जीवन का एक दिन..
जीवन का एक दिन..
अजीब विडंबना है.... जीवन में एक दिन या जीवन का एक दिन... उफ्फ... संडे को भी सैड डे बना दिया, ये सोच सोच कर......
क्या करें एक दिन में, जिसे दूसरे तो क्या कम-से-कम हम ही याद रखें,
रोज तो एक जैसा ही जाता है, दिन अलग तारीख अलग....
पर सच कहें.. इस एक शब्द में या इस एक वाक्य में कितनी खुशियां कितने ग़म,, कितने त्योहार, कितनी जयंती और ना जाने क्या छुपा हुआ है,
एक दिन कितना महत्वपूर्ण बन जाता है जब उस दिन के साथ कोई यादगार पल या हसीन वाक़या जुड़ जाता है...
जिक्र करना नहीं चाहते पर एक संदेश भी है,, जो हम लिखना चाहते हैं,
हकीकत और फ़िल्मों में कभी कभी ज्यादा फर्क नहीं होता... कभी जिंदगी में फिल्म बन जाती है, कभी फिल्म को जिंदगी में उतार लिया जाता है..
एक दंपति के यहां काफी मिन्नतों के बाद एक बेटे का जन्म हुआ, मानो माँ बाप की खुशियों का जन्म हुआ, अपना हर ख्वाब उन्होंने अपने बेटे से जोड़ लिया.... सुख सुविधाओं के साथ साथ उसे बहुत अच्छे संस्कार भी मिले...
माँ बाप के आशीर्वाद और अपनी मेहनत से उसने अपना एक मुकाम बनाया....
शादी के लिए रिश्तों की लाइन लग गई.. बस यहीं एक चूक हो गई...
बेटे को एक ऐसी लड़की से प्यार हो गया जिसके माँ बाप काफी रूढ़िवादी थी... गैर समाज में लड़की ब्याहना उन्हें नागवार लगा...नतीजा ये कि शादी नहीं हो सकी...
माँ बाप के दबाव में लड़की ने समाज में शादी कर ली... किन्तु शादी की पहली रात ही आत्महत्या कर ली..
इधर लड़के को पता चला तो उसने भी अपनी जान दे दी...
इतना सब लिखने के पीछे सिर्फ एक ही मकसद था हमारा... कुछ दिन पहले एक शायर को पढ़ रहे थे.... आजकल बच्चे जिस तरह अपनी जिंदगी से खेल जाते हैं, उस पर उनकी लिखी दो लाइन दिल छू गई...
ऐसी घटना को उन्होंने इस एक दिन से जोड़कर क्या खूब लिखा था,
...और फिर, एक दिन, बैठे बैठे उसे
अपनी दुनिया बुरी लग गई,
....जिसको आबाद करते करते
उसके माँ बाप की जिंदगी लग गई,
जिंदगी के हर पल को जीएं... दुख सुख तो दिन रात की तरह है.. आज ही अपनी मित्र से हम कह रहे थे कि हम जीवन का उत्सव मनाते हैं.. मौत का उत्सव तो हमारे बाद लोग मना ही लेंगे, जीवन का एक दिन नहीं जीवन के हर पल को जीएं।
