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Arunima Thakur

Abstract Fantasy

4.7  

Arunima Thakur

Abstract Fantasy

खिड़की के पार

खिड़की के पार

18 mins
530


मुझे सुबह-सुबह ही कमिश्नर साहब का फोन आ गया कि एक वयोवृद्ध प्रसिद्ध साइंटिस्ट प्रोसेसर डॉ कृष्णा अपने घर में मृत पाए गए हैं। संदेहास्पद तो कुछ खास नहीं बस दरवाजा शायद बाहर से बंद था। मुझे तुरंत घटनास्थल पर पहुंचने का आदेश दिया। मैं लगभग तैयार ही था। दादी से आशीर्वाद लेकर घटनास्थल की ओर निकल पड़ा। मैं यानी कौन . . . . ओके क्षमा चाहता हूँ कि मैंने आपको मेरा परिचय नहीं दिया I मैं इंस्पेक्टर बेदी, . . . .मैं दादी का बहुत लाडला हूँ और मैं भी उनको बहुत सम्मान देता हूँ। मेरे बारे में बाकी बातें बाद में अभी तो हमें घटनास्थल पर पहुंचना है।

वैज्ञानिक प्रोफेसर कृष्णा का घर जब बनाया गया होगा तब शायद शहर के किनारे फार्म हाउस जैसा था। जो कि अब शहर के विस्तार के कारण शहर के अंदर आ गया था। आसपास की बड़ी-बड़ी इमारतों के बीच में छोटा सा हरित धब्बे जैसा घर अच्छा लग रहा था। घर छोटा था। घर के अंदर ही एक पूर्ण सुसज्जित प्रयोगशाला थी जो कि किसी भी पासवर्ड लॉक नहीं थी। यह बात थोड़ी आश्चर्यचकित करने वाली थी। पहली नजर से देखने पर मामला प्राकृतिक मृत्यु का ही लग रहा था क्योंकि घर में या लाश पर किसी भी तरह की जोर जबरदस्ती के निशान नहीं थे। 

प्रोफेसर कृष्णा की लाश को देखकर लग रहा था कि जैसे सोफे पर बैठकर वह किसी गहरी सोच में डूबे हुए हो। तभी मेरा ध्यान मेज पर गया। उस पर एक टेबल कैलेंडर रखा था। जिसमें कल की तारीख यानि 28 नवंबर दिख रही थी। मेज पर दो कप प्लेट और प्लेट में बिस्किट भी रखे थे। एक कप चाय से आधा भरा था। शायद चाय पी नहीं गयी थी। मतलब कोई तो आया था, जिसके लिए प्रोफेसर कृष्णा ने खुद से चाय बनाई थी। मतलब कोई पुराना जान पहचान वाला। रसोई में खाना वैसा ही रखा था मतलब मौत रात खाना खाने से पहले ही हुई होगी या फिर उन्होंने खाना नहीं खाया था। पास ही एक महिला रो रही थी पूछने पर पता चला कि वह उनकी काम वाली बाई सुजाता थी। जो कि कल शाम को खाना बना कर गई थी। तब तो प्रो. कृष्णा अच्छे भले थे। उन्होंने उसके जाने के बाद दरवाजा बंद भी किया था। वैज्ञानिक को चाय का बहुत शौक था तो वह रोज जाने से पहले थरमस भरकर रख देती थी। क्योंकि वह अकेले ही रहते थे। उनका कोई परिवार नहीं था। तो किसी भी पहचान वाले के आने जाने की स्थिति में उनको चाय नहीं बनानी पड़ती थी। 

पूछने पर सुजाता ने बताया कि वह जब रोज की तरह सुबह आई तो दरवाजा बाहर से बंद था। उसे लगा कि वैज्ञानिक कहीं बाहर टहलने गए होंगे। तो वह दरवाजा खोलकर अंदर आ गयी। तब उसने इनको इस हालत में देखा और दो - चार बार बुलाने पर भी जब इन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं की तो उसने बाहर जाकर पड़ोसियों को बताया और उन्होंने पुलिस को फोन किया।

घर में कहीं भी किसी तरह की चोरी के निशान नहीं थे। थोड़ा शक तो हुआ, कितना बड़ा वैज्ञानिक और घर में कोई तिजोरी, कोई जगह भी नहीं जहां पर कुछ संभाल कर रखा जा सके। खैर हो सकता है वह अपने सारे दस्तावेज बैंक के लॉकर में रखते हो। लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेजने के बाद मैं यूं ही एक बार वापस से अच्छी तरह से घर को देखना चाहता था कि कुछ भी अलग से, संदिग्ध हो तो छूटने ना पाए। मैंने घर को एक बार बाहर से भी देखना, जांच करना उचित समझा। मैं बाहर फार्महाउस में भी जाकर आया कि शायद कोई सिरा मिले। यूँ ही जाँच करते समय जब मैं बैठक की खिड़की जो कि बाहर फार्महाउस में खुलती थी की तरफ गया तो खिड़की से झाँकने पर पाया कि अंदर प्रोफेसर कृष्णा बैठकर चाय पी रहे हैं। यह देखकर तो मेरे होश ही उड़ गए। क्या भूत . . मैं भागकर अंदर कमरे में गया। कमरा पहले की तरह सुनसान था। मैं वापस बाहर आया वापस झाँक कर देखा तो प्रोफ़ेसर कृष्णा उठकर गए कोई किताब निकाली और बैठकर पढ़ने लगे। मेरा तो दिमाग ही काम नहीं कर रहा था। यह क्या है ? यह कैसे संभव है ? क्या इस खिड़की की काँच में कोई वीडियो लगा है, जो सीसीटीवी की तरह इमेज दिखा रहा है ?

तभी मेरी नजर मेज पर रखे कैलेंडर पर पड़ी उसमें आज से पाँच दिन पहले अर्थात 23 नवंबर की तारीख थी। यह क्या . . . . ? कोई ऐसा क्यों करेगा भला . . .? खिड़की में वीडियो फिल्म . . . . ? मैं काफी देर तक खड़ा देखता रहा। फिर कुछ पुलिस वालों को निगरानी के लिए बोल कर मैं वापस आ गया I मैं पूरे समय उसी खिड़की के बारे में सोचता रहा। कि अगर इसमें वीडियो फिट है तो अंदर से कुछ भी अलग क्यों नहीं दिखा। अंदर से तो खिड़की एकदम सामान्य लगती है। मैं इस गुत्थी में इतना उलझ गया था कि मैंने वापस जाकर खिड़की को चेक करने का निर्णय लिया। कुछ देर बाद वापस मैं खिड़की पर था।अंदर से तो जैसे कि मैंने सुबह भी देखा था कोई तार किसी तरह का कोई कनेक्शन नहीं दिखता। मैं वापस बाहर आया। बाहर से अंदर का सब कुछ साफ दिखाई दे रहा था। एक अजीब बात जब मैंने खिड़की से मुंह सटाकर ध्यान से देखने की कोशिश की तो मुझे कमरे के किनारे दरवाजे की तरफ वाला हिस्सा भी दिखाई दिया। मैं देखा प्रोफेसर कृष्णा ने उठकर दरवाजा खोला। दरवाजे से कामवाली सुजाता अंदर आई I सुजाता अंदर की तरफ चली गई। प्राे कृष्णा ने मुंह उठाकर ऊपर की ओर देखा वहां दीवार घड़ी थी। उसमें 5: 25 हो रहे थे। आश्चर्य लगभग यही समय तो मेरी घड़ी में भी बज रहा है। मैं सोच में पड़ गया कि यह कैमरा होता तो मुझे उतना ही दिखाता जितना मुझे दिख रहा है। मुझे लग रहा था मानो 5 दिन पहले की खिड़की पर खड़े होकर अंदर के दृश्य देख रहा हूं। यह तो अजीब पहेली है।

दूसरे दिन वापस मैं प्रोफेसर कृष्णा के घर गया। पुलिस पहरा दे रही थी। वह परेशान थे कि खाली घर को पहरा देने को कह रहे हैं। सीधी सी बात है घर सील कर दो। पर मैं किसी को अभी खिड़की की बात बताना नहीं चाहता था क्योंकि जो रहस्य मैं खुद नहीं समझ पाया उस को दूसरो के साथ साझा करूँ भी तो कैसे ? खिड़की से झाँक कर देखने पर कमरा खाली था। पर लाइट जल रहीं थी। सामने टेबल पर रखे कैलेंडर में 5 दिन पहले की मतलब वारदात से 4 दिन पहले की यानी कि 24 नवम्बर की तारीख दिख रही थी। अंदर घड़ी का समय मेरी घड़ी के समय के लगभग समान था। मतलब क्या यह खिड़की रोज मुझे 5 दिन पहले उस कमरे में घटित हुई घटनाओं को दिखाती है ? क्या यह संभव है. ? तभी मेरे दिमाग में मेंरे बचपन की एक दोस्त की बात गूँज गई जो हमेशा कहता था कि सब कुछ संभव है। जो सारे अविष्कार आज सच है उनके होने की कल्पना तीन दशक पहले तक असंभव लगती थी। खैर मैं काफी देर तक देखता रहा मुझे कुछ भी खास नहीं दिखा। मेरे दिमाग में आया क्यों ना मैं यहां खड़े होकर इस खिड़की की वीडियो बनाऊं। तो मुझे पता चलेगा कि अंदर हो क्या रहा है। क्योंकि पूरा दिन मेरा। खिड़की पर खड़े रहना तो संभव नहीं था। तो मैंने अपने भरोसे के एक पुलिस फोटोग्राफर को बुलाकर उसको खिड़की की वीडियो शूटिंग करने को बोला I पहले तो वह भी आश्चर्य से मेरा मुँह देखने लगा कि खाली पड़े कमरे की वीडियो शूटिंग करने से क्या फायदा? पर जब उसने भी पाँच मिनट खिड़की से कमरे के अंदर देखा तो उसका मुँह भी आश्चर्य खुला रह गया I 

मैंने उसे संक्षेप में समझाया, उसे अगले दो-तीन दिनों तक वीडियो शूटिंग करनी है दिन-रात। वह चाहे तो ऐसा कोई कैमरा उस खिड़की पर फिट कर दे या जो भी वह कर सके। तभी प्रोफेसर कृष्णा लाइट बंद करके कहीं बाहर जाने के लिए तैयार होकर निकल गए। तब फोटोग्राफर ने कहा कि जब तक कमरे की लाइट चलती रहेगी सिर्फ तभी तक वीडियो बनाना मुमकिन है। उसने कहा उसके पास एक ऐसा कैमरा है जो आँख की तरह 270 डिग्री तक की फोटो खींच सकता है और उसमें सेंसर भी है जब भी फोटो खींचने लायक रोशनी होगी वह वीडियो बनाना शुरू कर देगा। मैंने पूछा फिर बैटरी स्टोरेज का क्या होगा कहीं ऐसा ना हो कि बैटरी खत्म हो जाए या स्टोरेज फुल हो जाए तो . . : ? हमारा कुछ छूट ना जाए। तो उसने विश्वास दिलाया कि वह एकदम उच्च क्वालिटी का कैमरा है। इसकी बैटरी व स्टोरेज की कोई चिंता नहीं है।

यहां सब व्यवस्थित करके मैं पुलिस स्टेशन पहुँचा। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट आ चुकी थी। रिपोर्ट सामान्य थी मृत्यु हार्ट फेल हो जाने के कारण हुई थी। पर पता नहीं क्यों लाश का शारीरिक तापमान बहुत कम था। एक के बाद एक गुत्थी सामने आती जा रही थी। मुझे विश्वास था कि शायद खिड़की के द्वारा मौत की पहेली हल हो जाए। मैं रोज जाकर खिड़की को चेक करता टेबल कैलेंडर की तारीख 1 दिन बाद की होती। अब मैंने यह सारी बातें अपने सीनियर को बता दी थी। वह बहुत ही आश्चर्यचकित थे। अब कल का इंतजार था। जब जाकर खिड़की पर हमें पता चलने वाला था कि उनकी मृत्यु हुई तो हुई कैसे ? सुबह खिड़की से झांकने पर कैलेंडर की तारीख 28 नवंबर यानी कि वारदात के दिन की थी। बाकी सब कुछ सामान्य था। हमने निश्चय किया कि हम सुजाता के जाने के बाद वाले समय में आएंगे I क्योंकि जो भी हुआ था वह उसके बाद ही हुआ था। और सुजाता उस दिन 6:30 के आसपास गई थी तो हम सब 6:15 पर वहां पहुँच गए। कैमरा पहले से ही था फिर भी एक अतिरिक्त कैमरा लगा दिया कि कोई भी गलती की गुंजाइश ना हो l प्रोफेसर कृष्णा ने सुजाता के जाने के बाद दरवाजा बंद किया। वह अपनी अलमारी के पास गये। उन्होंने अलमारी खोलकर उसमें से कुछ फाइलें निकाली और लाकर देखने लगे। फाइलें . . .यह तो हमें नहीं मिली। कहीं यह फाइले ही तो चोरी नहीं हो गई हो। मैं सोचने लगा। थोड़ी देर बाद प्रों कृष्णा ने चौक कर दरवाजे की ओर देखा I फटाफट उठे अपनी फाइलें वापस जाकर अलमारी में रखी और जाकर दरवाजा खोला। 

दरवाजे से एक बहुत ही सुंदर महिला का प्रवेश हुआ । वैज्ञानिक से उसने हाथ जोड़कर नमस्कार किया। दोनों आमने सामने बैठ कर बातें करने लगे। बाद में फिर प्रो कृष्णा थरमस से चाय निकाल कर लाए। दोनों ने बातें करते-करते चाय पी ॥ हम नहीं जान पाए कि उन लोगों ने आपस में क्या बातें की। करीब एक घंटे बाद वो उठ कर जाने लगी। जाते समय उसने वैज्ञानिक की तरफ हाथ बढ़ाया। उसके हाथों ने वैज्ञानिक के हाथों को छुआ। फिर क्या हुआ पता नहीं? पर लगा जैसे प्रो. कृष्णा को उसने स्टेच्यू बोल दिया हो। प्रोसेसर कृष्णा वैसे ही खड़े रह गए। फिर उसने धीरे धीरे करके उनको सोफे पर बिठाया और बाहर निकल गयी। उसके बाद हम काफी देर तक वहां खड़े रहे पर प्रोफेसर कृष्णा में कोई भी हलचल दिखाई नहीं दे रही थी। हम सब अचरज में थे कि किसी के छूने मात्र से कैसे कोई मर सकता है।

अब मेरा पहला काम था उस महिला के बारे में जानकारी निकालना। उस महिला की फोटो गूगल पर ढूंढने से पता चला कि वह एक प्रसिद्ध व्यवसायी की पत्नी और समाजसेविका है। हम उससे मिलने गए। उनकी कंपनी का मीटिंग हाल बहुत बड़ा था। वह एक सिरे पर बैठी थी और हम दूसरे सिरे पर। उन्होंने अभिवादन करके हमारे आने का कारण पूछा। हमने बताया हम एक केस के सिलसिले में आपसे कुछ पूछना चाहते हैं। आप 28 नवंबर की शाम को 7:00 बजे से 8:00 बजे तक कहां थी ? उन्होंने अपने सेक्रेटरी को बुलाया और हमें 28 नवंबर की जानकारी दिखाने को कहा। आश्चर्य 28 नवंबर की रात 7:00 से 8:00 बजे तक वह एक मीटिंग में थी। उन्होंने उस मीटिंग की वीडियो क्लिप लाने के लिए सेक्रेटरी को बोला। वीडियो क्लिप देखने पर मुझे आश्चर्य हुआ कि यह तो हो ही नहीं सकता। भला कोई एक साथ एक समय में दो जगह पर कैसे रह सकता है। यह तो असंभव है। उस पर भी दोनों जगह उनके कपड़े , उनके बैठने का तरीका एक जैसा था। फिर मेरे दिमाग में मेरे मित्र की बात गूंजी कि कुछ भी असंभव नहीं, साथ ही साथ दादी की सुनाई कहानी भी कि कृष्ण जी ने अपने योग बल से सभी गोपियों के साथ सशरीर रास रचाया था। मतलब. . . . यह संभव हो भी सकता है, एक साथ एक समय में दो जगह उपस्थित होना I पर कैसे ......?

खैर यह गुत्थी सुलझाने से पहले मैं फाइलों की गुत्थी सुलझाने के लिए प्रोफेसर कृष्णा के घर गया कि वह फाइलें हमें क्यों नहीं मिली? प्रोफेसर के घर जाकर मैंने अलमारी खोली उसके अंदर के सारे कपड़े और सामान निकालकर पलंग पर डाले और अलमारी का निरीक्षण करना शुरू किया। अलमारी के किनारों पर कहीं मेरे हाथ का दबाव पड़ा और एक पतला सा पल्ला निकलकर मेरे हाथ में आ गया। उसके पीछे से एक फाइल गिरी I यह क्या अलमारी में फाइल के बराबर उधर्वाकार खाना? पूरी अलमारी को ध्यान से देखने पर उसमें बहुत सारे ऊर्धवाकार खाने बने हुए मिले। जिसमें फाइलें थी। मैंने वह सब फाइलें समेट ली और कपड़े वगैरह ठीक से अलमारी में रख कर वहां से निकला। हो सकता है प्रोफेसर कृष्णा की मौत की गुत्थी इन फाइलों से सुलझ सके।

फाइलों को पढ़ कर पता चला कि उन्होंने ऐसे कई सारे शोध किए थे जिनको उन्होंने अभी तक पेटेंट नहीं कराया था। और उनमें से कुछ अविष्कार ऐसे भी थे जिनके बारे में उन्हें लगा कि वह मानवता के लिए खतरा है। इसलिए उन्होंने उसे छिपा कर रखा था और हां एक फाइल जिसका विवरण उन्होंने पेटेंट कराने के लिए भेज दिया था। उसमें लिखा था कि उन्होंने एक ऐसा कांच बनाया है जिसमें किरणों को कांच के अंदर एक निश्चित अवधि के लिए घुमा दिया जाता है। जैसे प्रिज्म में किरणे निकालते वक्त थोड़ी मुड़ जाती है। वैसे ही असंख्य प्रिज्मों को जोड़ करके किरणों को अंदर ही अंदर कुछ निश्चित अवधि के लिए मोड़ देते हैं। और वह किरणें दो दिन दो महीने या साल भर बाद भी बाहर निकल सकती हैं। अच्छा अब समझ में आया कि वह खिड़की का काँच भी उन्हीं का अविष्कार था। जिसमें किरणें पाँच दिन बाद बाहर निकलती थी। चलो एक गुत्थी तो सुलझी।

अब बारी थी दोनों वीडियो क्लिप्स का पोस्टमार्टम करने की I मतलब उन्हें अच्छे से देखने की। मुझे लग रहा था कि कोई ना कोई सुराग तो जरूर मिलना ही चाहिए। काफी देर तक अदल बदल कर वीडियो देखने के बाद मेरा ध्यान गया कि प्रोफ़ेसर के घर वाले वीडियो में उस महिला की परछाई तो पड़ ही नहीं रही थी। इसका मतलब.. . .आभासी व्यक्ति ? पर आभासी व्यक्ति चाय का कप कैसे पकड़ सकता है ? अच्छा शायद इसीलिए एक कप में चाय बची हुई थी। अब मैंने उन महिला से मिलने का निर्णय किया। 

उन्होंने मुझे अपने कंपनी के दूसरे मीटिंग हॉल में अच्छे से बिठाया और बहुत ही सभ्यता से पूछा कि कहिए, "आपका कैसे आना हुआ" ? 

मैंने ध्यान दिया कि उनकी परछाई भी नहीं पड़ गई थी। मैंने पूरे आत्मविश्वास से बोला, "मैं आपसे नहीं असली वाली श्रीमती जी से मिलना चाहता हूँ"। 

वह थोड़ा चौक गई पर फिर स्वयं को व्यवस्थित करते हुए बोली असली नकली क्या ? जो भी हूँ मैं ही हूँ I 

मैंने कहा, "वह तो आप है। पर आप यहाँ आभासी रूप में उपस्थित है। मैं आपसे आपके वास्तविक रूप में आपसे मिलना चाहता हूँ"। इतना कहकर मैं तेजी से उठा कि मैं उनको छूकर सिद्ध कर सकूँ कि वह एक परछाई है, आभासी है I उन्हें छूते ही मुझे झटका लगा और मैं गिर पड़ा। शायद उन्होंने मुझे ढकेल दिया था। पर यह क्या ? वह तो ठोस, सामान्य इंसान की तरह ही थी। पर परछाई क्यों नहीं बन रही है ? 

 उन्होंने हँसते हुए मुझे देखा और बोली, "कर ली तसल्ली। अब तो आप मानते हैं ना कि मैं, मैं ही हूँ"। 

मैंने कहा नहीं , "क्योंकि मेरे पास 28 नवंबर की रात की 7:00 से 8:00 तक का आपका एक और वीडियो भी है। तो अगर तब उस दिन आप एक साथ दो जगह पर हो सकती हैं तो आज क्यों नहीं" ? 

उनकी आँखें कुछ देर सोचने की मुद्रा में बंद रही। मैंने भी उन्हें समय दिया कि वह मुझ पर विश्वास कर सकें और अपना सच मेरे साथ साझा कर सकें। फिर उन्होंने कुछ देर बाद बोला ठीक है कल सुबह नौ बजे आप मेरे घर पर मुझसे मिलिए I मैं उन्हें धन्यवाद देकर चला आया।

दूसरे दिन सुबह ही मैं अपने कपड़ों में वीडियो कैमरा फिट करके गया कि पता नहीं वह मेरे साथ कैसा बर्ताव करने वाली हो ? और उस कैमरे की रिकॉर्डिंग अपने उस फोटोग्राफर दोस्त के कंप्यूटर में कर दी, जिससे अगर मुझे कुछ होता है तो वह तुरंत मेरी मदद को पहुँच सके और हमारे पास सबूत भी रहे। उनका घर बहुत बड़ा था मेरे पहुंचने पर वह मुझे बैठक में ही मिली l उन्होंने मुझे चाय नाश्ता के लिए पूछा I उसके बाद वह बोली, "आइए मैं आपको कुछ दिखाती हूँ"।

उन्होंने मुझे एक सफेद एप्रन जैसा कुछ पहनने को दिया I मैं परेशान अब यह पहनने के बाद शर्ट के बटन में लगा कैमरा काम ही नहीं करेगा। पर मैं अपनी परेशानी छुपाते हुए निश्चिंततापूर्वक वह एप्रन पहनकर उनके साथ गया। उनके घर के ऊपर एक बड़ी सी प्रयोगशाला थी और वहां एक व्यक्ति काम कर रहा था। पता नहीं क्यों उसे देखकर मुझे मेरा बचपन का मित्र याद आ गया। वैसी ही नीली हरी आँखें और उनमें विज्ञान का जुनून। उन महिला ने मुझे बोला, "यहां आपको आपके सारे सवालों के जवाब मिल जाएंगे I यह एक गरीब वैज्ञानिक है। जो आज से लगभग आठ साल पहले मेरे पति को बड़ी ही दयनीय अवस्था में रास्ते पर पड़े मिले थे। जब मेरे पति ने इनको कुछ मदद करना चाहा, देना चाहा तो इन्होंने उनसे विनती की कि अगर आप मेरे लिए कुछ करना ही चाहते हैं तो मेरे विचारों को सुनें | मैं अपने विचारों पर प्रयोग करना चाहता हूं। अगर आपसे संभव हो तो मुझे मदद करें I ना जाने क्यों मेरे पति को इनकी आँखों में कौन सा जुनून कौन से इरादे दिखे कि वह इन्हें घर ले आए और इनके लिए प्रयोगशाला खोल दी। पहले यह प्रयोगशाला बहुत छोटी सी थी। धीरे-धीरे उन्होंने मेहनत कर इसको काफी विकसित कर लिया। पति के जाने के बाद मुझे उनका बिजनेस संभालने में काफी परेशानी आ रही थी। तो इन्होंने यह ठोस आभासी रूप का निर्माण किया। इन आभासी रूपों से मैं घर बैठे बैठे हर जगह पहुँच जाती हूँ। यह रुप वायुमंडल में पाई जाने वाली सभी विकिरण, ध्वनि, प्रकाश और चुंबकीय तरंगों को इकट्ठा करके बने हैं। इस मशीन के द्वारा जहां जहां मैं चाहूं वहां वहां अपने रूपों में प्रकट हो सकती हूँ। यह मशीन उस जगह की किरणों को सोख कर मेरा प्रतिरूप तैयार कर देती है। मेरे इन रूपों में दिमाग नहीं रहता है। इसलिए निर्णय लेने वाली जगहों पर मुझे स्वयं जाना पड़ता है। अभी तक इसे हम दो से ज्यादा रूपों में बांट सके ऐसा नहीं बना पाए हैं। हम इस पर काम कर रहे हैं। जिस दिन यह हो गया सीमा पर हमारे फौजी भाइयों को शहीद नहीं होना पड़ेगा इस मशीन से बने आभासी फौजियों द्वारा हमारी सेना ज्यादा सुदृढ़ हो जाएगी। मैं इस प्रयोग को भारत सरकार को सौप दूंगी।

हम प्रयोगशाला से बाहर निकले। बैठक में मैनें अपना एप्रन उतार कर रखते हुए बोला, "यह तो समझ में आया। पर आप प्रोफेसर के घर क्यों गई थी और उनकी मौत कैसे हुई "? वह बोलीं मेरा आपकों यह सब दिखाने का एक मकसद था कि जब मैं आपको कुछ सच बताऊँ तो आप मुझे समझ सके। चूकि आपके शक की सुई मेरे ऊपर हैं इसलिए बिना किसी प्रमाण के आप मुझ पर विश्वास नहीं कर पाओंगे I प्रमाण तो अभी भी मेरे पास नहीं हैं पर शायद आपको मेरी बात पर विश्वास आए। उन्होंने कहना शुरू किया। मैंने सुना था कि प्रोफेसर कृष्णा ने एक ऐसा अविष्कार किया हैं कि वह वायुमंडल की उर्जा को मानसिक तंरगों में बदल कर उसको कितनी भी दूरी पर बैठे व्यक्ति के दिमाग में संदेश भेज सकते हैं। मुझे उनका यह अविष्कार काफी अच्छा लगा। मुझे लगा इस अविष्कार को अपनाने से मुझें कहीं आने जाने या फिर आभासी रूपों की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। किसी भी व्यक्ति के दिमाग से सीधा संपर्क कर संकूँगी। तो मैं उनके पास यह अविष्कार खरीदने का प्रस्ताव लेकर गयी थी।

पर प्रोफेसर कृष्णा ने बताया कि अभी उनका इन किरणों पर पूर्ण नियंत्रण नहीं हैं I अभी तक वह अपने उपकरण में सुधार नहीं कर सकें हैं। कभी कभी इन किरणों की तीव्रता इतनी बढ़ जाती हैँ कि वह सामने वाले के दिमाग को नुकसान भी पहुँचा सकती हैं। उन्होंने बताया कि उनकी प्रयोगशाला में रखी मशीन उनके दिमाग से जुड़ी हुई हैं। जब वो उसे निर्देश देते हैं तो वह उनके आस पास की उर्जा को मानसिक तरंगों में बदल कर किसी व्यक्ति को संदेश तो भेज सकती हैं पर किरणों की तीव्रता उस दिमाग पर खराब असर भी डाल सकती हैं। पशु पक्षियों पर किये हुए उनके प्रयोगों के मिश्रित परिणाम उन्हें मिलें थे।

मैं प्रोफेसर कृष्णा को यह बोलकर कि वह मेरे साथ संपर्क में रहें और किसी तरह की कोई आवश्यकता हों तो बेझिझक कहें और प्रयोग पूरी तरह सफल होंने पर उसका लाभ मुझे उठाने की अनुमति दें"। यह कर मैं निकल ही रहीं थी कि प्रोफेसर ने अपना हाथ आगे बढ़ाया मिलाने के लिए I मैं कभी किसी से हाथ नहीं मिलाती हूँ जैसा कि उस दिन आपने भी महसूस किया होगा हल्का सा करंट या झटका लगता हैं। पर पता नहीं मैं किस सोच में थी मैंने उनसे गलती से हाथ मिला लिया। मेरे आभासी शरीर का पूरा वजूद तरंगों का बना हैं। प्रोफेसर कृष्णा भी वायुमंडल की उर्जा तरंगों पर काम कर रहें थे। मेरे हाथ मिलाते ही उर्जा के टकराव के कारण उनकी उर्जा पूरी तरह से मेरे शरीर में समाहित हों गयी। मैं कुछ समझ नहीं पायी। मुझे लगा यह असर थोड़ी देर के लियें हीं हुआ होगा इसीलिए मैं उनकों वहीं बैठा कर वापस चली आयी। इस तरह से उनकी मौत हो जायेगी यह मैंने कभी सोचा नहीं था। 

मैं उनकी बातों से सहमत था क्योंकि प्रोफेसर कृष्णा की एक फाइल में इस अविष्कार का उल्लेख था और यह भी यह अभी निर्माण की प्रक्रिया में हीं था। इस तरह सें एक गुत्थी और भी सुलझती हैं कि प्रोफेसर कृष्णा का शरीर तापमान इतना कम क्यों था।

उन महिला ने मुझें बोला आप चाहें तो मुझे खून के इलजाम में गिरफ्तार कर सकते हैं I पर जैसा आप देख सकते हैं कि यह मैने जानबूझकर नहीं किया था। मैं उनको दिलासा देकर कि उनके साथ अन्याय नहीं होगा। अपने सीनीयर से मिला उनको पूरी बात बताई वीडियों दिखाया। साथ हीं वो खिड़की वाले वीडियों को वापस देखा। उसमें प्रोफेसर कृष्णा ने हीं पहले हाथ आगे बढ़ाया था हाथ मिलाने के लिये I हम सबने मिलकर यह तय किया कि शायद वह महिला निर्दोष हैं I प्रोफेसर की मौत हार्ट अटैक से हुई थी और फाइल को बंद कर दिया। हमारा निर्णय सहीं था या गलत यह तो आप प्रबुद्ध पाठक जन ही बताइयें।


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