बाँझ
बाँझ
"अरे गुणवन्ति दो बरस हो गए बिटुआ के ब्याह को। अभई तक तुम ने कोई शुभ समाचार ना सुणायो। कै बात है। माना बहुरिया शहर में रैवे है पर अब इत्ती भी ना चले है के तुम्हारी उस घर में के तुम बहुरिया को बच्चा करने को मना लो या फ़िर कोई और बात है", गुणवन्ति की बड़ी ननद और राजनाथ की बुआ सास कांता जी, जो उनके घर उनकी बेटी शालिनी के विवाह के मौके पर आईं हुई थीं वो सुकन्या की सास गुणवन्ति जी से पूछ रहीं थीं।
"देख गुणवन्ति जे कोई दूजी बात हो तो बता दे। हम गाँव में बैद जी से बात कर दवा करा देंगी। अच्छे अच्छो को बच्चे हो गए बैद जी की दवा से", वो बात बढ़ाते हुए बोली।
"अरे जीजी, ऐसी कोई बात ना है। अभी तो राजनाथ पे शालिनी बिटिया के ब्याह का बोझ था और सुकन्या बहू भी जिस दिन से घर आई है उसका हाथ बंटावे है रुपए जोड़न खातिर। अब ऐसे में वो बच्चे के बारे में क्या सोचते तो दोनों ने फैसला लिया अभी बच्चा ना करने का। अब बच्चा तो कुछ समय बाद भी हो सके है मगर शालिनी बिटिया की भी तो ब्याह की उमर निकली जाबे थी ना। सो उन्हें वो जादा ज़रूरी लगो", गुणवन्ति जी ने जवाब दिया।
"बात तो तू सही केहवे है गुणवन्ति पर अब तो ब्याह हो ग्यो और भगबान किरपा बड़ी धूम धाम से कर्यो है राज ने शालिनी का ब्याह, इसमें तो कोई दौराए ना सै। अब ब्याह पच्चात तो सोच लैणो चाहिए। देख जे बात मैं तो समझूँ हूँ पर बाकी लोग ना समझेंगे। फ़िर अक्सर ऐसे मामलों में देरी करो तो अक्सर बाद में मामला बिगड़ जाया करे है इसीलिए जे भी एक ज़रूरी काम जाणके जितनी जल्दी हो सके करके फुर्सत कर लैणी चाहिए। बाद में कछु ऊंच नीच हो जाबे तो सारी उमर पछतानो पड़े है", कांता जी ने कहा।
"हाँ जीजी ठीक है। सोच लेंवेगे। अभी तो चल दो घड़ी शालिनी संग बिता लें। फ़िर जाने कब बिटिया से मुलाक़ात हो", गुणवन्ति जी ने बात ख़त्म करते हुए कहा।
शादी में फैरों के समय कांता जी ने एक बार फ़िर सुकन्या से ही बात छेड़ दी।
"देख सुकन्या बहू। तोए अच्छा लगे जा बुरा हमें परवाह नई। बस इत्ता जाण ले की हम तोए अपना समझ एक सुझाव दे रहीं हैं। देख बहुरिया मानते हैं की आज जो जे शालिनी का इत्ता अच्छा विवाह हो रयो है इसमें तेरा भी जोगदान है और इस खातिर तूने बच्चा करण से भी ना कह दियो पर अब देर ना लगायो। देख बहुरिया कलको जो कुछ ऊंच नीच हो गयी तो जे दुनिया जे ना देखेगी की तूने बिटिया की ब्याह खातिर कुर्बानी दी थी। लोग तो तुझे ही बाँझ बुलाबेंगे। और जे इत्ता बजन कैसे बढ़ ग्यो तेरो। ब्याह में तो ख़ासी पातली थी तू। जे अच्छा लक्षण ना है। तू कहे तो हम बैद जी से दवा भिजवा देंगी", फेरों के वक़्त बैठी बैठी सुकन्या के कान में भुंभूनाए जा रहीं थी।
"बुआजी, तम चिंता को नी करो। थोड़ा समय रुको बस। एक हँसता खेलता गुड्डा आपकी गोद में डालूंगी खेलने को। तब ना मत कहना", सुकन्या हँसते हुए पूरे विश्वास के साथ बोली जिससे बुआजी को चुप करना ही पड़ा।
"म्हारो असीस है तोए बहुरिया। प्रभु करें ऐसा ही होए", कांता बुआजी उसके माथे पर हाथ फेरते हुए बोलीं।
विवाह ठीक से निपट जाने के और सभी मेहमानों की बिदाई के पश्चात गुणवन्ति जी भी परिवार समेत वापिस शहर आ गयीं।
शालिनी के जाने के बाद कुछ दिन तो वो घर बड़ा खाली खाली लग रहा था सबकी।
कुछ दिन बाद शालिनी अपने पति सहित उनसे मिलने वहाँ आई।
"अरे शालिनी अचानक। इख़्तिला तो की होती। पहली बार जमाई बाबू आ रहे थे। हम अच्छे से स्वागत करते उनका", गुणवन्ति जी ने कहा।
"जिस घर में मेरी एक नहीं दो दो माँ हों वहाँ और क्या स्वागत चाहिए मुझे और मेरे पति को"......." और जिसके प्रताप से मुझे इतनी अच्छी पत्नी मिली उनसे मुझे भी और क्या चाहिए", शालिनी की बात को बीच में ही काटते हुए उसके पति बिमल ने कहा।
"वैसे भी अब तो मिलना जुलना होता ही रहेगा, क्यूँकि मेरा भी तबादला यहीं हो गया है और हमें अचानक ही आना पड़ा क्यूँकि मुझे कल से ड्यूटी जॉइन करनी है। अब घर ढूंढ़ने में कुछ दिन लगेंगे इसलिए हम यहाँ चले आए", बिमल ने कहा।
इतने में राजनाथ और सुकन्या घर वापस आए।
"कैसी हो भाभी माँ", उन्हें देखते ही शालिनी बोली।
"बस ठीक है सब, थोड़ा शुगर बढ़ा हुआ है, सो चैक अप करवाने गए थे", सुकन्या बोली।
"क्या बोला डॉक्टर ने।"
"अरे तू छोड़ ना इन बातों को। क्या डॉक्टर डॉक्टर लेकर बैठ गयी। अभी पहले मैं जमाई बाबू के लिए बढ़िया पकोड़े बनाती हूँ। पहले बताया होता तो आज मैं डॉक्टर के यहाँ जाती ही नहीं", सुकन्या उसे कुछ इशारा करते हुए बोली।
"नही भाभी, पहले आपकी सेहत है। बाद में कुछ और। और ये इशारे कर चुप मत करवाइये क्यूँकि इन्हें मैंने सब कुछ बता दिया है। आपने जो मेरे लिए किया है मैं उसे क्यूँ किसीसे छिपाऊँ", शालिनी बोली।
"जी भाभी मैं सब कुछ जानता हूँ। आपने वाकई सिर्फ माँ ही नहीं भगवान का काम किया है। जीवनदान और कन्यादान एक साथ में करके। अब इसके बाद आप सबसे पहले सिर्फ अपनी सेहत का खयाल रखें और हमारी कभी भी कैसी भी ज़रूरत पड़े तो बेझिझक कहें", बिमल ने कहा।
"जी ज़रूर जमाई बाबू", सुकन्या ने कहा।
रात को सुकन्या और शालिनी जब आपस में बात कर रहीं थीं तब उसने उससे कहा की क्यूँ उसने जमाई बाबू को सब बता दिया। क्या ज़रूरत थी जिसपर शालिनी ने कहा,"क्यूँ ज़रूरत नहीं थी भाभी और क्या ग़लत किया है क्या कुछ आपने, जो हम सबसे छिपाएं। किसीको जीवन दान दिया है आपने। मैं तो कहती हूँ माँ को भी सबको बोल देना चाहिए। सवाल भी बंद हो जाएंगे सबके।"
"अच्छा चल छोड़ अब ये बता क्या प्लान है तुम्हारा", सुकन्या ने पूछा।
"बस भाभी इनको घर मिल जाए तो हम भी शिफ्ट हो जाएंगे।
कुछ ही दिनों में बिमल बाबू और शालिनी भी अपने घर में शिफ्ट हो गए। उधर सुकन्या ने घर के खर्चोँ को चलाने के लिए फ़िर एक बार टिफ़िन सर्विस चलाने का काम शुरू किया तो शालिनी भी उसके साथ हो ली। दोनों मिलकर दोनों वक़्त का खाना ख़ुद पकाती और गुणवन्ति जी सब पैकिंग करतीं। फ़िर राजनाथ अपनी रिक्शा से सब टिफ़िन पहुँचाने जाता। इसी तरह दो बरस गुज़र गए।
ओह अभी तक आप सुकन्या के परिवार से तो मिले ही नहीं।
सुकन्या का पति राजनाथ एक कपड़ा मिल में काम करता था और शाम के वक़्त कुछ आमदनी के लिए रिक्शा भी चलाता था। ये लोग मूलतः उत्तर प्रदेश के गाँव के रहने वाले थे मगर काम के सिलसिले में दूर उस शहर में आकर बस गए थे। सुकन्या भी उसी गाँव की थी और दसवीं पास थी मगर शहरों में दसवीं पास को कौन पूछता है। हाँ गाँव तरफ के व्यंजनों की पाक कला में निपुण थी।
उधर राजनाथ के पिता उसके बचपन में ही गुज़र गए थे जिस वजह से उसे छोटी उम्र में ही काम पकड़ना पड़ा था। बस शालिनी का अच्छा सा ब्याह हो जाए यही चाहत थी राजनाथ और उसकी माँ की और शायद ब्याह के बाद सुकन्या ने भी वही अपनी चाहत बना ली।
उसने शादी के बाद ही ससुराल में आते ही खाना और कुछ खास व्यंजन सप्लाई करने का काम तो पहले भी किया था मगर इन सबसे तो घर चला करते है, शादियों का खर्च नहीं उठाया जा सकता.......
ख़ैर चलिए कहानी में वापस चले..........
कुछ दिन बाद गाँव से न्योता आया। छोटी बुआ की लड़की की गोदभराई का। वैसे भी वो लोग दो बरस से गाँव तो गए नहीं थे सो सबने मिलकर इस बार गाँव जाने का तय किया। बिमल बाबू को तो छुट्टी नहीं मिली इसलिए शालिनी भी उन्ही के साथ हो ली।
उधर गाँव पहुँचकर कुछ दिन तो उनके सबसे मिलने जुलने में ही चले गए। जहाँ जाते वहाँ रिश्तेदार परोक्ष रूप से ताना मार देते, "अरे शालिनी तू भी भाभी की राह पे है क्या। कुछ सीखी नहीं इससे की बच्चा समय पर कर लेना चाहिए वरना बाद में यूँ सूनी गोद घूमना पड़ता है...... वगैरे वगैरे......."
वो लोग बिन कोई जवाब दिए चुप चाप सबकी सुनते रहते।
कांता बुआ जो उन्ही के घर रहने आई थीं उस रात गुणवन्ति जी से बोलीं, "कहे थे ना हम तोए की बहुरिया को समझा मगर नाइ तोए तो तब हमरी सुननी को नी थी और बहुरिया तू तो बड़ी डीग हाँके थी के प्यारा सा गुड्डा दूँगी खेलन को। के हुआ तेरे वादे का। हम तोए भी उस रात समझाए थे पर तूने हमारी एक ना सुणी। देख लियो नतीजो। आज सब पीठ पीछे बाँझ बुलाबे हैं तोको। अब भी बखत है, कल चल बैद जी के पास। उनसे बहुतों को फायदा हुआ है बहुरिया मान हमार बात। तेरे दुश्मन नाइ है हम। भला चाहत हैं। अपने भाई का वंश बढ़ता देखन चाहत हैं बस। और कोई लालसा नाइ हमारी।"
सब बस चुप चाप उनकी बातें सुन रहे थे.........
अगले दिन छोटी बुआ के घर उनके परिवार से मिलने गए सब। उनकी बेटी शांति भी ससुराल से आ चुकी थी।
"अरे भाभी आओ आओ। क्या सारा गाँव घूम लिए तब हमार द्वार याद आया तोको। ऐ शांति अंदर जा तू। बाद में आना यहाँ", वो अपनी बेटी से बोलीं।
"पर माँ भाभी और शालिनी से दो घड़ी मिल तो लूँ। ब्याह में भी ये लोग ना आ पाए थे। फ़िर जाती हूँ", शांति ने कहा।
"हम कहे ना तोए। अंदर जा मतबल अंदर जा। जा शालिनी तू भी इसके साथ चली जा बेटा", वो शालिनी से बोलीं।
"जी बुआ", कहते हुए शालिनी ने सुकन्या का हाथ पकड़ा और उसे भी अन्दर लेकर जाने लगी।
"अरे जे के करे है बिटिया। अब हम तो कित्ते थके हैं तू बहुरिया को जहाँ रेवन दे। कुछ चा पाणी का इंतज़ाम कर लेवेगी जे। तू जा", उन्होंने शालिनी को टोक दिया और सुकन्या को अपनी बहू के साथ रसोई में भेज दिया।
"देखो भाभी, आपणे एक दम सही फैसलों लियो थो ब्याह में ना आकर। आखिर बहुरिया का साया नई दुल्हन पर पड़ना अपशगुनी होता। बुरा ना मानियो पर तोरी बुद्धि इह बार कहाँ गयी। काहे ले आई इसलिए बाँझ को अपणे साथ। तोए तो पता था ना के शांति पेट से है तो फ़िर क्यूँ अपशगुन करती है".............."बाँझ नहीं है मेरी भाभी। माँ है वो मेरी। जीवनदान दे चुकी है वो और उसी वजह से कन्यादान भी हुआ था मेरा। खबरदार जो ये शब्द दुबारा मुँह से निकाला तो", शालिनी जिसने उनकी बातें अचानक सुन लीं थीं ज़ोर से चिल्लाकर बोली।
"बाँझ ना है। के मतबल बाँझ ना है। कटे है उकी संतान उहे माँ बुलाने वाली", छोटी बुआ भी ज़ोर से बोलीं।
इतने में सुकन्या भी शोर सुन रसोई से बाहर आ चुकी थी और शालिनी का हाथ पकड़ उसे चुप करवा दिया।
"मैं हूँ उनकी संतान। भाभी नहीं, भाभी माँ है वो मेरी", कहकर वो वहाँ से निकल गयी।
घर पहुंचे कांता बुआ ने फ़िर से वो बात छेड़ दी।
"जे शालिनी के कह रही है गुणवन्ति। तू हमसे कुछ छुपावे है के। देख अब भी बखत है बता दे।"
किसी मेहमान के आने से बात बीच में ही रह गयी।
उस रात सुकन्या की आँखों से नींद गायब थी। उसे वो दिन याद आ रहा था और उसके आँसू बहे जा रहे थे...............
दो वर्ष पूर्व..........
"मुबारक़ हो मिस्टर सानयाल, एक खूबसूरत सी बिटिया आई है आपके घर की रौनक बढ़ाने। और आपको भी मुबारक़ हो राजनाथ जी, माँ लक्ष्मी पधारी हैं सुकन्या की कोख़ से आपके सपने साकार करने", डॉक्टर ने ऑपरेशन थिएटर से बाहर आकर कहा।
"सुकन्या कैसी है, डॉक्टर साहिबा", राजनाथ ने पूछा।
"देखिये थोड़ा मेन्टल स्ट्रेस तो था ही उन्हें और फ़िर जो एक महीने से उन्हें शुगर की शिकायत थी उस वजह से थोड़े कॉम्प्लिकेशन्स तो थे ही, फ़िर उसपर से ये सीज़ेरियन करना पड़ा, उस वजह से उनकी तबियत थोड़ी तो ख़राब है, और इसलिए इस वक़्त उन्हें आराम की ज़रूरत है। मगर आप फ़िक्र ना करें कुछ दिन में वो ठीक हो जाएंगी फ़िर आप उन्हें डिस्चार्ज करवा सकते हैं", डॉक्टर ने कहा।
"कितने दिन रखना पड़ेगा", राजनाथ ने पूछा।
"अरे उसे आराम करने दो। कुछ दिनों मे जब वो पूरी तरह ठीक हो जाएगी, तब आराम से छुट्टी करवाना अस्पताल से राजनाथ। और खर्च की फ़िक्र ना करो, हम है ना", मिस्टर सानयाल ने कहा।
"जी बहुत बहुत शुक्रिया आपका", राजनाथ ने मिस्टर सानयाल से कहा।
"बच्ची कैसी है", रात को सुकन्या ने राजनाथ से पूछा।
"एक दम गोरी चिट्टी है। राजकुमारी लगती है", राजनाथ ने जवाब दिया।
"हाँ ऊपर स्पेशल कमरे में है। पता है पूरे अस्पताल में कितनी बक्शीस बाँटी है उन लोगों ने और तेरे इलाज का भी पूरा खर्च उठा रहे हैं", उसने कहा।
"एक बार मिलने देंगे क्या मुझको उससे।"
राजनाथ चुप रह गया।
चार पाँच दिन में ही सुकन्या की भी तबियत ठीक लग रही थी सो उसे भी अस्पताल से छुट्टी मिल गयी।
"ये दवाइयां नियमित रूप से पंद्रह दिन ले लेना और चैक अप के लिए समय पर आना। हाँ ये दवाई खाना भूलना मत वरना दूध नहीं सूखेगा। फ़िर तुम्हे दिक्कत होगी", कहकर डॉक्टर साहिबा ने कुछ खास गोलियों का पैकेट उसे दिया।
"ये लो राजनाथ, ये पाँच लाख रुपयों का चैक जो तय हुआ था। संभाल के रखना", डॉक्टर साहिबा ने वो चैक देते हुए कहा था।
"फ़िक्र ना करना सुकन्या। हालांकि शुगर का प्रॉब्लम तो आया है मगर ये तो तुम्हारी ख़ुद की संतान हो रही होती तो भी हो सकता था। ये बहुतों के साथ होता है। उम्मीद करते हैं की ये कुछ समय में ठीक हो जाएगा", कहते हुए उसे आश्वासन दिया।
"वो बच्ची डॉक्टर साहिबा। क्या उसको एक बार देख सकती हूँ", उसने धीरे से पूछा।
"उसका डिस्चार्ज हो चुका है। वो लोग तीन दिन पहले ही घर जा चुके हैं। और कानूनी कागज़ में क्या लिखा था ये तुम अच्छे से जानती हो। तुम उनसे नहीं मिल सकती। अब उसे भूलने की कोशिश करो। भगवान ने चाहा तो जल्द ही तुम्हारी कोख़ में तुम्हारी अपनी संतान खेलेगी", डॉक्टर साहिबा ने कहा।
घर पर गुणवन्ति जी और शालिनी ने उसकी कितनी मदद की थी। तीन महीने उसे बिस्तर से उठने तक नहीं दिया। उसकी मालिश तक गुणवन्ति जी ख़ुद किया करतीं थीं।
फ़िर उसके ठीक होने के बाद शालिनी का विवाह तय हो गया और तैयारियों में सुकन्या ने ख़ुद को मगन कर उस बात को सीने में कहीं दफ़न कर दिया।
मगर आज छोटी बुआ के तानो ने वो जख्म एक बार फ़िर ताज़ा कर दिए थे। उसपर से पिछले एक वर्ष से वो माँ बनना चाहती थी मगर सफलता नहीं मिल रही थी जिससे वैसे भी वो उदास रहने लगी थी।
ख़ैर अगले दिन वो छोटी बुआ के यहाँ गोद भराई में नही गयी। इधर कांता बुआ उसे देख ही समझ रहीं थीं की कुछ तो है जो वो लोग छिपा रहे हैं।
उन्होंने वहाँ रस्मो के दौरान गुणवन्ति जी से एक बार फ़िर पूछा। इस बार मगर शालिनी ने उन्हें सब सच बता दिया।
"सरोगेसी इसी सरोगेसी कहते हैं बुआजी", शालिनी ने उन्हें समझाया।
"हाय राम, मतबल सुकन्या ने रुपयों के लिए अपनी औलाद उन्हें दे दी", वो बोलीं।
"नहीं बुआजी औलाद नहीं कोख़। उन महिला को बच्चा नहीं ठहरता था सो उनके बीज निकालकर उन्हें बाहर कुछ दिन पनपने देकर फ़िर दूसरी औरत की कोख़ में रख दिया जाता है। वो बच्चा उन्ही का होता है बस पनपता दूसरी औरत के अंदर है। भाभी की एक सहेली तो दो बार कर चुकी हैं उन्होंने ने ही भाभी को भी राज़ी कर लिया था इसके लिए। हालांकि डॉक्टर मान नहीं रहे थे क्यूँकि ज्यादातर वो उन्ही औरतों को लेते हैं जिनकी अपनी औलाद हो चुकी हो जिससे आगे जाकर उनके जीवन में तकलीफ ना आए मगर भाभी के ज़ोर देने पर वो राज़ी हो गयीं मगर कानूनी कागज़ो में भाभी ने सब दस्तखत किए हैं", शालिनी ने उनको ठीक से समझाया।
"इत्ती बड़ी बात और तूने हमें बताने की भी ज़रूरत ना समझी गुणवन्ति", वो बोलीं।
"अब क्या करूँ जीजी। तब बहुरिया ने एक दम से फैसलों ले लियो और मने भी लागो के सही है। अब इससे के फर्क पड़ेगो। अब हम लोगों की भी तो दो दो तीन तीन औलादें होती ही हैं तो सुकन्या की भी हो जाएगी। और इत्ते सारे पैसों में शालिनी को ब्याह धूम धाम से निपट जाबेगो और ख़ूब बच भी जाबेगो मगर अब देखो। किसे पता था की ऐसा हो जाबेगा। पहले डॉक्टर साहिबा कह दीं की ऑपरेशन हुआ है तो तीन बरस तक बच्चा नाइ कर सकत और अब एक बरस से बेचारी दुखी है", गुणवन्ति जी बोलीं।
"जे तूने क्या होन दियो गुणवन्ति। बिटिया की ख़ुशी खातिर बहुरिया को मातृत्व से ही वंचित कर दिया तन्ने तो। बहुरिया ने तो बहाव में बह जे फैसलो ले लियो पर थारी अकल का घास चरण गयी थी", उन्होंने कहा।
"हाँ जीजी भूल तो हुई है मगर अब क्या करूँ। पछता रही हूँ।"
"अरे गुणवन्ति, अब पछताके कै मिलेगो, जे बात पेैले सोचणी चाहिए थी तन्ने। जे तो बेचारी के साथ नाइंसाफी हो गयी है", कांता बुआ बोलीं।
शाम को घर आए तो देखा सुकन्या बिना कुछ खाय पिए बस पीछे के आँगन में बैठी शून्य में निहार रही थी।
"अरे बहुरिया तू चिंता ना करे। अभई कांता जिन्दा है। कल चल मोए साथ बैद जी के जहाँ। बहुत सी औरतें जिन्हें दूजी बार में समस्या हुई थी उनका इलाज किया है बैद जी ने। हम सब सच सच बता देवेंगे उनको। फ़िर वो जाने और उनकी समझ", कहते हुए कांता बुआ ने उसे गले से लगा लिया।
"बहुत नेक काम कियो है तूने जिसके बदले तू सजा की नाइ बल्कि इनाम की हकदार है। हम हैं तोए साथ। तू चिंता कोनी कर।"
अगले दिन वो उसे लेकर वैद जी के पास गयीं। वो कहने को तो गाँव में रहने वाले बूढ़े वैद थे मगर देसी दवाइयों के ज्ञानी थे। उसे जाँचने के बाद उन्होने उसे वजन कम करने कुछ दवाइयां दीं और शुगर के लिए भी कुछ दवाइयां दीं। साथ ही महीना दो महीना वहीं उसी साफ सुथरे वातावरण में रहने को कहा और कसरत और खानपान में भी कुछ अहम बदलाव करने को कहा।
"आप फिकर ना करो बैद जी। जे कांता है ना। अब जे करेगीं बहुरिया की देखभाल। आप बस मोए बताना के कै करणों है", वो बोलीं।
"जी आप ज़रा राजनाथ को भिजवाएंगी। मैं उससे मिलना चाहूंगा", वैद जी ने कहा।
"जी ज़रूर बैद जी", कहकर वो लोग घर के लिए निकले।
अगले दिन राजनाथ उनके कहने पर वैद से मिलने आया।
"देखो राजनाथ, मैंने सुकन्या बिटिया की जाँच की है। मुझे नहीं लगता की उसे कुछ दिक्कत है। क्या तुमने कभी अपनी जाँच करवाई है", उन्होंने पूछा।
"क्या मतबल बैद जी", राजनाथ ने पूछा।
"देखो राजनाथ हो सकता है कमी तुममें हो। एक बार जाँच करा लो शहर से", उन्होंने सुझाव दिया।
सुकन्या को वहीं गाँव में कांता बुआ की देखरेख में छोड़ बाकी सब लोग शहर वापस आ गए। आकर शालिनी ने भी बिमल से सारी बातें बताई। उसने राजनाथ को हर मदद देने का आश्वासन दे जाँच के लिए मनाया। उधर कांता बुआ सुकन्या को सुबह जल्दी उठा मंदिर ले जातीं, दोनों मिल घर का काम करतीं और सारी दिनचर्या वैद जी के कहे अनुसार ही व्यतीत करते। कुछ ही दिनों में सुकन्या का वज़न कम होने लगा और उसके चहरे पर पहले सा नूर लौटने लगा। अब उसकी शुगर भी नियमित थी।
वहाँ शहर में जाँच में पता चला की राजनाथ को कुछ समस्या तो थी मगर वो आसानी से दवाइयों से और कम खर्च में आर्टिफिशल इनसेमिनेशन से सुलझाई जा सकती है।
"मगर मैं इतना भी खर्च करने में असमर्थ हूँ अभी शालिनी। अभी गाँव जाने का कितना खर्च हो गया", उसने शालिनी और बिमल जी जो की कदम कदम पर उसके साथ थे उनसे कहा।
"क्या हम ये इलाज कुछ समय बाद नहीं करा सकते डॉक्टर साहेब", उसने पूछा।
"नहीं भैया इलाज तो अभी ही शुरू होगा। अब भाभी बाँझ होने का ताना और नहीं सुनेगी", शालीनी ने कहा।
"आप खर्च की फ़िक्र ना करें राजनाथ भाई साहब। मैं हूँ ना। आप क्यूँ चिंता करते हैं", बिमल बाबू ने कहा।
राजनाथ की दवाइयां शुरू हुईं। कुछ दिन बाद वो गाँव से सुकन्या की लिवाने आया। वैद जी से भी मिलकर उन्हें सब कुछ बताया। उन्होंने भी उसे कुछ आयुर्वेदिक दवाइयां दीं।
बच्चों तुम दोनों अंग्रेजी दवाई के साथ इन बूटीयों का सेवन भी नियमित रूप से दो महीने तक करके तब आगे कदम उठाना। भगवान जल्द ही तुम्हारी मुराद पूरी करें।
"मैं भी बहुरिया के साथ शहर जाऊंगी", कांता बुआ बोलीं।
"ज़रूर बुआ जी। आपका तो बहुत सहारा है। आप भी चलिए हमारे साथ", सुकन्या ने उत्तर दिया।
शहर पहुंचकर उन लोगों ने दो महीने खूब मस्ती मज़े में बिताए। वहाँ के डॉक्टर से भी मशवरा करते रहे और वैद जी की दवाएं भी चालू रखी। फ़िर दो महीने बाद दोबारा राजनाथ की जाँच के बाद और सुकन्या की शुगर जाँच के बाद डॉक्टर ने भी हरी झंडी दे दी।
बिमल बाबू की मदद से और आर्टिफिशल इनसेमिनेशन यानी आई.यू.आई द्वारा डॉक्टर ने सफलता से उन्हें माँ बाप बनने का सुनहरा अवसर प्रदान किया।
पहली ही बार में सुकन्या का गर्भ ठहर गया। और उसके अंदर एक नही बल्कि दो दो जान पनपने लगीं। गर्भावस्था के वो महीने मुश्किल थे मगर वैद जी के परामर्श और डॉक्टरी सहायता के साथ सुकन्या ने सातवें महीने में कदम रखा।
कांता बुआ और बिमल बाबू ने भी पग पग पर उनका साथ निभाया। यहाँ तक की कांता बुआ तो शालिनी के साथ मिलकर टिफ़िन का काम भी करने लग पड़ी जिससे घर ठीक से चलता रहे।
गोद भराई में कांता बुआ ने रिश्तेदारों को ना बुलाते हुए ख़ुद ही मंदिर जाकर औपचारिकता पूरी कर ली।
फ़िर दो महीने बाद सुकन्या ने दो प्यारे प्यारे बच्चों को जन्म दिया। वंश और वंशिका।
जब कांता बुआ अस्पताल आईं तो सुकन्या ने वंश की तरफ इशारा करते हुए कहा, "बुआ अब इस राजकुमार को आप ही संभालना। मैं तो सिर्फ वंशिका को देखूंगी। मेरा वादा आज पूरा हुआ।"
"हाँ हाँ क्यूँ नाइ। ज़रूर संभालूंगी मैं। और तू फिकर कोनी कर बहुरिया। मैं तो अपणे पोता पोती और बहुरिया तीनों को ही संभाल लूंगी। आखिर मेरी दिली ख्वाईश पूरी हुई है आज", बुआजी ने कहा।
"एक बात और बुआजी। गाँव में सबको फ़ोन करके कह दो कि मेरी भाभी बाँझ नहीं है", शालिनी ने कहा।
"हाँ हाँ ज़रूर। लेकिन मैं जे भी साथ में बताऊँगी के बहुरिया तो बरसों पहले ही एक लछमी को जीवन प्रदान कर एक घर में ख़ुशीयों का दीपक जला चुकी थी", बुआजी ने सीना तानकर कहा।
दोस्तों,
सरोगेसी आर्टिफिशल इनसेमिनेशन की पदयती में तब उपयोग में लाया जाता है जब किसी कारण वश औरत के गर्भाशेय में दिक्कत आ जाए या फ़िर बार बार गर्भपात हो जाता हो जाता।
ऐसे में आई. वी. एफ. तकनीक द्वारा स्त्री बीज और पुरुष बीज निकाल कर फ़िर उन्हें बाहर ही टेस्ट ट्यूब में रखकर फ़िर पनपने पर उस महिला की कोख़ के बजाए दूसरी महिला की कोख़ में रखा जाता है। ये बच्चा जेनेटिकली अपने माँ बाप का होता है।
इसी सरल भाषा में किराये की कोख़ भी कहा जाता जहाँ इलाज का पूरा खर्च बच्चे के माँ बाप उठाते हैं और उस महिला को भी अच्छी ख़ासी रकम मिल जाती है।
आज बहुत सी गरीब महिलाएं इस तरह से पैसे कमा कर अपने घर को रोशन कर रहीं हैं। हाँ मगर कई डॉक्टर इनकी परिस्थितियों का फायदा उठाकर ख़ुद ज्यादा मुनाफा कमाते हैं। मगर सब ऐसा नहीं करते।
दूसरी ओर एक बच्चे को नौ महीने कोख़ में रखने के बाद इनका भी मन करता है उस बच्चे को देखने का मगर कानूनी कागज़ों पर पहले ही दस्तखत होते हैं कि उस बच्चे पर इनका कानूनन कोई हक़ नहीं है ना ही ना ही ये बच्चे को देखने की डिमांड कर सकती हैं।
हालांकि सरोगेसी पर पिछले कुछ समय से काफ़ी विवाद है की ये नितिगत है या नहीं और अब तो सरोगेसी के नए नियम भी बनाए जा रहे हैं।
मगर यदि डॉक्टर्स और ये महिलाएं इसका दुरूपयोग ना करें तो ये पदयति का दुरूपयोग ना करें तो ये पदयति दोनों ही परिवारों के लिए एक वरदान है।
आप कुछ कहना चाहेंगे इस बारे में।
