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Ashu Verma Chaubey

Others

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Ashu Verma Chaubey

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ये क्या बचकानी हरकत है

ये क्या बचकानी हरकत है

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"ये क्या बेहूदा हरकत है बाबूजी। अपनी उम्र का तो लिहाज़ कीजिए............."

इसके आगे के शब्द दर्शन लाल जी सुन ही नहीं पाए। उनके कानों मे तो वर्षों पहले कहे गए यही शब्द बस गूँज रहे थे। ये एक वाक्य पुरानी एक याद को इस तरह ताज़ा कर गया कि मानो कल ही की बात हो।

दर्शन लाल जी रेलवे मे मुख्य अभियंता के पद पर कार्यरत थे। क्लास वन अफसर थे। उन दिनों वे ग्वालियर मे रहते थे। बड़े ही अनुशासन प्रिय इंसान। घर हो या बाहर हर चीज उन्हें व्यवस्थित चाहिए होती थी। हर व्यक्ति से उनकी यही अपेक्षा रहती की वो अनुशासन से और तय नियमो के हिसाब से रहे।

कहीं किसी की कोई चूक या मस्ती तो उन्हें बर्दाश्त ही नहीं थी।उनका इकलौता बेटा ऋत्विक, क़रीब सात साल का नन्हा शैतान। अरे नहीं नहीं वो तो बड़ा ही शांत और पढ़ाकू किस्म का लड़का था। हर वक़्त पढ़ाई करता या शांति से बैठकर उनसे प्रवचन सुनता जिसमे वे उसे एक अच्छा इंसान बनने के नुस्खे बताते।

जो वो कहें बस हाँ मे हाँ मिलाता। बीच मे कभी कभी माँ की ओर नज़रें चुराकर देखता और थोड़ा मुस्कुरा देता। यदि पकड़ा जाता तो कह देता, "नहीं मैं तो आप ही की बात सुन रहा था। वो तो माँ एकदम से आईं तो हँस पड़ा।"

हाँ मगर कभी कभी इस बात पर उसकी मम्मी को डांट पड़ जाती।

"मैं उसे अनुशासन सिखा रहा हूँ। बीच बीच मे आकर उसका ध्यान ना भंग करो।"

वो बेचारी, "जी माफ़ कीजिये" कहकर रह जाती और अपने काम मे जुट जाती।

कभी कभी काम करते करते ख़ुद मे ही मुस्कुराती हुई पाई जाती ती दर्शन लाल जी कहते, "क्या रंजना पागल हो गयी हो क्या। ऐसे दाँत फाड़ फाड़ कर काम कर रही हो।"

कभी कभी जो ऋत्विक का होमवर्क ज्यादा होता और उन्हें घर आने मे देर हो जाती तो भी उससे कहते, "तुम लोग अनुशासन कब सीखोगे। सारा दिन खेल मे ही लगाए रखा क्या इसे। मैं ज़रा सा दफ्तर से लेट क्या हो जाऊँ तुम सबको मस्ती चढ़ जाती है। याद रखो जीवन अनुशासन से चलता है उछल कूद से नहीं।"

अब दर्शन लाल जी के माता पिताजी की भी उम्र हो चली थी। सो वो लोग भी गाँव छोड़ उन्ही के साथ रहने चले आए। आखिर दर्शन उनकी औलादों मे से सबसे सबसे संपन्न व होनहार थे।

बड़ा सा बँग्ला था उनका। और वे सबका आदर सत्कार भी ख़ूब करते थे। उन लोगों के आगे कभी ज़बान नहीं खोली थी उनके लाडले ने। दर्शन लाल जी भी ख़ुश थे की चलो अच्छा है अब सब एक साथ रहेंगे।

सबसे ज्यादा उनकी पत्नी रंजना ख़ुश थीं की अब उन्हें भी घरवालों का संग मिलेगा। कुछ माहौल बदलेगा।

छुप छुप के ऋत्विक से कहती, "अब बाबा आ रहे हैं ना। देखना बड़ा मज़ा आएगा। पापा अब तुम्हे ज्यादा बोलेंगे तो बाबा बचा लेंगे।"

"पता है बाबा क्या कहेँगे, "दर्शन.... तुम भी तो कभी बच्चे थे और इससे भी ज्यादा नटखट थे। फिर वो कुछ बोल ही नहीं पाएंगे।" और दोनों ज़ोर से हँस पड़ते।

बाबा दादी के आने के बाद घर मे गहमागहमी बढ़ गयी। ऋत्विक स्कूल से आते ही बाबा के साथ उनके कमरे मे ख़ूब मस्ती करता। शाम तक वो हुडदंग मचता घर मे जिसकी कोई हद ना हो।

बाबा तो ख़ुद ही बच्चे बन जाते। कभी तकिये से लड़ते दोनों। कभी वो लोग घर के सामने वाले पार्क चले जाते, जहाँ दादी भी झूला झूलने लगती और दादा उन्हें झूला झूलाते, ऋत्विक को साइकिल पर घुमाते।

आते वक़्त कभी गुब्बारे लेकर उड़ाते, कभी प्लास्टिक की तुरही बजाते हुए पूरे घर मे दौड़ते फिरते तो कभी गिटियाँ या फिर आँगन मे गिली डंडा खेलते।

"अरे आप तो ऋत्विक से भी छोटे बच्चे बन गए यहाँ आके,"दादी हँसते हुए कहती।

"उम्र का तो ख्याल कीजिए।"

"ये सुनने पर बाबा कहते "बुड्ढी होगी तू और तेरा बेटा मेरा दिल तो अभी मेरे पोते जितना ही है।"

"और अब तो जिम्मेदारियां भी ख़त्म तो बस अब तो पोते संग बचपना और मस्ती मज़ा", कहते हुए ऋत्विक को गुदगुदी करने लगते।

दर्शन लाल जी को इन सब बातों की कानों कान भनक ना लगने पाई। उनके दफ्तर से आने से पहले घर का माहौल एकदम उनके अनुकूल हो जाता।

गंभीर मुद्रा मे बाबा अखबार पढ़ते हुए। सास बहू रसोई मे और ऋत्विक किताबों मे मस्त। कुछ अटपटा तो लगा कई बार दर्शन जी को की जो लड़का बुलाने से भी ना नुकुर करता था वो कैसे ख़ुद ही रोज़ पढता हुआ मिलता है। मगर कुछ समझ नहीं पाए वो। उन्हें लगा शायद बाबूजी उसे समझाते हों।

जैसे ही दर्शन लाल जी बाथरूम मे फ्रेश होने जाते, बाबा पोता फिर एक हो मस्ती करने लग जाते।

ऐसे में ही एक दिन दर्शन लाल जी ने बाबा को ऋत्विक से कहते हुए सुना की,"गया नहाने, आधे घंटे की छुट्टी।"

अब उन्हें शक पड़ा की दाल में कुछ तो काला है। दूसरे ही दिन वे ऑफिस से बिन बताये घर जल्दी आ गए। घर से बाबा, दादी और पोता गायब। रंजना तो यूँ सहम गईं मानो काटो तो खून नहीं। बाग़ में गए तो वहाँ बाबा पोता खेल रहे थे, घास मे लोटपोट हो रहे थे।

इतने में उनके एक दोस्त वहाँ आए और कहने लगे, "अरे दर्शन अच्छा हुआ तूने बाउजी माँजी को बुलवा लिया। अब ऋत्विक का भी कितना मन लग जाता है। वो रोज़ पार्क मे कितने मज़े करते हैं।" सुनकर दर्शन लाल जी का खून खौल उठा। ऋत्विक को वहीं दो चाँटे लगाए और खींच कर घर लेकर आए।

"बाबूजी ये क्या बचपना है", उन्होंने घर आते ही कहा।

"अरे बेटा तू भी तो ऐसे ही खेल कूद के बड़ा हुआ है। भूल गया अपने दिन। क्यूँ बच्चे का बचपन छीनने पे तुला है।"

"एक दम सठिया गया लगता है तू", बाबूजी ने जवाब दिया।

"बाबूजी हमारा ज़माना और था। अब ज़माना बदल चुका है। अब गिल्ली डंडे खेलके कोई सफल इंसान नहीं बन सकता। आजकल बहुत प्रतिस्पर्धा का दौर है। अनुशासन से रहने पर ही इंसान सफल हो सकता है। बस इतना ही कहूँगा की आप सयाने हैं। ये बचपना दोबारा मत कीजियेगा।"

बाबूजी अपने कमरे मे चले गए।

"क्या हो गया है दर्शन को। बचपन भी छीन रहा है अपनी ज़िद मे बच्चे से। मुझसे कहता है बचपना ना करो। अरे मस्ती की भी कोई उम्र है क्या। चलो हमारी छोड़ो बच्चे को तो बक्शे।"

"ये मुझे कहता है की मैं बचपना कर रहा हूँ। अरे बचपना तो ये कर रहा है इस तरह बच्चे पर इतना बोझ थोप कर। ऐसे थोड़ी बच्चा पाला जाता है। बच्चे के साथ तो ख़ुद बच्चा बनना पड़ता है, बच्चा ख़ुद ब ख़ुद ही सब सीख जाएगा", वे अपनी पत्नी से कह रहे थे।

उस साल की वार्षिक परीक्षा के बाद दर्शन लाल जी ने ऋत्विक को हॉस्टल भेज दिया। घर भी अब मुरझा गया। पहले जैसा कुछ ना रहा। सब कुछ अनुशासन से चलता।

ऋत्विक की स्कूल के बाद कॉलेज तक सारी पढ़ाई हॉस्टल मे ही हुई। इंजीनियरिंग फाइनल ईयर मे ही उसकी एक अच्छी कंपनी मे नौकरी भी लग गयी।

साथ ही काम करने वाली एक लड़की ऋतू से उसने अपने माँ बाबूजी की आज्ञा से विवाह किया।

विवाह के दो वर्ष पश्चात उनके घर जुड़वाँ बच्चे हुए, ईशान और इशानी।

डिलीवरी के वक़्त रंजना जी उन्ही के पास काफ़ी समय तक रही मगर दर्शन लाल जी की नौकरी की वजह से उन्हें वापिस जाना पड़ा।

अभी तो ऋतू ने छुट्टियां ले रखीं थीं। जब वापस नौकरी जॉइन करनी पड़ी तो उसने बच्चों की देखभाल के लिए एक लड़की रख ली। रंजना जी भी आती जाती रहती तो उसे बड़ा सहारा रहता।

जब वो वहाँ ना होतीं तो उसकी मम्मी आ जाती। इसी तरह समय कटता गया और बच्चे पांच साल के हो गए।

मगर रंजना जी को बच्चों का रवैया बड़ा अजीब सा लगता। एकदम शांत रहते, गुमसुम से। कोई बच्चों वाली बदमाशी नहीं। मामले की तह तक जाने से उसे पता चला की लड़कियाँ सामने तो बहुत अच्छे से रहती मगर पीछे से बस अपने मे मस्त। बच्चों को डांट के किताब देकर एक तरफ़ कर देतीं। ना उनके साथ खेलती ना बातें करतीं।

उन्होंने ये बात ऋत्विक से की मगर उसे कुछ अटपटा नहीं लगा। उलटे उसने कहा की उसी ने कहा है पढ़ाई करवाने को और खेल कूद ना करने को। जब इस बार वे वापस घर गयीं तो दर्शन लाल जी ने उन्हें चिंतित देख कारण पूछा।उन्होंने सब कुछ निःसंचोच उनको बताया।

दर्शन लाल जी बस हम्म्म...करके सैर को चले गए।

वे अपने मन मे सोच रहीं थीं की यूँही बेवजह ही दर्शन लाल जी को सब बताया। वो भला क्या समझेंगे बच्चे का मन। वो तो ख़ुद ही अनुशासन प्रिय पिता थे।

क़रीब दो महीने बाद दर्शन लाल जी उस शाम जब ऑफिस से आए तो सीधे ही ऋत्विक को फ़ोन लगाकर बोले, "मैंने अपने दफ्तर से स्वेछिक सेवा निवृत्ति ले ली है। तुम थोड़ा बड़ा घर देख लो। किराये का इंतज़ाम मेरी पेंशन से हो जाएगा।"

"हम अब वहीं रहेंगे तो तुम्हे भी बच्चों को पालने मे घरवालों का सहारा हो जाएगा।"

उनकी पत्नी रसोई से उनकी बात सुन रहीं थीं। फ़ोन रखते ही आकर पूछने लगी, "आप सच कह रहे हैं। हम बच्चों के पास रहेंगे।"

"तो क्या तुम्हे मज़ाक़ लग रहा है। तुम्ही ने तो कहा था बच्चों की देखभाल ठीक से नहीं हो रही", उन्होंने केवल इतना ही कहा।

कुछ पल के लिए तो वो ख़ुशी से जैसे उछल पड़ी मगर फिर एक उदासी छा गयी ये सोचकर की कहीं दर्शन लाल जी ईशान और इशानी के साथ भी वही ना करें जो ऋत्विक के साथ किया था।

खैर तीन महीने बाद अपना घर समेट वो दोनों मुंबई के लिए निकल पड़े। बेटा बहू और बच्चों से मिलके वो बहुत ख़ुश थे।

माँ भी बोलीं, "ऋतू अब हम आ गए हैं तो तुम बच्चों की देखभाल के लिए एक ही लड़की रख लो। उनकी देखभाल मैं कर लूंगी उसकी मदद से।

वो जल्दी ही उसके माहौल मे ढल गयीं और बच्चे तो उनसे पहले से ही घुले मिले रहते थे।

हाँ, दर्शन लाल जी अपने मे ज्यादा व्यस्त रहते। अख़बार पढ़ना, टी वी देखना, सैर पर जाना वगैरे वगैरे..........

ऋत्विक और ऋतू भी निश्चिंत अपने काम पर जाने लगे।

एक दिन जब दर्शन लाल जी सैर से थोड़ा जल्दी वापस आए तो देखा दादी पोता पोती ख़ूब मज़े कर रहे थे।

नजाने क्यूँ पर उन्हें हँसी आ गयी। वो भी आकर उनसे बातें करने लगे। पहले तो बच्चे थोड़ा सकूँचाए मगर धीरे धीरे उनके भी क़रीब होते गए।

अब तो दर्शन लाल जी उन्हें कहानियाँ सुनाते, घोड़ा बनते, और कई खेल खेलते। उनकी ट्राई साइकिल को धक्का लगाकर चलाते।

धीरे धीरे बच्चों के चेहरे भी मुस्कुरा उठे। और दर्शन लाल जी भी बदलते गए।

अब तो वो उन बच्चों मे अपना बचपन जीने लगे। घर मे भागा भागी, नीचे गार्डन मे जाना, मसखरी करना और जाने क्या क्या।

एक दिन जब दर्शन लाल जी ईशान और इशानी के साथ बच्चे बने उनके कमरे मे गाँव की नौटंकी का खेल दिखा कर मस्ती कर रहे थे, तब अचानक ऋत्विक आ गया।

"क्या बेहूदा हरकत........................................... ऋतू देखेगी तो क्या कहेगी। आप खेल कूद के बहाने बच्चों को ये सब सिखा रहे हैं। "

"आप तो इतने अनुशासन प्रिय इंसान हैं। आपसे ऐसी बचकानी हरकत की उम्मीद नहीं थी। इन्हें पढ़ाने लिखाने के बजाय आप ये सब कर रहे हैं। ये कोई गाँव के नहीं मुंबई मे रहने वाले बच्चे हैं। इनके दोस्त क्या कहेँगे कि इनके घरवाले इतनी बचकानी हरकतें करते हैं", ऋत्विक बोले जा रहा था।

मगर उनके कानों मे तो बस वहीं वाक्य गूँज रहा था

कुछ कहे बगैर वो सर झुकाकर अपने कमरे मे चले गए।

शायद आज महसूस कर पा रहे थे उस पीड़ा को जो उन्होंने बरसों पहले अपने पिताजी को दी थी।

शायद आज समझ पा रहे थे कि बच्चों के साथ बचपन जिया जाता है।

उधर ऋतू भी आ चुकी थी। आज उसे घर का माहौल कुछ अजीब लगा। सन्नाटा सा।

माँ से पूछा कि क्या हुआ तो उन्होंने उसे सब विस्तार से बताया।

"माँ आप ही हैं जो ऋत्विक को समझा सकती हैँ। वो भी अपने बाबूजी कि गलती दोहरा रहा है। इसमें मैं कुछ नहीं कर पाऊँगी", माँ से कहकर वो अंदर चली गयी।

ऋत्विक ने भी शायद सुन लिया था उसे माँ से बात करते हुए। माँ ने ऋत्विक को बाहर बुलाया और नीचे ले जाने के बहाने लॉन मे ले गयीं।

"बेटा जब तुम छोटे थे तो तुम्हारे बाबूजी तुम्हे सदा अनुशासन का पाठ पढ़ाया करते थे और तुम चोरी चोरी मुझे देख मुस्कुरा दिया करते थे। तुम्हारी हँसी कि खातिर मैंने कितनी ही बार उनसे डांट खाई।"

"फिर जब बाबा और दादी हमारे साथ रहने आए थे तब तुम बाबा के साथ ऐसी हरकतें कर कितना ख़ुश हो जाया करते थे।"

"याद जब बाबूजी तुम्हे हॉस्टल भेज रहे थे तो तुम बाबा को पकड़ पकड़ कर रो रहे थे।"

"और आज वही तुम हो मगर अपने बाबूजी कि जगह खड़े हो गए हो।"

"ये कैसा बचपना कर रहे हो तुम ईशान और इशानी से उनका बचपन छीनके", माँ ने कहा।

"माँ तब ज़माना और था, आज ज़माना बदल चुका है। कितनी चीप लगती है ऐसी हरकतें। कोई देखेगा तो क्या सोचेगा।"

"और आजकल कि पढ़ाई का बोझ आप नहीं जानती। इन हरकतों कि कोई जगह नहीं है आज के लाइफस्टाइल मे", ऋत्विक ने जवाब दिया।

"बेटा ना ज़माना तब बदला था, ना अब बदला है। तब भी बाबूजी को तेरी पढ़ाई कि फ़िक्र थी और आज तुझे भी है।"

"तब भी तेरे बाबूजी भी पढ़ लिखकर अफसर बने थे और तू भी बना है।"

"बच्चा तू भी था और बच्चे ये भी हैं। मस्ती तू भी करता था और मस्ती ये भी करते है।"

"और तो और तू भी अपने बाबूजी की ही तरह बचकानी हरकत कर रहा है, बच्चों के बचपन को नज़र अंदाज़ करके।"

"तो फिर बदला क्या है",माँ ने पूछा।

इतने मे ऋतू भी वहाँ आ गयी।

"माँ सही कह रही है ऋत्विक। तुम आज भी मिस करते हो अपने बाबा के साथ की हुई मस्ती को तो फिर अपने बच्चों से क्यूँ छीन रहे हो ये मस्ती भरे पल।"

"आज अपनी इस बचकानी हरकत से बाबूजी का भी दिल दुखा दिया तुमने", ऋतू ने कहा।

ऋत्विक उन लोगों को बिना कोई जवाब दिए वापस घर चला गया।

वो दोनों बस इक दूजे को देखती ही रह गईं।

घर पहुँचा तो बाबूजी अपने कमरे मे और बच्चे अपने कमरे मे बातें कर रहे थे।

"क्या अब हमें भी पापा हॉस्टल भेज देंगे। मगर मेरा तो दादाजी के बिना मन ही नहीं लगेगा। काश पापा इस बात को समझ जाएं। दादाजी भी तो कितने उदास बैठे हैं", दोनों आपस मे बोल रहे थे।

बाबूजी के कमरे मे गया और बोला,"ये क्या बचकानी हरकत है पिताजी।"

"अब मैंने क्या किया", दर्शन लाल जी बोले।

"क्या पिताजी मैंने नासमझी मे कुछ कह दिया तो बजाए की मुझे डाँटने के समझाने के आप तो ख़ुद ही बच्चों का सा मुँह चढ़ा कर बैठ गए।"

"अब ये बचपना नहीं तो और क्या है।"

बाबूजी ज़ोर से बच्चों की तरह हँस पड़े और हाथ उठा उठाकर नाचने लगे।

"अब आया उंठ पहाड़ के नीचे। यही तो मज़ा है बचपन की शरारतों का। कुछ कहा भी नहीं और बच्चों सा रुआंसा हो तुझे भी मना लिया।"

"मैं तो जीत गया। मैं तो जीत गया", कहते कहते वो ज़ोर ज़ोर से तालियां बजा रहे थे।

अभी अभी लौटी माँ और ऋतू भी ये तमाशा देख मुस्कुरा रहीं थीं। ऋत्विक भी हाथ बांधे खड़ा उन्हें देख हर्षित हो रहा था।

और बच्चे वो भी आकर दादाजी के साथ ज़ोर ज़ोर से उछल उछल कर तालियां बजाने लगे।



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