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ज्योति

ज्योति

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"अरे ज्योति.. बहुत दिन बाद दिखाई दीं तुम..कैसी हो?पढ़ाई कैसी चल रही है?"

मैंने बहुत दिनों बाद देखा था उसे।

ज्योति, बहुत ही समझदार ,पढ़ाई में होशियार और सभ्य बच्ची थी। पिता गरीब मजदूर थे, इंटर तक पढ़ाई मुफ्त शिक्षा के तहत पूरी हो गयी थी। लेकिन इंटर के बाद आगे पढ़ाना उसके पिता के लिए संभव न था।वो उसकी शादी कर देना चाहते थे।तब पहली बार ज्योति मेरे पास आई थी, मैं उस गाँव के विद्यालय में नव नियुक्त हुई थी। ज्योति का छोटा भाई मेरे विद्यालय का छात्र था और बहुत होशियार था।ज्योति ने मुझे अपने हालात और आगे पढ़ने की इच्छा बताई और साथ ही ये भी कि, मैं उसके पिताजी को समझाऊँ उसकी उच्च शिक्षा के लिए।मुझे बेहद प्रसन्नता हुई कि विपरीत परिस्थितियों में भी इस बच्ची के मन में पढ़ाई के लिए कितना जज्बा है।बच्ची वाकई ज़हीन थी।

मैंने अगले ही दिन उसके पिताजी को बुलवाया और ज्योति की पढ़ाई सुचारू रूप से जारी रखने के लिए समझाया।काफी सीधे और सरल थे उसके पिताजी।उन्होंने आर्थिक मजबूरी का हवाला देते हुए कहा कि लड़की को इंटर तक पढ़ाना भी गांव में बड़ी बात है।मैंने उन्हें बताया कि ज्योति एक प्रतिभाशाली बच्ची है, उसकी अगर आगे पढ़ने की इच्छा है तो इच्छा को मारना गलत होगा।वैसे भी सोलह वर्ष की ज्योति का विवाह कानूनन वैध नहीं होगा। स्नातक करते करते वो विवाह योग्य भी हो जाएगी और हो सकता है वो कुछ अच्छा कर जाए..आपका नाम रोशन करे।


मैंने यथासंभव आर्थिक सहायता देने का वचन भी दिया और ज्योति से कहा कि वो जब भी चाहे पढ़ाई में मुझसे मदद लेने विद्यालय आ सकती है।उस समय ज्योति के पिताजी और सोच विचार करने की बात कहकर वहां से चले गये।कुछ दिनों बाद ज्योति फिर आई..आंखों में चमक, आत्मविश्वास भरी मुस्कराहट लिए।उसने बताया उसके पिताजी आगे पढ़ाने के लिए तैयार हो गए हैं और उसने अपनी अन्य सहेलियों के साथ एक कॉलेज में प्रवेश भी ले लिया है।

उसका दमकता चेहरा देखकर मुझे सच में बहुत खुशी हुई। मैने मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद दिया।उसके बाद अक्सर ज्योति का आना होता रहता पढ़ाई सम्बंधित सहायता के लिए।वाकई हर विषय पर अच्छी पकड़ और शिक्षा के लिए खासा जुनून था उसमें। अधिकारी बनने की चाहत पाले हुए थी मन में।मुझे भी ज्योति बड़ी प्यारी लगती थी, मैं अक्सर उसके लिए प्रार्थना करती थी कि इसे खूब सफलता और यश मिले।

इधर ग्रीष्म कालीन अवकाश हुए और उसके बाद मैं विद्यालयी गहमागहमी में व्यस्त हो गयी।ज्योति काफी दिन से नहीं आई थी,सोचा कि पढ़ाई में व्यस्त होगी। लेकिन आज..ज्योति को देखकर खुशी और आश्चर्य दोनों एक साथ हुए।अब उसके चेहरे में वो दमक नहीं रही थी। मुझे किसी अनहोनी की आशंका हुई।

"मैडम, मेरी शादी तय हो गयी है..।"ज्योति का बुझा हुआ स्वर आया।

मैं अवाक रह गयी।

"लेकिन .."बस इतना ही निकला मुंह से।

वो खुद ही मेरे अंदर उठते प्रश्नों को समझते हुए बोली..

"मैडम, जिस प्राइवेट कॉलेज में हम सब सहेलियों ने प्रवेश लिया था..वो दरअसल फर्जी मान्यता लेकर चल रहा था। दो साल तक हमें कुछ भनक भी नहीं लगी। दूसरे साल जब सरकारी जाँच में सामने आया तब से कॉलेज बंद है और संचालक भाग गया है कहीं, उसका फोन भी बंद आता है। हम सभी के दो साल तो बर्बाद हुए ही,साथ ही पिताजी की गाढ़ी कमाई भी युंही चली गयी।अब पिताजी ने शादी तय की तो मना करने की हिम्मत नहीं कर पाई।"

ज्योति की आँखें डबडबा आई थीं और गहन उदासी से चेहरा निस्तेज हो गया था।

मुझसे ज्यादा कौन समझ सकता था ,उसकी पढ़ाई के प्रति ललक,जुनून, अधिकारी बनने की महात्वाकांक्षा..।मुझे मन किया वो संचालक सामने आ जाए तो उसे जूते से मारूं मगर फिर भी ज्योति के दो साल और गरीब पिताजी के रुपए तो वापस आना असंभव ही था।

मुझे अवाक और शब्द शून्य देखकर ज्योति ने कहा.."मैडम, उदास हूँ लेकिन निराश नहीं हूँ.. पूरी कोशिश करुंगी शादी के बाद फिर से पढ़ाई जारी रख सकूं.. ससुराल में आर्थिक समस्या हुई तो सिलाई या ट्यूशन करके पैसे जुटाउंगी लेकिन अपने सपनों को जरूर पूरा करुंगी।"

मुझे इस समय वही ज्योति दिखी जो पहले दिन आई थी मेरे पास आत्मविश्वास से लबालब।ससुराल में पढ़ाई जारी रख पाना यूं भी आसान नहीं होगा ।फिर भी,मैं सोच रही थी,ज्योति मिसाल है हम सबके लिए, जहां एक तरफ विपरीत परिस्थितियों में हम बिखर जाते हैं या अवसाद में चले जाते हैं ज्योति अब भी राह बनाने में जुटी है।

मेरी भी आंखे डबडबा आईं।मैंने मन ही मन उसे आशीर्वाद देते हुए उसके सिर पर हाथ फेरा और कहा.."ज्योति, रास्ता तुम्हें खुद ही बनाना पड़ेगा लेकिन जहां भी जरूरत हो मुझे याद करना..।"

मेरे प्रोत्साहन से बुझती हुई ज्योति फिर जगमगाने लगी,और मैं मन ही मन भ्रष्टाचार के कोढ़ को कोसती हुई विद्यालय की ओर बढ़ गयी।




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