अंधी हो असहाय नहीं
अंधी हो असहाय नहीं
"हैलो मैम, मैं रिद्धिमा के कॉलेज से बात कर रहा हूँ। आई एम सॉरी, लेकिन मुझे आपको ये बताते हुए बेहद अफ़सोस हो रहा है की कुछ दिनों से रिद्धिमा की आँखों में एक इन्फेक्शन के चलते वो अपनी दृष्टि खो बैठी हैं।अभी वो अस्पताल में ही हैं, मगर उन्हें अभी इस बारे में जानकारी नहीं दी गयी है। आप कृपया जल्द से जल्द यहाँ पहुँचे जिससे की हम सब मिलकर रिद्धिमा के इस मुश्किल वक़्त में उसका सहारा बन सकें", सुनते ही अभिता के पैरों तले से मानो ज़मीन खिसक गयी।
हाथ से फ़ोन कब गिरा और वो ख़ुद भी कब माथा पकड़ बस ज़मीन पर निढाल बैठ गयी ये उसे भी नहीं पता चला।
रिद्धिमा उसकी उन्नीस वर्षीय इकलौती बेटी जो उनके छोटे से शहर के घर से दूर हॉस्टल में वनस्पति विज्ञान की पढ़ाई कर रही थी। इस दुनिया में रिद्धिमा और अभिता का एक दूजे के अलावा कोई नहीं था।
उसके पति और रिद्धिमा के पिता ने तो बहुत पहले ही उसे बेटा पैदा ना कर पाने के गुनाह के कारण छोड़ दिया था और दूसरा ब्याह कर अपना घर संसार बसा लिया था। ये बात और है की इसे उसके दिल से निकली आह कहें या फ़िर नन्ही रिद्धिमा की बद्दुआ या कुदरत का इंसाफ। उसकी दूसरी शादी से भी उसे दो बेटियां ही नसीब हुईं। हाँ मगर दहेज़ बहुत मिला था तो शायद दौलत की चकाचौंध ने वारिस के सपने को धुंधला कर दिया। क्यूँकि दो बेटियों के बावजूद उस शख्स ने बेटे की चाह में कोई तीसरी शादी नहीं की।
अभिता को अब भी वो भयानक रात याद थी जब रिद्धिमा के जीवन को पूर्ण विराम लगाने के इरादे से वो लोग उसे पास वाले मंदिर लिए जा रहे थे। अभिता ने अकेले ने ही उस रात माँ का त्रिशूल उठा लिया था अपनी बेटी की रक्षा के लिए। मगर अगले दिन पंचायत में अभिता को ही बदचलन साबित कर और रिद्धिमा को उसकी नाजायाज़ संतान बता उन लोगों ने उसे गाँव से निकलवा दिया।
ना खाने को कुछ, ना रहने का ठिकाना ना ही हाथ में रूपये पैसे। ऐसे में दूध मुंही बच्ची को लेकर बड़ी मुश्किल से अभिता अपने मायके लौटी थी।
वहाँ पर भी कुछ समय तो सब ठीक रहा लेकिन धीरे धीरे माँ की बिगड़ती तबियत और भाई भाभी से मन मुटाव बढ़ने के कारण अभिता ने रिश्ते हद से ज्यादा बिगड़ने से पहले ही ख़ुद को उन सबसे अलग कर लेने में ही बेहतरी समझी।
एक छोटा सा मकान किराए पर लेकर वो रिद्धिमा के साथ वहाँ रहने चली गयी और आस पड़ोस के बच्चों को ट्यूशन पढ़ा कर अपना गुज़र बसर करने लगी। साथ ही रिद्धिमा को भी माँ और पिता दोनों का प्यार देकर पालती रही। नन्ही सी बच्ची को उसने सब कुछ अकेले ही सिखाया। उसका पूरा जीवन जैसे रिद्धिमा के इर्द गिर्द ही घूमता था।
धीरे धीरे वो दोनों अपने इस छोटे से आशियाने में बीती सारी बातें भुलाकर ख़ुशी ख़ुशी रहने लगे। रिद्धिमा जब तीन वर्ष की हुई तो उसका दाखिला घर के पास ही एक अच्छे स्कूल में करवाकर उसने भी एक स्कूल में नौकरी ढूंढ ली। अब वो सुबह सुबह उठ सारा काम ख़त्म करती फिर रिद्धिमा को स्कूल छोड़ अपने स्कूल जाती। और शाम को ट्यूशन पढ़ाती और साथ ही रिद्धिमा को भी पढ़ाई के साथ साथ जीवन के ज़रूरी पाठ पढ़ाती।
यूँही माँ बेटी का वक़्त कब गुज़र गया पता ही नहीं चला और बारहवीं कक्षा पास करने के बाद रिद्धिमा ने वनस्पति विज्ञान में उच्च शिक्षा हासिल करने की इच्छा जताई। बारहवीं में अंक बहुत अच्छे आए थे उसके सो बड़े शहर के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में उसे दाखिला भी मिल गया। अभिता को उसे ख़ुद से पहली बार जुदा करते हुए डर तो बहुत लग रहा था। जाने कैसे कैसे ख्याल मन में आ रहे थे मगर रिद्धिमा ने जब उसे उसी की सीख याद दिलाई जो वो उसे बचपन से देती आ रही थी तो उसने भी रिद्धिमा के संग हौसलों की एक और उड़ान भरी।
ख़ुद रिद्धिमा को कॉलेज छोड़ कर आई थी वो दो वर्ष पहले। शहर का बड़ा नामी कॉलेज था वो। इतना अच्छा माहौल, इतनी अच्छी फैकल्टी। हॉस्टल भी लड़कियों ले लिए बिल्कुल सुरक्षित।
अभिता की तो जैसे सारी चिंता ही मिट गयी थी उस दिन। पहली बार शायद उसे ये लगा था की अब रिद्धिमा का जीवन एक राह पर बिना किसी जद्दोजहद के आगे बढेगा।
अभी पिछले ही महीने तो रिद्धिमा छुट्टियों में घर भी होकर गयी थी। कितनी ख़ुश थी। अपने जीवन के सपने भी उसके साथ सजाकर गयी थी। मगर किस्मत को शायद कुछ और ही मंज़ूर था, जिसका नतीजा था ये फ़ोन कॉल जिसने अभिता को पूरी तरह से झकझोंर कर रख दिया।
उसे लगा मानो आज वो जीवन से हार गयी उसकी आँखों के आगे वो मंज़र था जब नन्ही रिद्धिमा को उसके घरवाले उस रात ख़तम करने के लिए ले जा रहे थे। उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे मानो उस रात उसके हाथों से वो त्रिशूल गिर कर उसकी बच्ची को ही लग गया। उसे लगा जैसे इतने बरसों की जंग जो वो माँ बेटी मिलकर लड़ रहीं थीं आज वो हार गयी। उसका दिल बैठा जा रहा था। हिम्मत नहीं कर पा रही थी वो ख़ुदको उठाने की।
मगर वो कहावत है ना........
डूबते को तिनके का सहारा........
ऐसा ही कुछ उसके साथ हुआ। कुछ ही देर में उसकी कामवाली बाई अफ़रोज़ आई। उसे यूँ ज़मीन पर निढाल बैठे देख पहले तो बहुत घबरा गयी, मगर फिर ख़ुदको संभालकर उसने उसे भी संभाला। वहाँ से उठाया, भीगे रुमाल से उसका चेहरा साफ किया, पानी दिया। फिर उसे शांत कराकर पूछा की माज़रा क्या है।
उसने सारी बात अफ़रोज़ को विस्तार से बताई.........
"क्या होगा अफ़रोज़। मेरी फूल सी बच्ची के जीवन का क्या होगा। क्या बिगाड़ा था उसने किसीका जो ईश्वर ने उसे ऐसी सज़ा दे दी। कैसे गुज़ारेगी वो ये पहाड़ जैसी जिंदगी बिना रौशनी के। कैसे बर्दाश्त करेगी वो इतनी लम्बी काली स्याह रात अफ़रोज़", वो बिलख बिलख कर रोते हुए कह रही थी।
"भाभी आप तो आजतक हम सबको हौंसला देती आई हो। यहाँ तक की मेरे जीवन मे भी अंधकार से लड़कर नया उजाला लाने वाली आप ही हो। आपने तो शुरू से रिद्धिमा बिटिया को ये समझाया है की जिंदगी हर रोज़ नई चुनौतियाँ देती है और जो इन चुनौतियों से जंग लड़कर आगे बढ़ता है वही जीवन मे अंतिम बाज़ी मारता है।"
"आपने तो अकेले ही पूरे समाज से इस बच्ची की खातिर लोहा ले लिया था तो फिर आज इस मुश्किल घड़ी में आप कैसे टूट सकती हो। अगर आप ही हार मान लोगी तो फिर रिद्धिमा बिटिया का सारथी कौन बनेगा। कौन उसे जीवन के इस रण में रचे चक्रव्यू से सुरक्षित बाहर निकालेगा।"
"रिद्धिमा बिटिया की जिंदगी अभी के लिए थम ज़रूर गयी है मगर रुकी नहीं है। तो किस बात का विलाप। आप तो अंधेरों में भी उजाले ढूंढ़ने में सक्षम हो तो आज क्यूँ घबरा रही हो। आप बनो रिद्धिमा बिटिया की आँखों की रोशनी और उसे जीवन के इस अंधकार से बाहर निकालकर लाओ", अफ़रोज़ ने अभिता को हौसला बंधाते हुए कहा।
अबतक मायूस बैठी अभिता को जैसे एक रोशनी की किरण मिल गयी। और वो उठ खड़ी हुई एक नई जंग के लिए। फ़ौरन तैयार होकर निकल पड़ी रिद्धिमा को वापस घर लाने।
अगले दिन सुबह अस्पताल पहुंचकर जैसे ही उसने रिद्धिमा को देखा उसकी खूबसूरत आँखें देख उसका दिल एक बार फिर टूट सा गया मगर इस बार गिरने के बजाए उसने ख़ुद को संभाला और रिद्धिमा के कांधे पर हाथ रखकर बुलंद आवाज़ मे कहा," मेरी बच्ची चल घर चलें। मैं तुझे लेने आई हूँ। "
"क्यूँ माँ, क्या हुआ, अभी कुछ दिनों में मेरी आँखें ठीक हो जाएंगी। फिर एग्जाम आ रहे हैं। मैं अभी आपके साथ नहीं जा सकती", रिद्धिमा ने जिस विश्वास से ये उत्तर दिया वो विश्वास अभिता को कचोट रही थी लेकिन वो ठान चुकी थी की चाहे जो हो वो ना टूटेगी ना बिखरेगी।
"बच्ची, अब तेरे जीवन के एक नया संघर्ष शुरू होने जा रहा। और इस संघर्ष में तेरी आँखों ने तेरा साथ छोड़ दिया है। अब तुझे अपनी एक नई दुनिया सजानी है जिसमे सूरज की रोशनी, होली के रंग, दिवाली की चमक अब तेरा साथ नहीं देगी।"
"तुम कहना क्या चाहती हो माँ। मैं कुछ समझी नहीं।"
"मेरी बच्ची, ये जो कमरे मे घना अँधेरा है, जिसे तू अब तक ये समझ रही है की कमरे में डॉक्टर्स ने तेरे इलाज के लिए तुझे डार्क रूम मे रखा है, ऐसा कुछ भी नहीं। ये कमरा रोशनी से जगमगा रहा है, तेरे ठीक सामने बनी खिड़की से सूरज की किरणे ठीक वैसे ही इस कमरे को आज भी रोशन किए हैं जैसे बरसों से करती आईं होंगीं।"
"मगर उस इन्फेक्शन के चलते तेरी आँखों ने तेरा साथ छोड़ दिया है। अब तू कभी देख नहीं पाएगी मेरी बच्ची", कहते हुए अभिता ने रिद्धिमा को कसकर गले से लगा लिया।
इससे पहले की वो कुछ भी कहती, रिद्धिमा के चेहरे को हाथों में भरकर उसके आँसू पोंछते हुए उसने कहा,"सुन रिद्धिमा, रोना नहीं, विलाप नहीं, कुछ भी नहीं। दुख को समेट और अपनी ताकत बना। और चल घर हम मिलकर ये जंग भी लड़ेंगे और जीतेंगे", कहते हुए उसने अपने आँसू पोंछें और उसका सामान बांधना शुरू किया। हॉस्टल से भी उसके दोस्तों से उसका सामान मंगवाया।
वो जानती थी की राह इतनी आसान नहीं होगी। रिद्धिमा चुप तो थी मगर उसका चहरा बता रहा था की वो टूट चुकी है।
"ऑन्टी हम भी आपके साथ रिद्धिमा को छोड़ने चलेंगे", रिद्धिमा के दोस्तों ने कहा।
उन्हें छोड़ते वक़्त वे सब बोले,"हम भी आपके साथ हैं। आपको जब कभी भी हमारी ज़रूरत पड़े संकुचाइयेगा नहीं हक़ से कहियेगा"।
"ज़रूर बच्चों, मुझे तुम सबकी ज़रूरत बहुत जल्द पड़ेगी। तब आना ज़रूर", अभिता ने जवाब दिया।
सबके जाने के बाद अभिता ने रिद्धिमा का सामान उसके कमरे मे रखा। अफ़रोज़ भी आ चुकी थी। रिद्धिमा की आँखों से आँसू बह रहे थे।
"क्या हुआ रिद्धिमा, चलो शाम ढलने को है। कुछ खा लो। देखो अफ़रोज़ दीदी भी तुमसे मिलने आई है", अभिता ने कहा।
"अब क्या शाम, क्या सुबह माँ। अब तो बस रात है", कहते हुए रिद्धिमा फफ़क़ फफ़क़ कर रोने लगी।
"रो ले बेटा, रो ले। निकाल दे दिल का सारा ग़ुबार। तभी तो जीवन के इस नए मोड पर डट कर खड़ी हो पाएगी। दिल से दुख निकलेगा और हिम्मत की जगह बनेगी। मैं रोकूंगी नहीं तुझे आज", अभिता ने कहा।
वो रात माँ बेटी पर बड़ी भारी थी। बहुत लम्बी। जैसे सूरज उनकी परीक्षा ले रहा हो।
मगर सृष्टि का नियम है की रात के बाद सुबह ज़रूर होती है।
कुछ दिन तो सब यूँही चला। उदास रिद्धिमा सारा सारा दिन अपने कमरे मे गुज़ारती। बस शून्य में निहारती रहती।
फिर अभिता ने एक दिन सुबह सुबह रिद्धिमा को नींद से जगाया। चलो रिद्धिमा सैर पर चलें। अफ़रोज़ भी आई है।
"दो कदम चल नहीं पाऊँगी माँ और तुम सैर पर जाने की बात कर रही हो, तुम तो ना करो ऐसा मज़ाक", रिद्धिमा ने कहा।
"ये कोई मज़ाक नहीं है बेटा। अब तुम्हे नई शुरुआत तो करनी होगी। यूँ रोते रोते जिंदगी नहीं गुज़ारी जा सकती", अभिता ने जवाब दिया।
"माँ किस जिंदगी की बात कर रही हो। ना देख सकती हूँ, ना पढ़ सकती हूँ ना कुछ और। एक वैज्ञानिक बनने का सपना था, अच्छी डांसर बनने का सपना था, कैनवास पे रंग भरने का सपना था। सब खत्म हो गया एक ही झटके में। अब क्या जीवन और क्या जीना", रिद्धिमा ने कहा।
"रिद्धिमा तुमने तो मुझे सारी उम्र जिंदगी से जंग लड़ते देखा है। मुझे क्या, तुमने ख़ुद जीवन में कितना संघर्ष किया। रिद्धिमा आँखों की रौशनी गयी है उस हौंसले का उजाला नहीं जो मैंने तुम्हे भेंट किया था। आत्मविश्वास को यूँ ना टूटने दो तुम। अब आँखों का काम तुम्हें अपने एहसास से लेना होगा। अपने जीवन को एक नया मोड देना होगा।बचपन मे भी कहाँ तुम्हे चलना आता था। सिखाया ही था ना मैंने। एक बार फिर से सिखाऊँगी। बस तुम सिखने को तैयार हो जाओ। थोड़ी सी हिम्मत और ये जंग भी हम जीतेंगे", अभिता ने कहा।
बस यूँही दिन रात अभिता रिद्धिमा की हिम्मत बंधाती। उसे सुबह सैर पर लेकर जाती। बगीचे की वो महक जैसे रिद्धिमा मे धीरे धीरे नई जान फूंक रही थी। अब अभिता को एक कदम और आगे बढ़ाना था। उसने शहर में शिफ्ट होने का फैसला लिया।
रिद्धिमा के दोस्तों से कहकर किराए पर एक छोटा सा मकान लेने को कहा।
वहाँ पहुंचकर उसने सबसे पहले वहाँ एक अंध विद्यालय में रिद्धिमा का दाखिला करवाया। आगे आने वाले जीवन के लिए ये बहुत ज़रूरी था की रिद्धिमा ब्रेल भाषा सीखे और वहाँ पर और भी कई प्रकार का प्रशिक्षण ले।
उस दिन फिर एक बार रिद्धिमा टूट गयी। "इस सबसे क्या होगा माँ। मेरा सपनों का अंत यहाँ क्यूँ लिखा विधाता ने", उसकी अश्रुधार आज फिर बह निकली।
"होगा क्यूँ नहीं रिद्धिमा। और ये सपनों का अंत नहीं। इस जगह से तुम्हें अपने सपनों तक पहुँचने की नई राह मिलेगी। और तुम कब से कायर बन गयी। तुम्हे तो बहुत साहसी समझती थी मैं। सुनो एक बात कहे देती हूँ, अगर अब भी तुम ऐसी मायूस बातें बंद नहीं की तो मुझे मज़बूरन तुम्हारा साथ छोड़ना पड़ेगा, क्यूँकि मैं किसी कायर की माँ कहलाना पसंद नहीं करूंगी", अभिता ने सख़्ती से कहा।
"बच्चे, चलो आज मैं तुम्हें कुछ अलग किस्म के लोगों के जीवन की सच्चाईयों से अवगत कराती हूँ।"
"कही दूर नहीं जाऊंगी। हमारे ही देश के एक होनहार डॉक्टर डॉ.वाई.जी.परमेश्वर को ही देख लो। एम.बी.बी.एस के फाइनल ईयर में किन्ही कारणों से उनकी आँखों की रौशनी चली गयी। मगर वो हार मानकर बैठे नहीं। हिम्मत कर वापस आए। अपनी पढ़ाई भी ख़त्म की और एक सफल डॉक्टर् और प्रोफेसर के रोल मे ख़ुदको साबित किया।"
"महान संगीतकार रविंद्र जैन और अकबर खान जिन्होंने आँखों की रौशनी ना होने के बावजूद ना केवल संगीत की शिक्षा हासिल की बल्कि सफलता की ऊंचाइयों की चर्म सीमा को चूमा।"
"शेखर नाइक जिसने दृष्टि विहीन होने के बावजूद वर्ल्ड क्रिकेट चैंपियनशिप मे सफलता हासिल की और अपने नाम कई बैटिंग रिकॉर्ड बनाए।"
"कंचन माला पांडे दृष्टि विहीन होने के बावजूद ना केवल स्विमिंग चैंपियनशिप जीती, बल्की समान्य दृष्टि वालों को भी कड़ी टक्कर दी। अपनी दृष्टिविहीनता को अपनी हार नहीं बनने दिया इन लोगों ने उलटे समाज को एक मज़बूत उदाहरण पेश किया की जीवन कभी रुकना नहीं चाहिए।"
"गिरीश शर्मा जिसने बचपन में ही एक्सीडेंट मे अपनी एक टांग गवा दी थी इसके बावजूद भी उन्होंने बैडमिंटन केवल सीखा ही नहीं बल्कि चैंपियन भी रहे।"
"सुधा चन्द्रन को ही ले लो। हादसे में टांग गवाने के बावजूद भरत नाटयम में महारत हासिल की और फ़िल्म इंडस्ट्री में अपना एक मुकाम हासिल किया।"
"और अरुनीमा सिंह। उन्हें आज कौन नहीं जानता। जिसे बिना किसी अपराध के कुछ वहशियों ने ट्रैन से धक्का दे दिया था, उसने उस हादसे में टांग कटने के बावजूद भी माउंट एवेरेस्ट का शिखर चूम अपनी किस्मत को और उससे खिलवाड़ करने वालों को करारा जवाब दिया।"
जैसे जैसे अभिता, रिद्धिमा के हौंसले के टूटे हुए पँख फिर से जोड़ रही थी, उसकी आँखों में उस हौंसले की चमक को फिर इक बार लौटते हुए देख पा रही थी।
कुछ दिन बाद एक नए साहस के साथ उन दोनों ने फिर से अंध विद्यालय मे कदम रखा। रिद्धिमा को कुछ दिन तो वहाँ बहुत असहज महसूस हुआ लेकिन बचपन से ही एक मेधावी छात्रा रही रिद्धिमा ने जल्द ही ब्रेल भाषा की बारीकियां सीखा शुरू कर दिया।
अभिता के लिए भी ये रास्ता आसान नहीं था। उसे तो जैसे नन्ही रिद्धिमा को एक बार फिर से जीवन पथ की ऐसी ए बी सी डी का पाठ पढ़ाना था जो ख़ुद उसे भी नहीं आता था। वो भी एक नए तरीके, नए नज़रिये से।
वो रिद्धिमा को पार्क लेकर जाती। वहाँ स्पर्श के एहसास से रंगों की पहचान करवाती। खुशबू के एहसास से अपने आस पास के वातावरण से अवगत करवाती। यहाँ तक की हवा की झोंकों की दिशा से भी दोस्ती करवाती। हर चीज़ उसे एक छोटे से बच्चे की तरह समझाती।
उधर अंध विद्यालय मे रिद्धिमा ने ब्रेल भाषा के साथ साथ, अपनी नृत्य की शिक्षा भी दोबारा प्रारम्भ की और अपने मनोवस्था को दोबारा कैनवास पर उतारने का भी फैसला लिया। और इस बार पेंटिंग ब्रश की जगह ली उसकी उँगलियों ने। अपनी हाथों से वो कैनवास को नापति हुई और अपने स्पर्श से रंगों को पहचानती हुई अपनी हर भावना को बड़ी ख़ूबसूरती से अपनी उँगलियों के सहारे कैनवास पर जन्म देने लगी।
उसके जीवन मे आने वाली कठिनाइयों को देखते हुए अभिता ने उसे जुडो कराटे सीखने को भी राज़ी किया और अब तक हवा का रुख तक पहचान चुकी रिद्धिमा ने अपनी पूरी शक्ति लगा दी आत्मरक्षा के लिए ये कला सीखने में।
दूसरी तरफ उसने अपने कॉलेज में पढ़ाई दोबारा शुरू करने के लिए अर्ज़ी दाखिल की। लेक्चर अटेंड करने शुरू किए।
उसके प्रोफेसर्स ने भी उसके कदम से कदम मिला उसकी हर संभव सहायता की।
अगले ही वर्ष रिद्धिमा ने अपनी स्नातक की डिग्री पूरी भी की और कठिन हालातों के बावजूद वो यूनिवर्सिटी टॉपर भी रही।
हाँ फाइनल परीक्षा के दौरान अपने लिए राइटर नियुक्त करवाने की अर्ज़ी देते हुए उसे थोड़ा दुख हुआ मगर इस बार उसने दुख को खुदपर हावी नहीं होने दिया। बल्कि उस परिस्थिति का डटकर सामना किया।
इतना ही नहीं उसे उस साल कॉलेज की सर्वश्रेष्ठ छात्र की ट्रॉफी से भी नावाज़ा गया और ये अवार्ड उसे उसके प्रति किसी साहनूभूति की वजह से नहीं बल्कि उसकी लगन और काबिलियत की वजह से दिया गया।
अपने जीवन की सभी मुश्किलों को पार करते हुए रिद्धिमा ने अपनी माँ की सहायता से अपने जीवन की सबसे बड़ी जंग पूरी लगन मेहनत और ईमानदारी से जीती।
और आगे उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद वो एक अच्छे कॉलेज में प्रोफेसर के तौर पर कार्यरत हुई। साथ ही एक होनहार कुशल नृत्यांगना जो स्टेज को अपने क़दमों से नाप लिया करती थी और साथ ही एक अनूठी अद्वितीय पेंटर जो अपनी उँगलियों से कैनवास पर जीवन के रंग बिखेरने में सक्षम थी।
बरसों बीत चुके रिद्धिमा को अपनी दृष्टि खोए हुए मगर उसने जीवन के हर मोड पर ये जंग बड़ी हिम्मत के साथ लड़ी।
आज उसकी पेंटिंग्स की प्रदर्शिनी थी, जिसमे उसकी बहूचर्चित पेंटिंग ""होंसलों के उजाले"" की बोली लगाई जानी थी और जिससे आने वाली रकम उस प्रशिक्षण संस्थान को जानी थी जो उसकी माँ अभिता रिद्धिमा जैसे और कई ज़रूरतमंद लोगों के लिए चला रहीं थी।
एक बहुत ही बड़े व्यापारी बहुत देर से वो पेंटिंग निहार रहे थे। उन्होने उसे बुलवाकर उस पेंटिंग के उसके जीवन में मायने पूछे।
रिद्धिमा ने सबको सम्बोधित करते हुए कहा........
जीवन के हर मोड़पर पर एक द्वार है
जिसके पीछे छिपी अन्धकार की भयावह कारागार है
इस द्वार को बंद करने की हिम्मत हमें ही करनी होगी
वरना ये कारागार तो हमें निगलने को सदा तैयार है
कौन कहता है की उजाले सदा आँखों में ही बसते हैं
मन का दीप इक बार जलाकर देखो
बंद आँखों से भी दिखता रोशन ये संसार है
नाउम्मीदी और मायूसी के स्याह बादल जब भी बरसे
तो उन्हें खुलकर बरस जाने दो
क्यूँकी इन बादलों के पार उजली किरणें
इन घने बादलों को निगल जाने को तैयार हैं
इक बार हौंसला कर कदम उठाकर तो देखो
हिम्मत अपने मन में जगाकर तो देखो
अपने मन के इस उजाले को आज़माकर तो देखो
बुलंदियाँ तुम्हे हंसकर गले लगाने को तैयार हैं
कृष्ण केवल एक युग में ही नहीं हुए
आज भी एक बार अर्जुन की तरह
सच्चे मन से बुलाकर तो देखो
कृष्णा तो हर युग किसी ना किसी रूप में
तुम्हारा सारथी बनने को तैयार हैं
आज आँखों में रौशनी नहीं तो क्या
होंसलों के उजाले तो बुलंद हैं
और ये हौंसले एक नया जीवन युद्ध
जीतने को तैयार हैं।
