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Ashu Verma Chaubey

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Ashu Verma Chaubey

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ये आख़री फर्ज़ भी अब मेरी बहू ही निभाएगी

ये आख़री फर्ज़ भी अब मेरी बहू ही निभाएगी

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बारिश लगभग थम चुकी थी मगर खिड़की से देखने पर लग रहा था की ठण्डी हवाएं अभी भी चल रहीं थीं। उस खिड़की के दोनों तरफ ही एक भयानक तूफ़ान के आने की आशंका थी। बाहर आने वाले तूफ़ान के बारे में तो पहले से सरकारी चेतावनी थी मगर अंदर आने वाला तूफ़ान शायद दबे पाँव आ रहा था। कोई दस्तक भी नहीं हुई और सुमित्रा जी जीवन में एक हलचल सी मच गयी।

"माँजी, मैं ज़रा नीचे जाकर एक बार श्रीकांत को फ़ोन लगाकर देखती हूँ। मेरे फ़ोन की बैटरी भी डेड है और श्रीकांत भी शायद दोपहर से फ़ोन लगा रहे होंगे। आप तो जानती ही हैं की वो अक्सर दोपहर को फ़ोन करके सबका हालचाल लेते हैं। अब ऐसे में अगर मेरा फ़ोन इतनी देर बंद मिलेगा तो जाने क्या क्या सोच परेशान हो जाएंगे। मैं नर्स से कहकर जाती हूँकी अगर कोई भी इमरजेंसी आए तो मुझे बुलवा लें", भूमिजा बोली।


"जल्दी आना", नम आँखों से उसकी ओर देखती हुई उसकी सास के मुँह से केवल इतना ही निकला।

"आप फ़िक्र ना करें माँजी। मैं बस श्रीकांत को एक बार फ़ोन करके इत्तिला कर दूँ। बस आती हूँ। आप ख़ुदको अकेला ना महसूस करें। मैं हूँ ना आपके साथ। कुछ नहीं होगा पापा जी को। मैं बस अभी आई", कहते हुए वो तेज़ क़दमों से लिफ्ट की ओर बढ़ी।

नीचे रिसेप्शन पर पहुंच उसने श्रीकांत को फ़ोन लगाया। तीन चार बार फ़ोन लगाने पर भी फ़ोन नहीं उठा।

श्रीकांत शायद अपनी शिफ्ट पर वापस जा चुके थे और अंदर फ़ोन रखना मना था। वो जानती थी की अब तो श्रीकांत से बात अगले दिन सुबह ही हो पाएगी, फ़िर उसने किसीसे मोबइल मांगकर उनके लिए मैसेज छोड़ा......

"श्रीकांत मैं भूमिजा। ये नंबर मेरा नहीं है। बस तुम्हे बताने के लिए मैसेज कर रही हूँ कि बाउजी को सर पर चोट लगने की वजह से अचानक हमें उन्हें अस्पताल में दाखिल करवाना पड़ा। सुबह से यहाँ तूफानी हवा व बारिश थी तो फ़ोन में चार्जिंग भी नहीं। इसीलिए कल सुबह सुबह फ़ोन करूंगी या शायद ना भी कर पाऊं पर हो सके तो फ़ोन का इंतजार किए बिना आने का प्रबंधक कर लो। शायद समय कम है।"

श्रीकांत को मैसेज करके वो अपनी सास के लिए कुछ खाने को लेकर तुरंत वापस ऊपर गयी।

"माँजी कुछ खा लीजिए नहीं तो आपका शुगर डाउन हो जाएगा। आपको भी तो अपनी दवाई लेनी है। पापा जी का तो ख्याल डॉक्टर रख ही रहे हैं", भूमिजा ने कहा।


सुमित्रा जी ने बस चुप चाप वो रोटी रोल पकड़ा और नम आँखों से भूमिजा को देखती रहीं। उसने थोड़ा सा खोलकर उनसे कहा की जल्दी से खा लीजिए माँजी। फ़िर ठंडा हो जाएगा। कह तो रोल के लिए रही थी पर जानती थीं कि अंदर से कभी भी कोई भी विपरीत समाचार लेकर डॉक्टर बाहर आ सकते हैं। ऐसे में अकेली वो सब कुछ कैसे संभालेगी।

उधर सुमित्रा जी जैसे जैसे रोटी रोल तोड़ रहीं थी, पूरा जीवन उनकी नज़रों के सामने घूम रहा था। उनकी सारी गलतियां जैसे उन्हें कह रही थीं कि देख सुमित्रा, आखिर कौन तेरा अपना निकला और कौन पराया। कितनी ग़लत थी तू।

उसपर केशवनन्दन जी भी तो हमेशा उनसे कहा करते थे,"सुमित्रा क्यूँ तुम बेवजह बेचारी को परेशान करती हो। कहीं ऐसा ना कि एक दिन ईश्वर तुम्हे इसकी इतनी कठोर सज़ा दें कि पश्चाताप करने का भी मौका ना मिले।"

और शायद आज वही दिन था। ईश्वर ने आज उन्हें सज़ा सुना ही दी मगर वो अपने मन में ईश्वर से यही सवाल कर रहीं थीं कि इसमें केशवनन्दन जी की तो कोई गलती नहीं थी, तो फ़िर उन्हें क्यूँ। उन्हें लग रहा था जैसे ईश्वर ने उन्हें उनके किए की सज़ा के लिए जैसे उनके पति को ज़रिया बना दिया था। वो सात घंटे अस्पताल में बड़े भारी थे। सुमित्रा जी लगातार अपने पति के जीवन की दुआएं मांग रहीं थीं।

सात साल पहले.......

सुमित्रा और केशवनन्दन जी ने बड़े धूम धाम से अपने बड़े बेटे श्रीकांत का विवाह जुगलकिशोर जी की बेटी भूमिजा से तय किया। जुगलकिशोर जी और केशवनन्दन जी बड़े अच्छे दोस्त थे। मगर कुछ ही समय पश्चात् बिज़नेस में हुए घाटे को जुगलकिशोर जी सह ना पाए और उनका स्वर्गवास हो गया।


तब ये सोचकर सुमित्रा जी चुप थीं की शायद अभी अभी हुई पिता की मौत की वजह से वो परिवार अपनी बेटी की शादी सादगी से कर रहा है मगर बाद में भी जब उपहारों के नाम पर वहाँ से कुछ ना आया और भूमिजा ने उन्हें सारी परिस्थिति बताई तब नजाने क्यूँ उन्होंने उससे अपना व्यवहार बदल दिया।


उसपर से विवाह के दो वर्ष पश्चात भी भूमिजा को गर्भ भी नहीं ठहर पा रहा था।बहुत चीखी चिल्लाईं थीं उस दिन वो।

"कँगलों ने दोस्ती का फायदा उठा अपनी बाँझ बेटी हमारे मत्थे मढ़ दी। धोखा दिया है आपके दोस्त के परिवार ने हमें", वो केशवनन्दन जी से बोलीं।

"कोई धोखा नहीं दिया किसीने हमें। मैं तो ये सब पहले से जानता था। और क्या तुम्हे बहू के गुण नहीं दिखाई देते। जब देखो बस तोहफों के पीछे पड़ी रहती हो। आखिर किस चीज़ की कमी है तुम्हे। ईश्वर का दिया सब कुछ तो है", वो समझाते।

"ठीक है मगर वंश आगे बढ़ाने की ताकत तो नहीं इसमें। मेरा श्रीकांत तो बस यूँही फंस गया", वो हर वक़्त उसे उलाहना देती।

फ़िर उनके छोटे बेटे भरत का विवाह जानवी से हुआ। जानवी और भरत एक साथ पढ़ते थे और जानवी के पिता एक बहुत बड़े सरकारी अफसर थे। बड़ी शानो शौकत से उन्होंने अपनी बेटी को बिदा किया।

भरत के विवाह के छे महीने बाद ही उनकी बेटी रुत का भी विवाह बड़े ऊँचे खानदान में तय हो गया। हमेशा वो कहा करतीं,"कितनी किस्मत वाली बहू आई है। आते ही भाग खुल गए। ननद का विवाह इतने ऊँचे घर में तय हो गया।"


रुत की डोली उठते उठते, जानवी का भी गर्भ ठहर गया और कुछ महीनों पश्चात् सुमित्रा जी के यहाँ एक प्यारा सा पोता हुआ। उधर श्रीकांत को दुबई से एक अच्छी नौकरी का ऑफर आया।

"बेटा तू पहले जाकर अच्छे से सेटल हो जा फ़िर भूमिजा को भीे ले जाना",केशवनन्दन जी ने कहा।

श्रीकांत के जाने के बाद घर के सारे कामकाज का भार भूमिजा पर आ गया।

"आखिर तुझे काम ही क्या है। कौनसे बच्चे पालने हैं। या फ़िर पति की सेवा करनी है", सुमित्रा जी हर वक़्त ताना दिया करतीं।

हाँ मगर जब भी कभी भूमिजा बच्चे को हाथ भी लगाती तो जैसे उसपर तानों की वर्षा कर देतीं।

"छूना मत गलती से भी इसे। बाँझ कहीं की, नज़र लगाएगी क्या मेरे पोते को। कितनी बार कहूँ दूर रहा कर इससे और ना जाने क्या क्या........", सुमित्रा जी कह दिया करतीं।

कई बार तो केशवनन्दन जी उन्हें डांट कर चुप करवाते,"ये क्या बोले जा रही हो। थोडी तो शर्म करो। क्यूँ बेचारी का हर वक़्त दिल दुखाती हो। ईश्वर से डरो वरना पछताना पड़ेगा। ऐसा ना हो किसी दिन इसी का चहरा देख तुम्हे जीवन गुज़ारना पड़े। तब क्या ये बातें तुम्हे कचोटेंगी नहीं", वो कहते।

तब तो सुमित्रा जी चुप हो जातीं मगर ये तो उनके घर की रोज़ की कहानी थी।

अभी वंश दो साल का भी नहीं हुआ था कि भरत को कंपनी की दूसरी ब्रांच में शिफ्ट कर दिया गया। वो ऑफिस उनके घर से ज़रा दूर था इसलिए जानवी ने एक दिन अचानक आकर सुमित्रा जी से कहा," माँजी बुरा ना मानियेगा लेकिन भरत को रोज़ दफ़्तर आने जाने में बहुत दिक्कत होती है। बहुत समय लग जाता है। तो............ "तो क्या बहू", उन्होंने उसकी बात काटते हुए कहा।


"गाड़ी तो है ही भरत के पास और कहो तो एक ड्राइवर रख लेते हैं।"

"नहीं माँजी उससे बात नहीं बनेगी। समय बहुत बर्बाद होता है। फ़िर घर आकर ये थक जाते हैं और वंश के साथ भी ज्यादा खेल नहीं पाते तो हम सोच रहे थे की कंपनी के पास ही किसी घर में शिफ्ट हो जाएँ", जानवी बोली।

"तो शिफ्ट होने की क्या ज़रूरत है। भरत कंपनी में एक कमरा लेले। और एक दिन छोड़ एक दिन आ जाया करे। बहू हमारा भी तो मन करता है पोते के साथ रहने का", सुमित्रा जी ने कहा।

"अब माँजी ऐसा थोड़े ही होता है। आपको वंश के साथ रहना है इसीलिए हम पति पत्नी अलग रहें ये कहाँ का इंसाफ है। मेरी नई नई शादी है। मैं यहाँ अकेली नहीं रह सकती। मैं भाभी जैसी नहीं", जानवी ने दो टूक जवाब दे दिया।

"तो ठीक है, हम सब शिफ्ट कर लेते हैं। मैं बाउजी से कहकर एक घर खरीदने कह देती हूँ", सुमित्रा जी ने सुझाव दिया।

"नहीं माँजी अब बाउजी की दुकान यहाँ है। वो थोड़े ही रोज़ आ जा पाएंगे। फ़िर भाभी तो हैं ना यहाँ और हम भी आते जाते रहेंगे", जानवी ने उत्तर दिया।

"सीधे-सीधे कहो ना बहू कि तुम अलग होना चाहती हो", अंदर आते हुए केशवनंदन जी ने उसे साफ शब्दों में कह दिया।

जानवी कुछ कह नहीं पाई। कुछ ही दिनों में भरत और जानवी ने उस घर से अलग अपनी एक गृहस्थी बना ली। पहले कुछ दिन तो वो लोग शनिवार रविवार या छुट्टी के दिन आ जाया करते मगर धीरे-धीरे कुछ ही महीनों में यह सिलसिला बंद हो गया। हर बार जानवी बहाना बनाकर छुट्टी वाले दिन आने से मना कर देती।

कभी-कभी सुमित्रा जी उनके यहां चली जाया करतीं मगर धीरे-धीरे उनके मन को भी यह एहसास होने लगा कि शायद जानवी नहीं चाहती कि वो ज्यादा वहाँ आएं जाएँ। मगर उनकी अकड़ उन्हें यह कुबूल ही नहीं करने दे रही थी। वह अब भी हर वक्त जानवी की पैरवी करतीं और भूमिजा की गलतियां निकालती रहतीं।

कई बार केशव नंदन जी ने श्रीकांत से कहा कि वह भूमिजा को भी अपने साथ ले जाए पर भूमिजा ने उनको अकेले छोड़कर जाने से इंकार कर दिया। श्रीकांत हर छे महीने पंद्रह दिन की छुट्टी पर आता तब वह दिन जानवी के बड़े खुशनुमा गुजरते।

उधर सुमित्रा जी की बेटी रुत भी जब गर्भ से हुई और उसका बच्चा वक़्त से पहले ही हो गया तब भी भूमिजा ने उसकी मन लगाकर सेवा की। इतना कुछ करने के बाद भी न जाने क्यों सुमित्रा जी का मन भूमिजा के लिए पिघलता ही नहीं था। वह उसकी छोटी से छोटी गलती पर ताना मारा करती। उनके इस रवैया को देख अब जानवी और रुत भी भाभी की कुछ खास इज्जत नहीं किया करते थे।

हां कुछ काम पड़े तो सबसे पहले वो लोग भूमिजा को ही याद किया करते।कभी-कभी तो भूमिजा का भी मन करता है कि वो श्रीकांत के पास चली जाए लेकिन फिर उम्र के इस पड़ाव पर वो उन्हें अकेला छोड़ कर जा भी तो नहीं सकती थी।

श्रीकांत को अभी पिछली छुट्टी पर आए तीन महीने ही हुए थे। इस बार वो लंबी छुट्टी लेकर आया था और तकरीबन एक महीना वहां रुक कर उसने भूमिजा का इलाज शहर के एक बड़े डॉक्टर से करवाया। इस बार भूमिजा पर भी भगवान को तरस आ गया। भूमिजा अब अपने पिछले सारे दुख भुलाकर बहुत खुश रहने की कोशिश करती है मगर जानवी और रुत के बहकावे में आकर सुमित्रा जी अभी भी कभी कभी उसके साथ बहुत ही गलत व्यवहार किया करतीं। मगर इन सबसे बेपरवाह भूमिजा सिर्फ अपना ख्याल रखती और खुद को कामों में मगन रखती।

उस दिन दोपहर..........

खाना खाते वक्त उस दिन फिर से सुमित्रा जी किसी बात पर भूमिजा से नाराज हो पड़ी और उसे खूब खरी-खोटी सुना दी। यहां तक कि उसकी परवरिश पर भी उंगली उठा दी। उस दिन भूमिजा से सहन ना हुआ और वह फफक फफक कर रोते रोते अपने कमरे में चली गयी।

केशव नंदन जी ने उस दिन सुमित्रा जी को फिर से बहुत समझाया, " मेरी समझ से परे है क्यों तुम उस बेचारी के साथ हर वक्त ऐसा व्यवहार करती हो। आखिर क्या कसूर है उसका। एक बार मैं तुम्हें बता भी चुका हूं कि मैं विवाह से पहले ही सारी परिस्थिति जानता था फिर भी तुम उसे ताने मारने का कोई मौका भी नहीं चूकती। पहले तुम्हें उसके बाँझ होने से दिक्कत थी अब तो वह बेचारी गर्भ से है। कम से कम इस हाल में तो उसे शांति से रहने दो तुम। मैं आखरी बार आज चेतावनी दे रहा हूं ईश्वर से डरो वरना बहुत पछताओगी। "

केशवनंदन जी की वो चेतावनी जैसे वाकई में आखिरी चेतावनी ही बन कर रह गई। कुछ ही देर बाद जब सुमित्रा जी और केशवनंदन जी अपने कमरे में बिस्तर पर लेटे हुए थे, केशव नंदन जी बाथरूम जाने के लिए उठे मगर वहीं चक्कर खाकर गिर पड़े और उनके सर पर बहुत जोर से चोट आई।

कमरे के फर्श पर लहू बिखर गया। सुमित्रा जी के तो होश उड़ गए। मगर अभी भी अकड़ की मारी सुमित्रा जी ने भूमिजा को आवाज ना देकर भरत को फोन लगाया।

" बेटा तेरे बाउजी अचानक से चक्कर खाकर गिर पड़े हैं और सर पर शायद बहुत गहरी चोट आई है। वह लहूलुहान पड़े हैं। तू जल्दी से आजा", वो भरत के फोन उठाते ही बोलीं।

फोन शायद स्पीकर पर था क्योंकि दूसरी तरफ से भरत की बात काटते हुए जानवी की आवाज आई, "अरे पागल हो गए हो क्या। बाहर तूफान देखा है कितना जोरों का है। उन लोगों की तो उम्र हो चली है तुम्हें अगर रास्ते में कुछ हो गया तो। और फिर है तो भाभी वहां पे। तुम कह दो कि तुम्हारी गाड़ी खराब है तुम नहीं जा सकते".....

" मां वो असल में मेरी.... " हां कोई बात नहीं बेटा तुम गाड़ी ठीक करा लो फिर आ जाना। मैं कोई इंतजाम देखती हूं", उन्होंने फोन रख दिया और तुरंत अपनी बेटी रुत को फोन लगाया।

उसके फोन उठाते ही वो बोली, "बेटा जल्दी कुछ कर तेरे बाबूजी के सर पर बहुत चोट आई है। इस भूमिजा से तो मुझे कोई उम्मीद नहीं है। कहीं ऐसा ना हो कि उसे कहने जाऊं तो और मामला बिगड़ जाए। तू अपने पति से कह की कुछ इंतजाम कर बेटा। "

"मां मैं इंतजाम तो जरूर कर देती मगर इस वक्त वो शहर में नहीं है और मैं छोटू के साथ इस तूफान में अकेले कुछ नहीं कर पाऊंगी। आप प्लीज ऐसा करो जल्दी से एम्बुलेंस बुलवा लो और अस्पताल चले जाओ तूफान थमने पर मैं वहां आती हूं", उसने फोन रख दिया।

इतने में भूमिजा वहाँ उनके लिए चाय लेकर आई। कमरे का दरवाजा खटखटाया मगर जब किसी ने आवाज ना दी तो दोबारा जोर से खटखटाकर वो दरवाज़ा खोलकर अंदर गयी। कमरे के अंदर घुसते ही जो नजारा उसने देखा तो उसके होश उड़ गए। हाथ से चाय की प्याली छूट गई और वह तुरंत बाऊजी के पास दौड़ी।

" मांजी ये कैसे हुआ और आपने मुझे आवाज क्यों नहीं दी।"

अब तक खून बहुत ज्यादा बह चुका था। भूमिजा ने फ़ौरन एम्बुलेंस को फोन लगाया और जैसे तैसे केशव नंदन जी के सर पर टॉवल बाँध बांधकर और उनके मुँह पर पानी के छीटे डाल डाल उन्हें होश में लाने की कोशिश करती रही। मगर कुछ नतीजा ना निकला। इतने में ही एम्बुलेंस भी आ गई। उसने फौरन उन लोगों को बाउजी के कमरे में बुलाया और उनको एंबुलेंस तक पहुंचवाया।

"मांजी आप जल्दी एंबुलेंस में बैठिये। मैं घर को ताला लगाकर आई।"

सुमित्रा जी के कानों में मगर शायद अब केशवनंदन जी के स्वर गूंज रहे थे।

"तुम रहने दो बहु, इतने तूफान में तुम्हारे लिए हमारे साथ आना सुरक्षित नहीं", उन्होंने कहा।

"आप कैसी बातें कर रही है मांजी। आप लोगों से बढ़कर मेरे लिए और कुछ भी नहीं है। भैया आप गाड़ी घुमाइए मैं अभी ताला लगा कर आई", कहते हुए वह बारिश में भीगते हुए जल्दी से घर की ओर बढ़ी।

अस्पताल पहुंचकर केशव नंदन जी को सीधे आईसीयू में भर्ती कराया गया मगर डॉक्टरों के मुताबिक तब तक उनका बहुत ज्यादा खून बह चुका था।

आखिर जिसका डर था वही हुआ। करीब छे घंटों की मशक्कत के बाद भी डॉक्टर नाकामयाब रहे और केशवनंदन जी, सुमित्रा जी को हमेशा के लिए छोड़ कर चले गए।

भूमिजा ने भरत को और रुत को फोन लगाने की कोशिश की मगर दोनों में से किसी ने फोन नहीं उठाया। उस वक्त भूमिजा के पास इतने पैसे भी नहीं थे कि वह अस्पताल का बिल चुका पाती ना ही वो अपना कार्ड लाई थी। उसने खिड़की से बाहर देखा तो उसे एक सुनार की दुकान दिखाई दी।

"मैं अभी आई मांजी", कहकर वो उस तरफ निकली।

आकर उसने अस्पताल का बिल चुकाया और फ़िर बाउजी को घर ले जाने का इंतज़ाम करवाया।

तूफानी हवा को चीरती हुई एम्बुलेंस वापस घर पहुँची मगर केशवनंदन जी सुमित्रा जी के साथ नहीं थे। अगले दिन सुबह भरत का फ़ोन आया,"भाभी कहाँ हैं आप। कल फ़ोन नहीं लगा आपका।"

"घर आ जाईये भैया, बाउजी नहीं रहे", कहते हुए भूमिजा रो पडी।

पिछली दोपहर से जो डटकर लड़ रही थी वो ये शब्द कहते हुए टूट गयी।

कुछ ही देर में भरत और रुत परिवार समेत वहाँ पहुँचे। बाकी रिश्तेदारों को भी इख़्तिला कर दी गयी थी। सो सभी पहुँचे। बस कोई नही पहुंच पाया ती श्रीकांत। देर सुबह जब उसका फ़ोन आया और उसे भूमिजा ने बाउजी के बारे में बताया तो वो जैसे टूट सा गया। "प्लीज् भूमिजा बाउजी को अस्पताल में रखवा लो। मैं कमस्कम उनके आख़री दर्शन तो कर लूँ", मगर वहाँ भरत और रुत के होते हुए भूमिजा की कौन सुनता। आखिर सबको अंतयेष्टि की जल्दी थी। सब इंतज़ाम भी हो चुका था, सो भूमिजा रोती रह गयी मगर किसीने श्रीकांत का दर्द समझने की ज़रूरत नहीं समझी।

जब मुख़ाग्नि देने की बारी आई तो भरत ने बड़े भाई के वहाँ उपस्थित ना होने का हवाला देकर पंडित जी से कहा कि ये फर्ज़ वो निभाएगा।

"तुम रहने दो। कल तुम्हारी गाड़ी ख़राब थी। रुत का पति कहीं बाहर था। तुम लोग जिनके लिए मैंने इतना कुछ किया उन्होंने ये तक ना सोचा की हमने कुछ खाया होगा कि नहीं , अस्पताल में देने को हमारे पास पैसे होंगे की नहीं। रुत के बच्चे की सेवा कर उसे भूमिजा ने जीवन दान दिया। वंश के वक़्त जानवी तुमको भूमिजा ने ज़मीन पर कदम तक नहीं रखने दिए। इतनी बेइज़्ज़ती के बावजूद भी मन लगाकर तुम लोगों की और मेरी भी सेवा की। और आज जब ये बेचारी इतने वर्षों बाद प्रेग्नेंट है तो तुम में से किसी को इसपर और तो और अपने बड़े भाई पर तरस नहीं आया। अगर कल इसे कुछ हो जाता तो तुम सब क्या मुँह दिखाते ईश्वर को। मुझे तो मेरे किए की अति कठोर सज़ा ईश्वर ने दे दी है और ये सज़ा शायद तुम्हारे बाउजी ही सुनाकर गए हैं। मगर तुमको भी तुम्हारे किए की सज़ा तो मिलनी ही चाहिए। बाउजी के अस्पताल का बिल चुकाने को जो अपनी दादी का पुशतैनी कंगन एक झटके में बेचकर आई हो अपने पिता की अंतयेष्टि का अधिकार उसी संतान का है तुम जैसे नालायकों का नहीं।"

"माँ ये कैसी नीति विरुद्ध बात कर रही हो। पागल हो गयी हो क्या", भरत बोला।

"कोई नीति नहीं, कोई रीति नहीं। जब बाउजी के प्रति अब तक सारे फर्ज़ भूमिजा ही निभाती आई है तो ये आख़री फर्ज़ भी अब मेरी बहू ही निभाएगी", कहकर सुमित्रा जी ने पंडित को इशारा किया और भूमिजा से कहा, "जा बेटा अपने पिता को अब बिदा कर। श्रीकांत के यहाँ ना होते हुए ये तेरा फर्ज़ और हक़ दोनों हैं।"



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