ददिया माँ
ददिया माँ
माही कि नज़र बार बार घड़ी कि ओर जाती। आखिर आज उसकी बच्ची का नामकरण था। और उसकी ददिया माँ जो कि अब परदादी कहलाएंगी, उनका उसे बड़ी बेसब्री से इंतज़ार था।
वैसे तो उम्र के चलते अब वो अपने गाँव से बाहर ज्यादा आतीं जाती नहीं थीं मगर माही की ज़िद थी की पड़पोती का नामकरण उसकी प्यारी ददिया माँ के बगैर नहीं होगा।
उनका इंतजार करते करते माही बीते ख्यालों में खो गयी जब उसने सुमित्रा देवी को पहली बार उस शिव मंदिर में देखा था। कैसे प्रभु ने उस रोज़ एक नज़र में उनसे उसका रिश्ता जोड़ दिया था। जैसे ही उस रोज़ वो अपने शिव से लड़कर और रूठकर बाहर निकली थीं, छोटी सी उस बच्ची ने उनका पल्लू पकड़ कहा था, "दादी भूख लगी है। प्रसाद दे दो।"
उन्होंने ने भी उसे ऐसे गले लगा लिया था मानो उनकी पोती उन्हें मिल गयी हो। और फिर बन गयी थी दादी पोती की जोड़ी।
सुमित्रा देवी की अपने जीवन में शिव शम्भू से बस एक ही गुज़ारिश थी। "हे शिव शम्भू, इक उम्र बीत गयी तेरे दर पर सर नमाते। जीवन में तुझसे कभी कुछ नहीं माँगा। तूने जो कुछ भी दिया सुख या दुख प्रसाद समझ बस ग्रहण किया। और बस हर वक़्त तेरा गुणगान किया।" प्रभु पर आज एक अधूरी आस लिए तेरे दर पर आई हूँ। ये आँखें बंद होने से पहले पोते या पोती का मुखड़ा तो दिखला दे। एक बार अपनी नज़रों से अपने आँगन के बरगद को फलता फूलता देख लूँ तो शांत सुखी मन से ये नज़रें हमेशा के लिए बंद कर पाऊँगी", सुमित्रा जी मंदिर साफ करते करते भोले शंकर से गुहार लगा रहीं थीं।
यही छोटी सी आस थी सुमित्रा देवी की, जो एक बालिका वधु बनकर उस गाँव में आईं थीं।
पति ठाकुर रामप्रसाद, उनसे उम्र में काफ़ी बड़े थे और पहले से एक दस बरस की बेटी के पिता थे। सोलह बरस की कच्ची उम्र में ही सुमित्रा जी भी माँ बन गयीं। पहले एक चाँद से राजकुंवर को और फिर दो वर्ष पश्चात एक गुड़िया सी बिटिया को जन्म दिया उन्होंने।
बेटे का नाम राज और गुड़िया का नाम चाँदनी रखा गया था। और ठाकुर साहब की पहली और सबसे बड़ी बेटी का नाम स्वर्णा था।
देखते ही देखते स्वर्णा का भी पंद्रह बरस की उम्र में विवाह तय कर दिया गया। दो संतान होने के बाद और बालिका वधु की मुश्किल जिंदगी का अनुभव मात्र उन्नीस वर्ष की उम्र में ही सुमित्रा जी को सिखा चुका था की बाल विवाह अभिशाप है मगर वो चाहकर भी कुछ ना कर पाई।
स्वर्णा के विवाह में राज केवल तीन बरस का और चाँदनी एक बरस की थी। फिर भी उस उम्र में विवाह का सारा बोझ उन्ही के काँधे पे डाला गया था।
शादी के बाद स्वर्णा अपने ससुराल चली गयी और मायके में भी ज्यादा आना जाना ना होता। आखिर पिताजी से नाराज़ थी और सुमित्रा जी से ऐसा कोई रिश्ता बना ही नहीं था की वो उस घर को अपना मायका कहे। वो दोनों तो सहेलियों की तरह रहा करतीं थीं।
धीरे धीरे वक़्त के साथ राज और चाँदनी बड़े होते गए और स्कूल जाने लगे। वक़्त के साथ अब तो गाँव के माहौल में भी बदलाव आने लगा था। मगर सुमित्रा जी के घर में नहीं। बल्कि उनके पति के बर्ताव को देख राज और चाँदनी भी बड़े अकड़ू किस्म के बच्चे बन गए थे।
चाँदनी जब पंद्रह साल की हुई तो उसके पिता ने उसकी शादी की बात कई जगह चलाई। चाँदनी ने बहुत ना नुकुर किया मगर कोई सुनवाई ना होने के कारण वो एक रात के सन्नाटे में घर से भाग गयी। उसके बाद उसका कोई अता पता नहीं लगा। ना ही उसके पिताजी ने उसे ढूंढ़ने की कोशिश करी। उनके लिए तो वो मर चुकी थी।
उधर राज को पढ़ाई के लिए विदेश भेज दिया गया। बड़ा शौक था ना उस घर के चिराग को विदेशी चकाचौंध का। वो वहाँ जाके यूँ गुम हुआ की वापसी का रास्ता ही भूल बैठा।
इधर कुछ वर्ष पश्चात एक लम्बी बीमारी के बाद सुमित्रा जी के पति ठाकुर रामप्रसाद का भी स्वर्गवास हो गया। कुदरत का खेल की जिस बेटे की चाहत में उन्होंने अपनी उम्र से आधी से भी कम उम्र की लड़की से विवाह किया था वो बेटा ही उनके अंतिम संस्कार पर ना पहुँचा।
सुमित्रा देवी बहुत अकेली पड़ गयीं थीं।
एक दिन बेटे ने विदेश से ख़बर भेजी की वो वहाँ एक लड़की से विवाह कर रहा है। उन्हें टिकट भी भिजवाया आने का। बेटे की ख़ुशियों का सवाल था इसलिए सुमित्रा देवी भी ना नहीं कह पायी। चली गयीं विदेश बेटे के बुलावे पे।
शादी एक चर्च में थी क्यूँकि बहू एक ईसाई परिवार से थी। कुछ दिन वो वहाँ रुकीं मगर वहाँ का माहौल उन्हें रास ना आया। दो महीने पश्चात वे घर वापस आ गयीं।
अब क्यूँकि घर में वो अकेली रह गयीं थीं, तों उन्होंने अपने सपने को जीने का इरादा किया। वो शहर चली गयीं और एक समाज सेवी संस्था की मदद से रात्रि स्कूल जाना शुरू कर दिया।
बहुत शौक था उन्हें पढ़ाई का मगर लड़की बनकर पैदा होने का जो गुनाह उन्होंने किया था तों उसकी सज़ा उन्हें अनपढ़ रहकर चुकानी पड़ी थी। मगर अब जब कोई रोक टोक नहीं थी तों उन्होंने भी तय कर लिया अपने सपनों को जीने का।
दिन में उस सामाजिक संस्था में सेवा करतीं और रात को पढ़ाई करतीं। करीबन दस बरस की कड़ी तपस्या के बाद पचास साल की उम्र में जब बहुत से लोग थक जाते हैं तब सुमित्रा जी ख़ुद को अच्छे से शिक्षित कर लिया. और जिस संस्था से वो जुड़ी हुईं थीं उनसे सलाह मशवरा कर उन्होंने अपने गाँव में भी उस संस्था की एक शाखा शुरू करने का सोचा और की अपने जीवन की....
""एक नई शुरुआत""......
स्वीकृति मिलते ही वो अपने गाँव के लिए रवाना हुईं। उनका सुनसान घर उनकी राह देख रहा था। ताला खोल एक पढ़ी लिखी अपने पैरों पे खड़ी महिला ने अंदर कदम रखा। उनकी हँसी की गूँज, उनके रोने की आवाज़, उनके पति की बातें और बच्चों की किलकारीयाँ सब उनके कानों में गूँजने लगीं।
साफ सफाई करवा कर उन्होंने उस घर की मरम्मत करवानी शुरू की। और एक छोटे से स्कूल और बाल गृह की शुरुआत की ऐसे बच्चों के लिए जो ज़रूरत मंद थे। खेती से आईं रकम से सारा खर्च निकल जाता।
रोज़ सुबह वहाँ की शिव मंदिर की सफाई की ज़िम्मेदारी भी उन्होंने ले ली। रोज़ मंदिर की साफ सफाई के बाद पूजा किया करतीं, पोते या पोती की दुआ मांगती और फिर सारा दिन बच्चों में गुज़ारा करतीं।
इतने में एक दिन उनके बेटे का विदेश से फ़ोन आया की उसकी पत्नी गर्भवती है और वो लोग घर वापस आ रहे हैं। सुमित्रा जी तो जैसे अधूरी कामना पूरी हो गयी। महादेव को वो धन्यवाद देते नहीं थक रहीं थी।
अगले महीने वो दोनों वहाँ आ गए। उनकी बहू तो सारा दिन आराम करती। और बेटा भी कुछ नहीं करता। हर बात पर वो कहती तुम लोग रहने दो मैं संभाल लूंगी।
दिन बड़ी हँसी ख़ुशी से गुज़र रहे थे, जब एक दिन उनसे राज ने कहा की उन लोगों ने अपना नया व्यापार शुरू किया हैं जो वो लोग घर बैठे भी कर सकते हैं, इसीलिए अब वो लोग वापस नहीं जाएंगे। लेकिन इस व्यापार की लिए पैसे की ज़रूरत थी तो अगर खेत बिक जाते तो व्यापार अच्छे से शुरू हो पाता।
एक बार को तो सुमित्रा जी राज़ी भी हो गयीं। मगर किस्मत शायद उनका साथ देना चाहती थी। उस रात जब वो काम खत्म कर अपने कमरे में जा रहीं थीं तो उन्होंने राज और उसकी पत्नी को बातें करते सुना।
"डॉर्लिंग फॉर हाउ लॉन्ग विल वी स्टे हियर, आई एम गेटिंग बोरड़"।
जिसपर राज ने जवाब दिया, "डोंट वरी डार्लिग, वैरी सून वी विल बी बैक टू आवर लाइफस्टाइल। माँ इस रेडी तो सैल द फार्मस। एक बार वो सारा पैसा हमारे नाम ट्रांसफर हो जाएगा, वी विल बी बैक टू आवर फन एंड एक्साईटमेंट। टिल देन, थोड़ा नाटक और कर लो।"
और दोनों ज़ोरों से हँस पड़े इस बात से बेखबर की सुमित्रा जी ने उनकी सारी बातें सुन लीं थीं।
दो दिन बाद सुमित्रा जी ने उन्हें एक चेक और एक चिट्ठी पकड़ाई। बेटा ये तुम्हारे लिए चैक और ये चिट्ठी तब खोलना जब मैं तुमसे जुदा हो जाऊँ। कुछ ख़ास है इसमें तुम्हारे लिए।
अब तुम लोग चैन से व्यापार का काम शुरू कर सकते हो।
कुछ दिनों की बाद एक दिन उनकी बहू नहाने जाते वक़्त फिसल गयी। राज हॉस्पिटल ले जाने की लिए जल्दी से घर से निकला और एक हफ्ते बाद की फ्लाइट से दोनों अपनी दुनिया में वापस चले गए सुमित्रा जी को बिन बताए। सुमित्रा जी दुखी तो बहुत हुईं, शिव से भी लड़ी मगर इतना शुक्र था की उनके भोले नाथ ने उनको धोखेबाज़ों से बचा लिया था।
उसी दिन भोले नाथ ने माही को उनकी पोती बनाकर उनके आँगन में भेजने का निर्णय लिया था। मंदिर के बाहर निकलते ही वो मासूम सी बच्ची उन्हें मिली थी। बहुत कोशिश की थी उन्होंने उसके माता पिता को खोजने की मगर कहीं कोई सुराग ना मिलने पर वो उसे अपने साथ ले आईं।
माही ने ही सबसे पहले उन्हें ददिया कहकर बुलाना शुरू किया था। उनके बाल गृह में बच्चे तो बहुत थे मगर माही सारा दिन ददिया ददिया कहती कहती उन्हें अपने पीछे पीछे दौड़ाती। ना उनके बगैर खाती ना सोती।
उधर विदेश में घर पहुँचकर राज ने वो चेक बैंक में डाला। दो दिन बाद पता चला की चेक बाउंस हो गया है। उन्होंने सुमित्रा जी को फ़ोन लगाया और चेक की बारे में पूछा।
सुमित्रा जी ने उत्तर दिया, की जब पैसे अकाउंट में ना हों तो पैसे ट्रांसफर कैसे हों सकते हों। राज हक्का बक्का रह गया।
सुमित्रा देवी ने उन्हें ही उस रात की सारी बातें याद दिलाईं।
"क्या तुम भूल गए की उस रात बहू से तुम क्या कह रहे थे। मैं ज्यादा कुछ कहना नहीं चाहती। वो चिट्ठी तुम्हें हर सच से अवगत करा देगी। पढ़ लेना।"
याद दिलाने पर राज को वो चिट्ठी याद आई। ढूंढकर जब पढ़ा तो उसमें हर वो बात जो उस रात उन दोनों पति पत्नी के बीच में हुई थीं हूबहू लिखी हुईं थीं। वो समझ ही नहीं सका की एक अनपढ़ इतने अच्छे से अंग्रेजी भी सीख गयी होगी की उनकी सारी बातें समझ जाए।
अंत में बस यही लिखा था।
"ऐज़ प्रॉमिसड टू यू, आई सोल्ड माय फार्मस बट ट्रांसफरर्ड ऑल द अमाउंट तो माय ट्रस्ट वर्किंग फॉर नीडी चिल्ड्रन। एंड डूरिंग माय लाइफ ओर आफ्टर माय डेथ यू हेव नो राइट्स टू द ट्रस्ट।
चिठ्ठी पढ़कर राज और उसकी पत्नी के तो होश ही उड़ गए।
इधर सुमित्रा देवी ने अब अपने कस्बे की महिलाओं के लिए भी काम करना शुरू किया। लाचार बेसहारा और उम्र दराज़ औरतों का वो सहारा बनकर उभरी।
खेत खलियानों से आई रकम से उन्होंने ऐसी औरतों के लिए आस निवास का निर्माण किया जिसमें वे हँसी ख़ुशी रहकर अपने सपने साकार कर सकतीं।
पढ़ाई, कढ़ाई, बुनाई, हस्तकला, हर तरह का प्रशिक्षण दिया जाता वहाँ और फिर ये औरतें अपने अपने हुनर पहचान उस दिशा में कार्य कर सुमित्रा देवी का हाथ बटातीं और बाकी समय में बच्चों की देखभाल किया करतीं।
एक सामूहिक परिवार सा बन गया था सुमित्रा देवी का आशियाना जहाँ से गाँव के बहुत से बच्चे शुरुआती पढ़ाई के बाद उनकी मदद से शहर में अपने सपने साकार करने के लिए जाते और वहाँ अच्छे स्कूलों में पढ़कर कितनों की ही जिंदगी संवर गयी।
सुमित्रा देवी भी अब वक़्त के साथ अपनी उम्र के अगले पड़ाव पर पैर रख चुकीं थीं मगर उनका हौसला कहीं से कम नहीं हुआ था।
गाँव के सभी बच्चों के लिए वो दादी बन चुकी थीं, वो दादी जिन्हें प्यार से सब बच्चे माही के दिए हुए नाम के चलते प्यार से ददिया माँ कह के बुलाते।
वो अब केवल अपने ही गाँव की नहीं बल्कि आस पास के इलाकों के लिए रहम दिल ददिया माँ बन चुकी थीं जिनके दर स कोई बेसहारा कभी मायूस नहीं लौटा।
जो बच्चे कामयाबी के शिखर चूम रहे थे उनमें से कई, उनके बहुत से अभियानों में उनका हर संभव साथ निभा रहे थे, कोई पैसों से, तो कोई श्रम दान से तो कोई उनके साथ सर्वजन हित की योजनाएं बनाकर।
माही भी शहर के नामी कॉलेज से डिग्री हासिल कर अब एक प्रोफेसर बन गयी थी। उसी कॉलेज में उसकी पसंद के एक लड़के ने उससे विवाह प्रस्ताव रखा, जिसे ददिया माँ की भी मंज़ूरी से उसने स्वीकार किया। शादी गाँव में ही बड़ी धूम धाम से हुई थी।
ददिया माँ जो कभी एक पोते या पोती का मुँह देखने को तरस रहीं थीं, वो आज माही के चलते पूरे इलाके की प्यारी ददिया माँ बन चुकी थीं और उन हँसते खिलखिलाते चेहरों को देख एक अलग सी आत्मिक शांति और अनुभूति का एहसास किया करतीं थीं और ईश्वर को हर पल धन्यवाद देती नहीं थकती थीं उन्हें सर्वजन हित का ज़रिया बनाने के लिए।
और आज तो कई तोहफ़े हाथ में लिए वो अपने शिव शम्भू को ख़ास धन्यवाद दे रहीं थीं, उन्हें परदादी बनाने के लिए। और फिर चल पड़ीं अपनी प्यारी माही की बच्ची के नामकरण की रस्म निभाने।
उम्र और विपरीत परिस्थितियाँ जहाँ एक अच्छे ख़ासे इंसान को भी तोड़ देती हैं वहाँ एक अनपढ़, विधवा बालिका वधु ने जीवन की इन परिस्थितियों से लड़कर अपने जीवन की एक नई शुरुआत की और सैकड़ों जिंदगियों में उम्मीद का दीप जलाया और समाज को एक सीख भी दी कि
क्यूँ हम हार माने परिस्थितियों से
क्यूँ हम खुद को शिकार बना दें मानसिक बुढ़ापे का
क्यूँ हम अपने आँसू बहाकर बस ईश्वर पर दोष मढ़े
क्यूँ ना हम इस अंधीयारे में इक दीप जलाए
कुछ ज्ञान कि गंगा बहाएं
अपने दायरे के बाहर अपने कदम बढ़ाएं
और इस दीपक का उजियारा चहूँ ओर फैलाएं
