कसौटी~ समर्पण में स्वतंत्रता
कसौटी~ समर्पण में स्वतंत्रता
कसौटी~ समर्पण में स्वतंत्रता
राजमहल की दीवारों से बाहर, सीता को कोई बंधन नहीं था।
पर भीतर... हर दिन वह एक अदृश्य युद्ध लड़ती थी —
“क्या मैं सिर्फ प्रतीक्षा हूँ?”
“क्या मेरा मौन मेरी कमजोरी है?”
“क्या समर्पण का अर्थ है खो जाना?”
लोग कहते थे —
"सीता ने कुछ नहीं किया।"
"वह बस सहती रही।"
"वह बस प्रतीक्षा करती रही।"
पर वे नहीं जानते थे कि मौन भी एक क्रांति है।
हर बार जब उसने क्रोध को पी लिया,
हर बार जब उसने प्रतिशोध को त्यागा,
हर बार जब उसने प्रेम को चुना —
वह एक युद्ध जीतती रही।
फिर आया वह दिन —
जब राम ने अग्नि परीक्षा की बात कही।
सीता ने देखा —
ना राम में संदेह था, ना समाज में विश्वास।
बस एक परीक्षा थी —
जो उसके अस्तित्व को परखना चाहती थी।
वह चुप रही।
ना विरोध किया, ना रोई।
वह अग्नि में चली गई —
ना सिद्ध करने के लिए,
बल्कि यह दिखाने के लिए कि
*“मैं जो हूँ, वही पर्याप्त है।
मुझे किसी को कुछ सिद्ध नहीं करना।”*
अग्नि ने उसे जलाया नहीं —
बल्कि उसकी आत्मा को उजागर किया।
वह लौटी — शांत, उज्ज्वल, और मुक्त।
जब राम लौटे,
सीता ने उन्हें देखा —
न आँखों में शिकायत थी,
न मन में अपेक्षा।
बस एक शांत मुस्कान —
जैसे कह रही हो,
“मैं पहले ही मुक्त थी।”
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यह कहानी सीता को एक आंतरिक योद्धा के रूप में प्रस्तुत करती है — जहाँ अग्नि परीक्षा कोई बाहरी परीक्षण नहीं, बल्कि आत्म-स्वीकृति की अग्नि है.
