खंडहर

खंडहर

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मैं उसकी बाते सुन सुन कर थक चुका था रोज की वही किट किट... हे भगवान ! अब तुम ही मेरी कुछ मदद करो !

सारी गलती तो मेरी ही है मै ही उसके मासूम चेहरे के पीछे छिपे फरेब को न देख न पाया  | पैसे की चकाचौंध ने मानो परदा डाल दिया हो. कितना मना किया सबने यह लड़की तुम्हारे लिए सही नही, यह मतलबपरस्त व एक नम्बर की स्वार्थी है पर दिलो दिमाग़ पर वह हावी हो चुकी थी.. उसके रूपजाल में मैं इस कदर उलझ गया की अच्छे बुरे का कुछ होश न रहा |

बस उसके इशारों पर चलना मजबूरी नहीं आदत बन गयी |

मेरा वक्त उसके साथ ही बीतता था वो खुद की तुलना एक हसीन इमारत से करती थी अगर गलती से मैं कोई बात माँ की मान लेता तो वह कहती तुम उस खँडहर की ही सुनोगे मेरी नहीं | मैं उसे कभी दुखी नहीं देख सकता था भले ही कितनो के दिल ज़ार ज़ार रोते हो, सिर्फ उस हसीन इमारत की वजह से अपनी हर बात वो ऊपर रखती चाहे किसी का कितना भी नुकसान क्यों न हो उसे फर्क नहीं पड़ता |

एक बार मैं बुखार में तड़प रहा था वो शहर से दूर अपने किसी करीब की शादी में शामिल होने गयी थी मैं घर पर अकेले था मां पहले ही मुझे छोड़ गांव में चली गयी थी |

मेरी खांसी रुकने का नाम न लेती थी लगता मानो जान ही जायेगी पर उसे मेरी कोई परवाह न थी |

”यह क्या मैं यहां कैसे माँ.. मुझे कौन लाया”.. “तुम आराम करो बेटा डॉक्टर ने चकअप कर लिया है तुम ठीक हो जाओगे डरो नही मैं हूँ न. “.. मेरी आँखों में आंसू थे, माँ मुझे मानो दोबारा जीवन दिया हो | वो हसीन इमारत अपनी जली कटी सुनाने गांव चली अायी | वो बार - बार अपनी अमीरी का रोब दिखाती ,माँ ने एक शब्द न कहा पहली बार मुझे अपने अाप से नफ़रत हो रही थी |

उसकी अाँखो में विस्मय और अपमान... झलक रहा था. मुझे खंडहर के अांचल में सूकून मिल रहा था...उस हसीन इमारत की घुटन से आजाद.... कोसों दूर खंडहर में जीवन जी रहा था |


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