कर्मों का फल
कर्मों का फल
रायपुर के पास एक छोटा सा कस्बा था माधोपुर। यहाँ सभी धर्मो के लोग प्यार प्रेम से रहते थे। करीम मियां एक कपड़े के व्यापारी थे। वह बहुत मेहनती व काफी धनी व्यक्ति थे। वे दो भाइयों में सबसे बड़े थे। उनके दो छोटे भाई थे जो उन्हीं के साथ सांझा कारोबार करते थे। करीम मियां और भाई सब एक ही घर परिवार में रहते थे। सबके बच्चे थे। करीम मियां को ज़रूरत मंद लोगों की मदद करना बहुत पसंद था। उनके यहाँ जितने भी नौकर काम करते थे कभी भी करीम मियां ने उनका अपमान नहीं किया। आवश्यकता पड़ने पर करीम मियां उन सबकी बल्कि कस्बे के अन्य ज़रूरत मंदो की भी सहायता कर देते थे। उनके भाइयों की पत्नियाँ बहुत चालाक थीं। वे दोनों करीम मियां की पत्नी को अधिक कुछ नहीं समझती थी। करीम मियां ने अपनी दोनों बेटियों का विवाह कर दिया था। अब वह कारोबार के साथ साथ थोड़ी सी समाज सेवा मे भी लग गए थे। एक दिन वह नमाज़ पढ़कर आ रहे थे। उन्होने देखा एक पेड़ के नीचे एक साधु बैठे हुए हैं लोग उनके प्रवचन सुन रहे हैं। पहले तो उन्होने सोचा छोड़ो मेरा क्या काम यहाँ पर। जब उनके कुछ जान पहचान वालों ने उन्हे आवाज़ दी तो स्वयं को रोक नहीं पाए और जाकर सबके साथ बैठ गए।
वह साधु कह रहा था कि व्यक्ति को उसके किए कर्मों का फल अवश्य ही प्राप्त होता है। यदि एक व्यक्ति किसी के साथ कुछ अच्छा करता है। वह समय आने पर लौटकर अवश्य वापिस आता है। ऐसे ही बुरा करने वाले को भी लौटकर बुरा फल अवश्य प्राप्त होता है। करीम मियां ने अधिक ध्यान नहीं दिया कि वह साधु क्या कह रहा है। थोड़ी देर में वह उठकर अपने घर वापिस आ गए।
वह अपने कमरे मे आराम कर रहे थे इतने में बाहर उन्हें किसी के रोने का स्वर सुनाई पड़ा वह बाहर आए तो देखा एक भाई की पत्नी अपने बगीचे के माली को डाँट रही है। करीम मियां ने डाँटने का कारण पूछा तो वह ग़रीब माली बोला। "हुजुर, मेरी बेटी की शादी को केवल एक सप्ताह रह गया है और मेरे पास अभी तक कोई बंदोबस्त नहीं हो पाया। वही मैं मालकिन को कह रहा था कि मेरी कुछ सहायता कर दीजिए पर वह नाराज़ होकर मुझे डाँटने लगीं।" करीम मियां ने अपनी पत्नी से कहा कि घर में जो उनकी बेटी के पुराने गहने रखे हैं वह ले आओ। भाई की पत्नी नाराज़ हो गई कि ये गहने वह भाई की बेटी को भी तो दे सकते हैं। पर करीम मियां ने यह कहकर गहने माली को दे दिए कि यह ग़रीब है। हम तो और ख़रीद लेंगे। करीम मियां सबकी मदद करते रहते थे। हिसाब भी नहीं रखना पसंद करते थे कि किस को कितने पैसे दिए। दोनो भाई अंदर ही अंदर कुड़ते रहते पर क्या कर सकते थे। सबकुछ तो करीम के नाम ही था। एक बार करीम मियां बहुत बीमार हो गए। डॉक्टर ने जवाब दे दिया कि यह नहीं बचेंगे। घर परिवार मे मेहमानों का आना जाना लग गया। दोनों भाई और उनकी पत्नियों को बहुत चैन मिल रहा था। दोनों भाइयों ने किसी उपाय और चालाकी से करीम से व्यापार और सम्पत्ति के कागज़ों पर हस्ताक्षर करा लिए। करीम को बीमारी के कारण कुछ होश नहीं था। कम से कम एक डेढ़ साल बाद करीम मियां अपनी बीमारी से बाहर आए तो देखा उनकी पत्नी की हालत फटे हाल है। दोनों भाई और उनके बेटे सब ऐशो आराम का जीवन व्यतीत कर रहें हैं। कारण पूछा तो भाइयों की पत्नियों ने बताया कि अब इस घर में उनका कुछ भी नहीं बचा सब उन्होनें अपने भाइयों के नाम कर दिया है। करीम मियां को गहरा धक्का लगा और अपने अपनी पत्नी तथा ज़रूरत का सामान लेकर घर से बाहर निकल आए। वे तलाश कर रहे थे शांति की, जो अब उनसे कोसों दूर हो चुकी थी। वह अपनी पत्नी के साथ खेत में चले गए और वही एक छोटी सी कुटिया में रहने लगे। खाने की परेशानी कि कहाँ से भोजन लाएं? वह अपनी पत्नी से इस बारे में बात कर ही रहे थे कि उनकी कुटिया के सामने लोगों की भीड़ लग गई। करीम मियां और उनकी पत्नी ने देखा बाहर वे सब लोग थे जिनकी कभी करीम मियां ने सहायता की थी।
सबके हाथ मे भोजन था, वस्त्र थे। सबने कहा आप हमारे साथ रहेंगे। करीम और उनकी पत्नी को वे सब वहाँ से बाहर ले आए और कस्बे में ही एक छोटे से घर में उनका सामान लगा दिया। अब करीम मियां और उनकी पत्नी वहीं आराम से रहने लगे। सबने मिलकर करीम का व्यापार आरंभ करवा दिया। अब वहाँ सब एक थे, ना कोई किसी का नौकर, ना ही मालिक।
तीनों भाइयों ने करीम की कोई खबर तक नहीं ली। चार वर्ष बीत गए। दोनों भाइयों के बेटों ने वही किया उनके साथ जो उन्होने अपने बड़े भाई के साथ किया था। उनके बेटों ने अपनी पत्नियों के चक्कर में आकर उन दोनों को और माँ को घर से बाहर निकाल दिया। अब भाइयों की समझ में आया कि बुराई का नतीजा बुराई ही है। उधर करीम नमाज़ पढ़कर आ रहे थे। तभी वही साधु उन्हें प्रवचन करते सुनाई पड़े। इस बार करीम स्वयं उनके पास जाकर बोले-" बाबा, आपने सही कहा था, इंसान को उसकी करनी का फल अवश्य प्राप्त होता है। जैसा कर्म करोगे वैसे ही पल तुम्हें मिलेगा। " वहीं भीड़ मे करीम के दोनों भाई और उनकी पत्नियाँ भी बैठी थीं। वे वहाँ इसलिए बैठे थे कि कुछ खाने को मिल जायेगा। वे चारों करीम के पास आकर उसके पैरो में गिर कर क्षमा माँगने लगे। करीम ने उन्हे क्षमा कर दिया और अपने घर ले आया। भाइयों के बेटों से भी ठीक प्रकार से कारोबार नहीं चल पाया तो उन्होने करीम और अपने पिताओं को कारोबार सौंप दिया। किसी ने सच ही कहा है व्यक्ति को उसके कर्मों का फल अवश्य ही मिलता है।
