जो मैं सह रही हूँ क्या तुम भी वो सह रहे हो
जो मैं सह रही हूँ क्या तुम भी वो सह रहे हो
"तुम्हारा तो ये रोज़ का ही है। आज सर दर्द, कल पेट दर्द, कभी थकावट, कभी नींद ना पूरी होना तो कभी बस यूँही किसी भी बात पर रो देना। महास्वार्थी हो चुकी हो तुम। और ज़रा सा कुछ कह दो तो बस अब ये नया शुरू कर दिया तुमने की तुम्हें यहाँ नहीं रहना। तुम बस ज़िम्मेदारी से पीछा छुड़वाना चाहती हो और कुछ नहीं", आलोक ने अर्पिता को झिड़कते हुए कहा।
रोज़ की तरह अर्पिता की आँखों से फ़िर आँसू बह निकले मगर आज उससे भी शांत ना रहा गया।
"देखो आलोक अब बहुत हुआ, अब ये रोज़ रोज़ मैं डांट नहीं सुनूँगी तुमसे। आखिर कौनसी कमी छोड़ी है मैंने जो रोज़ तुम मुझे कोई ना कोई बात पकड़कर यूँ सुनाते रहते हो। सारा दिन घर के काम मे व्यस्त रहती हूँ। सुबह से उठते ही कभी बच्चों का काम तो कभी तुम्हारा, इससे ऊपर कुछ जीवन ही नहीं रह गया मेरा और जब भी दो घड़ी तुम्हारा साथ चाहती हूँ तो तुम मुझे स्वार्थी करार दे देते हो", ये कौनसी बात हुई।
"क्या ये हर समय दो घड़ी-दो घड़ी लगाए रहती हो। हम सब साथ ही तो हैं। अब और क्या होता है इससे हटके पारिवारिक जीवन में जो तुम्हारे पास नहीं जो हर वक़्त तुम बस शिकायतों का पिटारा खोले बैठी रहती हो", आलोक ने अपनी आवाज़ और ऊँची करते हुए जवाब दिया।
"सबसे पहले तो आवाज़ नीची रखो आलोक। यूँ हर वक़्त मुझे आवाज़ ऊँची कर डराने की कोशिश ना करो। और कौन सी दो घड़ी की बात कर रहे हो तुम। वो घड़ियाँ जब तुम बच्चों के बारे में मुझसे पूछते हो या फ़िर वो घड़ियाँ जब तुम अपने दफ़्तर की बातें मुझे खड़े-खड़े ही बताकर फ्रेश होने चले जाते हो। याद भी है कि आख़िरी बार तुमने मुझसे कब पूछा था कि क्या किया आज दिन भर। शायद नहीं ना। मुझे तो याद नहीं की आखिरी बार कब तुमने मेरे लिए समय निकाला था", अर्पिता ने सवालिया नज़रों से पूछा।
"हर वक़्त घर बच्चे, घर बच्चे। तंग आ चुकी हूँ मैं। थक चुकी हूँ मैं अब। शोर लगता है मुझे अब ये सब और नहीं बर्दाश्त होता अब ये कौतुहल मुझसे। आखिर मेरी भी तो सीमा है। आज तुम्हे जवाब देना ही पड़ेगा कि मेरा कुछ ख्याल है तुम्हे या फ़िर सिर्फ तुम और तुम्हारे बच्चों तक ही सीमित होकर रह चुकी है तुम्हारी सोच", अर्पिता ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा।
"मेरे बच्चे। व्हॉट डू यू मीन अर्पिता। क्या ये तुम्हारे बच्चे बोल रही हो। माँ हो तुम इनकी या दुश्मन जो इस तरह की बातें कर रही हो। और ऐसा क्या कर दिया तुमने जो इतना सुना रही हो। हर माँ का ये फर्ज़ होता है। तुम कोई अनोखा एहसान नहीं कर रही हो मुझपर या बच्चों पर", आलोक तहश मे आते हुए बोला।
"जानती हूँ आलोक कि मैं कोई अनोखा काम नहीं कर रही। लेकिन कोई नाजायज़ मांग भी नहीं कर रही। ना हीरे जवाहरात मांग रही हूँ ना ही कोई तोहफ़े। बस थोड़ा सा प्यार और तुम्हारा समय और तुम्हारे पास वो भी नही है मेरे लिए। जब भी तुमसे बात करना चाहती हूँ तुम आँख चुराकर परे हो जाते हो। ये कौन सा तरीका हुआ मेरे साथ पेश आने का। दो घड़ी सुकून के पल नसीब नहीं होते मुझे इस घर में। सारा दिन इसी उधेड़बुन में गुज़ार देती हूँ की तुम किस बात पर कैसी प्रतिक्रिया दोगे !! किस लिए?? क्या इसी कटु वाणी के लिए। क्या तुम्हारे प्यार पर कोई हक़ नहीं मेरा", अर्पिता ने नम आँखों से पूछा।
"हाँ हाँ बस अब और कुछ नहीं तो ये रोने धोने का नाटक शुरू कर लो तुम", आलोक चिल्लाया।
"क्या साबित क्या करना चाहती हो तुम। की बड़ा त्याग कर रही हो तुम। ऐसा क्या अलग कर रही हो तुम जो हर वक़्त बस जब देखो त्याग की मूरत बनकर खड़ी हो जाती हो। औलाद है तुम्हारी। कोई एहसान नहीं कर रही हो तुम जो हर वक़्त बस शिकायतों का पुलिंदा खोले रहती हो", उसने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा।
"सारा काम मेरे सर पर है पूरा दिन। उसपर ना कहीं आना जाना ना किसी से मिलना जुलना। इस पर तुम्हारे इस बर्ताव की अधिकारी तो नहीं हूँ मैं कम से कम।"
"ऐसा कौन सा बुरा बर्ताव किया मैंने तुम्हारे साथ और क्या मैं नहीं कर रहा हूँ बराबर तुम्हारे साथ", आलोक ने तुनक कर उत्तर दिया।
"क्या तुम भी बराबर का कर रहे हो। लगता है तुम्हें ऐसा?? और जो मैं सह रही हूँ क्या वो तुम भी सह रहे हो", बताओ अर्पिता ने पूछा।
"अब चुप रहो तुम। मेरा मुँह ना खुलवाओ। वरना अगर बोलना शुरू किया तो ज़ाहिर हो जाएगा कि कौन कितना कर रहा है। अम्मा भी रखी हुईं है तुमने मदद को। कौनसा सब तुम्हारे माथे है। अब मेरा वक़्त बर्बाद ना करो और अगर यही बात करनी हो तो बेहतर है की मुझसे बात ना किया करो तुम", आलोक ने जैसे अर्पिता को फरमान सुना दिया और चला गया बच्चों के कमरे में या यूँ कहें की अपने बैडरूम में सोने। वो बैडरूम जो कभी आलोक और अर्पिता का हुआ करता था मगर बच्चों के होने के बाद पहले तो वो कमरा अर्पिता और बच्चों का हो गया क्यूँकि आलोक को ऑफिस की थकावट मिटाने के लिए स्पेस चाहिए होती थी और फ़िर बच्चे जब कुछ बड़े हुए और रात भर सोने लगे और आलोक भी उनके साथ सोने लगा तो बहुत बार अर्पिता या तो इतनी थकी हुई होती या फ़िर सर दर्द से या फ़िर अपनी सेहत से परेशान होती की रात दूसरे कमरे में चली जाती।
फ़िर आखिर सुबह जल्दी उठ उसे आलोक के ऑफिस जाने के लिए टिफ़िन भी तो तैयार कर उसके तैयार होने से पहले कमरे मे आना होता क्यूँकि बच्चों को अकेला तो नहीं छोड़ा जा सकता था। फ़िर जब बच्चों को देखने के लिए अम्मा आ जाती तब वो जल्दी जल्दी घर के बाकी काम निपटाटी और उसके रहते रहते ही खाना पकाकर फ़िर बच्चों में लग जाती।
अगर यूँ कहें की उसकी दोस्त और सुख दुख की साथी कोई रह गई थी तो वो अम्मा ही थी तो ये ग़लत नहीं होगा।
शाम को आलोक दफ़्तर से आकर नहा धोकर तरोताज़ा होकर कुछ देर टी.वी. देखना चाहता। आखिर सारा दिन दफ़्तर मे थकने के बाद थोड़ा आराम तो बनता है। वहीं वो खाना भी खा लेता। और अपने दफ़्तर की कुछ बातें अर्पिता को सुना देता। फ़िर बच्चों के साथ खेलने चला जाता और अर्पिता काम निपटा बच्चों को सुलाने की तैयारी में लग जाती।
उस वक़्त वो उससे बच्चों का सारा दिन का हाल चाल भी ले लेता। और फ़िर रात चाँद के साथ वो भी अपने बचपन को शायद उन बच्चों मे देखता हुआ गहरी नींद में सो जाता और अर्पिता बस तरसती रह जाती उसके साथ को और तलाशती रहती उसके होने के एहसास को।
सारा दिन की थकी मांदी अर्पिता की आँखों से जैसे रात भर नींद नादारद रहती। हर वक़्त उसे यही लगता जैसे आलोक के पास वो नज़र ही नहीं रही जो उसकी नज़रों की बेचैनी पढ़ सके। उसकी बातों को तो वैसे भी अनसुना कर देता।
ऐसा नहीं की आलोक और अर्पिता के बीच कोई रिश्ता ही नहीं बचा था मगर वो पल आलोक के मूड और मर्ज़ी पर निर्भर थे।
इस माहौल में अर्पिता अब बहुत उदासीन व चीड़चिड़ी रहने लगी और ज़रा सी भी बात उसके मन तक को चीर जाती।
इसपर दिन ब दिन बढ़ती आलोक की बेरुखी उसे एक अवसाद के दलदल में जैसे धकेलती जा रही थी।
बहुत सोचने के बाद उसने अपनी एक सहेली जो की डॉक्टर थी उसकी सलाह से चिकित्साकीय परामर्श भी लिया जहाँ उसे ये पता चला कि ये अकेलापन नार्मल नहीं है। ये डिप्रेशन का रूप भी ले सकता है और आगे जाकर कई बिमारियों का शिकार भी बना सकता है उसे।
उसकी सहेली ने भी उसे समझाया कि इससे पहले की मामला इतना आगे बढ़ जाए की बात उसकी सेहत पर आकर रुके उसे कोई ना कोई कठोर कदम उठाना ही होगा। आखिर कब तक वो एक अम्मा के सहारे सारा भार उठाकर और अपना मन मारकर अपनी चाहतों की बलि देती रहेगी।
अब जब उनका रिश्ता इस हद तक आ चुका था की उन दोनों में पति पत्नी के प्यार भरे रिश्ते जैसा कुछ बचा ही नहीं था तो उसे भी पति और बच्चों से थोड़ा अलग हट और कुछ नहीं तो कम स कम अपने स्वास्थ के बारे मे तो सोचना ही होगा।
उस दिन भी आलोक ने आते ही उसके छोटे बच्चे को ज़ुकाम होने की वजह से हंगामा खड़ा कर दिया और ये तक कह दिया की वो बस अपने निजी स्वार्थ की खातिर अपनी ज़िम्मेदारी अम्मा के सर डाल मुक्त होना चाहती।
सबसे ज्यादा तो आलोक की कही हुई ये बात चुभ की अगर वो बोलने पी आ गया की कौन कितना काम करता है तो उसका मुँह सदा के लिए बंद हो जाएगा।
उसे अपना वजूद कहीं दिखाई ही नहीं दिया उस मकान में। उसे ऐसा लगा जैसे वो किसी पराए परिवार के साथ बस एक मकान में रह रही हो जिसकी कीमत वो अपने काम से चुका रही हो।
इसीलिए उस दिन आलोक से छिड़ी बहस के बाद उसने फैसला लिया आलोक को अपनी मौज़ूदगी का एहसास करवाने का।
उसने अम्मा से बात करके एक और लड़की को काम के लिए बुलवाया और कुछ ही दिनों में उसे पूरा कामकाज सिखाया।
कुछ दिन बाद……….
उस दिन दफ़्तर से जब आलोक शाम को घर वापस आया तो एक लड़की को दरवाज़ा खोलते देख भौचक्का रह गया। "तुम कौन और अर्पिता कहाँ है"।
इतने में अम्मा भी वहाँ आ गईं।
"अम्मा तुम इस वक़्त यहाँ। सब ठीक तो है। बच्चों को कुछ हुआ तो नहीं। वो दोनों ठीक हैं ना", आलोक ने ढेरों सवाल दाग़ दिए।
"सब ठीक है। बच्चे भी बिल्कुल ठीक है। बस जो नहीं ठीक थी वो नहीं है", अम्मा ने जवाब दिया।
"मैं कुछ समझा नहीं अम्मा। ठीक से बताओ बात क्या है", आलोक ने पूछा।
"नहीं वो अर्पिता ये चिट्ठी आपके लिए छोड़कर कहीं बाहर गई है। आप पढ़ लीजिए, ख़ुद ही समझ जाएंगे", अम्मा ने एक लिफाफा थमाते हुए कहा। फ़िर वो लड़की आलोक के लिए शरबत लेने चली गई और अम्मा बच्चों के पास चली गई।
आलोक ने अपना ब्रीफकेस वहीं छोड़ सबसे पहले चिट्ठी खोली।
"प्रिय आलोक,
मैं जानती हूँ कि भगवान की असीम कृपा से विहान और विजया चार वर्ष पहले हमारे जीवन में आए। लेकिन उसके साथ ही उनके आने से पहले कई बार और उनके आने के बाद अक्सर हमारे जीवन में ऐसे पड़ाव आए जहाँ मैंने हर फर्ज़ निभाने के बावजूद भी ख़ुदको बहुत अकेला पाया। बहुत बार तुमसे कहने की कोशिश की मगर तुमने कभी सुना ही नहीं।
आलोक तुम कभी ये कहते हो कि मैंने किया ही क्या है। बस उतना ही जितना हर माँ करती है। सही बात है। मैंने किसी पी कोई एहसान नहीं किया। अपनी संतान के लिए हर माँ वही करती है जो मैंने किया। मगर तुमने क्या किया।
एक पिता बनते ही तुम ये तक भूल गए कि तुम एक पति भी हो।
तुम ये कहते हो की अगर तुम बोले की तुमने क्या क्या किया है तो मेरी बोलती बंद हो जाएगी। मानती हूँ तुमने बच्चों को प्यार दिया, अपना समय दिया मगर मेरा समय चुराया भी तो। इसका क्या जवाब दोगे तुम। तुम बाहर दफ़्तर जाते, दस लोगों से मिलते, खुला आसमान निहारते, सड़कें नापते, हँसते खेलते और दिनभर बच्चों से हटकर कुछ अलग करते। मानती हूँ नौकरी की सीमाओं मे तुम बँधे हो उन्हें नहीं तोड़ा तुमने मगर उस दौरान खुले वातावरण मे स्वास तो लिया तुमने। तब तुम घर आकर थक जाते और एक अलग बिस्तर पर आराम करते। सही भी है। आखिर बच्चे तुम्हे सारी रात जगाएंगे तो अगले दिन काम कैसे करोगे तुम।
मगर सारी रात तो मैं जागती थी और अगले दिन काम भी किया था मैंने वो भी एक बंद चार दीवारी में बिना किसीसे बोले, बिना बात किए, बिना खिड़कियों से बाहर झाँककर साँस लिए। बस काम और काम। और तुमने भी मेरा वक़्त चुराते हुए ये भी नहीं सोचा की कुछ देर अगर बैठ जाओ मेरे साथ बस चुप चाप मेरे साथ तो शायद मेरी भी बोलने की आदत बनी रहे। मेरे भी दिल का ग़ुबार निकल जाए।
हाँ जब बच्चे बड़े हुए तो तुमने उनके साथ खेलते खेलते सोना शुरू कर दिया। वो कमरा जो हमारा था वो तुम्हारा हो गया। और मैं, क्या कभी तुमने देखा की मैं सोई या नहीं, कि कैसे मैं सारी रात बच्चों को पोषक आहार देने के बारे मे जानकारी इक्कठा करती रही और सुबह सूरज निकलते ही उन्हें वो सब बिना थके बिना रुके देती रही जिससे की वो फलें फूलें और बढ़ें।
क्या किसी शाम तुम ये देख पाए की उस दिन मुझे शायद नहाने का भी समय नहीं मिल पाया ना ही मैंने अपने बाल संवारे।
बच्चों की आँखों में खुशियाँ तो तुम आँख मूंदकर पहचानने लगे मगर क्या किसी एक शाम भी तुम मेरी आँखों मे थकावट महसूस कर पाए। क्या कभी मेरी नज़रों से अपनी ज़रूरत महसूस कर पाए।
उसपर जब भी मैंने कहना चाहा तो तुमने सुनने से पहले ही मुझे स्वार्थी करार दे दिया।
उसपर से हमेशा एक ही बात तुम्हारे होंठों पे रही कि मैंने किया ही क्या है ऐसा जो बखान करती फिरती हूँ।
पिछले चार सालों में घर की दीवारों में ख़ुदको कैद कर एक भी छुट्टी लिए बिना ओवर टाइम काम किया मैंने। शायद अपने स्वास्थ से भी खिलवाड़ किया मैंने। और तुमने किसी एक भी शाम ये जानने कि कोशिश भी नहीं की, कि क्या चाहती हूँ मैं। क्या चाहता है मेरा दिल और क्या है मेरी अहमियत तुम्हारी जिंदगी में।
शायद कुसूर तुम्हारा नहीं मेरा ही है क्यूँकि जब मैंने ही ख़ुदको अहमियत नहीं दी तो किसी और से क्या अपेक्षा रखूंँ।
मगर अब इससे ज्यादा मैं ख़ुदको नज़रअंदाज़ नहीं कर पाऊँगी। वर्षो बीते मैं मुस्कुराई नहीं, अपनों संग दो घड़ी बैठ खिलखिलाई नहीं। तुम मुझे भूलते गए और मैं ख़ुदको भुलाती गयी। और नतीजा ये हुआ की मुझे ही ख़बर भी नही लगी और मैं अवसाद के भंवर में फँसती चली गयी।
लेकिन अब इससे पहले की मैं इसमें सदा के लिए दफ़न हो जाऊँ मुझे ख़ुदको तलाश इस अँधे गहरे कुएँ से बाहर निकालना है फ़िर इसके लिए चाहे मैं स्वार्थी क्यूँ ना कहलाऊं।
और जहाँ तक बच्चों की बात है तो तुम्हारे अनुसार मैं तो वैसे भी कुछ करती नहीं इसीलिए जब तक की मैं लौटकर नहीं आती मैंने अम्मा और निर्जला को वहाँ रहने के लिए कह दिया है क्यूँकि तुम्हारे अनुसार जितना मैं करती हूँ उतना तो कोई भी कर सकता है बस उन्हें खुशी से अपना काम करने देना वरना वो काम छोड़ चली भी जाएंगी क्यूँकि वी मेरी तरह बाध्य नहीं है तुम्हारी।"
तुम्हारी नज़रों में
एक स्वार्थी माँ
अर्पिता…….
अर्पिता ये चिट्ठी छोड़, आलोक से अलग अपनी खुशियाँ तलाशने निकल पड़ी। अपने रिश्तेदारों से मिली, पुराने दोस्तों से मिली। ख़ुद पर थोड़ा ध्यान दिया। योगा क्लासेस जॉइन कर अपने बेडोल हो रहे शरीर और उदासीन मन को फ़िर से पहले की तरह आकर्षक बनाने की क़वायद शुरू की।
उधर कुछ ही दिनो में आलोक को भी शायद ये समझ में आ गया की माँ आखिर माँ होती है और हर माँ अलग होती है। और उसकी और उसके कर्तव्यों की तुलना किसी और से नहीं की जा सकती। जो एहसास अर्पिता नहीं करा पाई थी वो एहसास कुछ ही दिनों में उसकी कमी और उसके मकान की दीवारों ने करवा दिया शायद।
"अर्पिता, आई एम सॉरी। अब घर वापस आ जाओ प्लीज् क्यूँकि तुम्हारे बिना ये घर एक हँसता खेलता आशियाना नहीं बल्कि वही मकान लग रहा है जहाँ तुम ख़ुद को इतना तन्हा पाया करतीं थी। अब मैं और बच्चे, नहीं मैं तुम्हारे बिना यहाँ बहुत अकेला हूँ। और तुम्हारी कमी को महसूस कर रहा हूँ।", आलोक ने अर्पिता को फ़ोन पर जल्दी से उसके जीवन में वापस आने की गुहार लगाते हुए कहा।
दोस्तों,
अक्सर ये देखा गया है की एक औरत से माँ बनने तक का कठिन सफर पार करने के पश्चात वो माँ अपने बच्चों के लालन पालन में ऐसा उलझती है की ख़ुदको भूल ही जाती है। उसपर नए नए पिता बने उसके पति ये भूल जाते हैं की उस माँ का अपना भी कोई वजूद है, इच्छाएं हैं, अरमान हैं जिन्हें कुचल कर वो अपने शिशु पर ध्यान देती है। अक्सर बच्चों के संभल जाने तक ना कहीं आना ना कहीं जाना। और तो और रात पर दिन ना उठने का ठिकाना ना सोने का। इस बदली हुई दिनचर्या और परिस्थिति में बहुत बार वो ख़ुदको उलझा हुआ पाती है, कोई मेल मिलाप ना होने से ख़ुदको तन्हा पाती है और ऐसे में अगर उसे विवाह पश्चात के अपने सबसे नज़दीकी रिश्ते यानी अपने पती का भी साथ नसीब ना हो तो वो अकेलापन उसे खाने दौड़ता है।
वो कहती कुछ नहीं मगर दिल ही दिल में वो अपने पति का साथ चाहती वो साथ जो उनका पति पत्नी का प्रेम से ओत प्रोत रिश्ता झालकाए ना की माता पिता का ज़िम्मेदारी भरा रिश्ता क्यूँकि ज़िम्मेदारियां निभाते निभाते तो वैसे भी थक चुकी होती है। और जब वो ये चाहती है तो उसकी भावनाओं पर एक प्रश्नचिन्न लगा दिया जाता है स्वार्थी होने का।
ये एक बहुत बड़ी वजह है प्रसव उपरान्त बढ़ते अवसाद या डिप्रेशन की। ये अकेलापन उसके अंदर हो रहे बदलावों से तो उसे घेर ही रहा होता है किन्तु उसके इर्द गिर्द रह रहे परिवार जनों खास तौर पर उसके पति के व्यवहार पर भी बहुत हद तक निर्भर करता है।
वो केवल एक प्यार भरा एहसास चाहती है और वो एहसास उसमें नई ऊर्जा भर देता है अपनी ज़िम्मेदारी निभाने के प्रति। लेकिन वो चाहकर भी इस एक एहसास, इस एक स्पर्श को तरसती रह जाती है क्यूँकि अगर वो अर्पिता की तरह अपना हक़ मांग ले तो स्वार्थी कहलाती है।
आपका क्या विचार है इस बारे में।
