Hansa Shukla

Inspirational


4.8  

Hansa Shukla

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किरण

किरण

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जायसवालजी के परिवार में नये मेहमान आने की खुशी कुछ ही पल में मायूसी में तबदील हो गई जैसे ही जायसवालजी को डॉक्टर ने  बताया कि उनकी बेटी को सेरिब्रल पैलिस है अर्थात उसके शरीर और दिमाग का पूरा विकास नही हुआ है ऐसे बच्चों को विशेष देखभाल की जरूरत होती है इसे घर ले जाना चाहेगे अथवा यहाँ छोड़ेंगे।मिस्टर जायसवाल बिना जवाब दिए आँसू पोछकर अपनी पत्नी से मिलने कमरे में चले गए वहाँ उनकी पत्नी,नन्ही बिटिया को अपने सीने से लगाकर सो रही थी। एक कमजोर पिता की तरह बच्ची की उंगली को अपने मजबूत हाथ मे लिये तो उन्हें लगा कि बच्ची उनसे अपने रक्षा का वचन मांग रही हो वह तुरन्त कमरे से निकले और डॉक्टर से बोले आप डिस्चार्ज की औपचारिकता बात दे मैं अपनी बेटी का विशेष ध्यान रखूँगा।                           

परिवार और करीबी दोस्तों के सलाह के विरुद्ध जायसवालजी पत्नी और बिटिया को लेकर घर आ गये,यहाँ भी नाराज माँ उनका स्वागत करना तो दूर की बात दरवाजा खोलकर तुरंत अपने कमरे में आ गयी वह सोचती थी लड़की वह भी अपाहिज उसे घर लाने की क्या जरूरत थी इसे किसी मंदिर की सीढ़ी या अनाथालय में छोड़कर दोनो एक बार रो लेते घर लाकर दोनो जीवन भर रोयगे तब मेरी बात समझ में आयेगी। जायसवाल दंपति ने बच्ची को किरण नाम दिया उन्हें उम्मीद थी कि वह उनके जीवन में खुशी के किरण लेकर आयेगी।

पूरे जान पहचान और रिश्तेदारी में पति-पत्नी के अलावा किरण को प्यार करने वाला कोई और नही था कुछ उसे हेय की दृष्टि से देखते तो कुछ दया भाव से बेचारी अपाहिज। मिस्टर और मिसेज जायसवाल उसका पूरा ध्यान रखते अच्छे से अच्छे डॉक्टर को दिखाते उनके बताए एक्सरसाइज कराना समय से दवा देना हर बात का ध्यान रखते।किरण पांच साल की हुई तो उसे विशेष बच्चों के स्कूल में भेजने लगे अब किरण व्हीलचेयर पर बैठकर बाहर जाती और कुछ कदम चलने भी लगी थी किसी बात को बहुत देर से समझती लेकिन समझने के बाद वह बात या वाक्या उसके दिमाग मे अंकित हो जाता उसके गु गु की आवाज से उसकी जरूरत को केवल जायसवाल दंपत्ति ही समझ पाते थे।

मिस्टर जायसवाल ऑफिस काम से किसी भी बड़े शहर में जाते तो वहाँ के डॉक्टर से मिलकर किरण के केस की चर्चा जरूर करते उनके बताए हुए हिदायत और दवाई को इस उम्मीद से देते की उसका जल्दी विकास होगा इस उम्मीद के साथ चौदह बरस निकल गए।मिसेज जायसवाल ने धीरे-धीरे किरण को सारे जरूरी नंबर याद करवा दिए जिसमे आवश्यक हेल्पलाइन नंबर भी थे वह उसकी विशेष आवाज वाली बातों को समझ जाती और किरण भी माँ की हिदायत और बात को समझने लगी थी।एक दिन जायसवालजी ऑफिस गये थे और मिसेज़ जायसवाल को अचानक भाई के तबियत खराब की सूचना सुनकर अस्पताल जाना पड़ा वह अपने तरीके से किरण को समझा दी कि वह कमरे से बाहर ना जाये और माँजी को उसका ध्यान रखने का निवेदन कर वह चली गई उनके जाने के थोड़ी देर बाद किरण अपना व्हीलचेयर घसीटते हुवे हाल में आ गई किचन में कुछ देखकर अपनी अस्पष्ट आवाज से दादी को बुलाने लगी दादी उसकी आवाज सुनकर अपने कमरे का दरवाजा बंद कर ली,किरण ने बड़ी मेहनत से टेबल से मोबाइल उठाकर कोई नंबर डायल किया और हॉल के किनारे आ गई वहां से गु-गु की आवाज से दादी को बुलाने लगी। थोड़ी देर में घर के सामने आग बुझाने वाली गाड़ी आ गयी और पानी के तेज धार ने धीरे-धीरे आग की लपटों को शांत कर दिया।

मिसेज जायसवाल घर के सामने भीड़ और फायर ब्रिगेड की गाड़ी देखकर किसी अनहोनी की आशंका से इष्टदेव का सुमरन करते हुए अंदर आई वहाँ हाल के किनारे अचेत सी किरण थी उसके हाथ मे मोबाइल था जिसमे फायर ब्रिगेड का नम्बर डायल हुवा था वह सारा माजरा समझ गई उन्होंने किरण को अपनी मजबूत बाहों में भरकर अपनी पूरी ऊष्मा उस बच्ची को दे दी प्यार से उसका माथा चूमकर उसे पानी पिलाकर उसके कमरे में लिटाकर आई आज उनका गुस्सा आपे से बाहर हो गया माँजी को आवाज देकर वह गुस्से से बोली आप किरण को इसलिए पसंद नही करती है क्योंकि वह शारिरिक और मानसिक रूप से कमजोर है लेकिन आप तो मन से कमजोर है माँजी वो बच्ची आपको आवाज देती रही और आप बाहर आना तो दूर अपने कमरे का दरवाजा बंदकरके पूजा करती रही,कैसी पूजा माँजी जो आप मासूम बच्ची की भावनाओं को समझ नही पाती उससे नफरत करती है आज किरण ना होती तो शायद आपकी समाधि बन गई होती वो बच्ची आपकी ओर से कोई मदद ना मिलने पर फायर ब्रिगेड को फोन की और उन्हें अपना एड्रेस भेजी भले लोग समय से आ गए और सब कुछ बच गया क्या होता मेरी फूल सी बच्ची का ,आप तो हाथ मे माला फेरती है लेकिन आपके मन मे इतनी नफरत है वो भी अपनी पोती के लिए।

मिसेज जायसवाल दौड़ती हुई किरण के कमरे में आई कभी उसके हाथ को अपने हाथ में लेती,कभी बालो में हाथ फेरती कभी उसके माथे को चूमती वह किरण को अपने अंदर छुपा लेना चाहती थी जैसे आसमान में बादल वह सारी दुनिया को बताना चाहती थी कि आज उनकी दिव्यांग बेटी ने मुसीबत के समय वह काम कर दिखाया जो सामान्य बच्चें नही कर पाते।      

शाम होने तक सब सामान्य हो गया माँजी ने संध्यादीप में तीन दीप लगाया एक तुलसी में रखी ,एक भगवान के सामने और तीसरा दीप लेकर किरण के कमरे में आकर उसकी आरती की और अपना अपराध स्वीकार की मेरी फूल सी बच्ची मुझे माफ़ कर देना मैं तुम्हे कभी अपना नही सकी क्योकि तुम दिव्यांग थी आज तुमने मेरी आँखें खोल दी तुम नही होती तो मैं जलकर खाक हो चुकी होती तुमने मुझे ये अहसास कराया कि भगवान की हर रचना में उनका ही अंश होता है आज संध्या के सूरज की किरणों ने मेरे मन के अंधेरे को हर लिया और मेरे मन को प्रेमभाव से रोशन कर दिया है। दादी के झुर्रियों वाले हाथ ने किरण के नरम हाथो को मजबूती से थाम लिया और बोली तुम आज  से मेरी जिंदगी का किरण हो। 


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