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Bhawna Kukreti

Fantasy Inspirational Others


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Bhawna Kukreti

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किस्मत -1

किस्मत -1

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 मुझे घूमने, नई अनदेखी जगहों पर जाने का बेहद शौक है। कोई भरोसेमंद और मेरे मिज़ाज़ का इंसान साथ हो तो मैं कहीं भी बिना आग पीछा सोचे चल देने वालों में से हूँ। 

  

 अपनी गिरती तबीयत को संभालने के लिए मुझे कुछ पहाड़ी ऑर्गेनिक दालों, और जड़ी बूटियों की जरूरत थी। वे यहां देहरादून में भी मिल जाती पर मुझे खेत से हाल फसल की ही चाहिए थी। नेट पर सर्फ करते मुझे विभूति जी के गांव का पता चला। विभूति जी , अपनी वेबसाइट में, तस्वीर में चेहरे मोहरे से बहुत आम पहाड़ी से दिखते थे लेकिन थे बेहद टेक्नोसेवी , अपने छोटे से गांव का बहुत अच्छे से अपनी वेबसाइट पर प्रचार किया हुआ था। वे मेडिसिन और स्पिरिचुअल हीलिंग दोनों में काम करते थे। वेबसाइट पर उनका एक ट्रैवेल का बिज़नेस भी दिख रहा था।

  

   मेरी क्वेरी जिस पर मुझे अपनी समस्या के साथ अपनी तस्वीर भी भेजनी थी, उसे देखते ही उन्होंने मुझे मेल किया और अपने गांव आने का न्योता दिया। अपनी मेल में उन्होंने मुझे विस्तार से बताया कि विभूति जी काफी पहले से मेरे एक शौकिया बनाये पेज को फॉलो करते थे। वे एक पैन नेम से सोशल साइट्स पर थे। मुझसे, मेरी रचनाओं को लेकर कई बार संवाद कर चुके थे। मेरे पेज पर मेरी तस्वीरों से उन्होंने मुझे फौरन पहचान लिया लिया था। मगर मेरे लिए तो वे अपरिचित ही थे। फिर इस तरह से किसी का प्रशंसक निकल आना और मनुहार करना ये बहुत अजीब लग रहा था। मुझे सच कहूँ तो पहली बार " फ्रॉड इंसान " ही लगे थे। 


   लेकिन जब एक शाम लाइव वीडियो पर विभूति जी ने अपने परिवार से मिलवाया तो थोड़ी हिम्मत बंधी। विभूति जी , पीले रंग की रोशनी में गोरे रंग के , ठेठ पहाड़ी नैन नक्श वाले, पहाड़ी टोपी पहने लम्बे चौड़े खिचड़ी दाढ़ी लिये दिखे । मुस्कराते हुए अभिवादन के बाद माफी मांगते हुए अपने परिवार से परिचय करवाया। उसी दौरान पता चला कि उनके परिवार में एक छोटी बेटी और माता जी ही हैं। छोटी बिटिया जैसे किसी अंग्रेज की बेटी हो इतनी गोरी और नीली आंखों वाली...मुंह में उंगली डाले मुझे बहुत गौर से मुझे देखे जा रही थी। माता जी ने मोटा सा चश्मा पहना था। वेशभूषा पारंपरिक थी लेकिन पूरे समय वे हंसते हुए ही बात करती रहीं। अपनी बोली में पहले तो कहा "हे मेरी ब्वै..."फिर बोलीं " अच्छा तो तुम हो... वो लिख्वाड, आ जाओ आ जाओ सब ठीक हो जाएगा" । मेरी तबीयत के लिए विभूति जी की माता जी ने मुझे बार बार कहा कि मैं जल्द से जल्द आऊं। वे पूजा करेंगी। उनके अनुसार मुझपर बहुत बुरी नजर और देवता लगाया गया है। एक पढ़ी लिखी पहाड़न होने के नाते भले मैं इन बातों पर यकीन न करूं लेकिन परवरिश की जड़े गहरी होने के नाते श्रद्धा जरूर है। सो ये सारी बातें मेरे लिए बहुत डरावनी थी। मैं सोच में पड़ गयी मैंने किसी का क्या बिगाड़ा है? लाइव वीडियो इंटरेक्शन के बाद तौबा तौबा करती रही। फिर कुछ देर बाद ही अननोन नंबर से वौइस् कॉल आयी। दूसरी ओर विभूति जी थे। " मैंम प्लीज, मेरी माँ जी ऐसे किसी को नहीं कहती ,आप बस आ जाओ, सुबह ड्राइवर आपके घर पहुंच जाएगा।"

  

अब ये गले पड़ने जैसी बात लग रही थी। पर वेबसाइट पर जैसा गांव दिख रहा था वो इस लोकडौन में बंदी बने मन को फुसलाने के लिए काफी था। तबीयत और भविष्य को लेकर एक घबराहट भी थी और घर पर कुछ दिन के लिए अकेले भी थी। सोचा ट्राय करते हैं। एक दिन की ही तो बात है।


अगली सुबह ठीक 7 बजे सफेद स्विफ्ट दरवाजे पर थी। विभूति जी का मेसेज आया।"मैंम, कार आपकी बिल्डिंग के नीचे पहुंच गयी है, आप आ जाओ।" मैंने अपना पर्स उठाया, कार की नंबर प्लेट की पिक्स ली और दो एक जगह मेसेज सेंड किया कि फलाने गांव इस पते पर जा रही हूँ। शाम तक लौट आऊंगी। तस्वीर लेते हुए ध्यान ही नहीं गया, मेरी ये सब गतिविधियां कार का ड्राइवर कुछ दूर खड़ा बड़े गौर से देख रहा था। चेहरे पर उसके आश्चर्य और गंभीरता का अनोखा मिश्रण था। उसने नमस्ते किया और कार का दरवाजा खोला। मैंने ड्राइवर को गौर से देखा तो लगा कि वह कलीन शेव्ड वेल ड्रेस्ड ड्राइवर शायद विभूति जी का ही कोई रिश्तेदार है। दाढ़ी और टोपी होती तो हूबहू वही लगता। चेहरे से काफी कुछ उसी के जैसा लगता था।

 कार में बैठ कर मैं विभूति जी को मैसेज कर रही थी ," थैंक्स फ़ॉर द कार विभूति जी , बैठ गयी हूँ।" की उसी वक्त ड्राइवर ने कहा

 "मैंम , आप तो अपनी तस्वीर से काफी बेहतर दिखती हैं।" 

" तस्वीर!"

"जी मैंम ...आप आप के पेज पर ..."

" अरे नहीं...आप ...विभूति जी ..हैं!!" 

"जी मैंम " और हम दोनों हँस पड़े। 

  चंडी देवी तक विभूति जी मेरे बारे में सामान्य जानकारी लेते रहे। फिर पहाड़ी रास्ता जैसे शुरू हुआ ,विभूति जी ने कहा "मैंम आप आगे आ जाओ, मैं कान कम सुनता हूँ।" वो सही कह रहे थे। मैं अब इतना भी धीमा नहीं बोलती थी। बच्चों को पढ़ा पढ़ा कर आवाज अब ज्यादा पिच की हो गयी थी। मैं उनको कुछ पूछती तो वह गर्दन मोड़ कर हर बार कहते "क्या मैंम?" मुझे लग रहा था कि गाने चलाये हुए हैं इसलिए साफ नहीं सुनाई पड़ रहा होगा। सो मैं आगे की सीट पर बैठ गयी। 


  मैंने देखा उन्होंने अपनी बेटी की फोटो स्पीडोमीटर पर 60 पर लगाई हुई थी। मैंने उन्हें देखा वे धीमे धीमे मुस्करा रहे थे।

"आपने बेटी का नाम नहीं बताया ?",

"बोस्की" 

"बोस्की?!" 

"उसकी माँ ने रखा था, बोस्की ...प्यार से बोकी बुलाता हूँ " 

कहते हुए उनकी आवाज में भारी पन आ गया था। अक्सर आवाज का उतार चढ़ाव इंसान की मनोदशा को बिन कहे बता देता है। मैंने देखा विभूति जी की हाथों की पकड़ स्टीयरिंग व्हील पर कस गयी थी। सामने सिर्फ एक साइकिल वाला अपना कोना पकड़ कर जा रहा था लेकिन फिर भी विभूति जी ने होंर्न बजाया। और फिर गाड़ी की स्पीड तेज कर दी। मुझे उनका ये व्यवहार बहुत अजीब लगा। लेकिन जिस तेजी से स्पीड बढ़ी वैसे ही विभूति जी ने सोरी कहा और नार्मल ड्राइव करने लगे। बहुत विचित्र सी स्थिति थी। न मुझे कुछ कहे बना न पूछते बना।


 "मैंम, आप कभी किसी जंगल में रुके थे क्या?" "मतलब?" विभूति जी के अजीब से सवाल ने उस बातों के सन्नाटे को तोड़ा।" मां जी कह रही थी कि बाकी सब के अलावा जंगल का भी कुछ केस है आपका।" ,"न न , जंगल तो काफी साल हो गए ,गयी ही नहीं। हाँ, बचपन में गांव के पीछे था। तब खेलने जाते थे।" "हम्म..लेकिन ये हाल फिलहाल का मामला बता रहीं थी वे।" ," अच्छा , आपकी मां जी ने कहां से सीखा ये सब?","हहहहह मैंम आप पहाड़ी ही हो न?! "विभूति जी ने उल्टा सवाल कर दिया। मैं समझ गयी और चुप हो गयी। 


 कुछ ही देर में कार पहाड़ी रास्तों पर दौड़ रही थी। गढ़वाली गाने चल रहे थे। सुबह की धूप और पहाड़ की ठंडी हवा, चाय का मन हो आया था। लग नहीं रहा था कि इस रास्ते पर कहीं चाय नसीब होगी। "चाय चलेगी मैंम?" विभूति जी ने कहा।" नेकी और पूछ पूछ लेकिन यहां तो दूर दूर तक.." तभी मोड़ के बाद एक पुलिया से लगी गुमटी दिखी। उसके आस पास काफी जगह थी जहां सड़क किनारे पेड़ों के नीचे एक दो बेंच पड़ी थी। एक नीले रंग का पानी का ड्रम, और एक पुराना टब जिसमें कुछ ग्लास और कप साबुन के पानी में तैर रहे थे। हमारी कार वहीं रुकी। वहां गुमटी में एक पुरानी मेज के ऊपर रखे स्टोव के पीछे एक उम्रदराज सज्जन खड़े दिखे। विभूति जी को देखते ही उनकी आंखों में चमक आ गयी। विभूति जी ने दूर से ही , "बड़ा जी प्रणाम.. जरा ..द्वी..हाँ!" कहते हुए दो का इशारा किया। वे मुस्कराते हुए सर हिलाते हुए केतली में चाय का पानी रखने लगे। बहुत सुंदर जगह थी। विभूति जी उनको नमस्कार कर उनके कान में अटकी बीड़ी को निकाल कर सुलगाने लगे। पुलिया पर चढ़ कर वह उकडू बैठ बीड़ी पीते हुए बोले," मैंम ...वो रहा मेरा गांव। " वाकई , इट्स सो सिस्टेमैटिक, लग ही नहीं रहा कि इंडिया का ही गांव है।" " येsssss अब अयाँ छः तुम हैं..?!" मेरे पीछे से किसी औरत की आवाज आई, पलट कर देखा तो एक वृद्ध महिला थी।विभुति जी कूद कर पुलिया से उतरे ।


" प्रणाम प्रणाम, कन हाल चाल..." कहते हुए उनके पैर छुए। " ..?" मेरी ओर आंखों से इशारा करते हुए वे महिला धीमे से कुछ बोलीं।" विभूति ने उन्हें मेरा परिचय दिया। परिचय देने के बाद वे विभूति की प्रशंसा में बातें बताने लगी। उनकी बातों से पता चला कि विभूति कोई आम पहाड़ी व्यक्ति नहीं थे। वो इस छोटे से गॉंव का पहले लड़के थे जो ऊंची शिक्षा पाकर स्विस्ट्ज़र लैड में बेहद अच्छी पोस्ट पर कुछ साल रहे था और भी बहुत हैरान करने वाली बातें। "भागै की बात च छुचौ और क्य तब... हैं ।" अब मुझे उनका टेक्नोसेवी होना ,वेबसाइट वगैरह कुछ कुछ समझ आने लगा था और ये गांव का "सिस्टेमेटिक" होना भी।

 "विभूति जी...इम्प्रेसिव!!" मैंने कॉम्प्लीमेंट दिया। विभूति जी सर पर अपने बालों को जोर से हाथों से रगड़ते मुस्कराते हुए बोले " चलिए मैंम ,चाय पीते हैं।"

मैं पेड़ के नीचे रखी बेंच पर जा कर बैठ गयी। सेल्फी के लिए शानदार लोकेशन थी ।पेड़ की हरी भरी मोटी सी डाली ठीक मेरे सर के ऊपर झूल रही थी। एक दो तस्वीरें लीं तब तक विभूति जी अपने लिए स्टील के ग्लास और मेरे लिए कप में चाय लेकर आ गए।

"विभूति जी!...मैं भी जन्म से पहाड़ी ही हूँ " मैंने कप की ओर इशारा करते कहा "और कुछ ठंड भी है..।"

"ओह..हहहह सोरी अभी लाया मैंम।"


   कुछ देर बाद हम लोग और वे बड़ा जी और उनकी धर्मपत्नी साथ चाय पीते गप्पे लगा रहे थे। लग ही नहीं रहा था की मैं इन्हें पहले से जानती ही नहीं। वहीं मुद्दे और बातें जो कभी हम अपने बड़े बूढों से सुना करते थे। समय भले 30-35 साल आगे हो गया था मगर पहाड़ी जीवन की आम समस्याएं जस की तस थीं। खास तौर पर बुजुर्गों और जवानों के लिए ।कुछ उम्मीद विभूति जी से इन लोगों को हो आयी थी।


  तभी सामने से एक बच्चा डंडा लिए जोर से चिल्लाता हुआ मेरी ओर बढ़ा चला आ रहा था। उसकी आंखें और चेहरे के भाव ऐसे थे जैसे मौत को देख लिया हो। पता नहीं विभूति जी ने क्या समझा ,एकाएक उन्होंने भी मेरी ओर देखा । उनका चेहरा भी एक पल को भय से सफेद पड़ गया था। बड़ा जी और उनकी पत्नी झटके से दूर होने की जल्दी में लड़खड़ा कर वहीं गिर पड़े।


क्रमशः



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