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Ashu Verma Chaubey

Inspirational

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Ashu Verma Chaubey

Inspirational

कौशल्या निवास

कौशल्या निवास

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"भाई, आर्या बिल्डर्स के विलाज़ की नई स्कीम लॉन्च हो रही है। क्या कहते हो देखने चलें क्या", रिद्धि ने मुंबई में अपना मुकाम तलाश रहे बड़े भाई ऋत्विक से पूछा।

"ठीक है रिद्धि मैं इस शनिवार घर आता हूँ तो चल चलेंगे। तब तक मैं लोन अमाउंट और किश्तें वगैरह चेक कर लेता हूँ। साथ ही विला की कीमत और बाकी जानकारियां अगर दे सको तो बता देना, क्यूँकि वहाँ जाने से पहले मैं देख लूँ की मैं अफॉर्ड कर पाऊँगा की नहीं वरना यूँही समय बर्बाद होगा", ऋत्विक ने उसे जवाब दिया।

रिद्धि खुद पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर थी और एक जानी मानी बहुराष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत थी। उधर उसका बड़ा भाई ऋत्विक एक चार्टेड अकाउंटेंट था और मुंबई की एक अच्छी फाइनेंसिग कंपनी में फाइनेंस हैड के पद पर कार्य कर रहा था।

"अरे भाई ये कैसी बात कर रहे हो तुम। मैं भी तो हूँ ना तुम्हारा साथ देने के लिए। क्यूँ चिंता करते हो। तुम बस आ जाओ। पैसों का इंतज़ाम हो जाएगा"।

"नहीं रिद्धि ये घर खरीदने की ज़िम्मेदारी मेरी है। मैं तुम पर इसका बोझ नहीं डाल सकता। आखिर केतन और तुम्हारे ससुराल वाले क्या कहेंगे कि शादी के बाद अपने सपनों का आशियाना बनाने को मैंने अपनी बहन से रूपये लिए। ये तो शोभा नहीं देता", ऋत्विक ने जवाब दिया।

"तुम्हारे सपनों का आशियाना भाई। ये तुम क्या कह रहे हो। ये सपना हम दोनों का रहा है तो आज तुम्हारा कैसे हो गया। भूल गए इस घर में आधा हिस्सा मेरा होगा और अगर मैं ये नहीं सोच रही की भाभी क्या सोचेगी तो तुम क्यूँ केतन को बीच में घसीट रहे हो। ये तो तुमने वो आशियाना खड़ा होने से पहले ही झगड़े वाली बात कर दी", रिद्धि गुस्से से बोली।

"अरे अरे, सॉरी यार। मेरा वो मतलब ज़रा भी नहीं था। मैं तो बस"........."क्या बस बस", रिद्धि ने ऋत्विक की बात काटते हुए बोला।

"अच्छा बाबा चलो अभी ऑफिस में हूँ। शनिवार को मिलते हैं", कहकर ऋत्विक फ़ोन रखकर अपने काम में व्यस्त हो गया।

उधर रिद्धि ने उस सोसायटी की सारी जानकारी इकट्ठा करना शुरू किया। विला महंगा ज़रूर था मगर शायद उनकी पहुँच से बाहर नहीं। दूसरे वो बिल्डर भी बहुत जाना माना था जिसके काम की काफ़ी सराहना की जाती थी और उसकी कंस्ट्रक्शन कंपनी को कई पुरुस्कार भी मिले हुए थे। फिर शहर में ही ऐसी स्कीम रोज़ रोज़ तो आती भी नहीं थी। और ये भी बस कुछ ही बंगलों की स्कीम थी तो रिद्धि ये मौका हाथ से गंवाना नहीं चाहती थी।

उसके पास उसकी दो साल की सेविंग तो सुरक्षित थी साथ ही उसकी सैलरी भी अच्छी ख़ासी थी तो लोन मे भी कोई अडचन आती नहीं दिख रही थी।सो उसने तो उस खूबसूरत से घर के सपने भी सजाना शुरू कर दिया था। मन ही मन तो उसने घर के इंटीरियर्स भी करवा लिए थे।

हालांकि वो इस बात से थोड़ा दुखी थी कि शादी शुदा होने की वजह से वो उस घर में ज़्यादा तो नहीं रह पाएगी मगर फिर भी उसका बरसों का सपना साकार होने जा रहा था इस बात की ख़ुशी ज़्यादा थी। फिर ऋत्विक भी कहाँ उस घर में रहने वाला था। वो भी तो मुंबई में ही सेटल्ड था। मगर ये सपना उन दोनों ने मिलकर देखा था और इस सपने को पूरा करने को ही तो बरसों से दोनों जी तोड़ मेहनत कर पैसा जमा कर रहे थे।

रिद्धि ऑफिस से घर आकर रात को ट्यूशन करवाती, घर के छोटे-छोटे खर्चे बचाती तो ऋत्विक भी ऑफिस के बाद कोचिंग सेंटर में क्लासेस लेता। थोड़ी दूरी जाना हो तो ऑटो की जगह पैदल ही चल लेता। घर पर भी शनिवार रविवार को ऑनलाइन ट्यूशन पढ़ाता।

कुल मिलाकर दोनों भाई बहन कई वर्षों से कड़ी मशकत कर रहे थे एक ऐसा ही अपने सपनों का आशियाना बनाने को।

शनिवार को ऋत्विक गांधीनगर पहुँचते ही पहले रिद्धि से मिलने पहुँचा और फिर वो दोनों मिलकर वो प्रोजेक्ट देखने गए। सोसाइटी वाकई काफ़ी खूबसूरती से डेवलप की जा रही थी और सैंपल विला को देख तो जैसे उनका सपना साकार ही हो गया। आखिर ऐसा ही घर तो चाहते थे वो दोनों अपना सपनों का आशियाना सजाने के लिए। सारी बातें तय हो गयी गयीं।

बल्कि एडवांस की रकम तो उन दोनों ने अपनी सेविंग से ही चुका दी। फिर रिद्धि और ऋत्विक माँ पापा से मिलने उनके घर पहुँचे। पेशे से प्राइमरी स्कूल टीचर, उनके पापा बाहर बरामदे मे बैठे बच्चों को ट्यूशन पढ़ा रहे थे। दोनों बच्चों को साथ देखकर तो उनकी आँखों में अलग ही चमक आ गयी।

बड़े ज़ोर से माँ को आवाज़ लगाई। वो भी दौड़ती दौड़ती बाहर आयी। "अरे बेटा अचानक और तू अकेला ही। बहू साथ नहीं आयी। और रिद्धि तू ऋत्विक के साथ ही कैसे आज", माँ एक साँस में पूछती चली गयीं।

"अरे कौशल्या ज़रा साँस तो ले लो और बच्चों को चाय पानी तो दो। सवालों की मिसाइल बाद मे दाग़ लेना", पापा ने अपने अंदाज़ मे कहा।

उन्होंने बच्चों को छुट्टी दे दी और सब अंदर गए। रिद्धि माँ की मदद करने रसोई में चली गयी। आखिर अर्थराइटिस के दर्द से पीड़ित कौशल्या अकेले तो इतना काम कर नहीं सकती थीं।

चाय नाश्ते के बाद माँ ने फिर पूछा "अरे ऋत्विक बहू नहीं आयी और तू इस तरह बिन बताए कैसे"।

"क्यूँ माँ अब तुमसे मिलने को इज़ाज़त लेनी पड़ेगी क्या और बहुरानी के बिना क्या घर से निकाल दोगी", कहकर ऋत्विक ज़ोर से हँस पड़ा।

"खैर ऑफिस के कुछ काम से आना हुआ था अचानक तो सोचा मौका अच्छा है सो पहले रिद्धि से मिलने चला गया और फिर उसे लेकर इधर आ गया। सोचा की हम चारों बचपन के साथी कुछ एक्सक्लुसिव वक़्त बिताएं आज साथ में, सो सरप्राइज दे दिया", ऋत्विक ने बात पलटते हुए कहा।

उसी रात ऋत्विक को मुंबई के लिए निकलना था। आखिर ट्यूशन भी तो लेने थे अगले दिन।

जाते वक़्त गली के कोने के पहले मकान पर उनकी नज़र पड़ी। दोनों रुक से गए वहाँ जैसे उनके पैर वहीं जम गए हों। बस देखे ही जा रहे थे उस घर को। कितनी आवाज़े गूँज रही थीं उन दोनों के कानों मे।

"ऋत्विक ठीक से पढ़ ले बेटा। देख पापा कितनी मेहनत करते हैं सिर्फ तुम दोनों की पढ़ाई की खातिर। अरे रिद्धि सुन इस बार तू मेरी साडी ही पहन कर टीचर्स डे पर चली जाना। तेरी ट्यूशन फीस भरनी है बेटा तो नई साडी तो नहीं दिला पाऊँगी।"

उधर से पापा आते दिखे,"अजी सुनते हो रिद्धि का दाखिला इंजीनियरिंग कॉलेज में हो गया। आज बाबू हलवाई से थोड़ी मिठाई ले आओ", माँ की आवाज़ भी साथ ही आयी।

कैसे ऋत्विक की बारात निकली थी वहाँ से। भाभी के पहले क़दमों की पायल की वो गूँज़ अब भी सुनाई दे रही थी।

रिद्धि का तो अपनी विदाई में दिल ही टूट गया था क्यूँकी वो जानती थी की उस दिन वो माँ पापा के साथ साथ उस घर से भी सदा के लिए विदा ले रही थी। वो जानती थी की अब वो कभी लौटकर उस घर मे दोबारा नहीं आ पाएगी। यहाँ तक की अपने पगफेरों के लिए भी नहीं।

शादी के अगले ही दिन माँ पापा ने भी उस घर से बिदाई ले ली थी और इस छोटे से किराए के मकान में शिफ्ट हो गए थे।अपने परिवार के सपने पूरा करने को उन्होंने अपना आशियाना ही कुर्बान कर दिया।

आखिर पहले उन दोनों की पढ़ाई फिर बाकी खर्चे फिर दोनों बच्चों की शादियाँ। साथ ही परिवार की और भी ज़िम्मेदारियां ये सब एक मामूली स्कूल टीचर कब तक उठा पाता सो रिद्धि की शादी तक बात आते आते वो घर बिक गया। बहुत रोई थीं माँ अपने आशियाने से बिछड़ते वक्त।

उसी दिन उन दोनों ने ठानी थी की सबसे पहले अगर वो भाई बहन की जोड़ी कुछ बड़ा खरीदेगी तो वो होगा माँ पापा के लिए सपनों का एक आशियाना।

तभी से दोनों कड़ी मेहनत में लगे थे।

"अरे बेटा बहुत दिन बाद इस तरफ। आओ कुछ मिठाई खा लेओ", बाबू हलवाई की आवाज़ से वो दोनों वर्तमान में लौटे।

"अभी नहीं अंकल, थोड़े दिन बाद। और कुछ नहीं बहुत सारी मिठाई ले जाएंगे", दोनों एक स्वर में बोले।

ऋत्विक को स्टेशन छोड़ रिद्धि भी घर के लिए निकली। क़रीब हफ्ते भर में लोन भी पास हो गया और अब उनके सपनों का आशियाना उनके बेहद क़रीब था। रिद्धि और ऋत्विक समय समय पर वहाँ चल रहा काम देखने जाया करते। वैसे तो क्यूँकि वो सोसाइटी बुज़ुर्गों को भी ध्यान में रखकर ही बनाई जा रही थी सो उन्हें ज़्यादा कुछ बदलाव करवाने की ज़रूरत नहीं पड़ी मगर फिर भी उन दोनों ने माँ पापा को ध्यान में रखकर घर की एक एक चीज डिज़ाइन करवाई।

क़रीब दस महीने मे वो सोसाइटी बनकर तैयार हुई। कितनी शांति थी वहाँ। खूबसूरत लॉन, लाइन से खड़े खूबसूरत विला, क्लब हाउस। सभी सुख सुविधाएं मौजूद थीं वहाँ।

फिर रिद्धि ने पूरे घर का इंटीरियर माँ की पसंद के अनुसार करवाया और स्टडी रूम पापा की पसंद का बनवाया। अब वो सोसाइटी और उनके सपनों का आशियाना तैयार था।

कितनी संतुष्टि से दोनों भाई बहन उस घर को देख रहे थे। उसमें नई यादें लिखने की शुरुआत कर रहे थे। नई कहानियाँ बुन रहे थे।

अब ये राज़ उनसे छिपाए नहीं छिपाया जा रहा था। मगर क्या करते उन दोनों ने माँ पापा की शादी की सालगिरह का सरप्राइज रखा था ये आशियाना।

दोनों सालगिरह की तैयारियों में लगे थे। सबको सरप्राइज पार्टी के कार्ड भी जा चुके थे।

सालगिरह के दिन अचानक सुबह सुबह पापा को मकान मालिक का फ़ोन आया। "साहब माफ़ कीजियेगा पर आपको ये मकान खाली करना पड़ेगा।कृपया आप कोई नया आशियाना तलाश लें", उसने दो टूक कहा।

"अरे पर हुआ क्या भाई साहब और हमें थोड़ी मौहलत तो दीजिये", उन्होंने कहा।

इतने में ऋत्विक और रिद्धि उन्हें मुबारकबाद देने के लिए वहाँ पहुँच गए।देखा तो उनकी आखों मे आँसू और माथे पर परेशानी की लकीरें थीं।

"क्या हुआ माँ", दोनों ने एक ही स्वर में पूछा।

"अरे बेटा मकान मालिक ने जल्दी से जल्दी घर खाली करने को कहा है। अब इस उम्र में ये रोज़ रोज़ घर बदलना हमसे कैसे हो पायेगा", पापा बोले।

"पापा, माँ कुछ दिनों में कहा है ना, आज तो नहीं। देख लेंगे। अभी आज के ख़ास दिन आप उदास ना हो। चलिए ये नए कपड़े, आपका तोहफा है। अब जल्दी से तैयार हो जाईये। आज तो हम जी भर के खुशियाँ मनायेंगे", रिद्धि ने कहा।

"मगर बेटा दामाद जी नहीं आए और ऋत्विक तू भी अकेला। आखिर दामादजी और बहू के बिना कैसी खुशियाँ मनाना", माँ ने पूछा।

"अरे वो लोग भी आ जायेंगे पहले आप दोनों तैयार होकर चलिए तो सही"।

कुछ देर में तैयार होकर वो लोग निकले।" कहाँ चल रहे हैं हम, कुछ बताओ तो", पापा ने पूछा।

"बस कुछ ही देर में पहुँच जाएंगे। फिर आप ख़ुद ही देख लीजियेगा", ऋत्विक ने कहा।

गाड़ी तेज़ी से अपनी मंज़िल की ओर बढ़ रही थी। क़रीब आधे घंटे में वो लोग वहाँ पहुँचे। गाड़ी सोसाइटी के अंदर प्रवेश करती हुई एक शानदार विला के आगे जाकर रुकी।

उन दोनों ने बाहर देखा तो उनकी बहू, दामाद, सब नाते रिश्तेदार यहाँ तक की मकान मालिक भी वहाँ गेट पर खड़े उनका इंतजार कर रहे थे।

दोनों अचंभित रह गए। गाड़ी से उतरते ही बहू और दामाद एक ट्रे लेकर आएं जिसमे एक कैंची और एक चाबी रखी हुई थी।

"पापा जी कैंची लीजिये", दामाद जी बोले।

"माँ चाबी उठाईये", बहूरानी बोली।

सब लोग एक तरफ हो खड़े हो गए और ऋत्विक ने पापा से कहा कि वो मेन गेट पर बंधा रिब्बन काटें।

"ये क्या बेटा, किसका घर है ये", उन्होंने उन दोनों से पूछा।

"ज़रा सा सब्र रखें, आपको सब पता चल जाएगा। फिलहाल आप रिब्बन काटें", दोनों ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया।

फिर सब ढ़ोल के शोर के बीच अंदर गए।

"माँ चाबी से ये दरवाजा खोलें", रिद्धि बोली।

दरवाज़ा खोलते वक़्त उन दोनों की नज़र दरवाज़े पर लगी नेमप्लेट पर पड़ी जिसपर लिखा था

""कौशल्या निवास""

जैसे ही दरवाज़ा खुला अंदर से दोनों पर यूँ पुष्प वर्षा हुई मानो आज फिर दोबारा उनका विवाह हो।

आँखों में खुशियाँ सहेजे सामने देखा तो पंडितजी हवन को तैयार बैठे थे। उन्हें देखते ही बोले.....

"आईये यजमान, गृह प्रवेश की पूजा आरम्भ करें।"

"आपका आपके नए घर एवं जीवन में स्वागत है।"



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