लिफाफे में बंद
लिफाफे में बंद
"ये गरारा टाॅप तुझ पर बहुत अच्छा लगेगा।"...माॅल में ये कहते हुए निशा ने अपनी सत्रह वर्षीय भतीजी परी के हाथ को अपने हाथ में लेते हुए कहा।
वह जानती थी कि भाई की माली हालत बिल्कुल अच्छी नही, पर भाई इतना खुद्दार की बहन से मदद माँगना तो दूर उससे अपनी हालत भी कभी बयाँ नहीं किए,पर एक शहर में रहते हुए बहन को पता न चले संभव ही नही था।आज जब भतीजी घर आई और शाम उसे लोकल बस तक छोड़ने जा रही थी तो उसने सोचा भाई तो कुछ लेगा नही क्यूं न परी को ही अच्छी सी ड्रेस खरीद दूँ।
"बुआ...।" परी ने कुछ सकुचाते हुए कहा।
"क्यूँ तुझे पसंद नही...?"
"बुआ...मैंने प्राइस टैग देखा है...ये चार हज़ार का है...और बुआ....।" उसकी आवाज़ काँप रही थी।
"हाँ क्या परी...बोल...।"
"बुआ इतने पैसों में मेरी स्कूल की फीस जमा हो जाएगी...तीन महीने से नही दी है...।"
निशा के हाथ में परी का कोमल हाथ काँप रहा था।निशा को लगा खुद उसका हाथ भी काँप रहा था। कहाँ तो उस मासूम परी के सपने देखने के दिन और कहाँ तो उन आँखों में दुनियादारी समा गई थी।
निशा ने सामने वाले काउंटर से एक लिफाफा लिया ..."परी तू ठहर यहीं।"
कहकर उसने काउंटर पर चार लाइन कोरे कागज पर खींच दी,"परी ....तू बस मन लगाकर पढ़ना इस लिफाफे में तेरी साल भर की फीस है...बेटू...जिस घर में तुझ जैसी नन्ही परी हो और मेरे भाई जैसा शेर दिल हो वहाँ ...मुश्किलें ज्यादा देर नही रहेंगी...।" उसने बंद लिफाफा परी को थमा दिया। लोकल बस से परी उसे हाथ हिला रही थी ....और इस बात से अनजान कि उसके दूसरे हाथ में रखे लिफाफे में कितनी भावनाओं का सैलाब बंद था।
