Charumati Ramdas

Classics


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Charumati Ramdas

Classics


मालकिन - देहातिन

मालकिन - देहातिन

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लेखक : अलेक्सान्द्र पूश्किन

अनुवाद : आ. चारुमति रामदास


हमारे दूर-दराज़ के प्रान्तों में से एक थी जागीर इवान पेत्रोविच बेरेस्तोव की. जवानी में वह फ़ौज में काम करता थासन् 1797 में निवृत्त होकर वह अपने गाँव चला गया और वहाँ से फिर कभी कहीं नहीं गया. उसने एक ग़रीब कुलीना से ब्याह किया थाजो प्रसूति के समय ईश्वर को प्यारी हो गईजब वह सीमा पर तैनात था. घर-गृहस्थी के झँझटों ने उसके दुख को शीघ्र ही शान्त कर दिया. उसने अपने प्लान के मुताबिक घर बनायाकपड़ों की फ़ैक्ट्री शुरू कीनफ़े को तिगुना किया और स्वयम् को समूचे प्रान्त का अति बुद्धिमान व्यक्ति समझने लगाजिसका उसके यहाँ अपने परिवारजनों और कुत्तों समेत निरन्तर आने वाले पड़ोसियों ने विरोध नहीं किया. कामकाज के दिनों में वह मखमल का कुर्ता पहनतात्यौहारों के अवसर पर घर में बनाए कपड़े का कोट पहना करताहिसाब-किताब ख़ुद ही लिखता और सिनेट समाचार’ के अलावा कभी कुछ न पढ़ता. आमतौर पर वह लोकप्रिय ही थाहालाँकि उसे घमण्डी भी समझते थे. उसके साथ उसके निकटतम पड़ोसी ग्रिगोरी इवानविच मूरम्स्की की बिल्कुल नहीं पटती थी. यह ख़ानदानी रूसी ज़मीन्दार था. अपनी जागीर का अधिकांश भाग मॉस्को में उड़ा देने के बाद एवम् अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद वह जागीर के शेष बचे भाग में आ गया और यहाँ भी फ़िज़ूलखर्ची करने लगामगर दूसरी तरह से. उसने अंग्रेज़ी ढंग से एक बगीचा बनवायाजिस पर शेष जमा पूँजी खर्च कर दी. उसके अस्तबल अंग्रेज़ी जॉकियों से लैस थे. उसकी बेटी की देखभाल के लिए अंग्रेज़ी मैड़म थी. अपने खेतों में वह फ़सल अंग्रेज़ी ढंग से ही उगाता :

मगर नकल से औरों की,

उगे न रूसी अन्न...

और इसीलिएखर्चों में कटौती करने के बावजूद ग्रिगोरी इवानविच के नफ़े में कोई वृद्धि नहीं हुईगाँव में भी उसने औरों से ऋण लेना आरंभ कर दियामगर फिर भी उसे कोई बेवकूफ़ नहीं समझताक्योंकि वह पहला ज़मीन्दार थाजिसने संरक्षण-परिषद’ में अपनी जागीर रख दी थी. यह कदम उन दिनों काफ़ी जटिल और साहसिक माना जाता था. उसकी आलोचना करने वालों में बेरेस्तोव सर्वाधिक कठोर था. किसी भी नए कदम का विरोध करना उसकी चारित्रिक विशेषता थी. अपने पड़ोसी की अंग्रेज़ियत’ के प्रति वह उदासीन न रह सका और हर पल किसी-न-किसी बहाने से उसकी निंदा करने से वह न चूकता. मेहमान को अपनी मिल्कियत दिखाते समयअपनी कार्यकुशलता की तारीफ़ के जवाब में वह व्यंग्यभरी मुस्कान से कहता : “हाँहमारे यहाँ ग्रिगोरी इवानविच जैसी बात तो नहीं है. हम कहाँ अंग्रेज़ी तरीके अपनाने लगेरूसी तरीके से ही खाते-पीते रहें तो बहुत है.” इसी तरह के अन्य मज़ाकपड़ोसियों की मेहेरबानी सेनमक-मिर्च के साथ ग्रिगोरी इवानविच तक पहुँचते. अंग्रेज़ियत का दीवाना अपनी आलोचना को उतनी ही बेचैनी से सुनताजैसा हमारे संवाददाता करते हैं. वह तैश में आ जाता और अपने आलोचक को भालू और गँवार कहता.

तोऐसे थे सम्बंध इन दोनों ज़मीन्दारों के बीचजब बेरेस्तोब का बेटा पिता के पास गाँव में आया. उसने विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त की थी और सेना में भर्ती होने का इरादा रखता थामगर पिता इसके लिए राज़ी नहीं होते थे. शासकीय नौकरी के लिए यह नौजवान स्वयम् को अयोग्य पाता था. दोनों ही अपनी-अपनी बात पर अड़े थे और फ़िलहाल युवा अलेक्सेइ ज़मीन्दारों का जीवन जी रहा थाऔर मौके के इंतज़ार में मूँछे भी बढ़ा रहा था.

अलेक्सेइ सचमुच ही बाँका जवान थाबड़े दुख की बात होतीयदि फ़ौजी वर्दी उसके बलिष्ठ शरीर पर न सजती और घोड़े पर तनकर बैठने के स्थान पर वह सरकारी कागज़ातों पर झुक-झुककर अपनी जवानी गँवा देता. जिस तरह शिकार करते समयरास्ते की परवाह किए बगैरवह अपना घोड़ा सबसे आगे दौड़ातावह देखकर पड़ोसी एकमत से कहते कि वह कभी भी सरकारी अफ़सर न बन पाएगा. जवान लड़कियाँ उसकी ओर देखतींकुछ-कुछ तो देखती ही रह जातींमगर अलेक्सेइ उनकी ओर कम ही ध्यान देताउसकी बेरुखी की वजह वे किसी प्रेम सम्बन्ध को समझतीं. वास्तव में उसके ख़तों में से किसी एक पर लिखा गया पता हाथोंहाथ घूम भी चुका था, “अकुलीना पेत्रोव्ना कूरच्किनामॉस्कोअलेक्सेइ मठ के सामनेसवेल्येव डॉक्टर का मकानऔर आपसे विनती करता हूँकि कृपया यह पत्र ए. एन. आर. तक पहुँचा दें.”

मेरे वे पाठकजो कभी गाँवों में नहीं रहे हैंयह अन्दाज़ भी नहीं लगा सकते कि गाँवों की ये युवतियाँ क्या चीज़ होती हैं. खुली हवा में पली-बढ़ी अपने बगीचों के सेब के पेड़ों की छाँव में बैठीवे जीवन और समाज का अनुभव किताबों से प्राप्त करती हैं. एकान्तआज़ादी और किताबें उनमें अल्पायु में ही वे भाव और इच्छाएँ जागृत कर देते हैंजिनसे हमारी बेख़बर सुन्दरियाँ अनभिज्ञ रहती हैं. ग्रामीण कुलीना के लिए घण्टी की आवाज़ एक रोमांचक घटना होती हैनिकटवर्ती शहर की यात्रा जीवन का एक महत्वपूर्ण पर्व बन जाती हैऔर किसी मेहमान का आगमन उनके दिल पर लम्बा या कभी-कभी शाश्वत प्रभाव छोड़ जाता है. उनकी कुछ अजीब हरकतों पर कोई भी दिल खोलकर हँस सकता हैमगर इस सतही आलोचक के मज़ाक उन्हें प्रदत्त गुणों को नष्ट नहीं कर सकतेजिनमें कुछ प्रमुख हैं : चारित्रिक विशेषताआत्मनिर्भरताजिसके बगैरजॉन पॉल के अनुसारकिसी व्यक्ति की महानता का अस्तित्व ही नहीं है. राजधानियों मेंबेशकमहिलाएँ बेहतर शिक्षा पाती हैंमगर उच्च-भ्रू समाज के तौर-तरीके शीघ्र ही उनके चरित्र को कुन्द कर देते हैं और आत्माओं को उनके सिरों की टोपियों जैसा एक-सार बना देते हैं.यह हम उनकी आलोचना करते हुए नहीं कह रहे हैं. मगर हमारी रायजैसा कि एक प्राचीन विचारक ने लिखा हैअपनी जगह सही है.

यह अनुमान लगाना कठिन नहीं हैकि अलेक्सेइ ने हमारी सुन्दरियों पर कैसा प्रभाव डाला होगा. वह पहला नौजवान था जो उन्हें दुखी और निराश प्रतीत हुआपहला ऐसा व्यक्ति था जो उनसे खोई हुई ख़ुशियों और अपनी मुरझाती हुई जवानी की बातें करता : ऊपर से खोपड़ी की तस्वीर वाली काली अँगूठी पहने रहता. यह सब उस प्रदेश के लिए एकदम नया था. सुन्दरियाँ उसके पीछे पागल हो चलीं.

मगर उसके ख़यालों में सर्वाधिक खोई रहने वाली थी मेरे अंग्रेज़’ की बेटी लीज़ा (या बेत्सीजैसा कि ग्रिगोरी इवानविच उसे बुलाते)दोनों के पिता कभी एक-दूसरे के यहाँ जाते न थेउसने अलेक्सेइ को अब तक देखा न थाजबकि सारी नौजवान पड़ोसिनें सिर्फ उसी के बारे में बतियातीं. उसकी उम्र थी सत्रह साल. काली आँखें उसके साँवलेबेहद प्यारे चेहरे को सजीवता प्रदान करतीं. वह इकलौती और इसी कारण लाड़-प्यार में पली सन्तान थी. उसकी चंचलता और पल-पल की शरारतें पिता को आनन्दित करतीं और चालीस वर्षीयअनुशासनप्रियअविवाहित मिस जैक्सन को हैरान करतींजो काफ़ी पाउडर लगाया करतीभौंहों पर सुरमा लगातीसाल में दो बार पामेला’ पढ़तीइस सबके बदले में दो हज़ार रूबल्स प्राप्त करती और इस जंगली रूस’ में उकताहट से मरी जाती.

लीज़ा की सखी-सेविका थी नास्त्यावह कुछ बड़ी थीमगर थी उतनी ही चंचल जितनी उसकी मालकिन. लीज़ा उसे बेहद प्यार करतीउसे अपने सारे भेद बतातीउसके साथ शरारती चालें सोचती. संक्षेप में प्रिलूचिनो गाँव में नास्त्या का महत्त्व किसी फ्रांसीसी शोकांतिका की विश्वासपात्र सखी से कहीं अधिक था.

“आज मुझे बाहर जाने की इजाज़त दीजिए”नास्त्या ने एक दिन मालकिन को पोषाक पहनाते हुए कहा.

“ठीक हैमगर कहाँ?”

“तुगीलोवो मेंबेरेस्तोव के यहाँ. उनके रसोइये की बीबी का जन्मदिन है और वह कल हमें भोजन का निमन्त्रण देने आई थी.”

“क्या ख़ूब!” लीज़ा बोली, “मालिकों का झगड़ा हैऔर नौकर एक-दूसरे की मेहमाननवाज़ी करते हैं!”

“हमें मालिकों से क्या लेना-देना!” नास्त्या ने विरोध किया, “फिर मैं तो आपकी नौकरानी हूँन कि आपके पिता की. आपकी तो अभी तक युवा बेरेस्तोव से नोक-झोंक नहीं हुई हैबूढ़ों को लड़ने दोअगर उन्हें इसी में मज़ा आता है तो.”

“नास्त्याअलेक्सेइ बेरेस्तोव को देखने की कोशिश करना और फिर मुझे अच्छी तरह बताना कि वह दिखने में कैसा है और आदमी कैसा है.”

नास्त्या ने वादा कियाऔर लीज़ा पूरे दिन बड़ी बेचैनी से उसके लौटने का इंतज़ार करती रही. शाम को नास्त्या वापस लौटी.

“तोलिज़ावेता ग्रिगोरियेव्ना”उसने कमरे में घुसते हुए कहा, “युवा बेरेस्तोव को देख लियाबड़ी देर तक देखासारे दिन हम एक साथ ही रहे.”

“ऐसा कैसेसिलसिले से बताओ.”

“लीजिएहम यहाँ से गए : मैंअनीस्या ईगरव्नानेनिला, दून्का...”

“ठीक हैजानती हूँ. फिर?”

“कृपया बोलने देंसब कुछ सिलसिलेवार ही बताऊँगी. तो हम ठीक भोजन के वकत ही पहुँचे. कमरा लोगों से भरा था. कोल्चिन केज़ख़ारव के नौकर थेबेटियों के साथ हरकारिन थीख्लूपिन के...”

“ओह! और बेरेस्तोव?”

“रुकिए भी! तो हम मेज़ पर बैठेसबसे पहले हरकारिनमैं उसकी बगल में...बेटियाँ कुड़कुड़ाती रहींमगर मैं तो उन पर थूकती भी नहीं...”

“ओहनास्त्यातुम हमेशा अपनी इन लम्बी-चौड़ी बातों से कितना तंग करती हो!”

“औरआप कितनी बेसब्र हैं. तो हम खाना ख़त्म करके उठे...हम तीन घण्टे बैठे रहे थे मेज़ परखाना लाजवाब था : केक – नीलीलाल धारियोंवाला...वहाँ से निकलकर हम बगीचे में आँखमिचौली खेलने चले गएऔर नौजवान मालिक वहीं आया.”

“क्या कहती हैक्या यह सच है कि वह बहुत सुन्दर है?”

“आश्चर्यजनक रूप से अच्छा हैख़ूबसूरत भी कह सकते हैं. सुघड़सुडौललम्बागालों पर लाली...”

“सचऔर मैं सोच रही थी कि उसका चेहरा निस्तेज होगा. तोकैसा लगा वह तुझेदुखीसोच में डूबा हुआ?”

“क्या कहती हैंइतना दीवानाइतना उत्तेजना से भरपूर व्यक्ति मैंने आज तक नहीं देखा. वह तो हम लोगों के साथ आँखमिचौली खेलने लगा.”

तुम लोगों के साथ आँखमिचौलीअसंभव!”

“बिल्कुल संभव है! और क्या सोचा उसनेपकड़ लेता और फ़ौरन चूम लेता!”

“तेरी मर्ज़ी नास्त्याचाहे जितना झूठ बोल.”

“मर्ज़ी आपकीमगर मैं झूठ नहीं बोल रही. मैं तो बड़ी मुश्किल से स्वयम् को छुड़ा पाईपूरा दिन उसने हम लोगों के साथ ही बिताया.”

“तो फिरलोग तो कहते हैं कि वह किसी और से प्यार करता है और औरों की तरफ़ देखता तक नहीं है?”

“मालूम नहींमेरी तरफ़ तो उसने इतनी बार देखाऔर हरकारे की बेटी तान्या की ओर भीहाँकोल्बिन्स्की की पाशा को भी देखता रहामगर झूठ कहूँतो पाप लगेकिसी का अपमान उसने नहीं कियाइतना लाड़ लड़ाता रहा.”  

“बड़े अचरज की बात हैघर में उसके बारे में क्या सुना?”

“मालिककहते हैंकि बड़ा सुन्दर हैइतना भलाइतना हँसमुख है. एक ही बात अच्छी नहीं है : लड़कियों के पीछे भागना उसे बहुत अच्छा लगता है. मगरमेरे ख़याल सेयह कोई बुरी बात नहीं है. समय के साथ-साथ ठीक हो जाएगा.”

“आहकितना दिल चाह रहा है उसे देखने को!” लीज़ा ने गहरी साँस लेकर कहा.

यह कौन-सी बड़ी बात हैतुगीलोवो यहाँ से दूर तो नहीं हैसिर्फ तीन मीलउस तरफ़ पैदल घूमने निकल जाइए या घोड़े पर जाइएशायद आपकी उससे मुलाकात हो जाए. वह तो हर रोज़ सुबह-सुबह बन्दूक लेकर शिकार पर निकलता है.”

“नहींयह ठीक नहीं है. वह सोच सकता हैकि मैं उसके पीछे पड़ी हूँ. फिर हमारे पिता भी एक-दूसरे से बोलते नहीं हैंतोमैं उससे कभी मिल ही नहीं पाऊँगी... आहनास्त्या! देखजानती होमैं क्या करूँगीमैं देहातिन का भेस बनाऊँगी!”

“सचमुच ऐसा ही कीजिएमोटा कुर्ता पहनिएसराफ़ान डालिए और बेधड़क चली जाइए तुगीलोवोदावे के साथ कहती हूँ कि बेरेस्तोव आपको देखता ही रह जाएगा.”

“हाँमुझे स्थानीय बोली भी अच्छी तरह आती है. आहनास्त्याप्यारी नास्त्या! कैसा बढ़िया ख़याल है!” और लीज़ा अपने इस ख़ुशनुमा प्रस्ताव को शीघ्र ही मूर्तरूप देने का निश्चय करके सो गई.

दूसरे ही दिन वह अपनी योजना को पूरा करने में जुट गई. उसने बाज़ार से नीले डिज़ाइन वाला मोटा कपड़ा और ताँबे के बटन मँगवाएनास्त्या की मदद से अपने लिए ब्लाउज़ और सराफ़ान काटकर सारी नौकरानियों को उन्हें सीने के लिए बिठा दियाऔर शाम तक सारी तैयारी पूरी हो गई. लीज़ा इन नए कपड़ों को पहनकर आईने के सामने खड़ी हो गई और उसने मान लिया कि इतनी सुन्दर तो वह स्वयम् को पहले कभी नहीं लगी थी. उसने अपनी भूमिका को दोहरायाचलते-चलते नीचे झुकती और मिट्टी की बिल्लियों की भाँति सिर को कई बार झटका देतीकिसानों की बोली में बातें करतीबाँह से मुँह ढाँककर मुस्कुरातीऔर नास्त्या की दाद पाती. बस एक मुश्किल थी : उसने आँगन में नंगे पैर चलने की कोशिश कीमगर घास-फूस उसके कोमल पैरों में चुभतीऔर रेत एवम् कंकर उससे बर्दाश्त न होते. यहाँ भी नास्या ने उसकी सहायता की. उसने लीज़ा के पैर की नाप लीत्रोफ़ीम गड़रिये के पास गई और उसे उस नाप की चप्पल बनाने को कहा. दूसरे दिन उजाला होने से पहले ही लीज़ा उठ गई. पूरा घर अभी सो रहा था. दरवाज़े के बाहर नास्त्या गड़रिये का इंतज़ार कर रही थी. बिगुल की आवाज़ सुनाई दी और भेड़ों का झुण्ड ज़मीन्दार के घर के निकट से गुज़रा. नास्त्या के निकट से गुज़रते हुए त्रोफ़ीम ने उसे नन्हीसुन्दर चप्पलों की जोड़ी थमा दी और उससे इनाम में पचास कोपेक पाए. लीज़ा ने चुपचाप देहातिन का भेस बनायाफुसफुसाकर नास्त्या को मिस जैक्सन के बारे में कुछ सूचनाएँ दीं और पिछवाड़े के उद्यान से होकर खेतों की ओर भागी.

पूरब में लाली छा रही थी और बादलों के सुनहरे झुण्ड मानो सूरज का इंतज़ार कर रहे थेजैसे दरबारी सम्राट की प्रतीक्षा कर हों. स्वच्छा आकाशसुबह की ताज़गीदूबधीमी हवा और पंछियों के गान ने लीज़ा के हृदय को बच्चों जैसी ख़ुशी से भर दियाकिसी परिचित से आकस्मिक मुठभेड़ होने के भय से ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वह चल नहीं रही होबल्कि उड़ रही हो. पिता की जागीर की सीमा पर बने वन के निकट आने पर लीज़ा धीरे-धीरे चलने लगी. यहीं पर उसे अलेक्सेइ का इंतज़ार करना था. उसका दिल न जाने क्यों ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा. मगर हमारी जवान शरारती लड़कियों के दिल में बैठा भय ही उनका सबसे बड़ा आकर्षण होता है. लीज़ा वन के झुरमुट में घुसी. उसकी दबीप्रतिध्वनित होती सरसराहट ने नवयुवती का स्वागत किया. उसकी प्रसन्नता लुप्त हो गईधीरे-धीरे वह मीठे सपनों की दुनिया में खो गई. वह सोच रही थी...मगर क्या एक सत्रह बरस कीबसन्त की ख़ुशनुमा सुबह छः बजे वन में घूम रहीअकेली युवती के ख़यालों को जानना सम्भव है?

तोवह ख़यालों में डूबीदोतरफ़ा ऊँचे-ऊँचे पेड़ों वाले छायादार रास्ते पर चली जा रही थी कि अचानक एक सुन्दर शिकारी कुत्ता उस पर भौंका. लीज़ा डर गई और चीख़ने लगी. तभी एक आवाज़ सुनाई दी, “चुपस्बोगरयहाँ आओ...” और झाड़ियों के पीछे से एक नौजवान शिकारी निकला. “कोई बात नहींसुन्दरी”उसने लीज़ा से कहा, “मेरा कुत्ता काटता नहीं है.”

लीज़ा अब तक भय पर काबू पाकर स्थिति का फ़ायदा उठाने में सफ़ल हो चुकी थी.”ओहनहींमालिक!” कुछ भयभीतकुछ लज्जित होने का नाटक करते हुए वह बोली,”डर लागत है : कैसा तो होव वह दुष्टफिर झपटे है.”

अलेक्सेइ (पाठक उसे पहचान चुके हैं) इस बीच एकटक उस जवान देहातिन को घूरता रहा. “अगर डर लगता है तो तुम्हें छोड़ आऊँगा”वह उससे बोला, “क्या तुम मुझे अपने साथ चलने दोगी?”

“तुम्हें मना कउन करत है?” लीज़ा ने जवाब दिया, “चाह होवे तो राह है और रास्ता तो सबका होवे.”

“कहाँ से आई हो?”

“प्रिलूचिनो सेवसीली लुहार की लड़कीकुकुरमुत्ते चुनने जात हूँ.” (लीज़ा ने हाथ में डोलची पकड़ रखी थी) और तुममालिकतुगीलोवो के तो नहीं?”

“ठीक कहा”अलेक्सेइ बोला, “मैं छोटे मालिक का नौकर हूँ.” अलेक्सेइ अपना दर्जा उसके बराबर बताना चाहता था. मगर लीज़ा ने उसकी ओर देखा और हँस पड़ी. “झूठ बोलो हो,” वह बोली, “बुद्धू न समझो. देखती हूँतुम ख़ुद ही मालिक हो.”

“तुम ऐसा क्यों सोच रही हो?”

“सब देखत हूँ.”

“फिर भी?

“मालिक और नौकर में फ़रक कैसे नाहीं पता चलेकपड़े तो हम जैसे नाही पहने. बोली हम जैसी नाहीकुत्ते पे चिल्लाए भी तो हम जैसे नाहीं.”

लीज़ा अलेक्सेइ को अधिकाधिक अच्छी लगने लगी थी. भले देहातियों से दिखावा करने की आदत न होने सेअलेक्सेइ उसे बाँहों में भरने ही वाला थाकि लीज़ा छिटक कर दूर हो गई और चेहरे पर इतने कठोर एवम् ठण्डे भाव ले आई थी...हालाँकि अलेक्सेइ को यह सब हँसा तो गयामगर साथ ही वह और आगे बढ़ने की हिम्मत न कर सका.

“अगर आप चाहते हैं कि हम आगे भी दोस्त बने रहें,” उसने भाव खाते हुए कहा, “तो अपने आप को बहकने न दें.”

“इतनी ज्ञान की बातें तुम्हें किसने सिखाईं?” अलेक्सेइ ने ठहाका मारते हुए पूछ लियाकहीं मेरी परिचितातुम्हारी मालकिन की सखी नास्तेन्का ने तो नहींदेखो तोकैसे-कैसे तरीकों से ज्ञान का प्रकाश फ़ैलता है.”

लीज़ा को महसूस हुआ कि वह अपनी भूमिका भूल गई है और उसने फ़ौरन स्थिति सँभाल ली. “क्या सोचत होका हम मालिक के घर कभी न जाऊँ हूँ. चलोसब देखत-सुनत हूँ वहाँ पे. फिर भी,” वह बोलती रही, “तुमसे बतियाने से कुकुरमुत्ते न बटोरे जावें. जाओ तुम मालिकइस तरफ़ – मैं जाऊँ अपनी राह. माफ़ी माँगू हूँ...” लीज़ा ने दूर जाना चाहाअलेक्सेइ ने फ़ौरन उसका हाथ पकड़ लिया.

“तुम्हारा नाम क्या हैमेरी जान?”

“अकुलीना.” लीज़ा ने अपनी ऊँगलियाँ अलेक्सेइ के हाथों से छुड़ाने की कोशिश करते हुए कहा, “छोड़ भी देवोमालिकघर जाने का भी बख़त होई गवा.”

“अकुलीनामेरी दोस्ततुम्हारे बापू वसीली लुहार के यहाँ मैं ज़रूर आऊँगा.”

“का कहत हो?” लीज़ा ने ज़ोरदार प्रतिवाद किया, “ख़ुदा के लिएआना मत. अगर घर में पता चलेकि हम मालिक के संग जंगल में अकेले बतियात रहिन तो बुरा होवेबापू म्हारोवसीली लुहारमरते दम तक मोहे मारेगा.”

“मगर मैं तो तुमसे दुबारा ज़रूर मिलना चाहता हूँ.”

“फिर लौट के आऊँ हूँ मैं कुकुरमुत्ते चुनने.”

“मगर कब?”

“चाहे कल ही.”

“प्यारी अकुलीनातुम्हें चूमना चाहता हूँमगर हिम्मत नहीं होती. तो फिर कलइसी समयठीक है ना?”

“हाँ-हाँ.”

“और तुम मुझे धोखा तो नहीं दोगी?”

“नहीं दूँगी धोखा.”

“कसम खाओ.”

”पावन शुक्रवार की कसमआऊँगी.”

नौजवान व्यक्ति जुदा हुए. लीज़ा वन से निकलीखेतों से होती हुईउद्यान में छिपती-छिपाती फैक्ट्री की ओर भागीजहाँ नास्त्या उसका इंतज़ार कर रही थी. वहाँ उसने कपड़े बदलेअपनी शान्तविश्वस्त सखी के प्रश्नों के उड़े-उड़े से जवाब दिए और मेहमानखाने में दाखिल हुई. मेज़ सज चुकी थीनाश्ता तैयार थाऔर पाउडर पुतीलाली में डूबी मिस जैक्सन केक के पतले-पतले टुकड़े काट रही थी. पिता ने सुबह की सैर करने के लिए उसकी प्रशन्सा की. “सुबह जल्दी उठने से बढ़कर और कोई अच्छी बात नहीं है,” वह बोला. अब उसने लम्बी उमर तक जीनेवालों के कुछ उदाहरण दिएजो उसने अंग्रेज़ी पत्रिकाओं से लिए थे और यह कहा कि वे सभी लोगजो सौ वर्षों से अधिक आयु प्राप्त करते हैंवोद्का नहीं पीते और चाहे सर्दी का मौसम हो या गर्मी कासूर्योदय से पहले ही उठा करते हैं. लीज़ा उसकी बातें सुन नहीं रही थी. अपने ख़यालों में वह सुबह की मुलाकात को दोहरा रही थीअकुलीना की नौजवान शिकारी से हुई पूरी बातचीत याद कर रही थीऔर उसकी आत्मा ने उसे कचोटना शुरू कर दिया. अपने आपको बेकार में ही दोष दियाकि उनकी बातचीत शिष्टाचार की सीमा से बाहर क्यों न गईकि इस शरारत का कोई परिणाम नहीं निकलने वालाउसका विवेक बुद्धि पर मात किए जा रहा था. कल की मुलाकात का वादा उसे सबसे ज़्यादा परेशान कर रहा था. उसने लगभग निश्चय कर लिया कि अपनी कसम तोड़ देगी. मगर अलेक्सेइ व्यर्थ ही उसका इंतज़ार करके गाँव में आकर वसीली लुहार की बेटी को ढूँढ़ने आ सकता था – वास्तविक अकुलीना कोमोटीचेचकरू बेबे कोऔर तब वह उसकी छिछोरी शरारत के बारे में जान जाएगा. इस विचार से लीज़ा घबरा गई और उसने अकुलीना के भेस में अगली सुबह फिर वन में जाने का इरादा कर लिया.

उधर अलेक्सेइ भी उत्तेजित थापूरे दिन वह अपनी नवपरिचिता के बारे में ही सोचता रहाउस साँवली सुन्दरी की छबि रात में सपने में भी उसका पीछा करती रही. पौ फ़टने वाली थी कि वह बाहर निकलने के लिए तैयार था. बन्दूक में गोलियाँ भरे बिनावह अपने विश्वस्त स्बोगार को लेकर खेतों की ओर निकल पड़ा और उस जगह पहुँचा जहाँ मुलाकात का वादा किया गया था. बेचैनी से इंतज़ार करते-करते आधा घण्टा बीताआख़िरकार उसे झाड़ियों के बीच नीले सराफ़ान की झलक दिखाई दी और वह अपनी प्यारी अकुलीना की ओर लपका. उसने उसकी उत्तेजना का जवाब मुस्कुराहट से दियामगर अलेक्सेइ ने फ़ौरन चेहरे पर थकान और बेचैनी के लक्षणों को भाँप लिया. उसने इसकी वजह जाननी चाही. लीज़ा ने स्वीकार कियाकि उसे स्वयम् का आचरण बहुत छिछोरा प्रतीत हुआ हैऔर इसके लिए उसे पश्चात्ताप हो रहा हैइस बार वह वादा भी निभाना नहीं चाहती थीऔर यह भीकि यह मुलाकात आख़िरी होगी और वह उससे विनती करती हैकि उस परिचय को भुला देजिससे किसी सुखद परिणाम की आशा नहीं है.

यह सबज़ाहिर हैदेहाती बोली में कहा गया थामगर एक सामान्य लड़की के इन विचारों और भावनाओं से अलेक्सेइ को आश्चर्य हुआ. उसने मीठी-मीठी बातों सेदलीलों से अकुलीना को उसके इरादे से परावृत्त करने का प्रयत्न कियाउसे अपनी अभिलाषाओं की पवित्रता का विश्वास दिलायावादा किया कि वह उसे कभी भी शिकायत का मौका नहीं देगाअपने आपको ही इस पूरे प्रसंग का दोषी ठहरायाउससे चिरौरी करता रहाकि वह उसे जीवन की इस एकमात्र ख़ुशी से महरूम न रखेउससे एकान्त में मिलती रहेचाहे एक दिन छोड़कर ही सहीया फिर हफ़्ते में दो बार ही सही. वह ये सब बड़ी ईमानदारी और आर्तता से कह रहा था और इस क्षण सचमुच ही उसे प्यार हो गया था. लीज़ा चुपचाप उसकी बातें सुनती रही.

“वादा करो,” आख़िर में वह बोली, “कि कभी भी गाँव में मुझे नहीं ढूढ़ोगे और न ही किसी से कुछ पूछोगे. वादा करोकि जब मैं मिलने आऊँतभी मुझसे मिलोगेऔर अधिक मुलाकातों के लिए ज़िद नहीं करोगे.”

अलेक्सेइ पावन शुक्रवार की कसम खाने ही वाला था कि उसने मुस्कुराकर उसे रोक दिया, “मुझे कसम की ज़रूरत नहीं है,” लीज़ा बोली, “तुम्हारा एक वादा ही काफ़ी है.

इसके बाद वे मित्रों की तरह वन में घूमते हुएबातें करते रहेतब तकजब तक लीज़ा ने “बस!” न कहा. वे जुदा हुएऔर अलेक्सेइअकेला रह जाने पर समझ नहीं पाया कि कैसे यह सीधी-सादी ग्रामीण लड़की दो ही मुलाकातों में उसकी मालकिन बन बैठी है. अकुलीना से मुलाकातों में दिलकश नयापन थाऔर हालाँकि इस विचित्र देहातिन की शर्तें उसे काफ़ी कष्टदायक प्रतीत हो रही थींमगर अपने वादे को तोड़ने का ख़याल भी उसके दिमाग़ में नहीं आया. बात यह थीकि अलेक्सेइउस दुर्भाग्यशाली अँगूठी के बावजूदरहस्यमय पत्र-व्यवहार के बावजूद और मायूस निराशा के बावजूद एक भलाजोशीला नौजवान था और उसका दिल था स्वच्छऔर वह मासूम आनन्द को महसूस कर सकता था.

अगर मैं सिर्फ अपनी ही मर्ज़ी से लिखतातो निःसंदेह पूरी तफ़सीलों के साथ नौजवानों के मिलन के बारे में ही लिखता रहताउनके परस्पर बढ़ते आकर्षण एवम् विश्वासउनके कार्यकलापोंउनकी बातचीत का ही वर्णन करता रहतामगर जानता हूँ कि मेरे अधिकांश पाठक मेरी इस ख़ुशी में सहभागी नहीं होंगे. ये विवरण प्यारे लगने ही चाहिए और इसीलिए मैं उन्हें इतना ही कहकर छोड़ देता हूँकि दो महीने भी नहीं बीतने पाए थेमेरा अलेक्सेइ दीवानगी की हद तक प्यार करने लगाऔर लीज़ा भी उदासीन नहीं रह पाई थीहालाँकि उसके मुकाबले में अधिकतर ख़ामोश रहा करती. वे दोनों अपने वर्तमान से ख़ुश थे और भविष्य के बारे में कम ही सोचते.

सम्बन्धों को चिरंतन बनाने का विचार उनके दिमाग में कई बार झाँक जातामगर उन्होंने इस बारे में एक-दूसरे से कभी कुछ नहीं कहा. वजह साफ़ थीअलेक्सेइ अकुलीना से बेतहाशा प्रेम करने के बावजूद उस दूरी को भूला नहीं थाजो उसके और गरीब देहातिन के बीच विद्यमान थीऔर लीज़ा जानती थी कि उनके जन्मदाताओं के मध्य कितनी घृणा की भावना हैऔर वह उनके बीच समझौते की आशा ही नहीं रखती थी. फिर उसका स्वाभिमान भी भीतर ही भीतर एक रूमानी ख़याल को सहला रहा था कि एक दिन तुगीलोवो का ज़मीन्दार प्रिलूचिनो के लुहार की बेटी के कदमों पर गिरेगा. अचानक एक महत्वपूर्ण घटना उनके परस्पर सम्बन्धों में एक नया मोड़ लाते-लाते रह गई.

एक ठण्डी साफ़ सुबह (जैसी शिशिर ऋतु में रूस में अधिकतर होती है) इवान पेत्रोविच बेरेस्तोव घोड़े पर सैर को निकलासाथ में थे तीन जोड़ी शिकारी कुत्तेसाईस और कुछ सेवक-बालक झाँझवाली लाठियाँ लिए हुए. ठीक उसी समय ग्रिगोरी इवानविच मूरम्स्की ने भीअच्छे मौसम से ललचाकर, अपनी पूँछकटी घोड़ी को जोतने की आज्ञा दे दी और तीर की तरह अपनी अंग्रेज़ी ढंग की जागीर की ओर चल पड़ा. जंगल के निकट आने पर उसने अपने पड़ोसी को गर्व से घोड़े पर बैठे देखा. वह लोमड़ी की खाल का जैकेट पहने ख़रगोश का इंतज़ार कर रहा थाजिसे सेवक चीख़ों और झाँझवाली लाठियों से झाड़ियों के पीछे से खदेड़ रहे थे. यदि ग्रिगोरी इवानविच को पूर्वाभास होतातो वह निश्चय ही दूसरे रास्ते पर मुड़ जातामगर उसका बेरेस्तोव से अकस्मात ही सामना हो गया था और अब अचानक ही वह उससे पिस्तौल के निशाने की दूरी पर था. कुछ भी नहीं किया जा सकता था : मूरम्स्की एक भद्र यूरोपियन की भाँति अपने प्रतिद्वन्द्वी के निकट गया और उसने शालीनता से उसका अभिवादन किया. बेरेस्तोव ने उतनी ही तत्परता से उत्तर दियाजैसे कि जंज़ीर में बंधा भालू अपने मालिक के आदेश पर साहबों को झुक-झुककर सलाम करता है.

इसी बीच ख़रगोश झाड़ियों से उछला और खेतों की ओर भागा. बेरेस्तोव और साईस गला फ़ाड़कर चिल्लाएकुत्तों को छोड़ा गया और पीछे-पीछे ख़ुद भी पूरी रफ़्तार से दौड़े. मूरम्स्की का घोड़ाजो इससे पहले कभी शिकार पर नहीं गया थाडर गया और तीर की तरह उड़ चला. मूरम्स्की नेजो स्वयम् को बेहतरीन घुड़सवार समझता थाउसे दौड़ने दिया और मन-ही-मन ख़ुश भी हुआ कि इसी बहाने वह अप्रिय व्यक्ति से वार्तालाप करने से बच गया. मगर घोड़ा खाई के निकट पहुँचकरजिस पर उसने ध्यान नहीं दिया थाअचानक एक किनारे को उछला और मूरम्स्की उस पर बैठा नहीं रह सका. कड़ी ज़मीन पर काफ़ी तेज़ी से गिरने पर वह अपनी पूँछकटी घोड़ी को कोसता हुआ पड़ा रहाजो सँभलकर सवार की अनुपस्थिति का अनुभव करके रुक गई थी. इवान पेत्रोविच उसके निकट आया और पूछने लगा कि उसे कहीं चोट तो नहीं आई. इसी बीच साईस दोषी घोड़ी को लगाम से पकड़कर ले आया. उसने मूरम्स्की को घोड़ी पर बैठने में सहायता कीऔर बेरेस्तोव ने उसे अपने यहाँ आमंत्रित कर लिया. मूरम्स्की इनकार न कर सकाक्योंकि वह कृतज्ञता का अनुभव कर रहा थाऔर इस तरह बेरेस्तोव विजयी भाव से घर लौटाख़रगोश का शिकार करके और अपने प्रतिद्वन्द्वी को घायल अवस्था मेंयुद्धबन्दी की-सी स्थिति में लाते हुए.

नाश्ता करते हुए पड़ोसी काफ़ी दोस्ताना अन्दाज़ में बातें कर रहे थे. मूरम्स्की ने बेरेस्तोव से धोड़ा-गाड़ी देने की प्रार्थना कीक्योंकि उसे महसूस हो रहा था कि चोट के कारण वह घोड़ी पर नहीं बैठ पाएगा. बेरेस्तोव ने उसे बिल्कुल दरवाज़े तक आकर बिदा किया और मूरम्स्की यह वादा लिए बगैर नहीं गया कि दूसरे ही दिन (और अलेक्सेइ इवानविच के साथ) वह प्रिलूचिनो आएगादोस्तों की तरह भोजन करने. इस तरह पुरानी और गहरी दुश्मनी पूँछकटी घोड़ी के डर की बदौलत समाप्त होने को आई.

लीज़ा ग्रिगोरी इवानविच के स्वागत में दौड़ी हुई आई. “इसका क्या मतलब हैपापा?” उसने अचरज से कहा, “आप लंगड़ा क्यों रहे हैंआपका घोड़ा कहाँ हैयह गाड़ी किसकी है?”

“हूँयह तो तुम अनुमान भी नहीं लगा सकतींप्यारी बच्ची,” ग्रिगोरी इवानविच ने कहा और पूरी घटना सुना दी. लीज़ा को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ. ग्रिगोरी इवानविच ने उसे सँभलने का मौका दिए बगैर कह दिया कि कल उनके यहाँ दोनों बेरेस्तोव भोजन के लिए आ रहे हैं.

“आप क्या कह रहे हैं!” उसने पीली पड़ते हुए कहा. “बेरेस्तोवपिता और पुत्र! कल हमारे यहाँ भोजन पर! नहीं पापाआप जो जी में आयेकीजिएमैं तो बाहर नहीं निकलूँगी.”

“तुमक्या पागल हो गई हो?” पिता ने प्रतिवाद किया, “क्या तुम काफ़ी दिनों से इतनी शर्मीली हो गई होया तुम्हारे दिल में उनके प्रति अभी भी विरासत में मिली नफ़रत हैएक रूमानी नायिका की तरहबस हो गयाबेवकूफ़ी न करना...”

“नहींपापाकिसी भी कीमत पर मैं बेरेस्तोवों के सामने नहीं आऊँगीचाहे मुझे कितना ही ख़ज़ाना क्यों न मिलने वाला हो.”

ग्रिगोरी इवानविच ने कंधे उचकाए और उससे आगे बहस नहीं कीक्योंकि वह जानता था कि उससे विरोध करने से कुछ प्राप्त नहीं होगाऔर अपनी इस रोमांचक सैर से आकर वह आराम करने चला गया.

लिज़ावेता ग्रिगोरेव्ना ने अपने कमरे में आकर नास्त्या को बुलवाया. दोनों काफ़ी देर तक कल आने वाले मेहमानों के आगमन पर विचार-विमर्श करती रहीं. यदि भद्र घर में पली-बढ़ी युवती में अलेक्सेइ ने अपनी अकुलीना को पहचान लिया तो वह क्या सोचेगाउसके आचरण और चरित्र तथा बुद्धि के बारे में उसकी क्या राय बनेगीदूसरी ओर लीज़ा को यह देखने की तीव्र इच्छा भी हो रही थी कि इस अप्रत्याशित मुलाकात का उस पर क्या असर होता है...तभी उसके दिमाग़ में एक विचार कौंध गया. उसने उसे फ़ौरन नास्त्या को बतायादोनों उस विचार से बहुत ख़ुश हुईंमानो उन्हें ख़ज़ाना मिल गया हो और उस पर अमल करने का निर्णय कर बैठीं.

दूसरे दिन नाश्ते पर ग्रिगोरी इवानविच ने बेटी से पूछा कि क्या वह अभी भी बेरेस्तोवों से छिपने के निर्णय पर कायम है. “पापा,” लीज़ा ने जवाब दिया, “मैं उनका स्वागत करूँगीअगर आप यही चाहते हैं तोमगर सिर्फ एक शर्त परमैं उनके सामने कैसी भी निकलूँकुछ भी करूँआप मुझे डाँटेंगे नहीं और ना ही आश्चर्य अथवा अप्रसन्नता प्रकट करेंगे.”

“फिर कोई शरारत!” ग्रिगोरी इवानविच ने मुस्कुराते हुए कहा. “अच्छाठीक हैठीक हैमैं राज़ी हूँजो जी में आए करकाली आँखों वाली मेरी लाड़ो!” इतना कहकर उसने उसके माथे को चूमा और लीज़ा तैयार होने के लिए चली गई.

ठीक दो बजे छह घोड़ों वाली गाड़ी आँगन में प्रविष्ठ हुई और गहरी हरियाली वाले गोल लॉन के निकट रुक गई. बूढ़ा बेरेस्तोव मूरम्स्की के दो सेवकों की सहायता से ड्योढ़ी में आया. उसके पीछे-पीछे घोड़े पर आया उसका बेटा और उसके साथ ही मेहमानखाने में घुसाजहाँ मेज़ सज चुकी थी. मूरम्स्की ने बड़े प्यार से अपने पड़ोसियों का स्वागत किया और भोजन से पहले अपने उद्यान एवम् अस्तबल दिखाने के लिए साफ़-सुथरेरेत बिछे रास्तों से होकर ले गया. बूढ़ा बेरेस्तोव मन-ही-मन फ़िज़ूल के इस शौक परव्यर्थ गए समय एवम् परिश्रम पर दुखी हो रहा था. मगर शिष्टाचारवश चुप रहा. उसके बेटे को न तो सलीकापसन्द ज़मीन्दार की अप्रसन्नता से कोई मतलब थान ही अंग्रेज़ियत के दीवाने की उत्तेजना सेवह तो बड़ी बेताबी से मेज़बान की बेटी के आने की राह देख रहा थाजिसके बारे में उसने काफ़ी कुछ सुन रखा थाऔर हालाँकि उसका दिलजैसा कि हम जानते हैं किसी और का हो चुका था फिर भी जवान सुन्दरी उसकी कल्पना पर छाई हुई थी.

मेहमानख़ाने में वापस आकर वे तीनों बैठे. बूढ़े पुराने समय को और सैन्यकाल के चुटकुलों को याद करने लगे और अलेक्सेइ यह सोचने लगा कि लीज़ा की उपस्थिति में उसे कैसा बर्ताव करना है. उसने निश्चय किया कि ठण्डा रूखापन हर हाल में बेहतर होगाअतः वह स्वयम् को इस दृष्टि से तैयार करने लगा. दरवाज़ा खुला और उसने इतनी बेरुखी सेइतनी लापरवाही से सिर घुमाया कि अत्यंत चंचल एवम् छिछोरी लड़की का दिल भी काँप जाए. मगर अफ़सोसलीज़ा के स्थान पर बाहर निकली मिस जैक्सनपाउडर से पुतीसीधी-सपाटपलकें झपकातीहलका-सा झुककर अभिवादन करती – और अलेक्सेइ की यह ख़ूबसूरतफ़ौजी अदा बेकार गई. वह दुबारा स्वयम् को तैयार भी न कर पाया कि दुबारा दरवाज़ा खुला और इस बार लीज़ा ने प्रवेश किया. सब खड़े हो गएपिता ने मेहमानों का परिचय करवाना आरम्भ किया ही थाकि एकदम रुक गया और उसने फ़ौरन अपने होंठ काट लिए...लीज़ाउसकी साँवली लीज़ा कानों तक पाउडर में लिपटी थीमिस जैक्सन से भी अधिक सुरमा लगाए थीकृत्रिम बालउसके अपने बालों से कहीं अधिक हल्के रंग केचौदहवें लुदविक के विग जैसे प्रतीत हो रहे थेमूर्खों जैसी आस्तीनें मैडम पोम्पादूर की आस्तीनों की भाँति झूल रही थींकमर इतनी कसी थी मानो ‘X’ अक्षर होऔर माँ के सभी जवाहरात उसकी उँगलियोंकानों और गले में जगमगा रहे थे. इस हास्यास्पद एवम् चमकीली युवती में अलेक्सेइ अपनी अकुलीना को न पहचान सका. उसके पिता ने उसकी ओर हाथ बढ़ाया और उसने भी अनिच्छा से उनका अनुकरण कियाजब उसने उसकी गोरी-गोरी उँगलियों को छुआ तो उसे महसूस हुआ कि वे थरथरा रही हैं. इस दौरान वह उसका पैर भी देख चुका था जो जानबूझकर बाहर की ओर निकाला गया था और पूरे छिछोरेपन से सजा था. इससे उसके अन्य श्रुंगार के साथ उसने समझौता कर लिया. जहाँ तक पाउडर पोतने और सुरमा थोपने का प्रश्न थातो मानना पड़ेगाकि अपने हृदय की सादगी के कारण पहले तो उसने उनकी ओर कोई ध्यान ही नहीं दिया और बाद में भी उसे कोई सन्देह नहीं हुआ. ग्रिगोरी इवानविच ने अपना वादा याद करके आश्चर्य न दिखाने का प्रयत्न कियामगर बेटी की यह शरारत उसे इतनी दिलचस्प लग रही थी कि वह मुश्किल से स्वयम् को रोक पा रहा था. सजी-सँवरी अंग्रेज़न को हँसने जैसा कुछ लगा ही नहीं. वह समझ गई कि पाउडर और सुरमा उसकी सिंगार मेज़ से ही उड़ाए गए हैंअतः उसके चेहरे की सफ़ेदी से झाँक रही थी क्रोध की लाली. उसने नौजवान आफ़त की पुड़िया पर जलती हुई नज़रें डालींजो हर प्रकार की क्षमा-याचना को उचित समय के लिए टालकर यह दिखा रही थीमानो उन्हें देख ही न रही हो.

खाने की मेज़ पर बैठे. अलेक्सेइ ने सोच में डूबे उदासीन पात्र का अभिनय जारी रखा. लीज़ा बड़े कृत्रिम ढंग से व्यवहार कर रही थीदाँतों को भींचकर गाते हुए सेसिर्फ फ्रांसीसी में ही बातें कर रही थी. पिता हर क्षण उसकी ओर देखतेउसके उद्देश्य को समझ न पातेमगर उन्हें यह सब बड़ा मनोरंजक लग रहा था. अंग्रेज़न तैश में थी और ख़ामोश थी. सिर्फ इवान पेत्रोविच ही सहज थादो आदमियों का खाना खा गयाअपने हिसाब से पी गयाअपने मज़ाक पर हँसता रहा. और धीरे-धीरे अधिकाधिक दोस्ताना अंदाज़ में बातें करता रहा और ठहाका मारकर हँसता रहा.

आख़िरकार मेज़ से उठेमेहमान चले गएऔर ग्रिगोरी इवानविच ने अपनी हँसी और प्रश्नों को इजाज़त दे दी, “यह तुम्हें उनको बेवकूफ़ बनाने की क्या सूझी?” उसने लीज़ा से पूछा. “जानती होपाउडर सचमुच ही तुम पर फब रहा थामैं औरतों के सिंगार के रहस्य नहीं जानना चाहतामगर तुम्हारे स्थान पर यदि मैं होतातो मैं भी पाउडर लगाना शुरू कर देताबेशक इतना ज़्यादा नहींहल्के से.” अपनी चाल की सफ़लता से लीज़ा उत्तेजित थी. उसने पिता के गले में बाँहें डाल दींउसकी सलाह पर गौर करने का वादा किया और गुस्से से काँपती मिस जैक्सन को शान्त करने चलीजो बड़ी मुश्किल से दरवाज़ा खोलकर उसकी सफ़ाई सुनने को राज़ी हुई : लीज़ा को अपने साँवले रंग के कारण मेहमानों के सामने जाने में शर्म आ रही थीमाँगने की हिम्मत हुई नहीं...उसे विश्वास था कि प्यारी और भली मिस जैक्सन उसे माफ़ कर देगी...वगैरहवगैरह. मिस जैक्सन को विश्वास हो गया कि लीज़ा उसका मज़ाक नहीं उड़ाना चाहती थी और वह शान्त हो गईउसने लीज़ा को चूमा और समझौते के उपलक्ष्य में उसे अंग्रेज़ी पाउडर का एक डिब्बा उपहार में दियाजिसे लीज़ा ने सच्ची कृतज्ञता दर्शाते हुए स्वीकार किया.

पाठक भाँप ही गए होंगे कि अगली सुबह लीज़ा को मिलन-वन में पहुँचने की जल्दी पड़ी थी.

“तुम गए थेमालिकसाँझ को हमारे मालिकों के पास?” उसने फ़ौरन अलेक्सेइ से कहा, “कैसी लगी मालकिन?”

अलेक्सेइ ने जवाब दिया कि उसने उस पर ध्यान नहीं दिया. “अफ़सोस,” लीज़ा ने कहा.

“मगर क्यों?” अलेक्सेइ ने पूछ लिया.

“इसीलिएकि मैं पूछना चाहूँ कि का वो सच्ची में...सभी कहते हैं...”

“क्या कहते हैं?”

“...सच्ची में कहते हैंकि मैं मालकिन से मिलती हूँ?”

“क्या बकवास है! तुम्हारे सामने तो वह बड़ी बदसूरत है”.

“ओहमालिकपाप पड़े ऐसा कहो तो! मालकिन हमारी इत्ती गोरी-गोरीइत्ती सजी-धजी. मैं कहाँ उनका मुकाबला कर सकूँ!”

अलेक्सेइ ने उसे विश्वास दिलाया कि वह सभी गोरी मालकिनों से बेहतर हैऔर उसे सांत्वना देने के लिए उसकी मालकिन का इतने मज़ाकिया ढंग से वर्णन करने लगा कि लीज़ा दिल खोलकर हँस पड़ी.

“फिर भी”वह गहरी साँस लेकर बोली, “चाहे मालकिनहो सकता हैमूरख भी दिखेतो क्यामैं फिर भी उनके सामने अनपढ़ मूरख ही तो हूँ.”

“हाँ,” अलेक्सेइ ने कहा, “यह है अफ़सोस की बात. अगर चाहो तो मैं तुम्हें अभी लिखना-पढ़ना सिखाऊँगा”.

“सचमुच”लीज़ा ने कहा, “कोशिश तो कर सकती हूँ!”

“हुक्म दोप्यारीअभी शुरू करते हैं.”

वे बैठ गएअलेक्सेइ ने जेब से पेन्सिल और नोट बुक निकालीऔर अकुलीना ने ग़ज़ब की फुर्ती से वर्णाक्षर सीख लिए. अलेक्सेइ को उसकी समझ पर आश्चर्य हुए बिना नहीं रहा. अगली सुबह उसने लिखने की कोशिश कीपहले तो पेन्सिल उसके बस में नहीं आईमगर कुछ ही मिनटों बाद बड़े सलीके से वह अक्षर लिखने लगी.

“क्या कमाल है!” अलेक्सेइ ने कहा, “हमारी पढ़ाई तो लंकास्टर पद्धति से भी ज़्यादा तेज़ रफ़्तार से चल रही है.”

सचमुच हीतीसरे पाठ के समय अकुलीना हिज्जे जोड़-जोड़कर “सामन्त की बेटी नतालिया” पढ़ने लगीपढ़ते-पढ़ते वह रुक-रुककर ऐसी टिप्पणियाँ करती कि अलेक्सेइ को आश्चर्य होताउसने एक पूरा पन्ना उसी कहानी से चुनी कहावतों से भर दिया.

एक हफ़्ता बीतते-बीतते उनके बीच ख़तो-किताबत होने लगी. पुराने चीड़ के कोटर में उनका डाकघर बना. नास्त्या छुप-छुपकर डाकिये की भूमिका निभाती. वहाँ अलेक्सेइ मोटे-मोटे अक्षरों में लिखे पत्र लाता और वहीं उसे नीले कागज़ पर टेढ़े-मेढ़े अक्षरों वाली प्रेम पाती मिलती. अकुलीना की भाषा बड़ी अच्छी थीऔर उसकी बुद्धि तेज़ होती जा रही थी.

इसी बीच इवान पेत्रोविच बेरेस्तोव और ग्रिगोरी इवानविच की हाल ही में हुई पहचान शीघ्रतापूर्वक मित्रता में बदल गई, जिसकी वजह ये थी : मूरम्स्की अक्सर यह सोचता कि इवान पेत्रोविच की मृत्यु के बाद उसकी पूरी जागीर अलेक्सेइ इवानविच को मिलेगीउस हालत में अलेक्सेइ इवानविच इस प्रान्त के सर्वाधिक धनी ज़मीन्दारों में से एक होगा और कोई वजह नहीं कि उसकी शादी लीज़ा से न हो. उधर बूढ़ा बेरेस्तोवहालाँकि अपने पड़ोसी को कुछ सनकी समझता था (या उसके शब्दों में अंग्रेज़ियत का मारा) फिर भी उससे जुड़ी हुई सकारात्मक विशेषताओं को नकारता नहीं था. उदाहरण के लिए : हर स्थिति का उपयोग करने की योग्यता. ग्रिगोरी इवानविच सामन्त प्रोन्स्की का नज़दीकी रिश्तेदार थाजो बड़ा प्रसिद्ध एवम् प्रभावशाली थीसामन्त अलेक्सेइ के लिए मददगार सिद्ध हो सकता थाऔर मूरम्स्की (इवान पेत्रोविच के विचार में) शायद अपनी बेटी का हाथ उसे देने का मौका पाते ही प्रसन्न हो जाएगा.

बूढ़े ये सब अपने आप ही सोचते रहेफिरआख़िरकारउन्होंने एक-दूसरे से विचार-विमर्श कियागले मिलेइस काम को सुनियोजित ढंग से पूरा करने का वादा किया और अपनी-अपनी तरफ़ से उसे अंजाम देने के काम में लग गए. मूरम्स्की के सामने कठिनाई थी अपनी बेत्सी को अलेक्सेइ से घनिष्ठता बढ़ाने के लिए राज़ी करनाजिससे वह उस यादगार भोज के बाद मिली नहीं थी. ऐसा लगता थाकि वे दोनों एक-दूसरे को पसन्द नहीं आए थेकम-से-कम अलेक्सेइ दुबारा प्रिलूचिनो नहीं आया थाऔर अब भी इवान पेत्रोविच उनके यहाँ आता, तो लीज़ा अपने कमरे में चली जाती. मगरग्रिगोरी इवानविच ने सोचाअगर अलेक्सेइ हर रोज़ मेरे यहाँ आएगा तो बेत्सी उसके प्यार में पड़ ही जाएगी. यह तो स्वाभाविक है. समय के साथ सब ठीक हो जाएगा.

इवान पेत्रोविच अपने उद्देश्य के बारे में कम चिन्तित था. उसी शाम उसने बेटे को अध्ययन-कक्ष में बुलायापाइप का कश लगाया और कुछ देर ख़ामोश रहकर बोला, “क्या बात हैअल्योशाआजकल तुम अपनी फ़ौजी नौकरी के बारे में बात नहीं करतेया फ़िर शासकीय अफ़सर की वर्दी तुम्हें ललचा रही है...!”

“नहींमहाशय,” अलेक्सेइ ने आदरपूर्वक उत्तर दिया, “मैं देख रहा हूँकि मेरा घुड़सवार दस्ते में जाना आपको पसन्द नहीं हैमेरा कर्तव्य है आपकी सेवा करना.”

“अच्छा,” इवान पेत्रोविच बोला, “देख रहा हूँकि तुम आज्ञाकारी पुत्र हो. मुझे इससे ख़ुशी हुई. मैं तुम्हें बंधन में थोड़े ही बांधना चाहता हूँ. तुम्हें शासकीय नौकरी में जाने पर भी अभी मजबूर नहीं करूँगा. फ़िलहाल तो तुम्हारी शादी करना चाहता हूँ.”

“किससेमहाशय?” विस्मित अलेक्सेइ ने पूछ लिया.

“लिज़ावेता ग्रिगोरेव्ना मूरम्स्काया से,” इवान पेत्रोविच ने जवाब दिया, “लाजवाब दुल्हन हैसच है ना?”

“महाशयअभी मैं शादी के बारे में सोच भी नहीं रहा.”

“तुम नहीं सोच रहेइसीलिए मैंने तुम्हारे लिए सोचा और निश्चय कर लिया.”

“आपकी मर्ज़ीलीज़ा मूरम्स्काया मुझे ज़रा भी अच्छी नहीं लगती.”

“बाद में अच्छी लगने लगेगी. थोड़ा धीरज रखोगे तो प्यार भी करने लगोगे.”

“मैं अपने आपको इस योग्य नहीं समझता कि उसे सुख दे सकूँ.”

“उसका सुख तुम्हारे लिए दुख की बात नहीं है. क्यातो तुम पिता की इच्छा का इसी तरह सम्मान करते होठीक है.”

“आप जो भी समझेंमगर मैं शादी करना नहीं चाहता और करूँगा भी नहीं.”

“तुम शादी करोगेनहीं तो मैं तुम्हें बद्दुआ दूँगा और जागीरख़ुदा मेरा इन्साफ़ करेगाबेच दूँगा और उड़ा दूँगामगर तुम्हें एक पाई भी नहीं दूँगा. तुम्हें सोचने के लिए तीन दिन का समय देता हूँऔर तब तक मेरी आँखों के सामने न पड़ना.”

अलेक्सेइ जानता था कि यदि पिता के दिमाग़ में कोई बात घुस जाएतो उसे तरास स्कतीनिन के शब्दों मेंकील से भी बाहर नहीं निकाला जा सकता. मगर अलेक्सेइ भी अपने बाप का ही बेटा थाऔर उसे भी मनाना उतना ही कठिन था.

वह अपने कमरे में गया और सोचने लगा पिता के अधिकारों के बारे मेंलिज़ावेता ग्रिगोरेव्ना के बारे मेंपिता के उसे भिखारी बनाने के संकल्प के बारे मेंऔर अन्त में अकुलीना के बारे में. पहली बार उसे साक्षात्कार हुआ कि वह उसे दीवानगी की हद तक प्यार करता है. एक देहातिन से ब्याह करकेअपने हाथों से मेहनत-मज़दूरी करके जीने का रूमानी ख़याल भी उसके दिमाग़ में आयाऔर जितना अधिक वह इस बारे में सोचताउसे यही निर्णय उचित प्रतीत होता. कुछ दिनों सेबारिश के कारणवन में होनेवाली मुलाकातें भी रुक गई थीं. उसने अकुलीना को साफ़-साफ़ अक्षरों में और अत्यन्त संतप्तावस्था में पत्र लिखकर सम्भावित आपत्ति के बारे में बताते हुए शादी का प्रस्ताव कर दिया. उस पत्र को वह फ़ौरन कोटर में रख आया और प्रसन्नतापूर्वक सो गया.

दूसरे दिन सुबहअपने निर्णय में दृढ़अलेक्सेइ मूरम्स्की की ओर गयाजिससे उससे साफ़-साफ़ बात कर सके. उसे आशा थी कि वह उसकी भलमनसाहत का वास्ता देकर उसे अपनी ओर कर लेगा.

“ग्रिगोरी इवानविच घर पर हैं?” उसने घोड़े को प्रिलूचिनो के गढ़ के द्वार के निकट रोकते हुए पूछा.

“नहीं,” सेवक ने उत्तर दिया, “ग्रिगोरी इवानविच सुबह-सुबह ही बाहर निकल गए.”

कितनी मुसीबत है!’ अलेक्सेइ ने सोचा, “कम से कम लिज़ावेता ग्रिगोरेव्ना तो घर पर हैं?”

“घर पर हैं.”

अलेक्सेइ ने घोड़े पर से कूदकर सेवक के हाथ में लगाम थमाई और बिना सूचना दिए अन्दर गया.

अभी सब तय हो जाएगा,’ उसने मेहमानख़ाने की ओर चलते-चलते सोचा, ‘उसी से सब साफ़-साफ़ कह दूँगा.

वह अन्दर घुसा...और वहीं बुत बन गया. लीज़ा...नहींनहींअकुलीनासुन्दर सलोनी अकुलीनासराफ़ान में नहींबल्कि सुबह की सफ़ेद पोषाक में खिड़की के सामने बैठकर उसका ख़त पढ़ रही थीवह इतनी मशगूल थी कि उसे उसकी आहट भी सुनाई न दी. अलेक्सेइ ख़ुशी के मारे चीख़ पड़ा. लीज़ा काँप गईउसने सिर उठायाचीख़ी और वहाँ से भागने लगी. वह उसे पकड़ने दौड़ा.

”अकुलीनाअकुलीना!”

लीज़ा ने स्वयम् को छुड़ाने की कोशिश की...”छोड़िए मुझेमहाशयआप क्या पागल हो गए हैं?” वह उससे मुँह मोड़ते हुए दोहराती जा रही थी.”अकुलीना! मेरी सखी अकुलीना!” वह उसके हाथ चूमते हुए दोहराता रहा. इस दृश्य की चश्मदीद गवाह मिस जैक्सन समझ न पाई कि इस सबका क्या मतलब है. इसी समय दरवाज़ा खुला और ग्रिगोरी इवानविच अन्दर आया.

“अहा!” मूरम्स्की ने कहा, “आप लोगों का मामलालगता हैफिट हो गया है...!”

आशा हैपाठक मुझे सुखद अन्त का वर्णन करने की अनावश्यक ज़िम्मेदारी से मुक्त करेंगे.



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