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Anita Bhardwaj

Action


4.5  

Anita Bhardwaj

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खरीददार

खरीददार

7 mins 202 7 mins 202

आरोही एक सुलझी हुई लड़की, जिसे बड़ी सादगी से रहना सिखाया उसकी मां ने।

पापा के घर में किसी चीज की कोई कमी नहीं। फिर भी आरोही में ना तो कोई घमंड था, ना किसी ऐशो - आराम की आदत।

उसने ये सादगी उसने अपनी मां के संतोष स्वभाव से पाई थी, जिसे किसी दिखावे, दुनिया के चलते फैशन से कोई मतलब नहीं था। आरोही में भी वही गुण आए।

ज्यों ही आरोही बड़ी हुई शादी की बात भी होने लगी घर में।

रिश्तेदार, आरोही के टीचर्स तक उसके लिए एक से बढ़कर एक रिश्ते लेकर आते थे।

पर आरोही, पापा की इतनी लाडली थी कि अपनी, लाडो के लिए कोई रिश्ता उन्हें पसंद है नहीं आता था। कहीं पैसों की अकड़ , कहीं लड़के का बस फैमिली बिजनेस पर निर्भर होना।

आरोही को बहुत अच्छा लगता जब भी वो किसी रिश्ते को ना कह देते।

आरोही की सहेली की शादी हुई, दूल्हे की डिमांड थी कार की, जब उसने शादी के पंडाल में कार देखी तो उसे रंग पसंद नहीं आया।

दूल्हा ज़िद्द पर अड़ गया, और घरवाले, रिश्तेदार लग गए इधर उधर जुगाड़ बिठाने, कहीं फेरे ना रुक जाए।

आरोही ने अपनी सहेली से कहा-" तारा, तुम ऐसे लड़के से शादी करोगी, जिसे तुम्हारी या तुम्हारे मां बाप की तकलीफ का कुछ ख्याल नहीं?"

तारा-"पापा की ही गलती है मैंने बोला था कार लेने से पहले पूछ लेते तो क्या हो जाता?"

आरोही -" तुम पागल हो गई हो , इस शादी के पीछे ?"


तारा -" मैं प्यार करती हूं उसको, मैं कुछ नहीं कर सकती।"

आरोही -" प्यार करती हो, तो बिना कार के विदाई क्यू नहीं करवा लेती ? क्यूं सबको परेशान कर रही हो?"

तारा -" तुम्हारे घर में तुम्हें सब मिला है आरोही! मुझे हमेशा पापा ने यही बोला है कि अपने सपने कम रखो ; कल को तुम्हारी शादी में भी खर्च करना है। वैसे भी ये घर ,खेत सब भाई के पास ही तो रहेंगे। मुझे एक कार दे भी देंगे तो क्या हो जाएगा।"


आरोही -" क्या बिना कार लिए तुम्हें प्यार नहीं करेगा वो?"

तारा -" बिना दहेज के कोई इज्जत नहीं करता, ना पति ना ससुराल वाले। "

आरोही -"अगर ऐसा है तो मुझे कभी नहीं करनी शादी।"

तारा -" कहना आसान है , ये किताबों की बातों में यकीन करने वाला कोई नहीं होता।"

आरोही -" चलो मैं जा रही हूं, तुम्हें शादी मुबारक।"

तारा -" आरोही सुनो ! फेरे तो देख कर जाओ, कम से कम।"

आरोही -" ये खरीददारी वाली शादी मुझे नहीं देखनी।"

और आरोही चली आई घर।

दादी -" क्या हुआ बेटा, कैसी रही शादी आरोही!"


आरोही -" शादी नहीं दादी वहां तो दूल्हा बिक रहा था, अपनी ही पसंद की कार में।"

दादी -" नहीं बेटा, ऐसा नहीं बोलते। ये दान दहेज तो देना ही पड़ता है सबको। लड़की के पैदा होते ही मां बाप इस दिन के लिए जोड़ना शुरू कर देते है। तू देखना तेरी शादी में इतना दान दहेज देंगे तेरे पापा कि आसपास किसी ने नहीं दिया होगा।"


आरोही - " तो दादी उन दान लेने वालों को बोल देना झोली फैला के पंडाल में बैठे, वरना मैं फेरे नहीं लूंगी।"

आरोही की बातें पापा के कानों में पड़ी। उन्होंने गुस्से से बोला -" यही सब सिखाते हैं क्या तुम्हारे कॉलेज में?"

आरोही -"पापा मैं तो बस कहना चाह रही थी कि -ये दान दहेज वाली शादी ,मेरी मत करना। "


पापा -" बिना दहेज के कोई इज्जत नहीं लड़की की ,ससुराल में। "

आरोही -" तो दहेज के बाद क्या वो इज्जत करते हैं? "

पापा -" अपने बराबर का रिश्ता करना है तो, ये सब तो देना ही पड़ता है।"

आरोही -" बराबरी सिर्फ हम करेंगे क्या, लड़के वाले भी मेरी पसंद की कार और मेरे लिए लाखों रुपए की सेविंग करके बैठे होंगे?"

पापा -"ये बड़ी बातें बहुत आसान है, जब दुनिया की हकीकत से लड़ोगी तब देखना।


आरोही -" प्लीज़ पापा !!! मुझे किसी कार की जरूरत नहीं; ना कार वाले की। मेरे पापा के पैसे देख कर नहीं ,मुझे देखकर शादी करे, ऐसा ही कोई ढूंढ़ना।"

पापा -" ऐशो आराम में पली हो बेटा , बड़ी बातें करना बहुत आसान है। एक दिन भी नहीं गुजर पाओगी मैं दावा करता हूं। फिर छींक तक भी मारोगी तो पापा को याद करोगी दवाई के लिए। सारी उम्र किसी से ना मांगना पड़े कुछ, इसलिए पहले ही मां बाप बेटी को इतना देते हैं की आगे जाकर उसकी इज्जत हो , किसी चीज की जरूरत ना महसूस हो।"

आरोही -" पापा आपने अपनी बेटी को समझा नहीं। इतना स्वाभिमान है मुझमें। मैं खुद कमाऊंगी और शादी भी उसी से करूंगी जो अपने दम पर कुछ कर सके।"


पापा -" ये बहस ना करो, लगता है अब जल्दी ही रिश्ता करना पड़ेगा।"

कुछ दिन बाद पापा के एक दोस्त आए रिश्ता लेकर।

" देखो! लड़का वकील है और जल्दी जज बन जाएगा। तुम बस कुछ दहेज देने की बजाय 25 लाख कैश दे देना । जज जमाई ढूंढते तो 50 लाख से कम में बात नहीं बनती; अब 25 में ही मिल रहा है।" इंटरव्यू वालों ने 50 लाख की डिमांड की । 25 लाख तो लड़के के पापा ने जमा कर लिए । अब 25 के जुगाड़ में लगे हैं। कहो तो आरोही बेटी की बात चलाऊं।

पापा -" हां बिल्कुल, इसी रविवार बुला लो।"


आरोही सब सुन रही थी, उसने जैसे ठान ली हो, उसे सबक सिखाने की। फिर तो बस रविवार तक पापा की हर हां में हां करती गई।

पापा ने दादी से कहा -" मां इसे समझा देना कहीं उनके सामने भी अपने कॉलेज के भाषण शुरू कर दे।"


दादी तो अपनी लाडो को जानती ही थी, और बेटे को भी। बिना बोले वो भगवान जी को प्रसाद चढ़ाने का लालच देने लगी।

" हे मेरे कृष्ण भगवान ! ये रिश्ता हो या ना हो बस बाप बेटी की लड़ाई मत होने देना। इस एकादशी 11 कन्या को खाना खिलाऊंगी।"


लड़का आया, उसके मम्मी - पापा और आरोही के पापा के दोस्त भी।

घरवालों के सामने आरोही को भी बुलाया गया , उसकी खाना बनने की स्किल से लेकर, घर चलाने की, सहनशक्ति, नौकरी सब बातें पूछी गई।

फिर आरोही और दीपक को बोला गया , कुछ पूछना हो तो पूछ लो एक दूसरे से।


दादी दरवाजे के पीछे ही थी कान लगाए खड़ी थी, और भगवान को अपना वादा याद दिला रही थी ;हाथ जोड़े।

दीपक -" तो अपने बारे में कुछ बताइए।"


आरोही - "मेरे बारे में तो आप सब पता करके ही आए है। मेरी एजुकेशन से लेकर, मेरे पापा के बैंक बैलेंस तक।"

दीपक -" मैं समझा नहीं।"

आरोही -" अरे!! आप तो जज बनने वाले हो इतना भी नहीं समझे!! ओह ! याद आया ,रिश्वत देकर बनने वाले हो ना इसलिए शायद समझ नहीं पा रहे हो।"

दीपक -" इस बदतमीजी का क्या मतलब है?"

आरोही -" अरे जज साहब ! थोड़ा धैर्य रखिए , ये तो सीखने से ही आयेगा, खरीद नहीं पाएंगे।"

दीपक -" तुम्हें कोई और पसंद है तो घरवालों से कहो ना, मुझपर अपना गुस्सा क्यूं निकाल रही हो?"

आरोही -" अब आए ना आप अपनी असलियत पर। मुझे पसंद तो कोई नहीं पर मुझे किसी रिश्वतखोर से भी शादी नहीं करनी है।"

दीपक -" मैं तो यहां जीवनसाथी के लिए आया था, पर तुम तो सातवें आसमान पर हो। हो क्या सिर्फ एक लेक्चरर।"

आरोही -" वकील साहब ! तुम यहां जीवनसाथी नहीं, अपने खरीददार की तलाश में आए हो।

मैं चाहे कुछ भी हो, पर तुम्हारी तरह बिकाऊ नहीं हूं।"

दीपक उठा और बाहर आ गया।

दीपक की मां - " हो गई बात बेटा?"

दीपक -" चलो मां यहां से?"


आरोही -" आंटी आप मुझसे पूछ रही थी ना खाना बनाना आता है कि नहीं। तो अब आप बताइए, 25 लाख देकर भी मैं ही खाना बनाऊंगी ?"

आरोही के पापा -" आरोही!! अंदर जाओ अभी।"

दीपक की मां -" भाई साहब कुछ तमीज सिखाइए , लड़की जात है।"

आरोही -" आवाज़ धीमे आंटी जी। लड़की जात हूं ये भूलकर, ये सोचिए खरीदार हूं आपके इस वकील की, जिसके बिकने की कीमत पर ये जज बनेगा।"

( एक सन्नाटा फैल गया कमरे में, दीपक और उसके घरवाले चले गए अपना सा मुंह लेकर।)

आरोही के पापा को विश्वास नहीं हो रहा था कि आरोही में इतनी हिम्मत है कि वो सब इतने आसान शब्दों में कह देगी।

पापा -" आरोही !! आखिर तुम चाहती क्या हो?"

आरोही -" पापा, मुझे ऐसा जीवन साथी चाहिए जिसको जीवनसाथी कि जरूरत हो खरीददार की नहीं।


आरोही के पापा समझ चुके थे कि कोई फायदा नहीं किसी लोभी के घर बेटी ब्याह कर, सारी उम्र बेटी भी दुखी और मां बाप भी।

और जुट गए किसी स्वाभिमानी वार की तलाश में।



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