खरगोश ने किया मदहोश
खरगोश ने किया मदहोश
खरगोश ने किया मदहोश
शायद मैं तब हाई स्कूल में पढ़ता था।
छुट्टी का दिन था। शाम का समय।
मैं हरे-भरे, लहलहाते खेतों में टहल रहा था। कठिन परिश्रम से उपजी फसल को निहारते हुए मन में एक अजीब-सी तृप्ति थी। धीरे-धीरे शाम गहराने लगी थी।
तभी मेरी आँखों के सामने एक अत्यंत मनोहारी दृश्य उभरा।
कुछ खरगोश अपने बिलों से बाहर निकल आए थे। उछल-कूद कर रहे थे, मानो यही उनका खेलने-घूमने का समय हो।
मैं उनकी ओर धीरे-धीरे बढ़ने लगा।
पर ज्यों ही उन्हें मेरी आहट मिली, वे फुर्ती से कूदकर अपने-अपने बिलों में समा गए।
हाँ, अब मुझे उनके घर का पता चल गया था।
मन में इच्छा जागी—
काश, एक खरगोश पकड़ लूँ और उसे पालतू जानवर की तरह पालूँ।
पर यह आसान नहीं था।
एक दिन किस्मत ने साथ दिया।
एक खरगोश मुँह घुमाकर बैठा हुआ था। मैं साँस रोके, दबे पाँव आगे बढ़ा और अचानक उसके ऊपर टोकरी रख दी।
मैं सफल हो गया।
उस क्षण की खुशी को शब्दों में बाँध पाना कठिन है—बहुत कठिन।
मैं उसे घर ले आया। एक बक्से में बंद कर दिया।
पिताजी ने देखते ही कहा,
“इसे वापस छोड़ आओ।”
लेकिन मैं खरगोश पालने की ज़िद पर अड़ा था।
पिंजरे का जुगाड़ करने की योजना बना रहा था।
उसे हरी घास, सब्ज़ियाँ और दूध पिलाने लगा।
एक कमरे में रखता, ऊपर से टोकरी ढक देता।
मौसम सर्दी का था।
दिन में तीन-चार बार उसे गोद में उठाता, सहलाता।
मुझे लगता था—मैं उसकी पूरी देखभाल कर रहा हूँ।
पिताजी बार-बार कहते,
“अब तुम्हारा चाव पूरा हो गया हो तो इसे खेतों में छोड़ आओ।”
पर मेरी ज़िद बढ़ती जा रही थी।
धीरे-धीरे मैंने देखा—
खरगोश सुस्त होता जा रहा है।
एक ही सप्ताह में उसने दम तोड़ दिया।
मुझे बहुत दुख हुआ—बहुत।
एक तो खरगोश पालने का सपना टूट गया,
दूसरा—उसकी मौत का बोझ मन पर आ बैठा।
पिताजी ने समझाया,
“यह घर की सर्दी सहन नहीं कर सका।”
मैंने मासूमियत से पूछा,
“खेतों में भी तो सर्दी होती है। वहाँ उसके पास कंबल-स्वेटर तो नहीं होते।”
पिताजी बोले,
“खरगोश बिलों में रहते हैं।
वही बिल उनके लिए कंबल और स्वेटर का काम करते हैं।”
उस दिन मैंने प्रकृति का एक गहरा नियम समझा।
और उसके बाद—
मैंने कभी दोबारा खरगोश पकड़ने की कोशिश नहीं की।
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