना है, और तुम ख़ुद ग़लत उदाहरण दे रही हो।आते ही कोल्ड्रिंक्स पीती हो, खाने के साथ तक कोल्ड्रिंक पीती हो और बच्चे से चेष्टा रखती हो की वो एक झटके में उन लोगों की जिनको तुम कुछ तूल ही नहीं देती उनकी बात मानकर दूध पी जाए। ये कौनसा तरीका हुआ।"

"माँजी प्लीज, अब बस कीजिए। मेरे दोस्तों के सामने इन दो कौड़ी की लड़कियों के लिए आप मेरी बेइज़्ज़ती कर रहीं हैं।"

बात अब काफ़ी बढ़ती नज़र आ राही थी सो उसके दोस्तों ने वहाँ से जाने में ही भलाई समझी। जाते जाते उसकी ख़ास दोस्त रिया उसके कंधे पर हाथ रख उसे शांत करने की कोशिश करते हुए कहने लगी, "प्लीज् कूल डाउन मैत्री। ठन्डे दिमाग़ से सोच फिर जवाब दे। अभी तू गुस्से में है।"

मगर आज तो उसका पारा बहुत चढ़ा हुआ था। गुस्से में निशांत को भी थप्पड़ लगा दिए और यशोधरा जी को तो किसी बात का जवाब ही नहीं दे रही थीं।

अगले शनिवार जब रोहन आया तो यशोधरा जी ने उससे गाँव वापस जाने की इच्छा जताई। उसपर मैत्री बोल पड़ी, "हाँ वहीं अच्छा है। वहाँ थीं तो रिश्ता तो ठीक ठाक चल रहा था। यहाँ तो उलटे बस मन मुटाव और खींचतान ही हो रही हैं। छोड़ आओ इन्हें।"

और अपने कमरे मे चली गयीं। इसके बाद चार दिन बड़ी मुश्किल कटे। वो सुबह ऑफिस चली जाती। शाम को आती तो यशोधरा चाहे जितनी कोशिश कर लें उनसे बात तक ना करतीं।

खैर चार दिन बाद यशोधरा जी वापस चली गयीं।

निशांत मन ही मन शायद उन्हें बहुत मिस करता था। अब वो भी शांत सा रहने लगा। मगर मैत्री कुछ भाँप नहीं पाई। उसका पढ़ाई में भी मन नहीं लगता।

जब दो महीने उसका टर्म रिजल्ट आया तो परफॉरमेंस काफ़ी डाउन थी जिसे देख मैत्री के पारे की सीमा ही नहीं रही। काफ़ी कुछ सुनाए जा रही थी वो उसे मगर वो ख़ुद में मगन अपने खिलौनों में बैठा बस कुछ कुछ किए जा रहा था।

"निशांत, तुमसे कुछ कह रही हूँ, बद्तमीज। और तुम मुझे इग्नोर कर रहे हो", वो उसपर गरजी।

"जवाब तक नहीं दे रहे। तुम्हारी इतनी हिम्मत", कहते हुए उसने निशांत को खींचा और एक थप्पड़ मारने को हुई।

निशांत एकदम से बोला,"क्या आप दादी को जवाब दिया करतीं थीं या कभी दीदी से ढंग से बात करतीं हो जो मुझसे एक्सपेक्ट कर रही हो।"

निशांत का जवाब सुन मैत्री को तो मानो काटो तो ख़ून नहीं।

"ओह तो यही सब सीख रहा है। अपनी माँ से बहस करना। इसीलिए पढ़ाई में भी मन नहीं लगता तेरा।"

निशांत ने कोई जवाब नहीं दिया।

मगर ये चुप्पी शायद मैत्री को बहुत कुछ समझाने की कोशिश कर रही थी।

डरी सहमी नेत्रा के कंधे पर हाथ से थपकी देते हुए वो कमरे से बाहर चली गयी। सारी रात सो नहीं पाई। सोचती रही की कहाँ राह भटकी और कब।

आखिर उस दिन यशोधरा जी ने और आज निशांत ने जो उसे कहा था वो भी तो ग़लत नहीं था। ज़रूरत से ज्यादा लाड के चक्कर मे शायद वही एक सामामजस्य नहीं बैठा पाई।

अगले दिन सुबह ही यशोधरा जी को फ़ोन कर उसे एक मौका देने का आग्रह किया और उन्हें लेने गाड़ी भिजवाई।

अगले दिन शाम यशोधरा जी वहाँ पहुँची।आते ही उसने उनके पैर चूकर अपने व्यवहार के लिए माफ़ी मांगी और उसकी उलटी पड़ रही गृहस्थी की लाइन पर लाने में सहायता मांगी।

यशोधरा जी मे अपनी मुस्कान से ही सब कुछ कह दिया।

उन्होंने निशांत को आवाज़ लगाई। नेत्रा उसे लेकर आयी।

"निशांत बेटा ये क्या सुन रही हूँ मैं। तुमने तो मुझसे वादा किया था की ख़ूब पढोगे और अच्छे बच्चे बनोगे फिर ये सब क्या है।"

निशांत चुपचाप खड़ा सुन रहा था। फिर नजाने क्या सोचकर बोला, "सॉरी दादी, सॉरी मम्मी, मुझसे गलती हो गयी। आगे से ऐसा नहीं होगा।"

यशोधरा जी नेत्रा की आँखों में देख समझ गयीं कि उसी ने निशांत को समझाया होगा।

"मैत्री, क्या तुम्हे कुछ समझ आया.....", यशोधरा जी ने ज़ोर से पूछा।

"हाँ मम्मी जी, कल से नो कोल्ड्रिंक्स, ओनली ठंडाई", कहते हुए ज़ोर ज़ोर से हँसने लगी और निशांत और यशोधरा जी को कसकर गले से लगा लिया।



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