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Ragini Ajay Pathak

Tragedy Others

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Ragini Ajay Pathak

Tragedy Others

कामकाजी बहू हूँ।

कामकाजी बहू हूँ।

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शांति जी अपने पति आलोक जी के साथ अपने बेटे बहू के पास मुम्बई अपने घुटनों के इलाज कराने आयी थी।


हालांकि उन्होंने अपने बेटे आकाश को बहुत मना किया। कि वो अपना इलाज यहाँ वाराणसी में करा लेंगी। वहाँ भी अच्छे डॉक्टर और अस्पताल है। लेकिन आकाश ने कहा,"मां डॉक्टर तो मिल जाएंगे लेकिन आराम तो नहीं मिलेगा ना।फिर तुमको घर के काम पापा की दवाइयां ये सब काम भी तो आपके जिम्मे ही आता है। और स्नेहा और खुशी (शांति जी की बेटियां) भी यही है। उन दोनों से और बच्चों से मिलना जुलना भी हो जाएगा माँ प्लीज मान जाओ ना"

बेटे के इतना मनुहार करने पर शांति जी मान गयी। और मुंबई आ गयी।

मां पापा के आने से आकाश बहुत खुश था लेकिन आकाश की पत्नी रक्षा खुश नहीं थी। जो लाख छिपाने पर भी उसके चेहरे के हाव भाव से साफ पता चल रहा था।


पढ़ी लिखी आत्मनिर्भर रक्षा देखने में बेहद सुन्दर और प्रतिभा सम्पन्न थी वो पेशे से एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर थी । शांति जी स्वयं पढ़ी लिखी नहीं थी लेकिन उन्होंने अपने तीनो बच्चों को शिक्षित और आत्मनिर्भर बनाया क्योंकि उन्हें शिक्षा का महत्व पता था इसीलिए उन्होंने अपने बेटे के लिए बड़े अरमान से पढ़ी लिखी आत्म निर्भर रक्षा को अपनी बहू के रूप में चुना।

घर में हर काम के लिए बाई आती थी रक्षा घर का कोई काम नहीं करती थी। क्योंकि उसे घर के काम करने में कोई दिलचस्पी नहीं थी।


इस बात से शांति जी और आलोक जी को भी कोई परेशानी नहीं थी। वो समझती थी कि रक्षा ऑफिस के कामों से थक जाती है। इसलिए घर और ऑफिस दोनो के काम एक साथ संभालना ऐसा संभव नहीं है।लेकिन रक्षा ऑफिस से सीधा आकर मोबाइल में लग जाती। या छुट्टियों में अपनी सहेलियों के साथ बाहर घूमने चली जाती।


शांति जी को आए दो सप्ताह हो गए थे लेकिन रक्षा ना तो उन लोगो के पास जाकर कभी उनके साथ बैठती थी और न ही बात करती थी । बस काम से काम बात करती। शांति जी के आने के बाद आकाश ने घर में एक फुल टाइम नौकरानी एक दी थी जो सारा घर काम और शांति जी और आलोक जी से जुड़े सारे काम सम्भालती थी । जो चीज नौकरानी नहीं बना पाती थी रक्षा वो बाहर से ऑर्डर कर दी जाती थी । जैसा खाना बन जाता था वैसा ही सबको खाना पड़ता था । शांति जी को उसका बनाया हुआ खाना पसंद तो नहीं आता था लेकिन बेटे बहू की खुशी के लिए मुस्कुराते हुए खा लेती थी। 


एक दिन शांति जी ने आकाश से कहा,"बेटा रक्षा बहू कुछ बोलती नहीं ना ही हमारे पास बैठती है।"


तब आकाश ने कहा,"मां वो बोलती ही बहुत कम है। और ऑफिस का भी बहुत काम होता है। थक जाती है।"


शांति जी आलोक जी बेटे की बात सुनकर चुप हो गए। 


एक दिन नौकरानी ने बताया की वो तीन चार दिन नही आएगी। तो शांति जी ने कहा,"कोई बात नहीं तब तक मैं कर लूंगी काम"


उतने में रक्षा ने तपाक से कहा,"नही मांजी आपको रसोई में जाने की कोई जरूरत नहीं। वरना सबको बोलने का और मुझे ताने देने का मौका मिल जाएगा की कुछ दिनों के लिए सास ससुर आए थे और उनकी सेवा भी नही कर पाई। " रक्षा का इशारा अपनी ननदों की तरफ था।

शांति जी आलोक जी बात को समझ गए लेकिन अपमान का घूंट पीकर चुप रह गए।


पिछले तीन दिनों से खाना और नाश्ता दोनों ही बाहर से आ रहे थे । खाना बहुत ही ऑयली और मसालेदार होने की वजह से आलोक जी का शुगर लेवल बढ़ गया।

अगले दिन शांति जी सुबह सुबह बिना पूछे रसोई में चली गई। और जाकर चाय बनाई। बिना शक्कर की चाय आलोक जी के लिए और मसाले वाली चाय खुद के लिए और बेटे बहु के लिए बनाई और उन्हें आवाज देकर जगाया।


चाय देखते आकाश तो खुश हो गया लेकिन रक्षा का मूंह बन गया। शांति जी ने चाय रक्षा को पकड़ाई तो भौंहे टेढ़ी करकेरक्षा ने कहा,"मांजी मैने आपको मना किया था ना। रसोई में जाने से"


तब शांति जी मुस्कुराते हुए कहा,"बहू तुम तो बस चाय का मजा लो कोई तुमसे कुछ नही कहेगा। अगर कोई कहता है तो उसे मेरे पास भेज देना।"

एक सप्ताह तक अब शांति जी ने घर के सारे काम किए लेकिन क्या मजाल जो रक्षा ने मदद करने की जगह कभी झूठी तारीफ ही कर दी होती।

शांति जी और आलोक जी को रक्षा का अभद्र व्यवहार अब समझ में आने लगा था। आकाश ने जब शांति जी को डॉक्टर को दिखाया तो उन्होंने ज्यादा तेल मसाला खाने से मना किया था।


नौकरानी आने के बाद शांति जी ने अब उसको भी कम तेल मसाले डालने और सबके स्वादानुसार भोजन बनाने के लिए कहा तो नौकरानी की भौंए तन गई।


उसने गुस्से में कहा,"आप मुझे समझाने के लिए रहने दीजिए। आप सासो की इसी ही नुक्तता चीनी की वजह से बहुएं आप जैसी सासो के साथ नही रहना चाहती।"


 उसी समय सुबह रक्षा ऑफिस के लिए तैयार हो रही थी । उसने सब कुछ सुना लेकिन मुस्कुरा कर अनसुना कर के चली गई।


आलोक जी ने शांति जी से कहा,"देखो तुम रक्षा को समझाओ की वो नौकरानियों को कम से कम खाने का मैन्यू और तरीका तो बता दे।"


तभी उसी समय उनकी दोनों बेटियां उनसे मिलने वहाँ आ गयी। बातों बातो में उन लोगो को पता चला कि आलोक जी का शुगर लेवल बढ़ा हुआ है। दोनो बेटियां मल्टीनेशनल कंपनी में अच्छे पदों पर थी। तभी उनकी बड़ी बेटी ने कहा," पापा पहले चलो आप दोनों आज सबसे पहले डॉक्टर के पास"


उसने अपने परिचय के अच्छे डॉक्टर को उनलोगों को दिखाया। और दवा लेकर घर आ गयी। तब शान्ति जी ने कहा,"अरे तुम दोनों की आज छुट्टियां थी क्या?"


तब दोनो ने कहा,"नही माँ हमने छुट्टी ली है अब हम तीन दिन तुम्हारे और पापा के साथ रहेंगे और आप दोनों को मुंबई दर्शन कराएंगे।"


आलोक जी इस मामले में पुराने ख्यालों के थे उन्हें बेटी के ससुराल का खाना और बेटी के पैसे लेना दोनो मंजूर नही था।


शाम को रक्षा और आकाश आये। तो इस बार रक्षा का मूड दोनो ननदो को देखते खराब हो गया।


उसने अंदर कमरे में जाकर आकाश से कहा," अब क्या तुम्हारी दोनो बहने भी यही रहेगी क्या?प्लीज् हां मत कहना। कोई भी बहाना कर के इनको निकालो यहाँ से मैं एक साथ इतने लोगो को अपने घर मे बर्दाश्त नहीं कर सकती।"


आकाश ने कहा,"कैसी बातें कर रही हो रक्षा? धीरे बोलो कोई सुन लेगा तो उन्हें बुरा लग जाएगा।"


अगली सुबह रविवार को सबकी छुट्टियां थी सब एक साथ हाल में बैठकर हंसी मजाक कर रहे थे।


तभी शांति जी ने रक्षा को आवाज लगाई - रक्षा बेटा, इधर तो आओ ,कुछ देर हमारे पास भी बैठो,

 फिर तो हम सब कुछ दिनों में चले ही जाएंगे' ।

शांति जी के अचानक बोलने से रक्षा सकपका गयी और आकर उनके पास आकर बैठ गई । लेकिन पूरा समय मोबाइल देखती रही और फिर बहाना करके उठकर वहाँ से चली गयी।


अगले दिन शांति जी मौका देखकर पहली बार उसके कमरे में गयी और बड़े प्यार से अकेले में रक्षा समझाते हुए बोलीं - 'बेटा मैं पिछले कुछ दिनों से देख रही हूँ कि तुम ऑफिस से आने के बाद भी फोन से ही चिपकी रहती हो ,कभी ना घर का कोई काम देखती हो ,ना हम सब से बात करती हो , बेटा रिश्ते और घर नौकरानी के भरोसे थोड़े ही चलता है ।स्वयं भी देखना पड़ता है तभी घर ठीक से चल पाता है। जब से आयी हूं देख रही हूं तुम उदास रहती हो, जो नौकरानी दे देती हैं बनाकर वो तुम सब खा लेते हो ये गलत है बेटा। तुम नौकरानी से अपनी पसन्द का खाना बनवाओ, बोलो थोड़े तेल मसाले डाले, राशन का हिसाब रखा करो। ये सब मैं खुद के लिए तुम्हारे भले के लिए समझा रही हूं ताकि सभी लोग स्वाद लेकर रुचि से खा सकें और स्वास्थ्य भी ठीक रहे ।


शांति जी के इतना कहते ही रक्षा भड़क उठी ।   गुस्से में जोर जोर से चीखते हुए से स्वर में बोली-'मम्मी जी,पहले तो आप बिना पूछे मेरे कमरे में चली आयी।और अब बिना मांगे नसीहत भी दे रही हैं।आप ने हम बहु को समझ क्या रखा है ,क्या हम बस एक चलती फिरती मशीन हैं जो घर का सारा काम चुपचाप करते रहें और सबके ताने उलाहने भी सुनते रहें और एक चूं तक भी न करें ।आपके बेटे की तरह मैं भी तो दिन भर मेहनत करती हूँ, मेरा भी दिमाग खर्च होता है ,तो क्या मुझे थकान नहीं होती ,क्या मेरा मन नही करता कि मैं भी घर आकर आराम करूँ ।"


मुझे पता है ये सब आप अपनी बेटियों को दिखाने सुनाने के लिए कर रही है। उनको बताना चाहती गई कि मैं काम चोर हूं। क्योंकि मैंने तीन दिन बाहर से खाना आर्डर कर दिया था। अगर मैंने बाहर से खाना ऑर्डर कर दिया तो क्या कुछ गलत किया ।आपको तो समय से आपकी पसन्द का खाना मिल ही रहा था ना, फिर क्यों गयी आप मेरी रसोई में ताक झाँक करने। राशन बर्बाद हो या खाना आप से क्या मतलब पैसे मेरे बर्बाद होते है ना तो होने दीजिए मैं कमाती हूँ। जहाँ और जैसे मर्जी करे खर्च करूं। आपसे मांगती तो नहीं ना ,ना ही आपकी तरह किसी पर आश्रित हूँ।


 और आपकी सामान्य जानकारी के लिए बता दूँ कि बाहर काम करने वाली अधिकांश महिलाएं ऐसा ही करती हैं ।और हाँ ,ये घर के काम मुझसे नहीं होते ,न तो मैंने कभी ये काम किये हैं और न ही मुझे पसन्द है।


मैं आपकी तरह कोई अनपढ गंवार घरेलू महिला नहीं कामकाजी महिला हूँ।शांति जी अवाक रक्षा का मुँह देखती रह गईं । दरवाजे पर खड़े आलोक जी ,दोनो बेटियां और आकाश को समझ ही नही आ रहा था कि हुआ क्या जो रक्षा अचानक इतना चिल्लाने लगी।


इधर शांति जी अपमानित नजरे झुकाए सोचने लगी कि क्या इसीलिए लोग पढ़ी लिखी लड़की को बहू बना कर लाते हैं कि वो ससुराल आकर घर के बड़ों और माता पिता समान सास ससुर का जबाब देकर उनकी बेइज्जती करे । क्या पढ़ लिख कर अपने सारे संस्कार भुला दिए जाने चाहिए ।


तब आलोक जी ने कहा,"वाह री हमारी पढ़ी लिखी कामकाजी बहु जिसे ये तक नही पता कि बड़ो से बात कैसे करते है। वो मेरी पत्नी को घरेलू गंवार औरत कह रही है। तो तुम्हारी सामान्य जानकारी के लिए बता दूं की इसी गंवार महिला ने तुम्हारे पति को भी संस्कार और शिक्षा दी है। और हमने अपनी बेटियों को भी आत्मनिर्भर बनाया है। लेकिन इसका ये मतलब कतई नहीं कि वो अपने बड़ो का सम्मान भूल जाएं।"


तभी उनकी बेटी ने कहा,"भाभी आपके इसी व्यवहार के कारण हम एक शहर में रहकर भी कभी नही मिलते क्योंकि आपको हमारा आना जाना और भाई से बात करना नहीं पसंद हम आजतक अपने संस्कारो के कारण ही चुप थे क्योंकि आप हमारी बड़ी भाभी है। लेकिन आज आपने ये करके अपने मान सम्मान के साथ रिश्ता भी खो दिया। हम अपने माँ पापा को लेकर जा रहे है। लेकिन अब अगर आप चाहेंगी तो भी हम आप से रिश्ता नही जोड़ पाएंगे। चलिए मां


"रुको मां!"


आकाश ने कहा-" आजतक मैं चुपचाप इसकी सारी बत्तमीजी बर्दाश्त करता रहा इसकी गलतियों पर पर्दा डालता रहा।जिसका नतीजा ये हुआ कि आज इसने आप का ही अपमान किया। अगर मेरी मां ने औरतो पर हाथ उठाना सिखाया होता तो आज मैं तुम्हारा वो हाल करता कि तुम कभी बोलने लायक नही रह जाती।"


लेकिन अब तुम मुझसे ये उम्मीद कभी मत करना कि मैं तुम्हारे माता पिता का सम्मान करूँगा। या उनसे कभी बात करुंगा। जिस तरह इस घर मे मेरी मां मेरी बहन नही आ सकती। उसकी तरह अब तुम्हारे माता पिता भी मेरे घर मे कभी दिखाई नही देने चाहिए। अब तुम सोचो क्यों क्योंकि मैं कुछ ना भी करू अपने माता पिता के लिए तो भी उनकी दो बेटियां सक्षम है। लेकिन तुम तो अकेली हो अपने माँ पापा की।


इतना सुनते रक्षा ने तुरंत रंग बदल लिए,उसने कहा

"ये तुम कैसी बातें कर रहे हो आकाश , तुम चाहते हो तो मैं माँजी से माफी मांग लेती हूं। लेकिन प्लीज् ऐसी बातें मत बोलो"


माँजी आकाश को समझाइए आखिर मेरे मातापिता के प्रति भी तो इसका कोई कर्तव्य है। उनके तो कोई बेटा नहीं। उनका इकलौता सहारा तो मैं ही हूँ।


शांति जी ने नजर झुकाए सिर्फ दो टूक कहा,"बहू मैं अनपढ़ गंवार घरेलू महिला हूँ मैं किसी को क्या समझा सकती हूं।"


और उसी समय अपनी बेटियों के साथ चली गयी। और मन ही मन सोचने लगी अगर पढ़ लिखकर ऐसा बनना हो तो वो तो अनपढ़ ही ठीक हैं । 


रात में आलोक जी ने शांति जी से कहा,"क्या सोच रही है आप ?जो हुआ उसे बुरा सपना समझकर भूल जाइए। हम एक दो दिन में अपने घर वापिस चले चलेंगे, अभी आपका पति इस काबिल है कि आप की हर जरूरत पूरी कर सकते।"


नम आंखों से आँचल से आंखों के आंसू पोछती शान्ति जी ने कहा,"आप तो जानते हैं जी कि हमने घर , परिवार और बच्चों को एक सुसंस्कृत वातावरण में पाला और ताकि भविष्य में हमारे तीनो बच्चें और बहु मिल जुल कर एकसाथ रहेंगे, एक दूसरे के काम आएंगे और अपने बच्चों को हमने हमारा भरपूर समय दिया, कभी अपने बुढ़ापे के बारे में नहीं सोचा,भविष्य के लिए कोई बचत नही की जिससे वो बड़े होकर एक अच्छे नागरिक बन कर शान्ति पूर्ण प्रेम और सद्भाव के साथ जीवन यापन कर सकें ।

पढ़ी लिखी बहू भी यही सोचकर लाए थे। लेकिन हमारा सोचा हुआ कुछ भी नहीं हुआ। और वो इतना कहकर फफककर रो पड़ी।



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