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Pradeep Kumar

Abstract Comedy Inspirational

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Pradeep Kumar

Abstract Comedy Inspirational

किसान पापा की परी रजनी

किसान पापा की परी रजनी

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राजीव भटनागर का घर पहाड़ी पर था। पहाड़ी के नीचे से एक नदी बहती थी, और उसी नदी के किनारे उसका कॉलेज था। राजीव कॉलेज के पहले साल में था। उस दिन वह स्टीमर बोट से उतरकर घर की ओर लौट रहा था कि पास के गाँव की एक लड़की, रजनी, मिल गई।
उसे भी पहाड़ी पर चढ़ना था,दो घंटे का लंबा सफर। ऐसे रास्तों में लोग अक्सर साथ तलाश लेते हैं, ताकि सफर आसान हो जाए। उस दिन राजीव के साथ उसकी क्लास की एक और लड़की, अंजना, भी थी। तीनों ने मिलकर रास्ता पकड़ा।
रजनी राजीव से लगभग तीन साल बड़ी थी। वह पास के गाँव के किसान हरिशंकर की इकलौती संतान थी। उसकी माँ का देहांत बचपन में ही हो गया था। हरिशंकर ने दूसरी शादी नहीं की, बल्कि अपनी बेटी को ही अपना सब कुछ मानकर पाला। खेती उनका मुख्य सहारा था, लेकिन कभी-कभी किसी फ़ंक्शन में रसोई बनाकर भी गुज़ारा कर लेते।

रजनी पढ़ाई में तेज थी। मैट्रिक में उसके अच्छे नंबर आए थे, जिससे पूरे इलाके में खुशी की लहर दौड़ गई थी। उन दिनों लड़कियों की पढ़ाई प्रायः मैट्रिक के बाद रुक जाती थी, लेकिन हरिशंकर ने समाज की परवाह किए बिना अपनी बेटी को शहर पढ़ने भेजा। पैसों की तंगी थी, मगर यह कदम गाँव के लिए किसी क्रांति से कम नहीं था।

रजनी मुझे हमेशा दीदी जैसी लगती। वह पहले मेरी दीदी की सहपाठी भी रही थी। रास्ते में वह बार-बार दीदी का हाल पूछती और शहर के किस्से सुनाती। एक बार उसने बताया , “एक लड़का मुझसे बात करने की कोशिश कर रहा था, तो मैंने साफ़ डाँट दिया।”
यह सुनकर मेरे मन में उसके प्रति एक अलग सम्मान जग उठा।
लेकिन उसकी कुछ बातें दिल में अटक गईं। वह मुस्कुराकर बार-बार कहती —
“भैया, आप बहुत अच्छे हैं… हमें आप पर थोड़ा नहीं, पूरा भरोसा है। आप बाकी लड़कों की तरह नहीं हैं जो लड़कियों को छेड़ते हैं।”
राजीव को ये सब अटपटा-सा लगा। उसके इन शब्दों में जैसे कोई अनकही बात छुपी रहती थी।
करीब चार–पाँच महीने बाद अचानक खबर आई ,रजनी ने कोर्ट मैरिज कर ली है, वो भी इंटर-कास्ट। गाँव-इलाके में हंगामा मच गया। लोग कहने लगे,
“हरिशंकर की इज़्ज़त मिट्टी में मिल गई।”
पंचायत बैठी और तय हुआ कि हरिशंकर का “हुक्का-पानी” बंद कर दिया जाए।
बेचारे हरिशंकर ने गाँववालों के सामने गिड़गिड़ाकर कहा ,
“आज के बाद उससे मेरा कोई संबंध नहीं। न मैं उसे बुलाऊँगा, न ही उसके घर जाऊँगा।”
यह कहते समय उनकी आँखों में पानी था, मगर जुबान पत्थर जैसी।
पंचायत बोली ,“हरिशंकर, गाँववालों को तुमसे पूरी हमदर्दी और सहानुभूति है। लेकिन इस घटना से इलाके की लड़कियों पर बुरा असर पड़ेगा।”
बाद में पता चला , रजनी की शादी उसकी मजबूरी थी। वह गर्भवती थी और शादी के सिवा उसके पास कोई राह नहीं थी।
चार–पाँच साल बाद की बात है। मैं बस-स्टॉप पर खड़ा था कि अचानक रजनी दिख गई। अपने पति के साथ, गाँव जाने के लिए बस का इंतज़ार कर रही थी। चेहरे पर वही तेज़ था, पर आँखों में गहरी थकान।
चार–पाँच साल बाद की बात है। मैं बस-स्टॉप पर खड़ा था कि अचानक रजनी दिख गई। अपने पति के साथ, गाँव जाने के लिए बस का इंतज़ार कर रही थी। चेहरे पर वही तेज़, मगर आँखों में गहरी थकान।
रजनी अपने छोटे बच्चे के साथ पिता के घर आई । गाँव के लोग टकटकी लगाकर देखने लगे। हरिशंकर बरामदे में बैठे थे। बेटी को देखकर उनका चेहरा सख़्त हो गया। लेकिन जैसे ही उनकी नज़र नन्हे बच्चे पर पड़ी, पत्थर-सी जुबान थरथराने लगी।
रजनी ने काँपते हुए कहा ,“पापा… मुझे माफ़ कर दीजिए। मैं गलती कर बैठी, पर यह बच्चा आपका भी खून है।”
हरिशंकर का गला रुंध गया। उन्होंने बच्चा गोद में उठाया, और आँसू उनकी आँखों से बह निकले।
गाँव के लोग भी चुप हो गए। कोई कुछ नहीं बोला।
उस दिन लगा मानो पंचायत के सारे फ़रमान, समाज की सारी मर्यादाएँ उस एक पल में पिघल गईं।
खून और रिश्तों का बंधन आखिरकार हर दीवार से बड़ा होता है।
आज भी जब वह घटना याद आती है तो मन सोच में पड़ जाता है ,मानव स्वभाव कितना जटिल है। कभी-कभी जवानी का जोश समाज के सारे बंधन तोड़ देता है, लेकिन अंततः दिल का रिश्ता सब पर भारी पड़ता है।



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