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Ashu Verma Chaubey

Inspirational

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Ashu Verma Chaubey

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अरे ये तो एक हिंदी टीचर है

अरे ये तो एक हिंदी टीचर है

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"हिंदी में बोलना, बातें करना बड़ा अच्छा लगता है माँ, एक अपनापन सा है इस भाषा मे और बड़ी ही सरलता से मन की भावनाओं को अभिव्यक्त कर देती है ये भाषा", सूज़ी ने सरला जी से कहा।

"और आप तो इस भाषा को इतने उत्कृष्ट तरीके से निखारती हैं जैसे एक एक शब्द मोतियों सा पिरोया गया हो।"


सरला जी एक विदेशी लड़की के मुँह से ये शब्द सुनकर अपनी आँखों मे अश्रुधार को समेट ना पायीं।बरसों ये आँसू छिपाये वो बस संलग्न थीं अपने काम मे।वो काम जिसे करके उन्हें संतुष्टि तो बहुती मिली, कई पुरुस्कार भी मिले मगर इज्जत थोड़ी कम ही मिली।क्या करें आजकल माहौल ही कुछ ऐसा है। हर तरफ अंग्रेजी की धूम है। साइंस सब्जेक्ट के टीचर्स की भी बहुत पूछ है। टूशन से भी भरपूर कमाई होती है।


मगर सरला जी ठहरी हिंदी की अध्यापिका। अब आजकल पूछता कौन है हिंदी को। आजकल के स्टूडेंट्स तो हिंदी मे बात तक करने मे कतराते हैं। आउट ऑफ़ फैशन मानते हैं हिंदी में वाद विवाद को।

एक अनपढ़ व्यक्ति भी टूटी फूटी इंग्लिश बोलना अपनी शान समझता है पर हिंदी बोलने मे उसे शर्म आती है।दसवीं मे भी ज्यादातर छात्र सिर्फ अच्छी परसेंटेज के चक्कर मे संस्कृत चुनते हैं। ये नहीं समझते की हिंदी का ज्ञान अर्जित करना ना केवल ज़रूरी है बल्कि गर्व की भी बात है। आखिर ये केवल एक और भाषा नहीं हमारे ख़ून में रची बसी हमारे देश की मिट्टी की सुगंध है मगर इन सब भावनात्मक विचारों से आजकल किसीको भी ज़्यादा कुछ लेना देना नहीं है। बस होड़ लगी ख़ुदको मॉडर्न साबित करने की और अंग्रेजी बोलना ही इसका एकमात्र रास्ता नज़र पड़ता है आज की युवा पीढ़ी को।


वो दोहे, काव्य, अपठित गद्यांश आदि अब किसको सुहाते हैं।और सूरदास, तुलसीदास, निराला, बेनीपुरी भी अब किसे याद हैं। अब भला ये पुराने ज़माने के लेखक क्या जाने नए ज़माने की भावनाएँ।


हाँ, हिंदी दिवस पर हिंदी के बहुत से कार्यक्रम और प्रतियोगिताएं ज़रूर आयोजित किए जाते हैं और विजेताओं को पुरस्कृत भी किया जाता है।बड़े ही उत्साह के साथ हिंदी पख्वाड़ा भी मनाया जाता है।हाँ कुछ सरकारी दफ़्तरों मे अब व्यवहारिक भाषा हिंदी कर दी गयी है।इस इलावा हिंदी बस कुछ शायरियाँ, कविताएं और उपन्यास मात्र बनकर रह गयी है।बस इतनी ही रह गयी है अब हमारी मात्र भाषा की अहमियत शायद।


अब भला ऐसे मे एक हिंदी टीचर का क्या मान। उलटे कई बार तो हिंदी टीचर को बड़े ही हास्यास्पद तरीके से पेश किया जाता है। कवियों के नाम से उनका सम्बोधन, अ--आ इत्यादि तारीकों से उन्हें पुकारा जाता है।


घर परिवार मे भी कुछ ज्यादा अहमियत नहीं होती कई बार।

"अरे इसे क्या पता, ये तो सिर्फ हिंदी टीचर है", कहकर एक तरफ कर दिया जाता है।

जैसे हिंदी टीचर ना हुआ, कोई कम पढ़ा लिखा अनोखा इंसान हुआ जिसे किसी और विषय का कोई ज्ञान ही ना हो।


और कुछ ऐसा ही हाल था सरला जी का।जबसे शादी करके आईं, सासुमा ने अध्यापिका साहिबा कह कहकर कई व्यंग कसे।देवरानी जो की केमिस्ट्री टीचर थी, हमेशा कहती रहीं भाभी आपको काम ही क्या है। इतना आसान सा सब्जेक्ट है आपका तो पतिदेव कहते "क्या यार, कम से कम घर मे तो इंग्लिश बोल लिया करो। अब ऐसा भी क्या बैर इंग्लिश से।"

"वो भी तो तुम्हारी तरह हिंदुस्तान की बहू है।" "अपना लो अब उसे भी" कहकर ज़ोर हँस पड़ते।


विद्यालय में भी अन्य प्रोफेसर कभी उन्हें माता महादेवी तो कभी शकुंतले तो कभी चन्द्रकांता कहकर सम्बोद्धत कर देते फ़िर कहते, "जस्ट लाइट वेटड जोक्स यार, डोंट टेक इट सीरियसली एंड सॉरी इफ वी हर्ट यू, बट इट वॉज़ टोटली अनइंटेंशनल", कहकर परह हट जाते।


और सरला जी चुप रह जातीं, दर्द और आँसू समेटे बस मुस्कुरा देतीं और अपने काम मे लगी रहतीं।


उनका बेटा विकास, जो की एक जानेमाने कान्वेंट मे था, उसका तो हिंदी से दूर दूर तक कोई वास्ता ही नहींं था और बारहवीं के बाद वो पढ़ाई के लिए विदेश चला गया तो जो थोड़ा बहुत नाता था वो भी टूट गया।


हाँ, उनकी ननद उन्हें समझती थी। शायद लड़की थी, वो भी थोड़ी कम पढ़ी लिखी इसीलिए। उससे उन्हें थोड़ी बहुत इज्जत मिलती थी।हाँ, मगर जब भी अपने विषय में उत्कृष्ट योगदान के लिए सम्मानित किया जाता, तो घर मे पार्टी ज़रूर होती, उनकी बड़ी प्रशंशा भी होती।


"अरे क्या बात है मैडम, आप तो कितना ऑफ बीट काम कर रही हैं। मानना पड़ेगा, बट डोंट यू थिंक की इससे स्टूडेंट्स को कुछ ज्यादा फायदा नहीं मिलेगा। इन फैक्ट टेंथ में भी अगर हिंदी सब्जेक्ट लो तो परसेंटेज गिर जाती है। आप इसके बारे में भी कुछ सोचिये और इस दिशा में कुछ कदम उठाइये", कभी कभी तो समझ नहीं आता की लोग तारीफ कर रहे हैं या त्रुटियां उजागर कर रहे हैं।


ख़ैर जो भी हो, उनके घरवाले तो उस दिन उन्हें सर माथे पे बैठाते।पर रोज़ मराह तो बस वही "इसे क्या पता, ये तो हिंदी टीचर है।" सुन सुनकर उनके कान पक चुके थे।अब तो वो इन सब बातों की आदत भी डाल चुकी थीं मानो समझौता कर लिया हो लोगों की इस विचारधारा से।


एक दिन विकास का अमेरिका से फ़ोन आया। उसने उन्हें और बाकी परिवार वालों को वीडियो कॉल पर सूज़ी से मिलवाया।उनके पति ने सूज़ी से ख़ूब जोरदार अंग्रेजी मे बात की, यहाँ तक की सासू मां ने भी टूटी फूटी इंग्लिश मे बात की।जब सरला जी उससे अंग्रेजी मे बात करने लगीं तो उसने उन्हें टोकते हुए कहा, "माँ आप तो कम से कम हिंदी में बात कीजिए। बताया है विकास ने मुझे आपके बारे मे की आप हिंदी भाषा में कितनी सुप्रवीण हैं।

"ऐसे शब्द सुन सारे परिवार समेत, सरला जी भी अवाक रह गयीं।


सूज़ी, विकास की ख़ास दोस्त और वहाँ के हिंदी संगठन की सम्मानित कार्यकर्ता थी। वो हिंदुस्तानी नहींं थी, मगर हिंदी बहुत बढ़िया बोल रही थी। यहाँ तक की हिंदुस्तानी संगीत में भी पारंगत थी। जन्म से अमेरिकन मगर हिंदी जैसे उसके मन मे रची बसी थी।

उनके जिस हुनर की कद्र कभी उनके घर मे नहीं हुई, उनके देश मे नहीं हुई, उनके संस्थान मे नहींं हुई, उसकी कद्र एक विदेशी लड़की इतनी ख़ूबसूरती से कर रही थी।


"विकास ये क्या, सूज़ी इतनी खूबसूरत हिंदी बोलती है। और ऐसे विचार।"

"ये कैसे तुम्हारी दोस्त बन गयी। तुम्हारा तो हिंदी से कोसों दूर तक कोई नाता नहींं", सरला जी ने अचंभित हो उससे पूछा।

"हाँ माँ, नाता तो मेरा नहींं है, ना मुझे कोई इंटरेस्ट था कभी हिंदी भाषा पढ़ने का ना ही ये मेरा सब्जेक्ट था। मगर ऐसा बिल्कुल नहींं है की मैं आपकी इज्जत नहींं करता या फ़िर हिंदी भाषा का मान नहीं करता।"


"नाता तो मेरा सूज़ी से भी हिंदी की वजह से कभी नहीं रहेगा, मगर हम एक दूसरे को पसंद करते हैं। और हिंदी के अलावा बहुत कुछ है हमारे बीच।"


"हाँ, मेरे लिए इट् वॉज़ जस्ट अनदर लैंग्वेज, लेकिन सीखने को इसमें भी बाक़ी भाषाओं की तरह बहुत कुछ है और ये बात मैं हिंदुस्तान में रहकर तो ना समझ सका, मगर मुझे अमेरिका में सुज़ी ने समझाया कि हिंदी मात्र एक भाषा नहीं बल्कि एक संस्कृति है, एक सभ्यता है, जिसे हम हिंदुस्तानी ही भुलाने पर तुले हुए हैं।"


"जापान हो या चीन, वहाँ के हर नागरिक को अपनी भाषा पर गर्व है, शर्म नहीं। सिर्फ हमी लोग हिंदी छोड़ अंग्रेजी को स्टाइल स्टेटमेंट बनाए बैठे हैं।"

आज अपने बेटे के मुँह से ये सब सुन सरला जी के आँसू थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे। ये बात और थी कि ये आँसू ख़ुशी के थे।


उन्होंने सूज़ी को उन्हें इतनी ख़ुशी देने के लिए दिल से धन्यवाद दिया।मगर उनके जीवन की सबसे बड़ी ख़ुशी तो अभी बाकी थी।सूज़ी ने उन्हें ये कॉल, उस साल अमेरिका में होने वाले अंतराष्ट्रीय हिंदी महोत्सव में बतौर मुख्य अतिथि करने के लिए किया था। 


सरला जी ने कभी सपनों मे भी नहीं सोचा था की उन्हें ये सम्मान भी प्राप्त हो सकता है क्यूँकि अमूमन तो ऐसे कार्यक्रमों मे नेता अभिनेता ही शिरकत किया करते हैं, कोई मामूली हिंदी अध्यापक नहीं मगर वहाँ की हिंदी सोसाइटी की तरफ से सूज़ी ने ये भी आग्रह किया कि वे अपने साथ हिंदी भाषा में पारंगत कुछ और अध्यापकों को भी लाएँ जो वहाँ कुछ दिन रहकर वहाँ के छात्रों को हिंदी भाषा व उसके उदभाव एवं विकास से परिचित करा सकें।


सही मायनों में सरला जी को तो आज जैसे उनकी जीवन भर कि तपस्या का पुरुस्कार मिल गया।



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