ख़ुशी के रंग
ख़ुशी के रंग
सरिता , पैर के दर्द को अनदेखा कर दो दिनों से होली की तैयारी में जुटी थी।इस वर्ष दो सालों का कसक निकालना है महामारी के वजह से ढंग से होली नहीं खेल पाई थी।इस साल सारे दोस्तों कोबुला कर साथ में रंग खेलने का मन बना लिया था।सरिता ने।
“सुनो ,बाज़ार जाना तो ये सारे सामान ला देना।”सामानों की लिस्ट पकड़ाते हुए सरिता ने जितेंद्र अपने पति से कहा।साल भर का त्योहार है इसी बहाने पकवान बन जाते हैं।
“सुनो ,ये सामान रहने दो।चलो तैयारी कर लो गाँव चलते हैं...”जितेंद्र ने कहा।
“क्या गाँव?कैसे हमने तो टिकट भी नहीं करवाया है।”सरिता ने चिंता जताया।
"कोई बात नहीं ,अपनी गाड़ी से चलेंगे ड्राइवर का इंतज़ाम हो गया है।कल सुबह -सुबह छ: बजे निकल चलेंगे।इस बार होली वहीं मनाएँगे।” जितेंद्र ने कहा तो सरिता का ख़ुशी का ठिकाना ही नहीं रहा।
“अच्छा सुनो अम्मा,बाबूजी के लिए कुछ कपड़े खरीद लेते हैं पिछले साल भी नहीं जा पाए थे।पूरे दो साल हो जाएँगे गाँव गए हुए ।”सरिता ने कहा।
“दो साल नहीं पूरे बीस साल हो जाएँगे। पहली होली के बाद हम अब बीस साल बाद तुम्हारे ससुराल नहीं मैं अपने ससुराल जाऊँगा।” सरिता अवाक जितेन्द्र का चेहरा पढ़ने की कोशिश कर रही थी।
“क्या देख रही हो ऐसे? आज तक तुमने कभी कहा ही नहीं... मेरे परिवार और बच्चों के इर्द-गिर्द ही सारे ख़ुशियों के रंग बाँटती रही।”
सरिता पति के इस रंग से वाक़िफ़ नहीं थी।अप्रत्याशित प्रेम के तोहफ़े से सराबोर सरिता मायके में आकर बिलकुल बचपन के रंग में रंग गई थी।
